Indian railways UPA VS NDA

वंदे भारत स्लीपर ट्रेन: एस्पिरेशन की जीत या पुरानी सोच की हार? रेलवे में आया नया दौर

Summary
सवाल उठता है कि अगर वंदे भारत जैसी सुविधाएँ इतने कम सालों में Expand की जा सकती हैं तो शताब्दी जैसी Services क्यों नहीं Expand की गईं? इसका फिर वही जवाब है—Aspiration!

भारत में जहाँ अभी तक चलने वाली Vande Bharat Trains Intercity Model पर काम करती हैं, तो वहीं ये नई Sleeper वंदे भारत Long Route Trains होंगी और इनमें लोग सोते हुए लंबी यात्राएँ कर सकेंगे।

यानी अभी तक जिन ट्रेनों में लोग Chair Cars में बैठकर Maximum 900 किलोमीटर का सफर करते हैं, उनकी जगह अब नई वंदे भारत उन्हें लगभग 1500 किलोमीटर तक ले जाएँगी और वो भी सोते हुए!

ऐसी पहली वंदे भारत हावड़ा यानी कोलकाता से गुवाहाटी के बीच चलने वाली है और उम्मीद है कि इसी के साथ कई और Trains भी जल्द ही Launch की जाएँगी।लेकिन इन नई वंदे भारत Sleeper में क्या Features हैं, ये कितनी तेज हैं, कितनी Stable और Smooth हैं, ये बताने के लिए मैं आपके सामने नहीं हूँ। ना ही मैं आपको ये बताऊँगी कि ये किस Route पर चलने वाली हैं।

मैं वंदे भारत नहीं बल्कि वंदे भारत के पीछे की सोच की बात करने वाली हूँ और उस सोच की बात करने वाली हूँ जो चाहती है कि इस देश का आदमी कभी जनसेवा जैसी जनरल ट्रेनों से ऊपर ही न उठे।जो सोच हमेशा से ट्रेनों को मजदूर को एक राज्य से दूसरे राज्य Transfer करने का साधन मानती रही है, जो ट्रेनों को Transport का Mode नहीं बल्कि Votebank की किश्त समझती रही है।

ये सोच क्यों रही है और इसकी जड़ में क्या है? ये है Aspiration। वो Aspiration जो इस देश की पूर्ववर्ती सरकारों में पूरी नहीं की गई।इसे समझने के लिए आपको मैं लगभग 4 दशक पीछे यानी 10 जुलाई 1988 को ले चलूँगी। ये वो दिन है जब तत्कालीन रेल मंत्री माधवराव सिंधिया ने पहली शताब्दी ट्रेन को हरी झंडी दिखाई थी।

शताब्दी ट्रेनों का Concept कुछ-कुछ वैसा ही था, जैसा आज वंदे भारत Trains का है। यानी High Speed, कम से कम Stops और Daily Premium Service के साथ दो बड़े शहरों को जोड़ना।कहते हैं कि सिंधिया को ये Concept जापान और फ्रांस की यात्रा से मिला था। लेकिन कोई सुविधा चालू करना और उसको आम जनता तक पहुंचाना, दो अलग-अलग बातें हैं।माधवराव सिंधिया का ये Project था और उन्होंने उसे जमीन पर उतार दिया। शताब्दी को लोगों ने हाथों-हाथ लिया भी। लेकिन यहीं पर आती है Aspiration की बात।

1988 से 2014 के बीच एक लंबा अरसा रहा जब कांग्रेस देश की सत्ता में काबिज रही। लेकिन आपको पता है कि क्या इस दौर में कुल कितनी शताब्दी Trains चलाई गईं। 25 से भी कम। लेकिन मैं आपको शताब्दी का ये Number क्यों बता रही हूँ। इसलिए बता रही हूँ ताकि आप समझें कि Aspiration क्या चीज होती है। शताब्दी जैसा ही Concept वंदे भारत का है।वंदे भारत Trains की शुरुआत February 2019 में हुई थी। लेकिन आपको पता है कि मात्र 7 वर्षों के अंदर ही कितनी वंदे भारत इस समय Services दे रही हैं। तो इसका Total Number है 82!

