Emergency and Indira Gandhi From Iron Lady to Dictator

Emergency Part 1: आपातकाल – आयरन लेडी से तानाशाह तक

Summary
गुड़गाँव का एक लड़का। आपातकाल में इंदिरा गाँधी की पुलिस ने उसके बाल नोच लिए, नाख़ून उखाड़ दिए। बेंत से इतना पीटा कि वो बहरा हो गया।

यह घटना 1975 की है। गुड़गांव का एक लड़का था, जिसे पुलिस सिर्फ़ इसलिए उठा ले गई, क्योंकि वह अपने परिवार को समझा रहा था कि नसबंदी मत कराओ। पुलिस ने उसे हिरासत में लेकर उसके बाल नोच दिए, नाख़ून उखाड़ दिए। एक महीने तक रोज़ उसे बेंत से पीटा गया और जब एक महीने बाद छोड़ा गया, तो उसकी सुनने की क्षमता खत्म हो चुकी थी।

यह न कोई काल्पनिक कहानी है और न ही केवल पुलिस की बर्बरता का मामला। आज़ाद भारत के लाखों लोगों के साथ ऐसी ही घटनाएँ आपातकाल (Emergency) के दौरान उस इंदिरा गांधी के इशारे पर हुईं, जिन्हें 1971 में देश ने लौह महिला का तमगा दिया था।

1971 का चुनाव और इंदिरा का उदय

1971 का लोकसभा चुनाव कई मायनों में महत्वपूर्ण था। यह पूरा चुनाव केवल भावनाओं के आधार पर लड़ा गया। एक तरफ़ इंदिरा गांधी थीं और दूसरी तरफ़ पूरा विपक्ष। विपक्ष ने इंदिरा को हटाने का नारा दिया, तो वहीं इंदिरा गांधी ने “गरीबी हटाओ” का नारा दिया। इस भावनात्मक चुनाव में इंदिरा गांधी को देश ने 352 सीटें देकर, बड़ी उम्मीदों के साथ प्रधानमंत्री बनाया।

उसी साल के अंत तक, बांग्लादेश युद्ध जीतकर उन्होंने देशवासियों के मन में लौह महिला की छवि और भी मजबूत कर ली। लेकिन सवाल यह है कि महज़ तीन सालों में वही इंदिरा गांधी लौह महिला से तानाशाह महिला कैसे बन गईं? क्यों उन्होंने उसी जनता पर डंडा चला दिया, जिसने उन्हें इतनी बड़ी बहुमत से सत्ता सौंपी थी?

आपातकाल के बीज: 1971 से शुरुआत

आपातकाल भले ही 1975 में लागू हुआ, लेकिन इसके बीज 1971 से ही बोए जा चुके थे। युद्ध के दौरान लाखों बांग्लादेशी शरणार्थी भारत में आ गए। स्वाभाविक था कि जब इतनी बड़ी संख्या में शरणार्थी आएँगे, तो संसाधनों का प्रबंधन करना ज़रूरी था। लेकिन इंदिरा गांधी से पहली गलती यहीं हुई, उन्होंने संसाधनों का सही ढंग से प्रबंधन नहीं किया।

युद्ध जीतने के बाद उन्होंने न तो कोई पुनर्वास नीति बनाई, न ही स्थायी व्यवस्था की। संसाधन प्रबंधन की जगह उनकी प्राथमिकता छवि प्रबंधन बन चुकी थी।

आर्थिक संकट और लाल गेहूँ

1973 का तेल संकट भारत के लिए बड़ा झटका था। इंदिरा गांधी के पास इससे निपटने का कोई ठोस आर्थिक योजना नहीं थी। इसी दौरान अन्न संकट भी गहराया। हरित क्रांति के बावजूद जनता भूख से जूझ रही थी। समाधान के नाम पर अमेरिका से लाल गेहूँ खरीदा गया,वही लाल गेहूँ, जो वहाँ जानवरों को खिलाया जाता था।

महँगाई लगातार बढ़ने लगी। सामान्य वस्तुएँ भी आम आदमी की पहुँच से बाहर हो गईं। लौह महिला के फैसलों ने देश को महँगाई और असंतोष की ओर धकेल दिया।

