हमारे देश में फ़िल्में हमेशा सिर्फ़ मनोरंजन नहीं रहीं। कई बार वो आईना रहीं और समस्या यही है कि हर किसी को खुद का चेहरा पसंद नहीं आता। 90s का सिनेमा यही आईना था। साल 1998 में एक फिल्म आई थी ‘हजार चौरासी की माँ’ इसमें नक्सल रोमांटिसिज़्म दिखाया गया। नक्सलियों को इस तरह दिखाया गया जैसे देश का हर कॉलेज स्टूडेंट बंदूक उठाने के लिए ही पैदा हुआ है। और अगर वो ऐसा नहीं कर रहा है तो वो ग़लत राह पर जा रहा है।
फिर गुलजार की एक फिल्म आई थी ‘माचिस’ – खालिस्तान के विचारों को हवा देने वाली ये फिल्म सुपरहिट हुई… इस सिनेमा ने लोगों के परसेप्शन को भारत विरोध के लिए तैयार करने का काम किया, और इकोसिस्टम ने लाजवाब सिनेमा के नाम पर बधाई भी लूटी और इसमें शामिल ज़हर पर खामोशी भी ओढ़ ली।
ऐसी ही एक और फिल्म आई थी – ये फ़िल्म थी नंदिता दास की फ़िराक़। इस फिल्म में गुजरात दंगों पर वही पुराना वामपंथी नैरेटिव चलाया गया। हिन्दुओं के खिलाफ दुष्प्रचार और सिर्फ अजेंडा – कला के नाम पर आधी कहानी दिखाओ, आधी छुपाओ और फिर पुरस्कार ले जाओ।
इन सबको कभी कोई दिक्कत नहीं आई। इनके खिलाफ कोई प्रेस रिलीज़ नहीं जारी की गई। इनका कभी किसी ईकोसिस्टम ने बायकाट नहीं किया। कोई हमले नहीं। कोई Film Critics Guild नहीं बोला कि “देश-विरोधी नैरेटिव चलाए जा रहे हैं।”
क्योंकि नैरेटिव इनके अनुसार एकदम सही दिशा में जा रहा था। लेकिन अचानक से हवा बदली और भारतीय दर्शकों को थिएटर में जब सच का दूसरा पहलू दिखाया जाने लगा, तब क्या हुआ? मिडल ईस्ट के 6 देशों में फ़िल्म बैन। क्यों?
क्योंकि फिल्मों में अगर पाकिस्तान का आतंकी चेहरा, कश्मीर का सच, किसी आतंकी का मज़हब दिखा दिया जाए, या भारत की इंटेलिजेंस की स्ट्रैटेजी का जलवा दिख जाए , तो जिहादी नक्सली गिरोह ने कह दिया कि “ये हमारा कंटेंट नहीं है” यही उन्होंने ‘आर्टिकल 370’ और ‘द कश्मीर फाइल्स’ के साथ भी किया था।
पाकिस्तान तो खुद ही एक लंबी बैन-लिस्ट लेकर बैठा है। चाहे एक था टाइगर फिल्म हो, भाग मिल्खा भाग, मुल्क या फिर हैदर फिल्म हो। ये फ़िल्में पाकिस्तान में इसलिए बैन की गईं क्योंकि इनमें आतंकवादियों और कश्मीर में पाकिस्तान के अजेंडा की पोल खोली गई थी। और बारी जब धुरंधर फिल्म की आई तो अनुपमा चोपड़ा और सुचरिता त्यागी जैसे फिल्म क्रिटिक्स ने कहा कि ये फिल्म “टेस्टोस्टेरोन-हेवी है, इसमें श्रिल नेशनलिज़्म, है और इसमें एंटी-पाकिस्तान नैरेटिव दिखाया गया है।
आरफ़ा ख़ानम तो खैर इस फ़िल्म की सबसे बड़ी मार्केटिंग करने वाली महिला हैं उनका विरोध ही धुरंधर फिल्म की सबसे बड़ी मार्केटिंग बन गया है। आरफ़ा नेे इस फ़िल्म की खूबसूरती पर बात करते हुए साफ़ साफ़ कहा कि ऐसी फ़िल्में बनानी ही नहीं चाहिए। यानी जो बात ‘बॉम्बे’ के ज़माने में जिहादी नहीं सह पाए, वही आज का इंटेलेक्चुअल इकोसिस्टम नहीं पचा पा रहा। तब बम भी असली थे, जबकि आज तो सिर्फ़ सोशल मीडिया पर शब्दों के सुतली बम छोड़कर ही इनकी खिचाई हो रही है। आज अगर कोई कह दे कि “हम आपकी राय से असहमत हैं,” तो वो hate campaign बन जाता है।
इंगेजमेंट फार्मर आरफ़ा तो हिंदू नाम लेकर घूमने वाले लोगों से इंटरव्यू कर के ये भी दुनिया को बता रही हैं कि पाकिस्तान में मुस्लिम नाम तो मिल जाते हैं मगर कोई पांडे वहाँ नहीं मिलता। और जाने अनजाने में वो यही साबित करते हैं कि पाकिस्तान में कोई पांडे नाम वाला नहीं मिलता क्योंकि वहाँ रहने वालों के लिए पांडे काफ़िर है और उन्होंने काफ़िरों के साथ वही किया है जिसे अब हमारा बॉलीवुड खुलकर दिखाने लगा है। और उसी दिखाने से तो आरफ़ा परेशान भी हैं। लेकिन ये सब दिमाग़ की बातें हैं, जिहाद की बातें होती तो आरफ़ा को समझ आ भी जातींं।