और लगातार नई वंदे भारत Introduce हो रही हैं। तो Basically जहाँ ढाई दशक में शताब्दी Trains की संख्या 2 दर्जन के ऊपर नहीं जा पाई तो वहीं वंदे भारत का Number उनसे चार गुना हो गया है वो भी एक तिहाई समय में।यानी आज से पहले की सरकारें चाहती ही नहीं थीं कि Premium Train Services आप तक पहुँचे। कभी भी उन्होंने Mass Scale पर अच्छी सुविधाएँ देने का विचार ही नहीं किया।एक और बात, जब आप इन शताब्दी Trains के Routes देखते हैं तो पाते हैं कि ये केवल कुछ ही Main शहरों तक सीमित हैं और इनमें से कई तो दिल्ली से दूसरे प्रदेशों की राजधानी के लिए ही हैं।

यानी ये बड़े नेताओं और अफसरों को Facilitate करने वाली Trains हैं। लेकिन जब आप वंदे भारत के Routes देखते हैं तो पता चलता है कि श्रीनगर से लेकर कन्याकुमारी तक देश का शायद ही ऐसा कोई बड़ा शहर है जहाँ अब वंदे भारत न पहुँचती हो।आज वंदे भारत देश में Aspirational वर्ग की Train है, ज्यादा से ज्यादा लोग इसकी सुविधा उठाना चाहते हैं। 2019 में Launch होने से लेकर अब तक वंदे भारत देश के 7.5 करोड़ से ज्यादा लोगों को एक से दूसरी जगह पहुँचा चुकी हैं।

सवाल उठता है कि अगर वंदे भारत जैसी सुविधाएँ इतने कम सालों में Expand की जा सकती हैं तो शताब्दी जैसी Services क्यों नहीं Expand की गईं? इसका फिर वही जवाब है—Aspiration!

कांग्रेस सरकार हमेशा से Railway को उसी Colonial Mindset से देखती आई है, जिससे British इसे देखते थे। लेकिन शताब्दी और वंदे भारत जैसी Premium Trains पर ही ये Aspiration वाली बात लागू नहीं होती।ये बात तो उन Trains पर भी लागू होती है जिनसे इस देश के आम आदमी का सरोकार है। यानी General और Sleeper जैसी Trains।चाहे छठ हो या दिवाली, महाराष्ट्र-दिल्ली और तमिलनाडु से वापस होते हुए उत्तर प्रदेश-बिहार और झारखंड-बंगाल के मजदूरों की Videos हर साल Viral होती हैं।

Trains के General डब्बों में खचाखच लोग भरे होते हैं, साँस लेने की जगह नहीं होती। Twitter पर इन Videos को देखकर लोग दुख जताते हैं, Railway को गालियाँ देते हैं… लेकिन कभी समस्या की जड़ में नहीं जाते।आपको याद होगा कि कुछ साल पहले तक Rail Budget, हमारे आम Budget से अलग आया करता था। और Rail Budget में भी Focus इस बात पर नहीं होता था कि कितना Capital Expenditure होगा, कहाँ Highspeed Rail बनेगी, कौन सी नई Safety Technology लाई जाएगी?

बल्कि Rail Budget का मतलब नई Trains के Announcement से था और नई Trains का मतलब Votes से था।लालू यादव जब देश के Rail Minister थे तब ऐसी तमाम Trains बिहार से चलाई गईं, जिनका Main Focus Labours को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाना था। इस Time में जनसेवा, जनसाधारण जैसी Trains चालू की जाती थीं।

यहाँ तक कि गरीबों को अच्छी सुविधा देने के नाम पर जो गरीब रथ जैसी Trains चलीं थीं, उनमें कोई खास बदलाव नहीं था बल्कि Side की 2 Seats की जगह 3 Seats लगा दी गई थीं।अगर आप इसकी तुलना आज के समय से करें तो मोदी सरकार Amrit Bharat जैसी Trains चला रही है। ये Non-AC Trains भी उसी Standard की हैं, जैसा Standard महंगी Trains का है।चाहे Speed हो या Seats या फिर डिब्बों के अंदर मिलने वाले Comforts, सबका ध्यान रखा गया है। चाहे Visually हो या Ride Quality Wise, दोनों तरह से ये Trains सस्ती होने के बाद भी ज्यादा Premium हैं।

