जिहादी तुष्टिकरण के लिए हिन्दुओं का कब्रिस्तान बन रहा ममता बनर्जी का बंगाल

Summary
एक दशक से अधिक समय में पश्चिम बंगाल में हिंदुओं पर हुई टार्गेटेड हिंसा, सत्ता संरक्षण, जनसांख्यिकीय बदलाव और संस्थागत पक्षपात की विस्तृत कहानी।

अगर आप बांग्लादेश में हो रही हिंदुओं की हत्याओं से परेशान हैं, पाकिस्तान में टूटते मंदिरों पर आपका मन दुखता है, तो मैं आपसे कहूँगा कि पहले अपने घर में झाँक कर देख लीजिए। देखिए और समझिए कि कैसे एक सिस्टमेटिक तरीके से हिंदुओं को सत्ता-शासन और अंततः अपने ही राज्य से बाहर निकालने की योजना चल रही है।

क्या महसूस करेंगे अगर मैं आपको बताऊँ कि बीते एक दशक में कोई ऐसा साल नहीं गुज़रा जब पश्चिम बंगाल में हिंदुओं की टार्गेटेड हत्याएँ न हुई हों, तो कैसा महसूस करेंगे? कैसा महसूस करेंगे अगर मैं यह बताऊँ कि ये सारी हत्याएँ सत्ता के संरक्षण में हुई हैं।

संरक्षण भी कैसा—ऐसा कि क़त्ल हुआ लेकिन उसकी चर्चा नहीं होगी। दिल्ली से अगर कोई जाँच दल पश्चिम बंगाल जाए तो वह उसका सत्य न जान पाए, इसलिए जानलेवा हमला तक कर दिया जाएगा। और यह सब क्यों होता है? क्योंकि जो क़ातिल है, वह उस सत्ता का मुंसिफ है।

मुंसिफ यूँ कि वह चाहेगा तो इस नेता के पास तख़्त-ओ-ताज होगा, नहीं तो सियासत के बियाबान में एक लंबी रुख़्सती लिख दी जाएगी।

और सत्ता के लिए न सिर्फ़ हिंदुओं के कत्लेआम पर आँखें बंद की गईं, बल्कि सरकारी नौकरी और लाभ के गलियारों के रास्ते तक बंद किए गए। हिंदुओं के आरक्षण की नदी से मुसलमानों के लिए अवैध नहरें खोल दी गईं। बहुसंख्यक हिंदुओं के पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के सत्ता-लोक में हिंदुओं की एंट्री बंद करके मुसलमान नेताओं की एक पूरी जमात को परमानेंट हिस्सेदारी अलॉट कर दी गई।

तो मैं इस कहानी का सिरा कहाँ से पकड़ूँ, क्या बताऊँ कि कैसे 2011 में ममता बनर्जी को सत्ता मिली तो कम्युनिस्ट राज से ही जलते बंगाल की तपिश की चिमनी निरीह हिंदुओं की तरफ़ घुमा दी गई। यूँ नहीं था कि बंगाल को आग-लपटों से खेलने की आदत नहीं थी और यूँ भी नहीं था कि इस आग में हिंदू पहली बार जलने जा रहे थे।

1930 का किशोरगंज का दंगा हो, या 1941 में ढाका के अंदर सौ से ज़्यादा हिंदुओं के कत्लेआम की दास्तान, या फिर 1946 की The Great Calcutta Killing—हिंदुओं ने यह सब भोगा हुआ था। लेकिन इन सभी घटनाओं के बाद बंगाल के हिंदुओं को कुछ ही वक्त के लिए, लेकिन साँस लेने का मौक़ा ज़रूर मिला।

वे दोबारा खड़े हो पाए और अपनी महान संस्कृति की सेवा कर पाए। लेकिन आज मैं जो कहानी सुनाने जा रहा हूँ, वह दम घोंटू है। एक दशक से ज़्यादा वक्त के अत्याचार की दास्तान है, जिसमें सत्ता के संरक्षण में धरती पर ख़ून बहाने और काग़ज़ों पर पहचान मिटा देने की कहानी शामिल है। यह कहानी है पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के तानाशाही शासन में हिंदुओं के अस्तित्व पर प्रश्न खड़े हो जाने की।

Sunday Guardian नाम के एक पोर्टल पर 23 मार्च 2025 को एक खबर छपी। हेडलाइन थी— “Mamata gives in to sectarian demands, will sacrifice Hindu MLAs in 2026 polls”। यानी मज़हबी माँगों को स्वीकार करते हुए ममता बनर्जी 2026 के चुनावों में अपने हिंदू विधायकों का बलिदान देंगी।

