Germany Silent war history

DW न्यूज़ से लेकर CSDS तक, भारत-विरोधी दुष्प्रचार का अड्डा कैसे बन गया जर्मनी? Regim Change का केंद्र है KAS?

Summary
DW जैसे जर्मन मीडिया हों या सिविल सोसायटी के नाम पर KAS, CSDS, FES जैसे NGO; कश्मीर से लेकर परमाणु हथियारों तक के मुद्दे पर एंटी इंडिया बातें लिखने से चूकते नहीं हैं। जब भी भारत विरोधी एलिमेंट्स की बात होती है तो CIA, डीप स्टेट या चीन का नाम आता है, लेकिन जर्मनी चुपके से बच जाता है।

साल 2023 में भारत की एक अदालत राहुल गांधी को मानहानि के मामले में दोषी ठहराती है। सज़ा होती है, कुछ समय के लिए लोकसभा सदस्यता रद्द होती है। अब ये पूरा मामला किसका है? भारत का.. भारतीय अदालत, भारतीय क़ानून… लेकिन इस पर सबसे पहले बयान कौन देता है? जर्मनी। जर्मन विदेश मंत्रालय कहता है- “हम स्थिति पर नज़र बनाए हुए हैं और उम्मीद करते हैं कि न्यायिक स्वतंत्रता से समझौता नहीं होगा।”

अब यहीं पर ज़रा रुक कर सोचिए। सवाल ये नहीं है कि बयान आया। सवाल ये है कि जर्मनी को क्यों लगा कि उसे इस मामले में कूदना चाहिए? यहीं से आज की पूरी कहानी शुरू होती है। जिसे हम हमेशा लगभग नज़रअंदाज़ करते रहे। 

क्या आपने कभी सोचा है कि BBC और Voice of America के अलावा अगर किसी विदेशी ताक़त ने भारत के लिए हिंदी-उर्दू स्पेस को ध्यान में रखकर काम शुरू किया, तो वो ना रूस था, ना फ्रांस। वो देश था जर्मनी। और आप समझ ही गए होंगे कि मैं DW न्यूज़ की बात कर रहा हूँ। भारत में जब भी रेजिम चेंज, विदेशी दख़ल या नैरेटिव वॉर (Regime Change, Foreign Meddling, Narrative War) की बात होती है, तो उंगली सीधे अमेरिका की ओर उठती है। CIA, USAID, डीप स्टेट, ये नाम सब तयशुदा संदर्भ बन चुके हैं और कॉमन बातचीत का हिस्सा भी बन गए। लेकिन इसी शोर में एक देश हर बार चुपचाप निकल जाता है: जर्मनी।

DW कोई नया डिजिटल खिलाड़ी नहीं है; 2024 में उसके हिंदी-उर्दू प्लेटफॉर्म को भारत में 60 साल पूरे हुए। टैक्सपेयर के पैसे से चलने वाला यह स्टेट-फंडेड मीडिया भारत कवरेज में एक साफ़ पैटर्न दिखाता है- PM मोदी, भारतीय मीडिया और बहुसंख्यक समाज पर लगातार निशाना; कोविड के दौरान “Out of control India”, कश्मीर में सुरक्षा बलों को “Occupying Force” कहना, और अलगाववादी स्वरों को मंच देना

ये सब DW न्यूज़ के डिजिटल दुष्प्रचार की कहानी हैं। BBC का भारत में नेटवर्क कॉमनवेल्थ इतिहास से समझ आता है, लेकिन DW की इतनी गहरी और लंबी पैठ कोई संयोग नहीं है। यह जर्मनी की नई Soft Power Strategy का हिस्सा है, जो शोर नहीं करती, बस धीरे-धीरे नैरेटिव सेट करती है।

