माँ मीनाक्षी ने स्वयं दी तलवार: कुमारकंपन ने कैसे मदुरै को आततायी इस्लामी शासन से मुक्त किया

Summary
यह कथा विजयनगर साम्राज्य के युवराज कुमारकंपन की है, जिनकी वीरता और धर्मरक्षा का वर्णन ‘मदुराविजयम’ जैसे ऐतिहासिक काव्य में मिलता है।

कथामंजरी में आज हम जानेंगे एक ऐसे युवराज की कहानी, जिसे स्वयं माँ मीनाक्षी ने दर्शन दिया था। साथ ही यह भी जानेंगे कि कैसे उस युवराज को माँ मीनाक्षी ने भगवान विश्वकर्मा द्वारा निर्मित तलवार देकर, मदुरै को मलेच्छो के चंगुल से मुक्त कराने का आदेश दिया था। यह कहानी है, कुमारकंपन की और इस कहानी का मुख्य स्रोत है-मदुराविजयम। मदुराविजयम एक काव्य रचना है, जो कुमारकंपन की पत्नी गंगा देवी के द्वारा लिखी गई है।

आपमें से बहुत लोगों ने कुमारकम्पन का नाम पहली बार सुना होगा। कुमारकम्पन विजयनगर साम्राज्य के राजकुमार थे। जिन लोगों ने इतिहास की एकेडमिक पढ़ाई की होगी, उन्हें ये पता होगा कि हरिहर और बुक्का नाम के 2 भाइयों ने विजयनगर साम्राज्य की स्थापना की थी। हरिहर पहले राजा बने, उनकी मृत्यु के बाद उनके भाई बुक्का राजा बने। बुक्का के बेटे का नाम था कुमारकम्पन। 

यह पूरी कहानी सन 1330 ईस्वी से लेकर 1370 इस्वी के आसपास की है। बहुत पुरानी कहानी भी नहीं है, आज से 700 साल पहले की कहानी है। उस दौरान विजयनगर साम्राज्य पर बुक्का का शासन था और उनके पुत्र कुमारकम्पन उनके सेनापति हुआ करते थे। विजयनगर साम्राज्य को आप जब नक़्शे पर देखेंगे, तो आपको पता चलेगा, कि आज जहां पर कर्नाटक है, उस जमाने में लगभग यही एरिया विजयनगर का साम्राज्य हुआ करता था। 

विजयनगर साम्राज्य अपनी भव्यता के लिए जाना जाता था।  उनका साम्राज्य व्यापार और कृषि से समृद्ध था। उनकी सेना भी बहुत शक्तिशाली और अनुशासित थी। साथ ही विजयनगर साम्राज्य, हिंदू संस्कृति, मंदिर वास्तुशिल्प का भी केन्द्र था। उस जमाने में जितने भी विदेशी यात्री विजयनगर साम्राज्य की ओर घूमने आते थे, उन सब की पुस्तकों में विजयनगर साम्राज्य की भव्यता का वर्णन है।

अब यहाँ से कहानी का टर्निंग पॉइंट आता है। विजयनगर एक हिंदू साम्राज्य था, लेकिन विजयनगर साम्राज्य के ठीक दक्षिण में मदुरै स्थित था।और मदुरै पर उस समय कुर्बत हसन कंगू का शासन था। वह एक बेहद कट्टर इस्लामिक आतातायी शासक था। उसने मदुरै में न सिर्फ मंदिरों को तोड़ा बल्कि सनातन को नष्ट करने का हरसम्भव प्रयास किया। मदुरै में मीनाक्षी मंदिर है। हसन कंगू ने मीनाक्षी मंदिर को भी नष्ट किया। मदुरै के पास स्वामी रंगनाथ मंदिर है, उसे मंदिर में भगवान विष्णु शेषनाग के फन के नीचे निद्रा में लेटी हुई अवस्था में हैं। मलेच्चों ने उस मंदिर पर भी आक्रमण किया। वहाँ के पुजारियों ने फिर भगवान विष्णु की प्रतिमा को बचाने के लिए मज़बूरी में उन्हें ईंटो से ढँक दिया। 

