क्या आप जानते हैं कि ईरान में आज जो प्रदर्शन हो रहे हैं, उसके केंद्र में भारत के UP के एक छोटे से गांव से जुड़ा हुआ एक इस्लामी लीडर है? आयतोल्लाह रुहोल्लाह खोमैनी, जिनके दादा UP के नेओरी गांव से ईरान शिफ्ट हो गए थे। और उन्हें “इंडियन मुल्ला” कहकर ताने मारे जाते थे – ये बात 1978 में अमेरिका के इशारे पर ईरानी सरकारी अखबार ‘एत्तेलात’ में छपी थी, जहां उन्हें ब्रिटिश एजेंट और इंडियन मौलवी बताकर बदनाम करने की कोशिश की गई थी, ताकि लोगों का गुस्सा भड़काया जा सके।
लेकिन साथ ही आपको ये मैं ईमानदारी के साथ शुरू में ही बता दूं कि अगर ईरान में ख़ोमैनी-ख़ामनेई वाली सत्ता गिरती है, तो भारत के यहां बैठे मुल्लाओं और उनके चेलों पर जरा भी फर्क नहीं पड़ेगा। ईरान में जो कुछ भी चल रहा है, उससे हमारे और आपके आसपास के पत्थरबाज नहीं बदलने वाले हैं.. आसान भाषा में कहूं तो ईरान में अमेरिका अगर खोमैनी को टाइट करता है, तो इससे भारत में बैठे मुस्लिम बिल्कुल भी टाइट नहीं होने वाले हैं। भारत के मुस्लिमों का इस घटना से एक बाल भी नहीं सफेद होने वाला। वो तो वैसे ही रहेगा जैसे 1979 की इस्लामी क्रांति से पहले था, क्रांति के दौरान था और आज भी है… दिल्ली की गुलफिशा और आरफ़ा अचानक से हिंदुओं से प्रेम नहीं करने लगेंगी, यहां का जुबैर क्लिप काट के हिंदुओं की बलि नहीं चढ़ाएगा। अब्दुलों की बेगमें पत्थरबाजों को पैदा करना बंद नहीं कर देंगी।
तो जब ईरान में प्रोटेस्ट देख के हमें मजे जरूर आ सकते हैं, लेकिन जियो पॉलिटिक्स के नजरिए से इस मामले के क्या एंगल हो सकते हैं, ये हमें बारीकी से जानने और समझने की जरूरत है। और इसे समझने के लिए हमें देखना होगा कि डॉनल्ड ट्रंप क्या कह रहा है।
ईरान में चल रहे विरोध प्रदर्शनों पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की बड़ी-बड़ी बातें, भारी-भरकम धमकियां और सोशल मीडिया पर की गई शेर-दहाड़ का जमीनी असर क्या रहा, आज के इस वीडियो में हम उसी का पोस्टमार्टम करने वाले हैं। साथ ही यह भी समझेंगे कि ईरान में बार-बार ऐसे हालात क्यों पैदा होते हैं, क्या अमेरिका पहले भी इस तरह के प्रयोग कर चुका है, और उन प्रयोगों का अंजाम क्या रहा है। सबसे अहम सवाल यह है कि CIA और मोसाद जैसी एजेंसियों की सक्रियता के बावजूद क्या ईरान इस पूरे प्रोटेस्ट वेव को कंट्रोल करने में कामयाब रहा या नहीं।
आज का वीडियो पूरा देखिए, क्योंकि कहानी सिर्फ ईरान की नहीं है, बल्कि उस अमेरिकी ब्लफ की है जो हर बार दुनिया के सामने खेला जाता है। और हां, आगे बढ़ने से पहले चैनल को सब्सक्राइब जरूर कर लीजिए। ये बात एकदम सही है कि ईरान इन प्रोटेस्ट से निपटने में कामयाब हो गया है… आज की लेटेस्ट अपडेट यही बता रहे हैं कि सड़कें शांत हो चुकी हैं, रिजीम मजबूत खड़ा है, और वो साजिश जो अमेरिका-इजरायल और CIA की थी, पूरी तरह फेल हो गई।
डोनाल्ड ट्रंप ने वही किया, जो वो सबसे बेहतर जानते हैं। गाल बजाए, लोगों को उकसाया और कहा कि “प्रोटेस्टर्स, आगे बढ़ो, हेल्प आने वाली है”, लेकिन क्या हेल्प आई? वो तो कभी नजर ही नहीं आई… इस पर मैं आपको इतिहास के एक बेहद मशहूर धोखे की याद दिलाता हूं. ये पुरानी कहानी है कॉन्स्टेंटिनोपल की… जब ओटोमन सेनाएं शहर को घेरकर बैठी थीं, तब रोम से पोप का संदेश आया – “मदद रास्ते में है।”