क्या थीं ये मज़हबी माँगें? इसी खबर में एक टीएमसी नेता का बयान छपा कि मुस्लिम समुदाय के नेताओं के साथ हर बातचीत में दीदी (ममता बनर्जी) से मुसलमानों के अधिक सदस्यों को नामांकित करने का अनुरोध किया जा रहा है।

टीएमसी की तरफ़ से दो सर्वे भी करवाए गए, जिनमें सामने आया कि कम से कम ऐसी 35 सीटें हैं जहाँ अभी तक हिंदू विधायक थे, लेकिन 2026 के चुनावों में ममता बनर्जी को उन्हें बाहर का रास्ता दिखाना पड़ेगा, नहीं तो मुसलमान वोट बिखर जाएगा।

एक और टीएमसी नेता का बयान छपा कि अब ममता बनर्जी के पास विकल्प सीमित हैं। पार्टी के मुस्लिम नेता ज़ोर दे रहे हैं कि मुस्लिम समुदाय के लोगों को ज़्यादा प्रतिनिधित्व मिले।

और इसे मुमकिन बनाने के लिए सरकार हर तरह के हथकंडे अपना रही है। शेख शाहजहाँ जैसे बलात्कारी अपराधी को हर मुमकिन बचाने वाली पार्टी अपने हिंदू नेताओं पर भ्रष्टाचार के छोटे-छोटे आरोप लगाकर उन्हें न सिर्फ़ बाहर कर रही है, बल्कि उनके पॉलिटिकल एक्सिस्टेंस को ही ख़त्म कर दे रही है।

एंटी-CAA और एंटी वक़्फ़ जैसे प्रोटेस्ट्स में आपको साफ़ नज़र आएगा कि पश्चिम बंगाल स्टेट संविधान और संवैधानिक संस्थाओं के सामने मुसलमानों के साथ खड़ा है। कम से कम 50 हिंदू टीएमसी नेताओं ने ममता बनर्जी सरकार के एंटी-CAA स्टैंड से नाराज़ होकर पार्टी छोड़ दी, लेकिन ममता बनर्जी ने मुसलमानों को अपने पल्लू से बाँधे रखा।

एंटी-CAA प्रोटेस्ट के दौरान 80 करोड़ से ज़्यादा की रेलवे संपत्ति जलाई गई, लेकिन पश्चिम बंगाल पुलिस ने उसे रोकने के लिए क्या किया—किसी को नहीं पता। हाईकोर्ट ने सवाल पूछा था कि सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा ममता सरकार क्यों नहीं कर पाई।

ममता बनर्जी सरकार, यानी बंगाल स्टेट, द्वारा सरकारी ख़र्चे पर इंडियन स्टेट के क़ानून—Citizenship Amendment Act—के ख़िलाफ़ विज्ञापन चलवाया गया। इस मामले में भी हाईकोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार सरकारी संसाधनों का इस्तेमाल राजनीतिक विज्ञापन के लिए नहीं कर सकती।

और ध्यान रहे, एक वक्त पर यही ममता बनर्जी थीं जिन्होंने घुसपैठियों और अवैध नागरिकता के मुद्दे पर लोकसभा में स्पीकर के ऊपर काग़ज़ उछाल दिए थे।

लोकतांत्रिक सत्ता और सरकार के अलावा सरकारी नौकरियों में भी ममता बनर्जी ने खुले हाथों से हिंदुओं के हिस्से की नौकरियाँ मुसलमानों के हाथों में सौंपीं। पश्चिम बंगाल की 97 फ़ीसदी मुस्लिम आबादी को ओबीसी-A कैटेगरी में शामिल कर दिया गया, जिसमें विशेष 10% का कोटा बनाया गया।

कुल 179 ओबीसी जातियों में 118 जातियाँ मुस्लिम वर्ग से आती हैं। कई मौकों पर ऐसी सूचियाँ भी वायरल हुईं जिनमें एक तरफ़ से सारे के सारे सिलेक्टेड कैंडिडेट मुस्लिम नज़र आए।

इसके अलावा पश्चिम बंगाल में जो भी प्राइवेट या कॉन्ट्रैक्ट के काम हैं, वहाँ बड़ी संख्या में एकतरफ़ा मुसलमानों की भर्ती किए जाने की रिपोर्ट्स देखने को मिलती हैं।