इब्नबतूता का नाम आप सबने सुना होगा। वह मोरक्को का एक यात्री था, और इस जमाने में वह मदुरै भी घूमने आया था। इब्नबतूता लिखता है कि जब वह मदुरै गया तो उसने वहां पर देखा, कि मदुरै के सुल्तान हिंदू प्रजा को मारने के लिए अलग-अलग तरीके का इस्तेमाल करते थे। कभी जमीन में जिंदा दफना देना, कभी शरीर को भेदते हुए भाले के साथ खंभे पर बांध देना, तो कभी जिंदा जलवा देने जैसी पीड़ादायक मृत्यु हिंदुओं को दी जाती थी।

 इब्नबतूता तो एक जगह पर यह भी लिखता है, कि एक दिन जब वह सुल्तान के साथ बैठकर भोजन कर रहा था, तो उसके सामने किसी हिंदू को उसकी पत्नी और 7 वर्षीय पुत्र के साथ लाया गया। सुल्तान ने अपने सामने पहले उसे 7 साल के बच्चे का गला कटवाया, फिर पत्नी का गला कटवाया, फिर उस हिंदू का गला कटवाया। इब्नबतूता लिखता है कि उससे यह दृश्य देखा नहीं गया और उसने अपनी नज़रें हटा ली। आप सोचिये, कि इब्नबतूता के लिए हिंसा कोई बड़ी बात नहीं थी। पूरी दुनिया में उसने हिंसा देखी थी, लेकिन मदुरै के सुल्तान का अत्याचार देखकर उसको भी अपना मुँह फेर लेना पड़ा। उस समय में पूरे मदुरै क्षेत्र में एक महामारी भी फैली हुई थी और वहां की हिंदू प्रजा अन्न और जल के अभाव में लगातार मर रही थी।।

अब यहाँ यह बात ध्यान दीजिये, कि मदुरै सल्तनत, विजयनगर साम्राज्य का पड़ोसी था, लेकिन उस जमाने में सोशल मीडिया तो था नहीं, कि हिन्दुओं पर अत्याचार की बात किसी हिंदू राजा को पता चले। अब पता चलता, तब तो कोई हिंदू राजा कुछ करता। हसन कंगू जो अत्याचार करता था, उस बारे में बाहर किसी को पता ही नहीं चलता था। हसन कांगू भी, इस बात का विशेष ध्यान रखता था, कि उसके गुप्तचर उसके खिलाफ उठने वाली किसी भी आवाज को दबा दें। इसलिए मदुरै में क्या हो रहा है, यह बात कुमार कंपन को भी पता नहीं चल पा रहा था। मदुरै की हिंदू जनता की मदद के लिए कोई नहीं आ पा रहा था। मदुरै की असहाय हिंदू जनता के लिए हसन कांगू के पीड़ा दायक शासन से निकलने की सारी उम्मीदें खत्म हो चुकी थी।

लेकिन हमारे यहां सनातन में यही तो मान्यता है, कि जब सारी उम्मीदें खत्म हो जाती है,  तब एक दिव्य ज्योति आती है। एक Divine Interference आता है, फिर वहां से सब कुछ बदल जाता है। और वही हुआ।

विजयनगर साम्राज्य के युवराज कुमारकंपन आधी रात को निद्रा में थे। तभी उन्हें स्वप्न आया। उन्होंने स्वप्न में देखा कि दीप्तिमान पीत वस्त्रो से सुशोभित, पूर्णिमा के चंद्रमा के सामान प्रकाशित मुख, रत्नजड़ित मुकुट और परम तत्व का साक्षात रूप लेकर माँ मीनाक्षी स्वयं उनके स्वप्न में प्रकट हुई हैं। 