लोग दिन-रात समुद्र की तरफ टकटकी लगाए इंतजार करते रहे, हफ्ते गुजर गए, लेकिन कोई मदद नहीं आई। शहर गिर गया। ठीक वैसा ही हुआ ईरान में। ट्रंप ने ट्वीट किए, इंटरव्यू दिए, “स्ट्रॉन्ग ऐक्शन लेंगे”, “हेल्प ऑन द वे” कहा, लेकिन जब ईरान ने साफ जवाब दिया कि किसी भी हमले का मुंहतोड़ जवाब देंगे, तो ट्रंप पीछे हट गए। और डोनाल्ड ट्रम्प की इन गप्पाबाजियों के चलते कई निर्दोष लोगों की जान चली गई।
टार्गेटेड किलिंग कैंसल होने की खबरें आईं, एक्जीक्यूशन्स रुके, और पूरा वॉर-टोन अचानक डिप्लोमेसी में बदल गया। मतलब शेर ने दहाड़ तो बहुत मारी, लेकिन सामने दूसरा शेर देखकर चुप हो गया। अब ईरान का जमीनी स्टेटस देखते हैं। ईरानी सरकारी मीडिया PressTV, IRNA, Tasnim – साफ कह रहा है कि शुरुआत में कुछ आर्थिक शिकायतें थीं, महंगाई, करेंसी गिरना, ये सब जायज था।
विदेशी फंडिंग, सोशल मीडिया ऑपरेशन्स और ट्रेनिंग के जरिये हालात को दंगों में बदला गया। 300 से ज्यादा रिंगलीडर्स पकड़े गए, हथियार बरामद हुए, मोसाद और CIA के लिंक्स मिले। अब शहरों में शांति लौट आई है, प्रो-गवर्नमेंट रैलियां हो रही हैं, लोग नॉर्मल लाइफ जी रहे हैं।
भले ही, हम इस बात से पूरी तरह सहमत हैं कि ईरान में नॉर्मल का मतलब वो नहीं है जिसे आप और हम भारत में मानते हैं, यहां नॉर्मल का अर्थ किसी इस्लामी राष्ट्र का नॉर्मल है.. और इस्लामी रेजिम में हालात कभी उतने शांत नहीं होते। सैकड़ों गिरफ्तारियां हो चुकी हैं, मोसाद लिंक्ड टेररिस्ट सेल पकड़े गए, हजारों हथियार जब्त हुए… पुलिस चीफ ने कुछ दिन पहले अल्टीमेटम दिया था कि जो भटके हुए युवा “धोखे में आकर” इन दंगों में शामिल हो गए थे, वो 3 दिनों में सरेंडर कर दें – उनके साथ सब कुछ शांतिपूर्ण तरीके से होगा… उन्हें लेनिएंट ट्रीटमेंट मिलेगा, यानी समझदारी से निपटा जाएगा। लेकिन जो रिंगलीडर्स हैं, आर्म्ड टेररिस्ट्स हैं, या विदेशी एजेंट्स – उनके साथ कोई नरमी नहीं बरती जाएगी।
ईरान में अब कोई बड़ी गैदरिंग नहीं हो रही, प्रो-गवर्नमेंट रैलियां हो रही हैं, और पुलिस ने कई जगहों पर आर्म्ड दंगाइयों को न्यूट्रलाइज कर दिया है। मौतों के आंकड़ों को लेकर हमेशा की तरह नैरेटिव वॉर चल रहा है। सरकारी रिपोर्ट्स कह रही हैं कि ज्यादातर मौतें सिक्योरिटी फोर्सेस पर हमलों के दौरान हुईं, और कई जवान मारे गए। दूसरी तरफ वेस्टर्न मीडिया और कुछ अरब चैनल 3000 से 5000 मौतों का दावा कर रहे हैं।
ईरान में इंटरनेट धीरे-धीरे नॉर्मल हो रहा है, और रिजीम ने आर्थिक प्रॉब्लम्स सॉल्व करने के प्लान अनाउंस किए हैं … सच ये है कि न तो कोई रिजीम चेंज हुआ, न ही सिस्टम टूटा। ईरान अमेरिका की गुंडागर्दी के खिलाफ मजबूत खड़ा है।सवाल आता है कि ईरान में ये प्रदर्शन कहां से शुरू हुए? दिसंबर 2025 के आखिर में तेहरान के ग्रैंड बाजार में दुकानदारों ने महंगाई और रियाल की गिरावट का विरोध किया। बिल्कुल राइटफुल शिकायतें – सैंक्शंस की वजह से इकोनॉमी प्रेशर में थी। लेकिन देखते-देखते ये पूरे 31 प्रांतों में फैल गए, “डाउन विद डिक्टेटर” जैसे नारे लगने लगे।
Starlink: Regime Change का हथियार?