हमने मान लिया कि सेकंड वर्ल्ड वॉर के बाद जर्मनी ख़त्म हो गया। बस एक ट्रेडिंग पार्टनर.. या वो अब सिर्फ़ एक फूंका हुआ कारतूस है। लेकिन सच्चाई ये है कि वर्ल्ड वॉर के बाद कुछ देर के झटके से उबरकर जर्मनी हाशिए पर कभी गया ही नहीं। और ये वापसी टैंक लेकर नहीं हुई। ये वापसी हुई संस्थाओं, नैतिकता और लोकतंत्र की भाषा के ज़रिये।

तो सवाल आता है कि फिर पुराना जर्मनी क्या था? द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जर्मनी ने एक लाइन पकड़ी- वान्डल डुर्ख़ हान्डल (Wandel durch Handel)  मतलब-  व्यापार के ज़रिये बदलाव। ना ज़्यादा राजनीति.. ना ज़्यादा नैतिक उपदेश। बस इकॉनमी, टेक्नोलॉजी और सॉफ्ट पावर। लेकिन ये जर्मनी का पहला फेज़ था। अब जर्मनी सिर्फ़ इकॉनमिक पावर नहीं रहना चाहता।
 

अब वो खुद को एक ‘मोरल सुपरपावर’ के रूप में पेश करना चाहता है। जो दुनिया को बताए कि लोकतंत्र कैसा होता है। मानवाधिकार (Human Rights) कैसे दिखते हैं। और आज़ादी (Freedom) की सही परिभाषा क्या है। सुनने में बहुत अच्छा लगता है। लेकिन यहीं से दिक्कत शुरू होती है। क्योंकि जब आप खुद को नैतिक निर्णायक मान लेते हैं, तो दूसरे देशों की संप्रभुता आपको समस्या लगने लगती है। और भारत, जो अपने लोकतंत्र के लिए वेस्टर्न सर्टिफिकेट नहीं चाहता, स्वाभाविक रूप से टकराव का मैदान बन जाता है।

Germany: अपराधबोध से नैतिक दादागिरी तक

जर्मनी की कहानी में नाज़ी अतीत है, और यहूदियों का नरसंहार है। जर्मनी इस तरह से दशकों तक अपराधबोध में जिया। और इस अपराधबोध से निकलने का रास्ता उसने Moral Rebranding से चुना। खुद को दुनिया का नैतिक शिक्षक बना लो। लेकिन जर्मनी का यही प्रायश्चित धीरे-धीरे दख़ल बनता चला गया। और इस दख़ल का नतीजा भारत जैसे देशों के लोकतंत्र को ‘सुधारने’ की ज़िद में नजर आने लगा।

एक तरफा अमेरिका है – वो खुले ऑपरेशन, तख़्तापलट, युद्ध करता है। दूसरी तरफ़ जर्मनी- जो शांत, सलीके वाला और संस्थागत है। NGOs,  एकेडमिक्स, मीडिया,  फाउंडेशन्स। (NGO, Academics, Media, and Foundations) यानी कोई टैंक नहीं, मिसाइल नहीं। सिर्फ़ विचार और आइडियोलॉजी। यही वजह है कि जर्मनी कम दिखता है, लेकिन धरातल पर वो गहराई में ज़्यादा घुसा होता है।

इस तरह से इसने भारत में अपने गेम के कुछ फ्रंट्स तैयार किए  और आज भारत में जर्मनी का खेल कई चेहरों में दिखता है। जैसे – सिविल सोसायटी, अकादमिक नेटवर्क, मीडिया और डिजिटल इन्फ्लुएंसर्स, ‘डेमोक्रेटिक बैकस्लाइडिंग’ का फ्रेम। (Civil Society, Academic Networks, Media and Digital Influencers) 

CSDS और जर्मनी का नेक्सस

सबके चेहरे अलग हैं, लेकिन दिशा एक ही है। लेकिन ऐसा नहीं है कि किसी का ध्यान जर्मनी के इन तरीकों पर कभी गया ही नहीं। ऑपइंडिया ने जब CSDS पर रिसर्च की थी तो हमने बताया था कि CSDS जैसी संस्थाओं के पीछे जर्मनी की भूमिका कितनी गहरी है। हमारे इस रिसर्च पेपर में आप पढ़ भी सकते हैं कि जर्मनी अपनी संस्थाओं को उन देशों में सक्रिय होने के लिए फंडिंग दे रहा है जहाँ उसने मान लिया है कि “लोकतंत्र खतरे में है” (Democratic Backsliding)। 

