AR Rahman (रहमान) साहब, मद्रास के मोज़ार्ट, ऑस्कर के बादशाह, और अब… विक्टिम कार्ड के नए प्लेयर? वाह उस्ताद। यानी जब धुनें दिल छूती थीं, तो ग्लोबल जादूगर, और जब कम काम आ रहा है, तो अचानक “कम्युनल थिंग” का राग अलापने लगे?
आपने बयान दिया है कि पिछले आठ सालों में हिंदी फिल्म इंडस्ट्री बदल गई है, पावर शिफ्ट हो गया है, नॉन-क्रिएटिव लोगों के हाथ में फैसले आ गए हैं, और शायद ये “कम्युनल थिंग” भी है।
आठ साल? यानी ठीक 2018 से अब तक, मोदी सरकार के दौर का टाइमलाइन। कितना खूबसूरत संयोग है। जैसे कोई कैलेंडर खोलकर डेट चुन ली हो। ये तो वही पुराना पैटर्न है; लेफ्टिस्ट-इस्लामिस्ट स्टाइल: सफलता पर क्रेडिट खुद को, असफलता का ठीकरा हिंदू-मोदी-कम्युनल फोर्स पर फोड़ो।
स्वरा भास्कर की तरह- फिल्में फ्लॉप, रिलेवेंस जीरो, तो रोना “फासिस्ट हिंदू, पितृसत्ता, बीजेपी”। नसीरुद्दीन शाह की तरह- हर इंटरव्यू में “कम्युनल हेट” का राग, लेकिन दर्शक फिल्में नहीं देखते तो दोष “इंटॉलरेंट सोसाइटी” का। जावेद अख्तर की तरह- मोदी-विरोधी ट्वीट्स की बौछार, लेकिन खुद के गाने अब धूल फांक रहे हैं।
सबका फॉर्मूला एक ही है: सफलता का मतलब कि तुम जीनियस हो और असफलता मतलब समाज/या सरकार की साजिश। और आज ये सभी लोग जब फूंके हुए कारतूस हो चुके हैं तो दोष हिन्दुओं का?
लेकिन उस्ताद, ज़रा आईना देखिए।
आपकी वो जादुई धुनें, वो शोहरत, वो ऑस्कर तक का सफर, ये सब इन्हीं “कम्युनल” लोगों के बीच से गुज़रा था ना?
रोजा, बॉम्बे, दिल से… मणिरत्नम जैसे हिंदू डायरेक्टर के साथ, हिंदुस्तानी ऑडियंस ने सीना ठोककर गले लगाया।
ताल.. सुभाष घई ने घर-घर पहुंचाया, वो पंजाबी-हिंदी-माउंटेन मिक्स आज भी नॉर्थ इंडिया के किचन में गूंजता है।
रंगीला, लगान, स्वदेश, जोधा अकबर…. हिंदू प्रोड्यूसर्स, हिंदू हीरो-हीरोइन, हिंदू फैंस ने आपको स्टार बनाया।
वंदे मातरम एल्बम… राष्ट्रभक्ति का गाना, जिसे उन्हीं दिलों ने गुनगुनाया।
और याद है वो ज़माना, जब बॉलीवुड में फिल्में लोग सिर्फ सुपरहिट गाने सुनने के लिए थिएटर जाते थे?
झुमका ‘गिरा रे बरेली के बाजार में’ हो या ‘चाईये चाईये..’ म्यूजिक ही फिल्म को खींचता था। आज के दौर में बॉलीवुड बदल गया है। गानों की भूमिका कम हो गई है, रीमेक, आइटम सॉन्ग, बैकग्राउंड स्कोर पर फोकस। Dhurandhar फ़िल्म का ही एग्जाम्पल ले लो। लेकिन आप उसी पुरानी ग्लोरी के नाम पर रोना मचा रहे हैं, जैसे इंडस्ट्री ने आपको ही टारगेट किया हो। अब अचानक “कम्युनल थिंग”?
शायद वजह ये है कि ऑडियंस अब अच्छा, फ्रेश म्यूजिक चाहती है न कि पुराना फॉर्मूला। या आपका रिसेंट आउटपुट उतना हिट नहीं रहा जितना पहले होता था। या फिर बिजनेस है। क्रिएटिविटी से ज्यादा मार्केटिंग, म्यूजिक लेबल्स, कॉर्पोरेट फैसले।
तो कुछ सवाल सुनिए
क्या लगान को कम्युनल भारत ने नहीं अपनाया?
क्या जय हो को उसी समाज ने गुनगुनाया?
क्या ऑस्कर की राह में किसी ने आपका मज़हब पूछा?
नहीं भाई।
लोगों ने सिर्फ एक चीज़ पूछी कि क्या रहमान की बनाई धुन दिल छूती है या नहीं?
रहमान ये भी भूल गए कि उनके करियर का Peak पॉइंट उसी टाइम था जब देश में Atal Bihari Vajpayee वाली BJP की सरकार थी। (1998–2004), जिसे आज “कम्युनल” कहने का ट्रेंड है। उसी दौर में Dil Se फ़िल्म आई (1998), Lagaan (2001) और Swades (2004) जैसी फ़िल्में आईं, जिन्हें न सिर्फ film critics ने सराहा बल्कि उसी “कम्युनल” कहे जाने वाले समाज ने सिर–आँखों पर बैठाया; न तब किसी ने रहमान का मज़हब पूछा, न सरकार ने उनकी धुनों में कोई अड़ंगा लगाया। इसलिए आज पूरे दौर को “कम्युनल माहौल” कहकर अपनी मौजूदा असफलताओं का बहाना बनाना, fact बेस्ड नहीं बल्कि सेलेक्टिव कंफर्ट किस्म का लॉजिक है।
और हर वो कलाकार जो अपनी गिरती रिलेवेंस को हिंदू-मोदी-समाज पर टाँग देता है, वो इतिहास में पीड़ित नहीं, बहाना बनकर दर्ज होता है।
तो भाई, रोने-धोने की बजाय कुछ नया क्रिएट करो। रामायण के साथ हंस ज़िमर के साथ काम कर रहे हो ,वो तो कमाल होगा। मोदी सरकार में ही ये काम भी मिला है तुम्हें। उसमें फोकस करो, वही “रेडिएंट” बनो जो आप कहते हो। और आज के टाइम पर इतने प्लेटफ़्रोम हैं। उन पर जाकर के भौकाल मचाओ। यूट्यूब है, साउंड क्लाउड है। हॉलीवुड है, K ड्राम है। कौन रोक रहा है तुम्हें? कौनसा हिंदू जाकर तुम्हारी कला को मैदान पर उतरने से रोक रहा है?
क्योंकि सच्चा जीनियस स्केपगोट की तलाश नहीं करता, वो बस बेहतर धुन बनाता है। और हाँ, अगली बार इंटरव्यू में “कम्युनल” बोलने से पहले पुरानी फिल्में देख लेना… याद आएगा कि वो “कम्युनल” लोग ही थे जिन्होंने आपको गॉड लेवल पर पहुंचाया। धुन बदलिए उस्ताद, दुश्मन नहीं। जय हो!