विदेश से फंडिंग आई, सोशल मीडिया पर प्रोपेगैंडा चला, और शांतिपूर्ण प्रोटेस्ट को हिंसक बना दिया गया।ईरान के मौजूदा प्रदर्शनों में इंटरनेट और सोशल मीडिया की बहुत बड़ी भूमिका है। जब ईरानी सरकार ने विदेशी प्रोपगैंडा रोकने के नाम पर इंटरनेट ब्लैकआउट किया, तो एलन मस्क ने स्टारलिंक को फ्री में उपलब्ध करवाने का ऐलान किया। कुछ समय पहले वेनेजुएला में भी अमेरिकी हस्तक्षेप के बाद मस्क ने यही किया था। मतलब साफ है कि अमेरिका के लिए इंटरनेट और सोशल मीडिया अब रेजीम चेंज का एक ताकतवर हथियार बन चुका है।
इसी संदर्भ में ट्विटर के पूर्व मालिक जैक डोर्सी का वो पुराना बयान भी याद आता है। अरब स्प्रिंग के दौरान ट्विटर ने कहा था कि “कुछ ट्वीट्स किसी दबे कुचले देश में positive change लाने में मदद कर सकते हैं।” सबसे अहम था वो महीन संदेश, जिसमें जैक डोर्सी ने कहा था कि – “Some Tweets may facilitate positive change in a repressed country” इससे साफ झलकता था कि ट्विटर मानता था कि अरब देश दमनकारी थे और अरब स्प्रिंग एक मुक्ति का क्षण था। बाद में भारत में भी जब किसान आंदोलन के टाइम सरकार ने भड़काऊ कंटेंट ब्लॉक करने का दबाव डाला, तो ट्विटर ने इसी तरह का जवाब दिया था।
रेजिम चेंज के लिए अमेरिका ने पहले भी ऐसे खेल खेले हैं – आपको याद है लीबिया में गद्दाफी को कैसे गिराया? सीरिया में असद के खिलाफ प्रॉक्सी वॉर छेड़ी गई… यूक्रेन में कलर रेवोल्यूशन… सब CIA की स्क्रिप्टेड स्टोरी। लेकिन ईरान में फेल हो गई, क्योंकि ईरान कोई छोटा देश नहीं। यहां पर हम इस्लामी रेजिम के अत्याचारों को क्लीन चिट नहीं दे रहे हैं… लेकिन हम आपको US के सत्ता परिवर्तन के कारनामों की गणित बता रहे हैं।
अब आते हैं सबसे बड़े पॉइंट पर, वो ये है कि अमेरिका इतना शोर मचाने के बावजूद ईरान में डायरेक्ट एक्शन क्यों नहीं ले पाया। कारण बहुत साफ है। ईरान कोई इराक या लीबिया नहीं है। अमेरिका के पास इतना दम क्यों नहीं कि वो ईरान जैसी न्यूक्लियर पावर के खिलाफ डायरेक्ट वॉर छेड़ सके? भाई, अमेरिका की मिलिट्री दुनिया की नंबर वन है, इसमें कोई शक नहीं। सबसे ज्यादा बजट, सबसे एडवांस्ड वेपंस। लेकिन न्यूक्लियर क्लब के मेंबर्स के सामने ये पावर भी रुक जाती है।
क्यों? क्योंकि कीमत बहुत भारी पड़ती है। देखो, 9/11 जैसा बड़ा अटैक हुआ, लादेन पाकिस्तान में छिपा था। अमेरिका ने पाकिस्तान पर डायरेक्ट इन्वेजन क्यों नहीं किया? क्योंकि पाकिस्तान कहता है कि वो न्यूक्लियर पावर है। बातचीत की, सौदेबाजी की, लेकिन पूरा देश तबाह करने की हिम्मत नहीं हुई। कीमत चुकाने लायक नहीं थी।
नॉर्थ कोरिया को देखो; सालों से न्यूक्लियर टेस्ट कर रहा है, ट्रंप को “रॉकेट मैन” कहकर चिढ़ाता रहा। अमेरिका क्या करता है? सिर्फ कड़े बयान, सैंक्शंस। अगर सच में दम होता, तो प्योंगयांग को सबसे आसान टारगेट बनाकर खत्म कर देता। लेकिन नहीं करता, क्योंकि जवाब में न्यूक्लियर स्ट्राइक का डर है। रूस का केस तो सबके सामने है। यूक्रेन में अमेरिका हथियार भेजता है, ट्रेनिंग देता है, इंटेलिजेंस शेयर करता है, लेकिन खुद का एक भी सैनिक मैदान में नहीं उतारता।
