कथामंजरी में आज हम जानेंगे एक ऐसे राजा के बारे में, जो जब तक जीवित रहा, तब तक इस्लामी आक्रमणकारी भारत में प्रवेश भी नहीं कर पाए। यह कहानी शुरू होती है, सिन्ध साम्राज्य से। आप नक़्शे पर सिंध को देखिए। वैसे तो सिंध आजकल पाकिस्तान के एक राज्य के रूप में जाना जाता है। लेकिन जब भारत अखंड था, तब सिंध हमारा सीमान्त क्षेत्र हुआ करता था, और सिंध के उस पार, पश्चिम में अरबों और तुरकों का साम्राज्य शुरू हो जाता था। भारत पर अरबों के जितने आक्रमण हुए, उन सभी आक्रमणकारियों ने सिंध से ही प्रवेश किया। इसलिए मुहम्मद अली जिन्ना ने भी सिंध को ‘Gateway of Islam in India’ कहा था। जिन्ना ने यह भी कहा था, कि पाकिस्तान का निर्माण तो उसी दिन शुरू हो गया था, जब मुस्लिमों ने पहली बार सिंध की सरजमीं पर कदम रखा।
यहां एक रोचक बात यह हैं कि भारत पर जब अरबों के आक्रमण शुरू हुए, तो ऐसा नहीं है कि वो पहली बार में ही सफल हो गए। भारत के सम्राटों को तो छोड़िये, हमारे स्थानीय राजा भी कोई इतने कमज़ोर भी नहीं थे, कि कोई भी आक्रमणकारी कुछ सेना लेकर आएगा और उनको हरा कर चला जाएगा। हमें अब तक यही पढ़ाया जाता रहा है, कि भारत पर अरबों का पहला आक्रमण मुहम्मद बिन क़ासिम ने किया था। लेकिन जो हमसे छुपा लिया जाता है, वह ये कि क़ासिम से पहले अरबों ने 14 बार भारत पर आक्रमण किया और उन तमाम आक्रमणों को एक राजा ने अपनी ताकत के दम पर ध्वस्त किया। उसी राजा का नाम था दाहिर सेन।
दाहिर सेन एक कश्मीरी पंडित थे, जिन्होंने 680 इस्वी से लेकर 712 इस्वी तक सिंध क्षेत्र पर शासन किया। दाहिर सेन प्रजावत्सल थे। जितना वें अपनी प्रजा का ध्यान रखते थे, उतना ही प्रजा भी उनसे प्रेम करती थी। ऐसा कहा जाता था कि जब भी राजा दाहिर अपने घर से शिव आराधना के लिए मंदिर की ओर निकलते थे, तो उनके पद चिन्हो को उनकी जनता अपने माथे से लगा लेती थी। महाराजा दाहिर के संरक्षण में सिंध भारत की ढाल बन चुका था, अरब आक्रमणकारी सिंध को जीत ही नहीं पाते थे।
दाहिर सेन की यह कहानी शुरू करने से पहले हमारे लिए यह जान लेना आवश्यक भी है की जिस समय दाहिरसेन का शासन था, उस समय आसपास की दुनिया में क्या चल रहा था। मैं पूरा इतिहास तो नहीं बताऊंगा, लेकिन एक छोटी कहानी आपको बता देता हूँ।
जब दाहिरसेन सिंध के राजा थे, तो उस समय अरब में इस्लाम शुरू ही हुआ था। पैगंबर मुहम्मद साहब के बाद अरब में खलीफा का शासन लागू हो गया। खलीफा मतलब एक तरह से आप समझ लीजिये की दुनिया भर के मुस्लिमों का राजा।
खलीफा ने धीरे-धीरे पैगंबर साहब के सभी घरवालों को, उनके रिश्तेदारों को मार दिया। मुहम्मद साहब के जो रिश्तेदार बच गए, वो लोग जान बचाने का उपाय ढूंढ़ने लगे। इसी क्रम में मुहम्मद साहब के रिश्तेदार हुसैन अली तथा कुछ और लोगों ने सिंध के राजा दाहिर सेन से शरण माँगी।
अब हमारी तो यही रही है कि अगर सही मायने में कोई पीड़ित है, उसकी दुनिया में कहीं शरण नहीं मिल रही हो, और उसने हमसे शरण मांगी हो तो हम उसे अपने हृदय में स्थान देते हैं।
हमारे यहां तो जब विभीषण, भगवान राम के पास शरण मांगने आए तो उन्होंने विभीषण को , कोटि विप्र वध लागहिं जाहू, आएं सरन तजउँ नहिं ताहू। यह कहते हुए शरण दे दी।
उसी परम्परा का पालन करते हुए सिंध के राजा दाहिरसेन ने मोहम्मद साहब के रिश्तेदारों को अपने यहां शरण दी। अब जब बगदाद के गवर्नर, हज्जाज को यह बात पता चली की मोहम्मद साहब के जिन रिश्तेदारों को करने के लिए वह ढूंढ रहा है, उन सबको दाहिर सेन ने अपने यहाँ शरण दी है। तब बगदाद के गवर्नर हज्जाज़ ने दाहिर सेन से क्या कहा कि पैगंबर मोहम्मद की जिन रिश्तेदारों को तुमने अपने यहां शरण दी है, उन्हें हमें सौंप दो, नहीं तो हम तुम्हें मार देंगे।
दाहिरसेन ने जवाब भिजवाया कि शरण में आए हुए को मैं वापस नहीं भेज सकता, और रही बात मुझे मारने की, तो अब तक अरबों ने न जाने कितने आक्रमण मुझपर किये, आजतक तो युद्ध भूमि पर मेरा कुछ नहीं बिगड़ा, तो तुम मुझे क्या ही मारोगे?
