आपको यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का “मिट्टी में मिला देंगे” वाला बयान याद है। उन्होंने ये बयान दिया था जब माफिया अतीक अहमद ने राजू पाल की हत्या करवाई थी। माफिया अतीक इसके बाद सही में मिट्टी में मिल गया। लेकिन वर्तमान में एक और माफिया पर कार्रवाई यूपी की योगी सरकार कर रही है और इससे चिल्लाहट मच रही है समाजवादी पार्टी के खेमे में।
कुछ दिनों से यूपी में कोडीन कफ़ सिरप का मामला खूब चल रहा है, अब तक दर्जनों गिरफ़्तारियाँ हो चुकी हैं। करोड़ों की कफ़ सिरप पकड़ी जा चुकी है। कफ़ सिरप मामले के आरोपितों की फोटो अखिलेश यादव के साथ आ रही है। उनके लिंक सीधे तौर पर समाजवादी पार्टी नेताओं के साथ जुड़ रहे हैं।
सिंडिकेट का बड़ा मेंबर राहुल यादव निकला लकी यादव व अखिलेश यादव का करीबी !!
— 𝐍𝐢𝐥𝐞𝐬𝐡 (@ImNileshVats) December 2, 2025
मीडिया से पूछना है लकी व अखिलेश को कटघरे में कब खड़ा कर रही है ?
लकी यादव का कहना है….
नशीले कफ सिरप की वजह से कई मासूमों ने अपनी जिंदगी गवां दी, उनकी मौत का जिम्मेदार कौन, सच सामने है?
कौन किसकी सह… pic.twitter.com/AtBnFjHsWn
लेकिन आख़िर ये पूरा मामला क्या है, और क्यों समाजवादी पार्टी इससे हैरान परेशान है , ये जानते हैं। मामले को समझने के लिए हमें सबसे पहले जनना होगा कि आख़िर वो कोडिन क्या चीज है, जिसके नाम पर सारा बवाल है।
क्या चीज है कोडिन
कोडिन दरअसल अफ़ीम से निकला हुआ एक पदार्थ है। सामान्य तौर पर जिन सिरप में इसका इस्तेमाल होता है वो खांसी का इलाज करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन कहते है कोई भी चीज़ ज़्यादा इस्तेमाल करने के बाद विष बन जाता है। वही हाल कोडिन के साथ है। यदि इसकी अधिक मात्रा ले लिया जाए तो दिमाग को सुन्न कर देता है।
लंबे समय तक इस्तेमाल करने पर हेरोइन या अफीम जैसी ही लत पैदा करने की क्षमता रखता है। बीते कुछ वर्षों में तेजी के साथ सॉफ्ट ड्रग के तौर पर इसका इस्तेमाल लोगों ने करना शुरू किया है। और ये दवाई के तौर पर बिकती है तो मिलती भी आसानी से है।
तो बस जो चीज नशा देती है, उसका बिजनेस भी खड़ा हो गया और एक पूरा गैंग इस काम में जुट गया। अब आपको समझाते हैं कि सारा केस कहाँ से चालू हुआ।
कैसे चालू हुआ मामला?
साल 2024 की फ़रवरी में लखनऊ की सुशांत गोल्फ सिटी इलाके में एक छापा पड़ा। Phensedyl नाम की एक सिरप, जो कोडिन बेस्ड सिरप थी… यूपी एसटीएफ को सूचना मिली कि यहाँ पर बड़ी मात्रा में उसका अवैध भंडारण किया जा रहा है। जब छापा पड़ा तो पता चला कि इसके कागजात फर्जी थे और इस सिरप की सप्लाई चेन संदेह को बढ़ा रही थी।
इस छापे के बाद एक साल से भी ज्यादा वक्त तक इस मामले की हर कड़ी की जाँच हुई। इसी बीच एक साल के करीब के समय की जाँच के बाद 18 अक्टूबर 2025 को उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले में एक ट्रक पकड़ा गया। ट्रक के अंदर बड़ी संख्या में चिप्स के कार्टन थे। लेकिन जब इन कार्टन को खोला गया तो अंदर नशे का पूरा जखीरा रखा हुआ था।
इन कार्टन के अंदर कोडिन युक्त कफ सिरप की शीशियाँ रखी हुई थी। जब इनकी कीमत का अंदाजा लगाया गया तो प्रशासन के पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई। इस ड्रग्स की कीमत करीब 3 करोड़ रुपये बताई गई। यहाँ मध्य प्रदेश के तीन तस्कर हेमंत पाल, बृजमोहन शिवहरे और रामगोपाल धाकड़ गिरफ्तार हुए।
इस मामले की सघन जाँच हुई तो एक नाम सामने आया। नाम था- शुभम जायसवाल। शुभम के नाम तक पहुँचने से पहले एजेंसियों ने 300 से अधिक फर्मों की स्क्रीनिंग की। उनमें से 133 ऐसी फर्म्स के नाम शॉर्टलिस्ट किए गए जो सामूहिक रूप से इस नशे के इस धंधे में या तो सीधे शामिल थे या डायवर्जन में मदद दे रहे थे।