बेरोज़गारी और गोलीकांड

“गरीबी हटाओ” का नारा देने वाली इंदिरा गांधी की नीतियों ने युवाओं को भी निराश किया। बैंकों का राष्ट्रीयकरण और समाजवादी नीतियों ने निजी क्षेत्र की कमर तोड़ दी थी। युवाओं को लगा कि सरकार सब कुछ राष्ट्रीयकरण कर रही है, तो नौकरी भी सबको मिलेगी। लेकिन ऐसा संभव नहीं था।

नौकरी की माँग को लेकर जब युवा सड़कों पर उतरे, तो सरकार ने नौकरी के बदले गोलियाँ दे दीं। 1973 में भोपाल में हुए एक विरोध प्रदर्शन में 8 छात्रों की गोली मारकर हत्या कर दी गई। बेरोज़गारी, भ्रष्टाचार और महँगाई से त्रस्त जनता सड़कों पर उतर रही थी, लेकिन उसकी सुनवाई नहीं हो रही थी।

सोवियत प्रभाव और कांग्रेस

मित्रोखिन अभिलेख और अमरीकी खुफ़िया एजेंसी की रिपोर्टें तक कहती हैं कि जहाँ इंदिरा गांधी सोवियत संघ से प्रभावित थीं, वहीं कांग्रेस के लगभग 40% सांसदों को सोवियत संघ से धन मिलता था। एक ओर कांग्रेस के सांसद सोवियत संघ के पेरोल पर थे, तो दूसरी ओर नौकरी की माँग करने वाले युवाओं पर सरकार गोलियाँ चला रही थी।

संसद और न्यायपालिका पर पकड़

1973 में इंदिरा गांधी ने सर्वोच्च न्यायालय पर भी नियंत्रण जमा लिया। उन्होंने वरिष्ठता को दरकिनार करते हुए ए.एन. राय को मुख्य न्यायाधीश बना दिया।

दरअसल, इंदिरा गांधी की तानाशाही प्रवृत्ति लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु के बाद ही दिखने लगी थी। कांग्रेस पार्टी के भीतर भी उन्होंने असहमत नेताओं को बाहर का रास्ता दिखा दिया। पार्टी, सरकार और न्यायपालिका, हर चीज़ इंदिरा गांधी के नियंत्रण में थी। इंदिरा के एक हाथ में संसद थी, दूसरे हाथ में न्यायपालिका थी, खाली थे तो बस उनके पैर, जिसका इस्तेमाल वो जनता को कुचलने में कर रही थीं।

जेपी आंदोलन और इलाहाबाद उच्च न्यायालय

देश में फैली अव्यवस्था को देखकर जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में आंदोलन खड़ा हुआ। आंदोलन उस समय और तेज हो गया, जब इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने राजनारायण मामले में इंदिरा गांधी को चुनावी धांधली का दोषी ठहराया और उनकी संसद सदस्यता समाप्त कर दी।

जनता को उम्मीद थी कि इंदिरा गांधी कम से कम नैतिकता के आधार पर इस्तीफ़ा देंगी। लेकिन “कुर्सी का चक्कर बाबू भैया…” कुर्सी का चक्कर!

आपातकाल: सत्ता बचाने की जिद

सत्ता बचाने और बेटे संजय गांधी का भविष्य बनाने के लिए इंदिरा गांधी ने देश को आपातकाल के अंधेरे में धकेल दिया।

प्रसिद्ध कवि बाबा नागार्जुन ने इंदिरा गांधी के तानाशाही रवैये को देखकर कहा था

“इंदु जी इंदु जी क्या हुआ आपको,
बेटे को तार दिया, भूल गईं बाप को।”

निष्कर्ष

25 जून 1975 की रात अचानक नहीं आई थी। यह रात उस बारूद के ढेर में लगी चिंगारी थी, जिसे इंदिरा गांधी की नीतिगत भूलों और कुशासन ने खुद तैयार किया था। आपातकाल लगाते समय उन्होंने तर्क दिया था कि वह लोकतंत्र को बचाने के लिए ऐसा कर रही हैं, लेकिन सच्चाई यह थी कि लोकतंत्र को बचाने के नाम पर उन्होंने लोकतंत्र की ही हत्या कर दी।

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