दाहिर सेन का यह जवाब सुनकर हज़्ज़ाज़ बिलबिला सा गया। हज्जाज, अरब के खलीफा के पास यह विनती लेकर गया, कि हमारे दुश्मनों को दाहिरसेन ने अपने यहां जगह दी है, इसलिए आप आदेश करिए और मैं दाहिर सेन को मारने के लिए सेना भेजूँ।
खलीफा ने आदेश दिया और हज्जाज ने सईद और मुज़्ज़ा के नेतृत्व में 10 हजार की सेना को दाहिर सेन पर आक्रमण करने के लिए भेजा। लेकिन राजा दाहिर सेन ने अरबों की उस सेना को पराजित कर दिया। उसके बाद हज़जाज ने उबदैला के नेतृत्व में, 20 हजार की सेना भेजी, लेकिन दाहिर सेन ने अरबों की उस सेना को भी पराजित कर दिया।
अरबों के तमाम प्रयासों के बावजूद वह दाहिर सेन को ना तो पराजित कर पा रहे थे, और न ही भारत में प्रवेश कर पा रहे थे, क्योंकि भारत में प्रवेश करने का जो दरवाजा था यानी जो सिंध था, उस सिंध पर दाहिर सेन का राज था।
सन् 711 ईस्वी तक महाराज दाहिर सेन के 35 साल के शासनकाल में अरबों ने छोटे बड़े बहुत से आक्रमण किए मगर सफलता नहीं मिली। तब सन् 712 ईस्वी में हज्जाज ने अपने दामाद एवं सेनापति मोहम्मद बिन कासिम को 80,000 की सेना लेकर सिंध पर आक्रमण करने के लिए भेजा। उस जमाने में 80000 की फौज का होना बहुत बड़ी बात थी।
मोहम्मद बिन कासिम जानता था कि सीधे आक्रमण से सिंध पर विजय नहीं पाई जा सकती, इसलिए उसने बौद्ध धर्म को मानने वाले सिंध के पड़ोसी राजा मोक्षवास को अपने चंगुल में फँसाया। अब यह तो भारत का इतिहास ही है कि, हम हमेशा बाहर के दुश्मनों से नहीं बल्कि अंदर के दुश्मनों से हारते आए हैं।
राजा मोक्षवास, कहने को तो दाहिर सेन का मित्र था, लेकिन उस मित्रता की आड़ में उसने दाहिर सेन को धोखा देते हुए, मोहम्मद बिन कासिम के पास दाहिर सेन की युद्ध की सारी योजनाएं पहुंचा दी।
दाहिर सेन की एक मंत्री ने उनको कहा, कि महाराज ये 80,000 की सेना है, हम 20,000 की सेना के साथ इनका मुकाबला कर लेंगे, लेकिन आप सुरक्षित रहिये और आप अपने किसी मित्र राज्य के यहाँ शरण ले लीजिये।
इस पार दाहिरसेन ने जवाब दिया, “I am a wall between us and the Arab army. If I fall, nothing will stop our destruction from their hands”; मतलब मैं कैसे किसी के पास शरण ले लूं, मैं ही तो वह दीवार हूं, जिसे ये अरब आक्रमणकारी गिराना चाहते हैं, अगर मैं ही चला गया, तब तो बाकी सबको कौन बचाएगा।
मोहम्मद बिन क़ासिम ने बौद्ध राजा मोक्षवास के साथ मिलकर, सिंध पर आक्रमण किया। 9 दिनों तक युद्ध चला। दाहिर सेन की सेना अपना सर्वोच्च पराक्रम दिखाते हुए, अरबों का सफाया करते हुए आगे बढ़ती रही। अरब सेना एक बार को तो पराजय के कगार पर खड़ी थी, लेकिन ऐसा हो नहीं पाया, क्योंकि भाग्य सिन्ध का भविष्य लिख चुका था।
युद्ध का एक नियम होता है, कि सूर्यास्त के बाद युद्ध नहीं किया जा सकता। उसी नियम के अनुसार दाहिर सेन की सेना रात में सो रही थी कि अचानक नियमों का उल्लंघन करते हुए कासिम ने सेना पर धावा बोल दिया, जिसमें उसकी मदद उस गद्दार राजा मोक्षवास और उसकी सेना ने की। लेकिन इसके बावजूद दाहिर की सेना ने हार नहीं मानी। उस रात शुरू हुआ वह युद्ध भी कई दिनों तक चला। लेकिन आगे भी उस युद्ध में इतने छल किये गए कि धर्म के अनुसार लड़ने वाली दाहिर की सेना उन जिहादियों के छल-प्रपंच में फंसती चली गई।