जैसे 2011 में जब यह आरक्षण नहीं था, तब पश्चिम बंगाल की सिविल सर्विस में 5% मुस्लिम सेलेक्ट हो पाए थे, लेकिन इसी आरक्षण के आने के बाद 2014 में ओबीसी-A कैटेगरी में यह संख्या 17.4% हो गई। ग्रुप-A की नौकरियों में 8% से सीधे 22% की बढ़ोतरी हुई।

यह कितना बड़ा व्यवस्थागत भ्रष्टाचार है, इसे ऐसे समझिए कि ओबीसी-B कैटेगरी में केवल एक मुस्लिम सेलेक्ट हो पाया, जबकि विशेष तौर पर मुस्लिम-बहुल ओबीसी-A कैटेगरी में 39 मुसलमान सेलेक्ट हुए।

और यह सिर्फ़ एक नौकरी में नहीं हुआ—पुलिस से लेकर अस्पतालों में असिस्टेंट लेवल की नौकरियों तक, इस एक्सक्लूसिव आरक्षण की वजह से हिंदू ओबीसी समूहों को केवल 7% के कोटे में संघर्ष करना पड़ा।

इस पर कलकत्ता हाईकोर्ट तक को कहना पड़ा कि इस आरक्षण को देने का इकलौता आधार ही मज़हब है, जबकि संविधान में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है कि आरक्षण का आधार मज़हब हो।

इसके अलावा जो रोज़मर्रा के कामकाज हैं, या जो अनऑर्गनाइज़्ड लेबर सेक्टर है, उसे कंट्रोल करने के लिए जो सिंडिकेट बना हुआ है, उसका भी टिल्ट अब मज़हबी आधार पर देखने को मिलता है। और इसके प्रभाव को समझने के लिए पहले आपको सिंडिकेट को समझना होगा।

सिंडिकेट 2000 के दशक में वामपंथी सरकारों के दौरान बना। मूलतः यह लोकल स्तर पर पूरे राज्य में फैला एक नेटवर्क है, जो मज़दूर से लेकर ट्रेडर्स और ठेकेदारों तक पर अपना नियंत्रण रखता है। यह इतना ताक़तवर है कि अगर यह चाह ले, तो आप पश्चिम बंगाल के किसी कोने में एक कमरे की एक दीवार भी पेंट नहीं करवा सकते।

जब ममता बनर्जी सत्ता में आईं, तो यह सिंडिकेट ममता का लॉयल हो गया। और जो फिरहाद हकीम जैसे लोग ममता के लॉयलिस्ट थे, उन्होंने इस सिंडिकेट पर कब्ज़ा हासिल कर लिया। और आज वह सिंडिकेट व्यवस्थित रूप से मज़हबी आधार पर मज़दूरों को काम देता है।

हिंदू ठेकेदारों से इतनी ज़्यादा कट-मनी वसूली जाती है कि वे उस क्षेत्र में काम कर पाने की स्थिति में नहीं रह जाते। आरोप यहाँ तक लगते हैं कि बांग्लादेशी घुसपैठियों और रोहिंग्याओं को बसाने और रोज़मर्रा की मज़दूरी के कामों के ज़रिए उनके जीने-खाने का इंतज़ाम करने में भी यही सिंडिकेट काम करता है।

और आप समझ सकते हैं कि इससे सबसे ज़्यादा नुकसान किसका होता होगा। ज़ाहिर सी बात है—हिंदुओं का। कमजोर हिंदू वर्गों के पास काम नहीं है। जहाँ सिस्टेमैटिक बॉयकॉट हो रहा है, वहाँ से काम की तलाश में घर के पुरुषों को पलायन करना पड़ रहा है।

और उनके पीछे नौकरियों और मज़दूरी पर कब्ज़ा करने वाले लोग उनकी ज़मीनों पर कब्ज़ा कर रहे हैं। हिंदू परिवारों की अकेली महिलाओं और बच्चियों के साथ तमाम तरह का दुर्व्यवहार भी किया जा रहा है।

और इसका प्राइम एग्ज़ाम्पल देखना है, यह समझना है कि सिंडिकेट राज पश्चिम बंगाल के हिंदुओं के लिए कैसे काल बन गया—तो आपको एक ही केस में पूरी टाइमलाइन मिल जाएगी।