लेकिन ऐसा क्यों है? मेरा जवाब वही पुराना है। Aspiration। लालू यादव जैसे Ministers को Aspiration ही नहीं थी कि देश का आम आदमी भी अच्छी सुविधाएँ पाए।Railway उनके लिए मजदूर Transport करने का एक जरिया था। और जब Aspiration ही नहीं होगी तो भला नई High Speed Trains कहाँ से आएँगी? कहाँ से भला दुनिया की Technology के बराबर हम पहुंचेंगे।

जब दुनिया Bullet Trains की ओर Shift हो रही थी तब हम सोच रहे थे कि एक और जनसाधारण Train कैसे चलाई जाए! और यही वजह है कि वंदे भारत का विरोध आज यही जमात करती है।Trains तो छोड़ दीजिए, यहाँ तक कि पुराने Tracks को Upgrade करना और नई Technology को लाना भी इन लोगों को पसंद नहीं था।

हर आदमी चाहता है कि उसे Carry करने वाली Train ज्यादा से ज्यादा Speed से चले। लेकिन क्या आपको पता है कि Trains तो छोड़िए हमारे पास 2014 से पहले ऐसे Tracks ही नहीं थे जिन पर तेज Trains चल सकें।

Rail Minister अश्विनी वैष्णव द्वारा संसद में पेश किया हुआ एक Data बताता है कि साल 2014 से पहले इस देश के Total Rail Network का केवल 6% हिस्सा ही ऐसा था, जहाँ 130 किलोमीटर प्रति घंटा की Speed से अधिक गति से Trains चलाई जा सकती थीं।देश में 93% Tracks यानी पटरियाँ ऐसी थीं, जिन पर या तो Maximum 110 km/h या फिर 130 km/h Trains चलाई जा सकती थीं।

इसमें भी 110 वाला हिस्सा 56% था।आज की तारीख में देश का 77% Network ऐसा है जिस पर 110 किलोमीटर से ज्यादा की रफ्तार से Train चल सकती है। सोचिए जब पटरी ही Capable नहीं होगी तो भला Trains कैसे चलेंगी? और ऐसा नहीं है कि पटरियों को लेकर ही बहुत काम हो रहा था।

इस मामले में भी अगर आप Data सुन लेंगे तो चौंक जाएँगे! UPA सरकार के दौरान सिर्फ नई पटरियाँ बिछाने या Speed Upgrade को लेकर ही शिथिलता नहीं थी बल्कि Electrification, हो या फिर Tracks का Doubling, किसी मोर्चे पर गंभीरता ही नहीं थी।2014 के बाद से इन मोर्चों पर तो क्रांति-सी आ गई है। Railway का Data कहता है कि 2014 के बाद से अब तक 34 हजार किलोमीटर से ज्यादा नए Tracks यानी पटरियाँ बिछाई जा चुकी हैं।

2004 से 2014 के बीच केवल 14 हजार किलोमीटर ही नई पटरियाँ बिछी थीं। यानी इस मोर्चे पर मोदी सरकार में दोगुने से भी ज्यादा काम हुआ है।इसी के साथ Tracks के Electrification की बात करें तो इस मामले में तो चमत्कार ही हो चुका है। आज की तारीख में देश का लगभग 99% Broad Gauge Network Electrified है।

2014 से पहले, आजादी के लगभग 67 सालों में केवल 25% Network ही Electrified किया जा सका था। और ये ही नहीं बल्कि Trains के जल्दी चलने के लिए ये भी जरूरी होता है कि Tracks पर Congestion न हो।इसके लिए Tracks को Double किया जाता है, यानी आने और जाने वाली Trains के लिए अलग-अलग Tracks बिछाए जाते हैं। इस मोर्चे पर भी मोदी सरकार में ही काम हो सका है।

Data बताता है कि अब तक लगभग 18 हजार किलोमीटर Track का मोदी सरकार ने Multi-Tracking करवा चुकी है। यानी Basic Infra को बनाने में ही मोदी सरकार को सारी मेहनत झोंकनी पड़ रही है।

क्योंकि इससे पहले सिर्फ इस बात पर ध्यान दिया गया कि Votes बटोरने के लिए Trains का Announcement कर दो, भले ही हमारे पास Capacity न हो।लेकिन सिर्फ Capacity की ही समस्या थी, ऐसा नहीं है। बल्कि इससे भी बड़ी समस्या Safety की है। 2004-14 और 2014-25 के बीच Data Comparison दिखाता है कि Accidents का Number भी तेजी से घटा है।