युद्धभूमि पर कासिम की सेना से लड़ते-लड़ते सिंध के राजा दाहिरसेन वीरगति को प्राप्त हुए। भारत का दरवाजा टूट गया। इस्लाम अपने आतंक, अपनी बर्बरता और अपनी विकृत सोच के साथ भारत में प्रवेश कर गया।
मोहम्मद बिन कासिम ने सिंध की हज़ारों स्त्रियों को कैद किया और अपने सैनिकों के सामने ऐसे फेंक दिया जैसे भूखे भेड़िये के सामने मांस के लोथड़े फेंके जाते हैं।
महाराजा दाहिर सेन को हराने के बाद, मुहम्मद बिन कासिम ने दाहिर सेन की दोनों बेटियों, सूर्या और परीमल को भी कैद कर लिया। चचनामा नामक अरबी ग्रंथ में यह पढ़ने को मिलता है, कि राजा दाहिरसेन की दोनों बेटियाँ सूर्या और परीमल अपूर्व सौंदर्य की स्वामिनी थीं। मोहम्मद बिन क़ासिम ने खलीफा को खुश करने के लिए सूर्या और परिमल को उसे तोहफ़े के रूप में अरब भेज दिया। खलीफा भी दोनों बहनों सूर्या एवं परीमल का सौंदर्य देख फिदा हो गया।
दाहिर की दोनों पुत्रियों को खलीफा के शयन कक्ष में भेजा गया। अब यहाँ पर आप मुसीबत के समय में भी उन दोनों लड़कियों की समझदारी देखिये।
इतिहासकार इलियट लिखते हैं, कि जैसे ही खलीफा ने उन्हें छूने की कोशिश की, उन दोनों लड़कियों ने तुरंत पीछे हटते हुए यह कहा, कि आपलोगो का यह कैसा नियम है, कि राजा अपने नौकर का झूठन खा रहा है। मोहम्मद बिन क़ासिम ने हमारे शरीर को अपवित्र किया और फिर उसने अपना झूठन अपने खलीफा को यानि आपको दे दिया।
तीर निशाने पर लगा था। ख़लीफा गुस्से से पागल हो गया। उसने तिलमिलाते हुए मोहम्मद बिना कासिम को जान से मारने का हुक्म दिया। हुक्म की तामिल हुई और कुछ दिनों बाद ही कासिम के मृतक शरीर को खलीफा के सामने पेश किया गया. खलीफा ने राजा दाहिर सेन की दोनों बेटियों को बुलाया और कहा, “देखो, किस प्रकार मेरे आदमियों ने मेरी आज्ञा का पालन किया है”
उसपर उन लड़कियों ने मुस्कुराते हुए कहा, कि “हमने तुमसे झूठ बोला था, कासिम ने हमें छुआ तक नहीं था. मगर उस शैतान ने हमारे पिता जी, हमारे राजा की हत्या की,. इसीलिए प्रतिशोध और बदले के लिए हमने झूठ बोला। ख़लीफा यह सुनकर सुन्न हो गया.
खलीफा ने गुस्से में आकर उन बीर बालाओं को भयंकर यातनाएं दी. उन्हें घोड़े के पूंछ से बांधकर सड़कों पर घसीटने की आज्ञा दी. उन बच्चियों के शरीर के चिथड़े-चिथड़े हो गये थे, पर उनकी आँखों और होठों पर विजय के गर्व और मुस्कान को वह नहीं मिटा पाया।
आप सोचिये, कि राक्षसों के समूह से घिरी, अपने घर से हजारों मील दूर, उन कोमल राजकुमारियों ने असहाय होने के बावजूद, सिर्फ अपने विवेक से, अपने पिता की हत्या का प्रतिकार लिया। हमारे पुरखों ने, हमारी स्त्रियों ने इतिहास में ऐसी वीरता दिखाई है। तो क्या आज के हिंदू समाज, विशेषकर हिंदू स्त्रियों को शोभा देता है कि वे जिहादियों के सम्मुख अहिंसा व सहअस्तित्व की व्यर्थ बकवास करें?
इस देश के मक्कार इतिहासकारों ने हमें ना तो राजा दाहिर सेन के बारे में पढ़ाया, और ना ही उनकी दोनों पुत्रियों की बहादुरी के बारे में कुछ पढ़ाया। इस देश के बच्चों को यह जानने का अधिकार है, कि हमारी तलवारों ने अरबों को न जाने कितनी बार हराया। इस देश के बच्चों को यह जानने का अधिकार है, कि दाहिरसेन और उनकी पुत्रियों ने भारत के लिए क्या बलिदान दिए। इनका इतिहास, हमारी कक्षाओं में, हमारे पाठ्यक्रमों में शामिल किया जाना चाहिए, ताकि भविष्य की पीढ़ियां आत्मविश्वास और स्वाभिमान के साथ जी सकें।