इसी से आप समझ सकते हैं कि क्यों जर्मन विदेश मंत्रालय अब भारत के लीगल मामलों पर भी बयानबाजी करने में झिझकता नहीं है-  जैसे अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी का मामला हो या मणिपुर की हिंसा की घटना। यह केवल राजनयिक बयानबाजी नहीं होती हैं, ये जर्मनी की नई फ़ॉरेन पालिसी का एग्जीक्यूशन था, जो मानती है कि “मानवाधिकारों की रक्षा, देश की अपनी संप्रभुता से ऊपर है”।

कभी चर्च आगे आती है। कभी कोई फाउंडेशन। कभी स्कैंडिनेवियन देशों के कवर। और इन सबका मक़सद क्या होता है? ऐसी सिविल सोसायटी को प्लांट करना, जो हर बड़े भारतीय प्रोजेक्ट के सामने ‘नैतिक आपत्ति’ (Moral objection) बन जाए।

इनके आधार पर आपको राहुल गांधी की जर्मनी यात्राएँ समझने में समस्या नहीं होंगी। आजकल वो जर्मनी के ही हर्टी स्कूल ऑफ गवर्नेंस में लेक्चर दे रहे थे। एक ऐसा संस्थान, जिसका इतिहास ही नाजी अतीत के ‘प्रायश्चित’ से जुड़ा है। हर्टी स्कूल जिस हर्टी फाउंडेशन ने बनाया था, वो असल में 19वीं सदी के एक बड़े डिपार्टमेंट स्टोर (Tietz department store) से आया है, लेकिन नाजी दौर में इस यहूदी टिट्ज़ परिवार की संपत्ति को (Aryanization) “आर्यीकरण” के नाम पर छीन लिया गया था, जिससे फाउंडेशन को फायदा पहुंचा।

फाउंडेशन अब “प्रायश्चित” के तौर पर लोकतंत्र को मजबूत करने (Strengthening Democracy) के लिए भारी पैसा लगाता है। देखने में ये अच्छा भी लग सकता है, लेकिन यह guilt या “प्रायश्चित” अब दूसरे देशों के लोकतंत्र में दखल डालने का बहाना बन गया है, जैसे भारत जैसे देशों की राजनीति में अपनी नीतियों और विचारों को थोपना।  

आज जर्मनी का यही प्रायश्चित भारत जैसे देशों की राजनीति में दख़ल का औज़ार बनता दिखता है। और जब राहुल गांधी वहाँ खड़े होकर कहते हैं- “Institutional Capture”, “People Will Fight Each Other” तो ये सिर्फ़ भाषण नहीं होता। वास्तव में ये नैरेटिव एक्सपोर्ट हो रहा होता है। और इसका असल इंजन है KAS।  

KAS (Konrad Adenauer Stiftung)।

KAS इस कहानी का सबसे अहम किरदार है– KAS यानी कोनराड आडेनाउअर श्टिफ़्टुंग (Konrad Adenauer Stiftung)। ये कोई न्यूट्रल NGO नहीं है। ये CDU की वैचारिक मशीन है। इसमें Konrad Adenauer की ईसाई नैतिकता की खाद-पानी लगी हुई है और पश्चिमी वर्चस्व। KAS उसी सोच का एक्सटेंशन है।

KAS खुद अपनी वेबसाइट पर साफ़-साफ़ लिखता है कि वह Christian Democratic Union यानी CDU से politically affiliated है। इसमें कोई पर्दा नहीं है। और इसमें हैरानी भी नहीं होनी चाहिए, क्योंकि CDU और KAS- इन दोनों के पीछे जो दिमाग़ था, जो वैचारिक आत्मा थी, वो एक ही आदमी था: कोनराड आडेनाउअर 