2004-14 के मुकाबले अगर मोदी सरकार का Comparison किया जाए तो Train Accidents का Number आधे से भी कम हो गया है। जहाँ UPA के 10 वर्षों में देश में 1700 से ज्यादा Railway Accidents हुए तो वहीं मोदी सरकार में ये Number गिरकर 678 हो गया।इनमें होने वाली Deaths का Number भी घटा है। लेकिन ये ऐसे ही नहीं घटा है बल्कि इसके लिए काम करना पड़ा है।

मैंने आपको जो Aspiration वाली बात बताई थी, उसमें एक Angle ये भी है कि आपकी Trains में Coach कैसे लगते हैं। UPA सरकार में Trains के Coach तक बदलने में ढिलाई बरती जाती थी।

लेकिन मोदी सरकार में 42 हजार से ज्यादा LHB Coaches बन चुके हैं। LHB Coach हादसे के समय एक-दूसरे के ऊपर नहीं चढ़ते जबकि पुराने ICF Coaches हादसे का शिकार होते हैं तो बुरी स्थिति होती है।लेकिन Coaches के साथ ही हादसे रोकने के लिए भी Kavach System Develop किया गया है जिसको अब Deploy किया जा रहा है।यात्रियों के साथ ही Railway Crossings पर हादसे न हों, इसके लिए 12000 से ज्यादा Unmanned Railway Crossings खत्म की गई हैं।

मैं आपको ऐसे ही न जाने कितने Data बता सकती हूँ। Railway में बहुत से ऐसे काम हुए हैं जो आपको शायद अपनी Train यात्राओं के दौरान दिखते नहीं लेकिन उनके बिना सुखद यात्राएँ Possible ही नहीं थीं।और इस सरकार ने सिर्फ Train यात्राओं को ही Aspirational नहीं बनाया बल्कि Overall Experience कैसे बेहतर हो, इस पर भी काम किया है।

Train यात्रा का Experience सिर्फ Train नहीं बल्कि वो Stations भी अच्छा बनाते हैं जहाँ यात्रियों के लिए सुविधाएँ हों। आज से कुछ साल पहले अगर आप किसी छोटे-बड़े Station पर जाते तो बहुत Chance है कि कुछ ऐसी हालत देखने को मिलती।

चारों तरफ गुटखा-पान के दाग, पुराने Platforms, टूटी Benches, पुराने Foot Over Bridge और Overall खराब Experience। लेकिन आज अगर किसी Station पर जाएँ तो शायद आपका Perspective पूरी तरह बदल जाए।रानी कमलापति से लेकर गोमती नगर और अहमदाबाद से लेकर चिन्ना सालेम तक, आज Stations का कायाकल्प हो गया है, Lifts से लेकर अच्छे Waiting Lounge तक लोगों की सुविधा के लिए बने हैं।

इनके पीछे वही सोच है। Aspiration। Aspiration ही वो चीज है जो आपको जनसाधारण Express दिलवाती है और Aspiration ही वो चीज है जो आपको वंदे भारत दिलवाती है।इसी Aspiration से आप Airport जैसे Station पाते हैं। लेकिन ये सब तब नहीं होता जब गुंडाराज लाने वाले, बिहार को बर्बाद करने वाले और Industry को समाप्त करने वाले लोग Rail Minister बनते हैं। ये तब नहीं होता जब सड़क और Expressway को अमीरों का साधन बताने वाले लोग सत्ता में होते हैं।

आज देश में Railway के लिए Craze है। एक बड़ा तबका है जो Railway Engines, अलग-अलग Trains और पूरे Railway Culture पर बात करता है, इन्हें हम Rail Fans कहते हैं। ये तबका इसलिए Create हुआ है क्योंकि Railway आज Cool है, Technology पर बात करना Cool है।

क्योंकि Railway अब सिर्फ Transportation का साधन और मजदूर Supply करने का जरिया न समझकर एक Culture में बदल चुका है।इस नए भारत की Aspirations अगर ऐसे ही Match होती रहीं तो शायद वो दिन दूर नहीं जब हमारा Railway World Class ही नहीं बल्कि उससे एक कदम आगे होगा और यात्रा करना कोई बोझ नहीं बल्कि Pleasant Experience होगा।

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