और सोनभद्र में ट्रक पकड़े जाने से कुछ महीनों से पहले ही इस तरह की छापेमारी की जाने लगी थी जिससे कि इस पूरे सिंडिकेट की कमर को एक झटके में ही तोड़ा जा सके। एसटीएफ ने जाँच को तेजी से आगे बढ़ाया तो राज खुलने लगे। शुभम जायसवाल जो मूल रूप से बनारस का रहने वाला है, वो आज के समय में दुबई में रहता है।
एसटीएफ ने 27 नवंबर को लखनऊ के विभूतिखंड इलाके में गौरी चौराहे के पास अमित कुमार सिंह उर्फ़ अमित टाटा को गिरफ्तार किया गया। पूछताछ में पता चला कि ये इस ड्रग्स के कारोबार की अहम कड़ी है और दुबई से शुभम जायसवाल के इशारे पर पूरे नेटवर्क को ऑपरेट करता है।
अमित टाटा के पास मिले डिजिटल उपकरणों से सप्लाई रूट, लेनदेन का रूट, सिंडिकेट का पूरा नेटवर्क मैप सब कुछ सामने आ गया। शुभम के इस नशीले कारोबार में उसका पिता भोला प्रसाद भी शामिल था। उसे कोलकाता एयरपोर्ट से उस समय गिरफ्तार किया गया जब वो उत्तर प्रदेश की STF की कार्रवाई से डरकर थाईलैंड भागने की फिराक में था।
इसके बाद STF और उत्तर प्रदेश के औषधि विभाग को मुख्यमंत्री ने आदेश दिया कि इस पूरे नेटवर्क पर कानून का बुलडोजर तेज किया जाए। सामने आया कि इस गैंग ने कुछ बड़ी दवा निर्माता कंपनियों लेबोरेट, थ्री-बी हेल्थकेयर और एबॉट की सप्लाई चेन का इस्तेमाल किया गया।
वाराणसी, गाजियाबाद, लखनऊ, कानपुर, इन शहरों में काग़ज़ों पर दर्ज दर्जनों फर्में खड़ी की गईं। हिमाचल की फैक्ट्रियों से सिरप मंगवाया गया, गाजियाबाद के गुप्त गोदामों में छुपाया गया, और फिर फर्जी दस्तावेज़ों के ज़रिए बिहार, बंगाल और नेपाल बॉर्डर तक सप्लाई किया गया।
इस मामले में उत्तर प्रदेश पुलिस के एक बर्खास्त सिपाही आलोक कुमार सिंह का नाम भी सामने आया, जिसकी सात हजार वर्ग फुट की कोठी को देखकर ED के अधिकारी भी सन्न रह गए थे। और बात तब और गहरी हो गई जब इसी बर्खास्त सिपाही के साथ समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव की तस्वीर भी निकल कर सामने आ गई। इस पर सपा को जवाब देते नहीं बन रहा।
सिर्फ़ इतना ही नहीं बल्कि जिस शुभम जायसवाल को इस पूरे सिंडिकेट का किंगपिन बताया गया उसकी फर्म के जीएसएटी और ड्रग लाइसेंस में जो नंबर यूज हुआ, वो भी एक सपा के लोहिया वाहिनी के राष्ट्रीय सचिव रवि यादव के भाई मिलिंद यादव का नंबर है।
इस मामले में समाजवादी पार्टी के कांटैक्ट्स यहीं तक सीमित नहीं है बल्कि डब्बू यादव कुर रोहित यादव जैसे नाम भी तैर रहे हैं, इन पर भी जल्द खुलासा होने की उम्मीद है। STF की जांच के दौरान इस मामले में शुभम जायसवाल, आलोक सिंह और अमित टाटा के अलावा विभोर राणा, विशाल राणा, सौरभ त्यागी, भोला प्रसाद जायसवाल, अभिषेक शर्मा, आकाश पाठक, पप्पन यादव, मनोहर जायसवाल जैसों के नाम सामने आए हैं।
अखिलेश यादव के साथ आलोक सिंह की तस्वीरों के बाद अब समाजवादी पार्टी इस जुगाड़ में है कि वो कैसे इस पर ज्यादा से ज़्यादा शोर क्रिएट कर सके।
कोडिन का इतिहास और बंगाल कनेक्शन
वैसे जिस कोड़ीन कफ़ सिरप फेंसिडिल को लेकर यूपी में आज बवाल मचा है, उसका नशे के तौर पर इस्तेमाल और तस्करी कोई नई चीज नहीं है। 2012 में ही भारत और बांग्लादेश इस तस्करी को रोकने को लेकर काम कर रहे थे। लेकिन ये तस्करी अभी पूरी तरह से रुकी नहीं है।