Konrad Adenauer। अगर आप इस एक आदमी को समझ जाएँगे तो आप पूरे जर्मनी को समझ जाएँगे और ये भी समझ जाएँगे कि जर्मनी आख़िर इतना परेशान क्यों है? Konrad Adenauer कोई मामूली नेता नहीं थे। वो पश्चिम जर्मनी के पहले चांसलर थे। यानी २nd world war की तबाही के बाद जर्मनी को दोबारा खड़ा करने वाला चेहरा। एक ऐसा नेता जिसने खंडहरों से उठकर जर्मनी को फिर से पश्चिमी दुनिया की मुख्यधारा में ला खड़ा किया।

इस आदमी ने जर्मनी को अकेला नहीं छोड़ा। उन्होंने जर्मनी को अमेरिका और पश्चिमी यूरोप के साथ जोड़ा, NATO में शामिल कराया और यूरोपीय एकीकरण की नींव रखी। जिसकी शुरुआत European Coal and Steel Community से हुई। लेकिन ये सब सिर्फ़ सत्ता की राजनीति नहीं थी। इसके पीछे एक मास्टरप्लान था।

कोनराड एक कट्टर रोमन कैथोलिक थे। पूरी ज़िंदगी बाइबिल पढ़ते रहे और ईसाई सोच को राजनीति से अलग मानने को तैयार नहीं थे। उनका साफ़ मानना था कि बिना ईसाई सामाजिक नैतिकता के कोई भी समाज स्वस्थ नहीं रह सकता। उनके लिए यूरोप सिर्फ़ ज़मीन का टुकड़ा नहीं था, बल्कि एक Christian civilization था। और अगर उस सभ्यता से ईसाई मूल्य निकाल दिए गए, तो यूरोप खोखला हो जाएगा।

इसीलिए कोनराड की नज़र में द्वितीय विश्व युद्ध के बाद दुनिया की असली लड़ाई थी- ईसाई सभ्यता बनाम मार्क्सवाद। वे कम्युनिज़्म को नाज़ीवाद जितना ही खतरनाक मानते थे। सोवियत संघ उन्हें आज़ादी के लिए सबसे बड़ा खतरा लगता था। यही सोच उन्हें NATO तक ले गई, यही सोच उन्हें अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी तक ले गई।

और इसी सोच से जन्म हुआ Christian Democratic Union यानी CDU का। CDU कोई सामान्य राजनीतिक पार्टी नहीं थी। कोनराड ने इसे जानबूझकर इस तरह बनाया कि कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट, जो सदियों से बँटे हुए थे, एक साथ आ सकें और ईसाई सिद्धांतों पर आधारित राजनीति कर सकें। उनका मानना था कि राजनीति को ईसाई नैतिकता से चलना चाहिए।

कोनराड की निजी ज़िंदगी देखें तो वो पेशे से वकील थे। 1917 में कोलोन के मेयर बने। लेकिन 1933 में नाज़ी सत्ता में आए और उन्हें पद से हटा दिया गया। नाज़ी शासन के दौरान उन्हें जेल भी जाना पड़ा। 1944 में हिटलर की हत्या की कोशिश के बाद गेस्टापो  (Gestapo) ने उन्हें फिर गिरफ़्तार किया। ये गेस्टापो नाज़ियों की सीक्रेट पुलिस हुआ करती थी।

युद्ध के बाद वही व्यक्ति राइनलैंड के ईसाई लोकतांत्रिक दल का अध्यक्ष बना, फिर British Zone के CDU का अध्यक्ष, फिर Parliamentary Council का राष्ट्रपति और आखिरकार पश्चिम जर्मनी का चांसलर।  

20 दिसंबर 1955 को CDU से जुड़े प्रमुख नेताओं ने एक संस्था बनाई- Society for Christian Democratic Educational Work। मक़सद साफ़ था-  ईसाई लोकतांत्रिक विचारधारा को शिक्षा, रिसर्च और अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क के ज़रिये फैलाना। 

