45 साल बाद असम आंदोलन के 855 बलिदानियों को न्याय: सीएम हिमंता बिस्वा सरमा ने किया भव्य शहीद स्मारक का अनावरण, दिन-रात जलती रहेगी अमर ज्योति

Summary

10 दिसंबर को असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा 855 बलिदानियों के लिए बने भव्य ‘शहीद स्मारक’ का उद्घाटन कर रहे हैं, और अब 10 दिसंबर को आधिकारिक तौर पर ‘असम शहीद दिवस’ के रूप में मनाया जाएगा। खुद प्रधानमंत्री मोदी ने X पर भावुक पोस्ट कर इन वीरों को याद किया,  वो वीर जिनकी कुर्बानी को राजनीति ने 45 साल तक अंधेरे में धकेला।

यह कहानी सिर्फ़ असम की नहीं, बल्कि उस राजनीति की है जिसने दशकों तक बलिदान और वोट बैंक के बीच खुला धोखा किया। एक तरफ़ राहुल गांधी बार-बार मंचों से कहते हैं, “मेरे पिता शहीद हुए, मेरी दादी शहीद हुई।” लेकिन उसी देश ने 45 साल तक उन 855 असमी युवाओं को भुला दिया, जिन्होंने विदेशी घुसपैठ के खिलाफ अपनी जान दे दी। फर्क सिर्फ इतना है कि ये बलिदान कांग्रेस की वोट-बैंक राजनीति के लिए असुविधाजनक थे, इसलिए इन्हें शहीद मानने से भी डरते रहे।

लेकिन यह मोदी का दौर है। यहाँ इतिहास को दबाया नहीं जाता, योगदान भुलाया नहीं जाता। लेकिन असल सवाल यही है कि 855 बलिदानियों को इतने वर्षों तक सम्मान क्यों नहीं मिला? जवाब साफ है कि कांग्रेस को डर था कि असम आंदोलन के बलिदानियों को पहचान देने से उसका मुस्लिम वोट बैंक नाराज़ हो जाएगा। जिन युवाओं ने असम की अस्मिता की रक्षा में बांग्लादेशी घुसपैठ का विरोध किया, वो कांग्रेस की वोट-तुष्टिकरण रणनीति के रास्ते में खड़े थे।

असम आंदोलन की चिंगारी साल 1979 में भड़की, जब अवैध बांग्लादेशी मुसलमानों ने युवा कार्यकर्ता खरगेश्वर तालुकदार की हत्या कर दी। यही आंदोलन का पहला बलिदान था। इसके बाद भी कांग्रेस सरकार ने न घुसपैठ रोकी, न चेतावनियाँ सुनीं। और इसका नतीजा क्या हुआ ? 1983 का नेल्ली नरसंहार, जिसमें करीब 2,000 लोग मारे गए। ये सरकारी आँकड़ा है, लेकिन सच इससे कहीं बड़ा और दर्दनाक था। कांग्रेस ने इसकी जांच रिपोर्ट को भी कभी सार्वजनिक नहीं किया क्योंकि सारी कहानी उनकी तुष्टिकरण राजनीति को बेनकाब कर देती।

आज, 45 साल बाद, गुवाहाटी के पश्चिम बोरगांव में बने 116 बीघा के शहीद स्मारक को औपचारिक रूप से राष्ट्र के नाम समर्पित किया जा रहा है। शाम चार बजे ‘शहीद ज्योति’ जलाई जाएगी, उस इतिहास को रोशन करने के लिए जिसे दशकों तक बुझा कर रखा गया।

सोचिए, अपने ही देश में किसी को शहीद घोषित करने में आधी सदी क्यों लग गई? क्योंकि कुछ दलों को डर था कि कहीं वोट बैंक की आग ठंडी न पड़ जाए, कहीं यह न पूछा जाए कि असम की अस्मिता की लड़ाई में बलिदान हुए युवाओं को सिर्फ इसलिए क्यों अनदेखा किया गया कि हमलावर की पहचान से बुर्का ना उतर जाए?

आज जब कुछ नेता बीजेपी पर वंदे मातरम् को “वोट मातरम्” बताकर कोसते हैं, तो उन्हें अपने गिरेबान में झाँकना चाहिए, जहाँ 855 असमी बलिदानी 45 साल तक सिर्फ इसलिए बिना सम्मान पड़े रहे, क्योंकि सत्ता किसी मज़हब विशेष को खुश रखना चाहती थी, देश को नहीं।

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