बल्कि आपको रोज़ ऐसी खबरें देखने को मिलेगी, जिसमे BSF फेंसिडिल यानी कोडिन वाली सिरप जब्त करती है। और बंगाल में इस तस्करी में TMC के लोगों के शामिल होने का आरोप भाजपा लगाती रही है। यहाँ तक की टीएमसी के बड़े नेता अनुब्रत मंडल तक पर भी अपने मवेशी तस्करी के सिंडिकेट का इस्तेमाल ड्रग तस्करी के लिए करने के भी आरोप हैं।
तो समाजवादी पार्टी की दोस्त tmc का भी कहीं ना कहीं इस कोडीन तस्करी में नाम आया इसलिए, यूपी में शोर मचाया गया। वैसे आपको एक फैक्ट और बताता हूँ जिससे आप चौकेंगे। इस मामले में मैंने कुछ देर पहले मैंने एक आरोपित का नाम बताया, विभोर राणा।
विभोर राणा वर्ष 2021 में मालदा में 1350 फेंसिडिल की बोतलों के साथ मालदा में पकड़ा गया था और उसके ख़िलाफ़ नारकोटिक्स एक्ट का मामला चला था । आपको पता है तब कलकत्ता हाई कोर्ट में उसकी जमानत का केस कौन लड़ रहा था।
उसकी जमानत का केस लड़ रहे थे सब्यसाची बनर्जी, यही सब्यासाची उस पूर्व TMC नेता शेख शाहजहाँ का केस लड़ रहे थे जिसने संदेशखाली में रेप से लेकर क़ब्ज़े तक किए थे और टीएमसी ने तब अपने इस नेता को बचाने की खूब कोशिश की थी।
अच्छा अब भी अगर आपको कुछ गड़बड़ नहीं दिखती तो और एक फैक्ट सुनिए। विभोर वाले में मामले में दूसरे आरोपित को जो दूसरा वकील अयान भट्टाचार्जी रिप्रेजेंट कर रहा था, इसी वकील ने आरजी कर मेडिकल कॉलेज रेप मामले में ताला पुलिस स्टेशन के लोगों को रिप्रेजेंट किया था और ये मामला भी टीएमसी के लिए राजनीतिक संकट की तरह था ।
समाजवादी पार्टी ने आज तक बंगाल में कफ़ सिरप की तस्करी और इस मामले में विभोर राणा और उसके वकीलों को लेकर आवाज नहीं निकाली है। और अब जब योगी सरकार इस पर कार्रवाई कर रही है तो समाजवादी पार्टी रोज़ हल्ला मचा रही है।
तमिलनाडु कनेक्शन
आपको एक और पोलिटिकल कनेक्शन बताता हूँ। कुछ दिनों पहले आपको याद है कि मध्य प्रदेश में कई बच्चों की मौत एक कफ़सिरप को पीने से हुई थी। यह कफ़ सिरप बनी थी तमिलनाडु के श्रीसन फार्मा में और तमिलनाडु में है DMK की सरकार।
वही डीएमके जो अखिलेश की दोस्त है, जिसके हिंदू विरोधी एक्शन पर हाल ही में अखिलेश की पार्टी के साँसदीं ने साइन किए थे। तो इस पर भी समाजवादी पार्टी की आवाज नहीं निकली बल्कि यूपी में हल्ला मचा दिया। कहीं ये DMK और TMC जैसे दोस्तों को बचाने के लिए कवर अप तो नहीं?
वैसे इस कोड़ीन वाली कफ़ सिरप को बैन करने के लिए केंद्र सरकार ने क़दफ़म उठाए भी थे लेकिन फार्मा इंडस्ट्री इसके ख़िलाफ़ कोर्ट गई और दिल्ली हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार के बैन को रोक दिया। और आज उसी कोडीन के सहारे उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी हवा बनाने में जुटी हुई है और सीएम योगी को निशाने पर ले रही है, इस काम में उसका सहायक मीडिया भी बड़ी भूमिका निभा रहा है ।
योगी वर्सेस विदेशी मीडिया
लेकिन देशी विदेशी मीडिया की सीएम योगी से घृणा किसी से छुपी नहीं है। विदेशी मीडिया ने योगी आदित्यनाथ की मुख्यमंत्री पद पर नियुक्ति के समय से आज तक उन पर हमला ही किया है, चाहे न्यूयॉर्क टाइम्स हो, या फिर बीबीसी ।

अल जजीरा ने तो उन्हें आग उगलने वाला नेता करार दिया ,, हिंदू युवा वाहिनी की आलोचना से लेकर फ्रीडम हाउस व अमेरिकी रिपोर्ट्स तक, योग आदित्यनाथ की हिंदूवादी छवि को लगातार देशी-विदेशी मीडिया ने चुनौती दी है।
कैरवान मैगजीन ने योगी पर निरंतर मीडिया ट्रायल चलाया, लेकिन इससे वे कभी विचलित नहीं हुए। अब नशे के कारोबार के खिलाफ सख्त एक्शन लेते हुए उनका ऐलान स्पष्ट है- “ड्रग माफियाओं को मिट्टी में मिला देंगे”, जो निश्चित रूप से ऐसे हमलों को और बढ़ाएगा, मगर उनकी दृढ़ता अटूट बनी हुई है।