और 1964 में, जर्मनी के पहले चांसलर के सम्मान में, इसी संस्था का नाम बदलकर कोनराड आडेनाउअर श्टिफ़्टुंग (Konrad-Adenauer-Stiftung) रख दिया गया। यानी KAS कोई न्यूट्रल थिंक-टैंक नहीं है। ये CDU की वैचारिक विरासत है- कोनराड की सोच का संस्थागत विस्तार।

भारत में कैसे काम करता है KAS

आज यही KAS भारत में भी सक्रिय है। CSDS जैसी संस्थाओं को फंडिंग देती है। इन संस्थाओं के ज़रिये भारत की लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं पर सवाल खड़े किए जाते हैं, बहुसंख्यक समाज को टारगेट किया जाता है और संप्रभुता को कमजोर करने वाला नैरेटिव गढ़ा जाता है। 2016 से अब तक KAS ने CSDS को 2.6 करोड़ रुपये से ज़्यादा की फंडिंग दी है।

KAS कैसे काम करता है ये देखना दिलचस्प है। काग़ज़ों पर ये KAS शिक्षा, रिसर्च, स्कॉलरशिप के लिए काम करता है। लेकिन धरातल पर? युवाओं को ट्रेन करना। पॉलिसी नैरेटिव बनाना। मीडिया और अकादमिक नेटवर्क खड़ा करना। इस सबसे कोई सरकार नहीं गिरती। लेकिन समाज की सोच बदल दी जाती है।

और आज सरकारें आईडिया और उस आइडिया के डिजिटल वैचारिक इंजेक्शन से ही गिरती हैं। आज KAS 120 से ज़्यादा देशों में 200 से ज़्यादा प्रोजेक्ट चला रहा है। और यही वजह है कि इसे हल्के में लेना सबसे बड़ी भूल होगी।  इसीका एक उदाहरण देखिए जहाँ UAE के मानवाधिकार रिपोर्ट्स  में KAS पर “Operating Illegally” जैसे आरोपों का जिक्र मिलता है। मतलब- लोकतंत्र सिखाने आई संस्था खुद स्थानीय क़ानूनों के दायरे से बाहर काम करती है। और यह सिर्फ़ किसी एक देश की कहानी नहीं है।

KAS के इसी फ्रेम से भारत के मामलों पर जर्मनी के बयान आते हैं। चाहे केजरीवाल की गिरफ्तारी हो। मणिपुर हिंसा पर जर्मनी का कूदना हो। जर्मनी ने अपनी विदेश नीतियों के सहारे “मानवाधिकार को संप्रभुता से ऊपर रखने की सोच” को भारत पर थोपने की कोशिश हर बार की है। KAS जैसे संगठन सीधे सरकार गिराने नहीं आते। वे संविधान नहीं तोड़ते। वे टैंक नहीं भेजते। वे विचार भेजते हैं। वे नेटवर्क बनाते हैं। वे नैरेटिव गढ़ते हैं।

और अब तक तो आप समझ ही गए होंगे कि KAS ने राजनीति में दिलचस्पी यूँ ही नहीं ली। उसका मकसद था जर्मनी के मूल्यों और उसके मॉडल वाले लोकतंत्र को दुनिया भर में फैलाना। ठीक वैसे ही, जैसे अमेरिका अपनी सोच को फैलाने के लिए USAID का इस्तेमाल करता है। फ़र्क़ बस इतना है कि USAID अमेरिकी रास्ता दिखाता है, और KAS यूरोपीय या स्पेशली जर्मन रास्ता। KAS देशों को EU के रास्ते पर चलने के लिए तैयार करती है। जबकि USAID ज़्यादातर अमेरिकी मॉडल और नीतियों को आगे बढ़ाती है। इसलिए जब दोनों संस्थाएं एक ही देश में काम करती हैं,  तो टकराव भी होता है। KAS चाहती है कि देश यूरोप से जुड़ें। और USAID चाहती है कि देश अमेरिका के अनुसार चलें।