क्यों? क्योंकि रूस न्यूक्लियर पावर है। प्रॉक्सी वॉर लड़ना आसान है, डायरेक्ट वॉर? वो अलग खेल है। सामने वाला भी न्यूक्लियर बटन दबा सकता हो, तो कोई नहीं खेलता। अमेरिका की धमकी की एक रेंज है – और जैसे रात के अंधेरे में सियारों की एक हुआं हुआं के जवाब में दूसरा झुंड हुआं हुआं कर के शांत हो जाते हैं, ये अमेरिका और ईरान का टकराव भी कुछ वैसा ही है।
ईरान न्यूक्लियर थ्रेशोल्ड पर है, और अमेरिका जानता है कि डायरेक्ट टकराव की कीमत वर्ल्ड वॉर जैसी हो सकती है। यहां डायरेक्ट वॉर का मतलब सिर्फ एक देश से जंग नहीं, बल्कि पूरे मिडिल ईस्ट को आग में झोंकना है। कारण साफ है – मिडिल ईस्ट डोमिनो की तरह है। अगर ईरान गिरा, तो उसका असर सिर्फ तेहरान तक सीमित नहीं रहता। चेन रिएक्शन शुरू हो जाएगा।
सऊदी अरब, UAE, क़तर – सब हिल जाएंगे। ये प्रदर्शन अगर “महिलाओं की आजादी” या “हिजाब के खिलाफ” के नाम पर कामयाब होते, तो कल को सऊदी या UAE की मुस्लिम महिलाएं क्यों नहीं मांगतीं वही राइट्स? महिलाओं की आजादी, मजहबी पाबंदियां और सत्ता की वैधता पर बहस शुरू हो जाएगी।
और फिर तेल के ये शेख ट्रंप से ज्यादा पावरफुल हैं। गल्फ कंट्रीज आज तेल के सबसे बड़े मालिक हैं, और उन्होंने अपने देशों में भारी इंफ्रास्ट्रक्चर पर इन्वेस्टमेंट किया है – दुबई की स्काई-स्क्रेपर्स, बुर्ज ख़लीफ़ा जैसी बिल्डिंग्स, लग्जरी रिसॉर्ट्स, मॉडर्न एयरपोर्ट्स, NEOM प्रोजेक्ट्स – जैसे रियाद का विज़न 2030। ये सब इतने महंगे और शानदार हैं कि दंगे-फसाद और तोड़फोड़ में इन्हें कभी नुकसान नहीं होने देंगे।
वहीं, ईरान का स्टेटस अलग है – लंबे सैंक्शंस की वजह से उनका इंफ्रास्ट्रक्चर पुराना और कम डेवलप्ड है, ज्यादा मिलिट्री और इंडस्ट्रियल फोकस है, जबकि सऊदी-UAE का इंफ्रा हाई-टेक, टूरिस्ट अट्रैक्शन वाला और ग्लोबल बिजनेस हब है। इसलिए ये गल्फ देश किसी भी तरह की हिंसा या तोड़फोड़ अफोर्ड नहीं कर सकते – एक भी बड़ा प्रोटेस्ट उनकी इकोनॉमी को अरबों डॉलर का नुकसान पहुंचा सकता है। इसी डर से वो ट्रंप को रोकते हैं।
डोनाल्ड ट्रंप चिल्लाता है कि “मैं किसी से नहीं डरता”, लेकिन अरब के तेल डॉलर्स से डरता है। डर सबको लगता है, गला सभी का सूखता है… रिपोर्ट हैं कि अरब लीडर्स ने ही ट्रंप को धमकाया और कहा कि “ईरान में हाथ मत डाल, वरना ऑयल प्राइसेज स्काई हाई कर देंगे, और तुम्हारा इकोनॉमी तबाह हो जाएगा।” और इनकी नाराजगी को ट्रम्प झेल नहीं पाएगा.. यही कारण है कि ट्रंप चाहे जितना बोले, असल में उसे भी पता है कि कुछ सीमाएं हैं।
तेल की कीमतें आसमान छूने लगें, तो अमेरिकी इकोनॉमी खुद दबाव में आ जाएगी। जब पश्चिमी मीडिया ईरान को “ब्रूटल इस्लामिक स्टेट” बताने में जुटा था, भारत ने Iran मामले पर कोई नैतिक लेक्चर नहीं दिया। क्योंकि भारत को पता है कि आज अगर ईरान को अस्थिर किया गया, तो कल वही मॉडल नई दिल्ली, कोलकाता या हैदराबाद में टेस्ट किया जा सकता है।