वह केस है— संदेशखाली के शाहजहाँ शेख का केस।

ममता बनर्जी 2011 में पश्चिम बंगाल की सत्ता में आती हैं, और इसी समय एक गाँव का मुखिया शाहजहाँ शेख ममता की पार्टी का हिस्सा बनता है। लोकल लेवल पर वह पहले से ही सिंडिकेट का हिस्सा था। अब पार्टी का नेता बनने के बाद उसकी ताक़त बढ़ने लगी।

इस ताक़त के दम पर उसने ज़र, ज़ोरू और ज़मीन पर कब्ज़ा किया। हज़ारों करोड़ का अवैध कारोबार खड़ा किया। महिलाओं और हिंदू परिवारों पर अत्याचार को उसने अपने लिए एक तरह का टूल बना लिया।

50 से ज़्यादा महिलाओं ने इस एक मुस्लिम गुंडे के ख़िलाफ़ बलात्कार, अत्याचार और ज़मीनों पर कब्ज़े को लेकर बयान दिए। उनके साथ बलात्कार और उत्पीड़न की नाना प्रकार की घटनाएँ दर्ज हुईं।

रिपोर्ट्स यहाँ तक कहती हैं कि उसके डर की वजह से बड़ी संख्या में लोगों को काम की तलाश और सुरक्षा कारणों से पलायन करना पड़ा।

जब ईडी की टीम शेख शाहजहाँ के ख़िलाफ़ जाँच करने गई, तो उस पर उसके पाले हुए गुंडों ने हमला कर दिया। और ये गुंडे कौन थे? ये सभी शेख शाहजहाँ के मुस्लिम वोटर और समर्थक थे।

पत्रिका स्वराज्य ने अपनी एक रिपोर्ट में बताया कि कैसे बीते एक दशक में यहाँ की मुस्लिम आबादी में बड़ी संख्या में बांग्लादेशी अवैध घुसपैठिए आकर बस गए हैं। और वे उस इलाके में उसके कंट्रोल को और मज़बूत करते हैं।

और यह इकलौता इलाका या नेता नहीं है, जहाँ इस तरह अवैध बांग्लादेशियों को बसाया गया हो और हिंदुओं के ज़र, ज़ोरू और ज़मीन पर कब्ज़े के लिए इस तरह का नेटवर्क खड़ा किया गया हो।

और यहीं से हम वीडियो के आख़िरी और सबसे महत्वपूर्ण हिस्से की तरफ़ बढ़ते हैं, जहाँ से इस कहानी की वाक़ई शुरुआत हुई थी।

बहुत साधारण सी बात है—जब सत्ता का इस कदर समर्थन हो कि वह अपने विधायकों को कुर्बान करने को तैयार हो, इतना बड़ा सिंडिकेट कंट्रोल एक वर्ग के हाथ में दिया जा रहा हो, और उस वर्ग को पता हो कि “हमारे बिना इनका काम नहीं चलेगा”, तो वह अपने मैसेजिंग को और आक्रामक करता है।

और जब यह वर्ग मुसलमानों का हो, तो उनके लिए प्राथमिक और आख़िरी हथियार हिंसा ही होता है। हिंसा किसके प्रति? काफ़िरों के प्रति।

और पश्चिम बंगाल के हिंदुओं ने बीते एक दशक में ममता बनर्जी के मुस्लिम-प्रेम की क़ीमत अपने लहू से चुकाई है। ममता राज के पिछले एक दशक की तारीख़ नहीं, पूरा कैलेंडर हिंदुओं के रक्त से लाल है।

तो इस कहानी की शुरुआत ममता के मुख्यमंत्री बनने से एक साल पहले से होती है। ममता बनर्जी के सबसे क़रीबी मुस्लिम नेताओं की फ़ेहरिस्त में सबसे पहला नाम नूर उल इस्लाम का आता है।

नूर उल इस्लाम नॉर्थ 24 परगना का एक बेहद छोटा नेता था। 1998 से वह टीएमसी का सदस्य था और 2003 से इस ज़िले की एक पंचायत का प्रतिनिधि। 2009 में उसने कम्युनिस्ट पार्टी के अजय चक्रवर्ती को हराकर टीएमसी के टिकट पर लोकसभा का सांसद बनने में सफलता पाई।

यहाँ एक इलाका पड़ता था—डेगंगा। 2010 के सितंबर महीने में दुर्गा पूजा का एक पंडाल सजाया जा रहा था। यह पंडाल कम से कम 40 वर्षों से यहाँ लगाया जा रहा था। इसके पास एक क़ब्रिस्तान था।