इसी दबदबे को क़ायम रखने के लिए जर्मनी का भारत को लेकर बड़ी घटनाओं पर अलग-अलग रुख अपनाया। जब भारत ने 1961 में पुर्तगाली शासन से गोवा को मुक्त किया, तो पश्चिमी जर्मनी ने इसकी निंदा की, क्योंकि वह NATO के साथ था और पुर्तगाल उसका सहयोगी था। साल 1971 में जब भारत ने बांग्लादेश की मुक्ति के लिए पाकिस्तान से युद्ध किया, तो जर्मनी ने शुरुआत में इसकी आलोचना की। परमाणु परीक्षणों के मामले में जर्मनी भारत के लिए सख़्त ही रहा – 1974 के पहले परीक्षण पर और खासकर 1998 के दूसरे परीक्षण (पोखरण-II) पर जर्मनी ने सहायता रोक दी और भारत को परमाणु संधि (NPT) में शामिल होने के लिए दबाव डाला। 

जर्मनी की स्ट्रेटजी के 3 इंपोर्टेंट पिलर: श्टिफ़्टुंग (Stiftungen) मॉडल

जर्मनी की राजनीतिक व्यवस्था में एक अनोखी चीज़ है श्टिफ़्टुंग, यानी राजनीतिक फाउंडेशन्स। ये सीधे-सीधे राजनीतिक पार्टियों से जुड़ी होती हैं, लेकिन पैसा जर्मन स्टेट से लेती हैं। और फिर दुनियाभर में निकल पड़ती हैं ‘लोकतंत्र सिखाने’। भारत में इन फाउंडेशन्स की ऐक्टिविटीज पर गृह मंत्रालय ने कई बार सख़्त रुख भी अपनाया है। जिसकी वजह साफ़ है। ज़मीन पर इनका पैटर्न एक जैसा दिखता है। ऐसे NGOs को फंडिंग, जो PIL के ज़रिये विकास परियोजनाओं को रोकते हैं, इंडस्ट्रियल  डेवलपमेंट में अड़चन डालते हैं और सरकार की नीतियों को अदालतों में उलझाए रखते हैं। इसी प्रक्रिया में CPR और Oxfam India जैसे संगठनों के FCRA लाइसेंस रद्द हुए।

तीन फाउंडेशन, तीन पार्टियाँ….. लेकिन तीनों की दिशा एक है 

इसमें पहला नाम- फ़्रीडरिष एबर्ट श्टिफ़्टुंग (Friedrich Ebert Stiftung) (FES)। ये जर्मनी की SPD से जुड़ी है। FES उन NGOs को फंड करती है जो ‘लेबर राइट्स’ के नाम पर इंडस्ट्रियल अनरेस्ट खड़ा करते हैं और विकास परियोजनाओं का विरोध करते हैं। 2022 में FES की एक रिपोर्ट में भारत को Authoritarian regimesके साथ खड़ा कर दिया गया और ‘cow vigilantes’ जैसे शब्द इस्तेमाल हुए।

दूसरा नाम- हाइनरिष बॉएल श्टिफ़्टुंग Heinrich Böll Stiftung (HBS), जो Green Party से जुड़ी है। भारत को लेकर सबसे आक्रामक यही है। कोयला, न्यूक्लियर एनर्जी, अडानी जैसे इंफ्रा प्रोजेक्ट्स, यहाँ तक कि आरोग्य सेतु ऐप तक, हर जगह आपत्ति। और जब एजेंसियाँ money trail देखती हैं, तो कई बार सिरा इन्हीं जर्मन फाउंडेशन्स तक पहुँचता है।

तीसरा- कोनराड आडेनाउअर श्टिफ़्टुंग Konrad Adenauer Stiftung (KAS), CDU से जुड़ी संस्था है। इसका फोकस है यूथ, पॉलिसी मेकर्स और अकादमिक सर्कल। सर्वे, फेलोशिप और प्रोग्राम, जो सरकार विरोधी एनार्की को वैचारिक शक्ल देते हैं। मीडिया, रिसर्च और ट्रेनिंग, ये KAS तीनों काम एक साथ करती है।

Feminist Foreign Policy: नैतिकता या दख़ल?