अब उन लोगों से सवाल जो भारत में बैठकर ईरान पर लेक्चर दे रहे हैं… “महिलाओं को बुर्का मत पहनाओ, आजादी दो!” अरे भाई, भारत में संविधान है, इसलिए ख़ानुम अर्फ़ा शेरवानी, राना अय्यूब, RJ सायमा जैसी मुस्लिम महिलाएं बिना हिजाब के आजाद घूम सकती हैं। मुस्लिम देशों में ऐसा संविधान कहां है? भारत का संविधान भारत को वह लचीलापन देता है, जो ईरान या अरब देशों के पास नहीं है।
भारत में मुस्लिम महिलाएं बिना हिजाब के भी जी सकती हैं, हिजाब के साथ भी। चुनाव लड़ सकती हैं, जज बन सकती हैं, पत्रकार बन सकती हैं। अगर उनके शौहर या उनके जुम्मे वाले मौलवी, अलाव करें. लेकिन ईरान की महिलाओं के दिल में भी तो क्रांति की आग जल रही होगी ना? वो भी तो वेस्टर्न ड्रेस पहनकर आजाद घूमना चाहेंगी? लेकिन अरब देशों के शासक यही नहीं चाहते, अगर ईरान में क्रांति हुई तो उनकी कुर्सी भी हिलेगी। इसलिए वो चुपचाप ईरान को सपोर्ट कर रहे हैं, डोनाल्ड ट्रंप को रोक रहे हैं।
Iran की इस्लामी क्रांति
अब एक सवाल ये भी आता है कि क्या ईरान में ये सब पहली बार हो रहा है? तो इसके लिए ईरान की 1979 इस्लामिक रेवोल्यूशन को समझना जरूरी है, क्योंकि आज के हालात उसी से जुड़े हैं। ईरान को कभी पर्सिया कहा जाता था, दुनिया की सबसे पुरानी सभ्यताओं में से एक है। लेकिन 1950 में अमेरिका-ब्रिटेन ने मिलकर चुने हुए PM मोसद्दिक का तख्तापलट किया, क्योंकि उन्होंने ऑयल नैशनलाइज किया। शाह को कठपुतली बनाकर बिठा दिया– कुछ कुछ वैसा ही , जैसे अमेरिका ने बांग्लादेश में शेख हसीना को हटाकर अपने एजेंट मोहम्मद यूनुस को बिठा दिया… ईरान में शाह ने वेस्टर्नाइजेशन शुरू किया, लेकिन लोग गुस्से में थे।
फिर आयतोल्लाह खोमैनी आए, वो जब एक्जाइल में थे, तब ईरान के लोगों को मैसेज भेजते रहे, और 1979 में क्रांति हुई। अमेरिका के बिठाए गए शाह भाग गए, ईरान अब एक इस्लामिक रिपब्लिक बना। ईरान से अमेरिका का इन्फ्लुएंस खत्म हो गया। आज के प्रदर्शन भी उसी लिगेसी से जुड़े हैं; तब शाह की सेकुलर पॉलिसी पर गुस्सा था, आज इस्लामिक रूल की सख्ती पर। लेकिन फर्क ये है कि रिजीम ने सीख लिया है, विदेशी साजिशों को पहचान लिया और दबा दिया। कुल मिलाकर, ईरान ने साबित कर दिया कि वो मजबूत खड़ा रह सकता है।
ट्रंप की धमकियां खाली साबित हुईं, हेल्प कभी नहीं आई, और रिजीम ने समझदारी से स्थिति संभाल ली। बाकी दुनिया देखती रह गई। इस पूरे प्रकरण से भारत के लिए एक और सबक भी निकलता है। जो देश अपनी सुरक्षा एजेंसियों को कमजोर करता है, जो आंतरिक असंतोष को सिर्फ “डिसेंट” समझकर छोड़ देता है, वो धीरे-धीरे बाहरी ताकतों का खेल का मैदान बन जाता है। सवाल ये नहीं है कि इस्लामी राष्ट्र में महिलाएं क्या पहनती हैं। सवाल ये है कि पश्चिमी ताकतें ये मुद्दा सिर्फ वहीं क्यों उठाती हैं, जहां उन्हें भू-राजनीतिक फायदा दिखता है।