नूर उल इस्लाम ने जब टीएमसी का टिकट पाया, तो चुनाव जीतने के लिए उसने वादा किया कि “मुसलमानों, तुम मुझे वोट दो और मैं इस क़ब्रिस्तान की ज़मीन को हिंदुओं के दुर्गा पूजा पंडाल की जगह तक फैला दूँगा और पास की मस्जिद पर हाईकोर्ट के आदेश की अवहेलना करते हुए लाउडस्पीकर लगवा दूँगा।”

इस्लाम चुनाव जीत चुका था। अब बारी थी वादे को पूरा करने की। दूसरी तरफ़ हिंदू वर्षों से चली आ रही परंपरा के अनुसार पंडाल सजा रहे थे।

The Pioneer अख़बार के संपादक चंदन मित्रा के नेतृत्व में इस दंगे के बाद एक फैक्ट-फाइंडिंग कमिटी गई। उसने लिखा—
“जैसे ही हम डेगंगा के पास पहुँचे, परिदृश्य तेज़ी से परेशान करने वाले रूप में बदल गया। जली हुई दुकानें, लूटे गए ठेले, जले हुए स्कूटर और बंद दुकानों की कतारें राजमार्ग पर खड़ी थीं—शहर के बाद शहर। डेगंगा थाना एक क़िले जैसा दिख रहा था। सेना के ट्रक लाइन में खड़े थे, थके हुए जवान हाथों में कॉकेड राइफ़ल लिए उग्र रूप से गश्त कर रहे थे। हमने देखा कि कम से कम तीन पुलिस वाहन इस क़दर जले थे कि उन्हें पहचानना मुश्किल था।”

आगे उन्होंने लिखा कि भीड़ ने ज़ोर देकर कहा—वे उन्हें कार्तिकपुर कस्बे में तृणमूल सांसद हाजी नूरुल इस्लाम के गुंडों द्वारा की गई बर्बरता दिखाना चाहते हैं।

वहाँ सड़क किनारे काली मंदिर में काली माता की मूर्ति टूटी और बिखरी पड़ी थी। टीम को एक हिंदू लड़की मिली, जिसने इस दंगे में अपना सब कुछ खो दिया था। वह बांग्लादेश में इस्लामी हिंसा से पीड़ित एक हिंदू परिवार की सदस्य थी।

उसने रोते हुए कहा—
“हम धार्मिक उत्पीड़न से बचने के लिए लगभग एक दशक पहले बांग्लादेश से यहाँ आए थे। क्या आप हमें फिर से बेघर कर देंगे? क्या लोकतांत्रिक भारत में कोई न्याय नहीं है, कोई सुरक्षा नहीं है?”

भारत के पश्चिम बंगाल में बांग्लादेशी घुसपैठिए मुसलमान सुरक्षित थे, लेकिन शरणार्थी हिंदू सुरक्षित नहीं थे।

और यह सब कौन करवा रहा था? क्यों करवा रहा था? वह भीड़ कौन थी जिसने हज़ारों हिंदुओं को बेघर कर दिया था?

तो Pioneer के संपादक चंदन मित्रा ने अपने लेख में लिखा कि दुर्गा पूजा पंडाल प्रतिवर्ष एक शिव मंदिर के सामने बनाया जाता है। यह भूमि मूल रूप से स्वामी विवेकानंद के गुरु रामकृष्ण परमहंस की संरक्षक रानी रश्मोनी की थी।

लेकिन अब इस पर मुसलमानों की नज़र थी। पिछले दो दशकों में यहाँ हुआ डेमोग्राफ़िक चेंज बेहद ख़तरनाक दिशा में बढ़ चुका था। यहाँ हिंदू अब अल्पसंख्यक हो चुके थे।

राशन कार्ड, मतदाता पहचान पत्र और नागरिकता के अन्य प्रमाणों से लैस बांग्लादेशी घुसपैठिए अब यहाँ के असली शासक थे।

लोकल मुसलमान, जिन्होंने विभाजन के बाद यह स्वीकार कर लिया था कि भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था में हिंदुओं के साथ रहना है, वे भी इन घुसपैठियों को पाकर कट्टर हो चुके थे।

और हाजी नूरुल इस्लाम ने मुसलमानों से जो वादा किया था, उसे पूरा करने के रास्ते में जब हिंदू सामने आए, तो उसने उस भीड़ को निरीह हिंदुओं पर छोड़ दिया।

हालात इतने ख़तरनाक हो गए कि पश्चिम बंगाल पुलिस और अर्धसैनिक बल मुसलमानों को रोक पाने में नाकाम दिखे।