इसी लाइन पर जर्मनी की Feminist Foreign Policy आती है, जिसे जर्मनी की विदेश मंत्री ऐनालेना बेयरबॉक ने ‘महिलाओं और समानता’ के नाम पर पेश किया। लेकिन भारत के मामले में यही नीति दख़ल का औज़ार बनती दिखी। कश्मीर पर पाकिस्तान के साथ खड़े होकर UN दख़ल की बात, मणिपुर को ‘हिंदू बनाम ईसाई’ फ्रेम में दिखाना, और केजरीवाल की गिरफ़्तारी पर बयान देकर भारत की रेड लाइन बार-बार क्रॉस हुई।

जर्मनी ने भारत में डिजिटल युद्ध के लिए और भी फ़्रंट्स तैयार किए हैं, जिनमें मीडिया और सोशल मीडिया का बड़ा रोल दिखता है जैसा कि हमने दशकों पुराने DW मीडिया के बारे में आपको शुरुआत में ही बताया भी।

आज The Caravan जैसे शार्पशूटर्स तो KAS के Media Programme Asia  नेटवर्क का हिस्सा है ही।लेकिन जर्मनी बदलते दौर में भी अपने इन्फॉर्मेशन वारफेयर में भी ऐक्टिव है और जरूरत के हिसाब से अपनी पैकेजिंग भी बदल रहा है। इसका एग्जाम्पल वो जर्मन शेफर्ड हैं जो इंगेजमेंट फार्मिंग के लिए जर्मनी ने छोड़े हुए हैं। इंगेजमेंट फार्मिंग से एक नाम याद आता है और वो है ध्रुव राठी।

जिसे कोई नहीं जानता था, वो अचानक से 2019 के चुनाव से पहले BBC में दिखने लगता है, NDTV जैसे न्यूज़ चैनल्स पर Caste, Reservation, गंगा नदी, चुनाव, EVM जैसे संवेदनशील विषयों पर बात करने लगता है। और यूट्यूब पर पॉपुलर हो जाता है।

आज जर्मनी भारत-विरोधी डिजिटल इन्फ्लुएंसर्स के लिए सुरक्षित बंदरगाह बन चुका है। सख़्त privacy और free speech L aws उन्हें भारतीय कार्रवाई से बचाते हैं। 

जर्मनी की Normative Power

मल्टी-पोलर दुनिया में जर्मनी अपनी खोई हुई ताक़त फिर से हासिल करना चाहता है लेकिन सेना से नहीं। और यह उसकी Normative Power है। जर्मनी यह तय करने की शक्ति अपन पास रखना चाहता है कि कौन “लोकतांत्रिक” है और कौन नहीं। भारत एक आर्थिक साझेदार है, लेकिन जर्मनी का पॉलिटिश्यन और वहाँ का एलीट, भारत की Civilizational State के रूप में वापसी को सहजता से स्वीकार नहीं कर पा रहा और अब ये अधिक आक्रामक इसलिए हो रहा है क्योंकि टॉप-3 इकॉनमी की दौड़ में अगर किसी को पीछे छोड़ा जा सकता है, तो वह जर्मनी ही है।

क्या हम इस खेल को पहचान रहे हैं कि आज की जंग बॉर्डर पर नहीं बल्कि संस्थाओं, विचारों और नैरेटिव्स में लड़ी जा रही है। ऑपइंडिया की इन सभी पर नजर बनी हुई है और इसीलिए हम CSDS की तरह ही जर्मनी के बाक़ी के इन फ़्रंट्स पर भी जल्दी ही एक और बड़ी रिसर्च लेकर आएँगे, ताकि इस पूरे नेक्सस की बारीकियों और मोडस ऑपरेंडाई से आप भी वाक़िफ़ हो सकें।

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