लेकिन, इंटरनेट पर बैठे लोगों ने बस इतना किया कि उनके रिव्यू की क्लास लगा दी। ना धमकी दी गई। न हिंसा, ना बम फेंके गए। बस पब्लिक ने यही कहा कि हम आपकी राय से सहमत नहीं हैं। उन्हें तब कोई डर नहीं लगा जब नक्सल रोमांस, खालिस्तान सिम्पैथी या हिन्दूफोबिया बड़े पर्दे पर परोसा गया। डर तो तब लगता है जब कहानी में ‘इस देश’ का पक्ष दिखाया जाता है। और फिर Film Critics Guild अपनी लंबी प्रेस रिलीज़ ये कहते हुए निकाल देता है कि “हम पर अटैक हो रहा है… हमें डराया जा रहा है, हमारी आज़ादी खतरे में है…”
यार आपकी अध्यक्ष खुद अनुपमा हैं, वाइस-चेयरपर्सन सुचरिता हैं। और आप खुद ही अपने कारनामों के रिएक्शन के खिलाफ संस्था से स्टेटमेंट जारी कर रहे हो। ख़ुद ही फ़िल्म की आलोचना लिखी, ख़ुद ही ये कहते हुए विक्टिम भी खेल कि उनकी आलोचना की आलोचना हो रही है और ख़ुद ही सहानुभूति भी अपने लिए जारी कर दी। इनकी बदनामी हुई तो द हॉलीवुड रिपोर्टर इंडिया ने भी उनका रिव्यू हटा दिया। यानी, जब जनता असहमति जताए, तो समस्या जनता में ही बता दी जाए। जब आपका नैरेटिव न चले तो समस्या राष्ट्रवाद में ही बता दी जाए। अखबारों के हेडलाइंस वॉर जिंगोइज्म और हायपर नेशनलिज्म वाले बॉलीवुड से भरी जाएं और आरफा कहें कि फिल्म तो जबरदस्त है लेकिन इसमें पितृसत्ता और मस्कूलेनिटी ग़लत दिखाई है।
अब आप ये सुनिए कि कला के जरिए बात करने वालों पर होने वाला असली हमला किसे कहते हैं; साल 1995 यानी बाबरी नाम के विवादित ढाँचे के गिरने के बाद का भारत। मणि रत्नम ‘बॉम्बे’ फिल्म बनाते हैं। फिल्म में एक हिंदू लड़के और एक मुस्लिम लड़की की प्रेम कहानी है। समाज में यहाँ वहाँ घुसे हुए मुस्लिम जिहादियों को ये पसंद नहीं आता कि कोई फ़िल्म ऐसी बातें कैसे दिखा सकता है। और मणि रत्नम के घर पर दो बम फेंक दिए जाते हैं। वो घायल होते हैं और यहाँ तक कि उन्हें अस्पताल में भर्ती किया गया।
उस समय कोई Film Critics Guild ये कहने नहीं आया कि “कलाकार और क्रिएटिव लोगों पर अटैक हुआ है” कोई प्रेस रिलीज़ नहीं आई। और आज क्या कहा जा रहा है?
आज अगर सोशल मीडिया पर बस दो ट्वीट नेगेटिव मिल जाएँ तो पूरा ‘क्रिटिक्स गिल्ड’ ऐसे बिहेव करता है जैसे आपातकाल लग गया हो। हिपॉक्रेसी इतनी कड़क है कि काटने बैठो तो चाकू की धार मुड़ जाए। जब असल बम फटते हैं, तो कलाकार खड़े रहते हैं। जब सिर्फ़ ऑनलाइन डिसअग्रीमेंट होती है तो ‘गिल्ड’ गिर जाती है। ये फर्क समझिए।
जब मणि रत्नम ‘बॉम्बे’ film बनाते हैं तो उन पर घर के बाहर असली बम फेंके जाते हैं। और 2025 में आते-आते.. बस एक नेगेटिव रिव्यू पर ट्रोलिंग हो जाए तो भारत का Film Critics Guild पूरा प्रेस रिलीज़ निकालकर रोना शुरू कर देता है कि “हम से नफरत की जा रही है, हम पर हमला हुआ है, हमें डराया जा रहा है।”
1995 का अख़बार पलट कर देखने से पता चलेगा कि हेट सिंडिकेट असल में कौन झेलता था, और सोशल मीडिया की हल्की-सी हवा किसको बवंडर लगती है। यही आज की सबसे बड़ी कहानी है। यही है भारत का “वोक सिनेमा इकोसिस्टम” – जहाँ नैरेटिव को चोट जब ख़ुद को लगे तो उसे हिंसा और फासीवाद नाम दिया जाता है, और सच कहा जाए तो उसे ट्रोलिंग नाम दे दिया जाता है।