250 दुकानें जलीं, 50 हिंदुओं के घर जलाए गए और कम से कम पाँच हिंदू मंदिर तोड़ दिए गए। और ये तो वे घटनाएँ हैं जो रिपोर्ट हुईं—अनरिपोर्टेड घटनाओं की संख्या इससे तीन गुना मानी जाती है।

हिंदू अपनी दुर्गा पूजा नहीं मना पाए। लेकिन 11 तारीख़ को ईद थी। शांति बहाली के लिए केंद्र सरकार ने भारतीय सेना की टुकड़ियाँ भेजीं और स्थिति नियंत्रित हुई।

11 तारीख़ को ईद मनाई गई। हाईकोर्ट के आदेश की अवहेलना करते हुए उस मस्जिद पर लाउडस्पीकर लगाया गया। 13 तारीख़ को तृणमूल कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टी की ओर से शांति बैठक बुलाई गई। हिंदू और मुसलमान—सब आए।

लेकिन इसके बाद क्या हुआ?
क्या शांति बनी रही?
क्या मुसलमानों और बांग्लादेशी घुसपैठियों के गठजोड़ को तोड़ा गया?
क्या हिंदुओं के मंदिरों पर हमले बंद हुए?

तो क्या आप एक टर्म वॉटर टेस्टिंग के बारे में जानते हैं? क्या आप ड्राई रन के बारे में जानते हैं? शायद जानते हों। अगर नहीं जानते, तो यह समझिए कि डेगंगा में हिंदुओं के साथ जो हुआ, वह आने वाले भविष्य में जो होने वाला था—उसकी वॉटर टेस्टिंग या ड्राई रन था।

2010 में पत्रकार चंदन मित्रा ने Pioneer में छपे अपने लेख में लिखा था:
“West Bengal is at the crossroads: And every choice seems fraught with dangerous and bloody consequences. The future indeed augurs ill.”

और यही हुआ।

मुसलमानों द्वारा हिंदुओं पर अत्याचार की इस घटना ने पूरे पश्चिम बंगाल के मुसलमानों को एक संदेश दे दिया कि टीएमसी और ममता बनर्जी के साथ रहने पर भविष्य कैसा रहने वाला है। राशन कार्ड और वोटर कार्ड हासिल कर चुके अवैध बांग्लादेशियों को भी अंदाज़ा लग गया कि आने वाले निज़ाम का सलूक किसके लिए कैसा रहने वाला है।

उनके पास अपने चुनाव को लेकर बहुत सटीक और स्पष्ट वजह थी—और उन्होंने वैसा ही किया।

लेकिन जो पीड़ित थे, उन हिंदुओं ने क्या किया?
उन्होंने लोकतंत्र का पर्व मनाया।

उनके एक बड़े वर्ग को अपनी बौद्धिकता पर बड़ा नाज़ था। उन्होंने बदलाव किया। ख़ून से सने लाल-सलामी कम्युनिस्टों के सियासी सफ़र पर विराम लगाते हुए, सफ़ेदी में लिपटी ममता को चुना।

और अंजाम क्या हुआ?
वीडियो के शुरुआती दो हिस्सों में हमने आपको बताया।

आपको अंदाज़ा भी लग गया होगा कि उस सफ़ेद साड़ी में लिपटी ममता हिंदुओं के हिस्से कितनी आई।

लेकिन ममता के बंगाल का मुख्यमंत्री बनने के बहुआयामी दुष्प्रभाव हुए, और उसे एक ही वीडियो में समेट पाना मुश्किल है। क्योंकि मैं नहीं चाहता कि दो दर्जन से ज़्यादा नोटेबल नरसंहारों और हज़ारों हिंदुओं पर हुए अत्याचार की कहानी को वीडियो के किसी एक-दो मिनट के हिस्से में ख़त्म कर दिया जाए।

पूरी रिसर्च के साथ उन कहानियों को लेकर हम आपके सामने इस वीडियो के दूसरे पार्ट में हाज़िर होंगे, जिसमें हम आपको बताएँगे कि 2011 में हुई गलती की सज़ा आज तक हिंदू कैसे भुगत रहे हैं, और कैसे पश्चिम बंगाल हिंदुस्तान के भीतर रहते हुए भी संवैधानिक मूल्यों से कई नॉटिकल माइल दूर जा चुका है।

और बांग्लादेश या पाकिस्तान से पहले, हमें अपने ही घर के भीतर पनप रहे इस गहरे ख़तरे को एड्रेस करना होगा।

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