माँ मीनाक्षी ने अपनी मधुर ध्वनि से कुमारकम्पन को पुकारते हुए कहा, हे राजन, मैं तुम्हारे पास अपनी नगर को बचाने की विनती लेकर आई हूँ। जिस नगर को अपनी मधुर सुंदरता के कारण मधुरपूरी यानी मदुरै कहा जाता था, वही नगर अब जंगली जानवरों का नगर बन गया है। जो भगवान विष्णु वहां पर गहरी योग निद्रा में विश्राम करते थे वह भगवान विष्णु अब मलबे में हैं। दीमक ने सुंदर नक्काशी वाली लकड़ी की संरचनाओं को का डाला है, मंडपों में दरारें पड़ गई है, मंदिरों के गर्भ ग्रह जर्जर और ढह रहे हैं।

जिस मंदिर में मैं निवास करती थी, जिस मीनाक्षी मंदिर के हवन कुंडों से कभी यज्ञ के धुएं आकाश तक उठते थे, आज उन्हीं हवन कुंडों से मलेच्चों के द्वारा भुने जा रहे गोवंश की घिनौनी दुर्गंध आती है। मंदिर तक जाने वाले रास्ते जो कभी पेड़ पौधों से सुशोभित हुआ करते थे, वहां पर आज भयानक लोहे के शूल लगा दिए गए हैं, जिनके शीर्ष पर हिंदुओं की खोपड़ियाँ सजी हुई हैं। मदुरै की गलियां जो कभी चंचल चाल से चलती हमारी किशोरी युवतियों की पायल की मधुर ध्वनि से गूँजती थी, वो गलियाँ अब सूनी हो गई हैं, हमारी युवतियाँ आज मलेच्चों के चंगुल में हैं।  वो द्रविड़ स्त्रियाँ जो कभी सौंदर्य से परिपूर्ण थी, आज मलेच्चों के द्वारा बलात्कार की शिकार उन कोमल स्त्रियों के होंठ सूख गए हैं। उनके लंबे बिखरे बाल देखने में विकराल लग रहे हैं। मेरा नगर तबाह हो रहा है राजन।

माँ मीनाक्षी ने फिर आगे कहा, कि हे राजन, उठो, जाकर मेरी भूमि को मुक्त कराओ। वहाँ जाकर कल्याणकारी राज्य की स्थापना कराओ। कावेरी नदी दूषित हो गई है, जाकर उसकी धारा को मोड़कर वहाँ के किसानों का उद्धारों करो। सूखे और अकाल से त्रस्त मेरी संतानो की पीड़ा हरो। मलेच्चों के इस कलंकित शासन में, मुझसे मेरी संतानों का दुःख नहीं देखा जा रहा राजन। 

माँ मीनाक्षी के इस आद्र स्वर ने कुमार कंपन की आँखों को भिगो दिया। माता और पुत्र का संबंध ही ऐसा है। एक पुत्र के लिए इससे बड़ा लांछन और और क्या हो सकता है कि उसकी माता किसी दुख में है। कुमारकंपन को झटका आया, उनकी नींद खुल गई। अभी भोर भी नहीं हुई थी, फिर भी कुमारकंपन उठे, और सीधे अपने पिता महाराज बुक्का के कक्ष में गए। उसी समय उन्होंने तमाम सेना अध्यक्षो को बुलाकर सेना तैयार करने का आदेश दिया, और यह कहा आज दोपहर तक सेना तैयार करो, हम मदुरै को मुक्त कराने जा रहे हैं। 

अब आप यह ध्यान दीजिएगा कि विजयनगर साम्राज्य कर्नाटक के क्षेत्र में आता है जबकि मदुरै सल्तनत तमिलनाडु के क्षेत्र में आती थी। तो यहां एक कन्नड़ राजकुमार एक तमिल क्षेत्र में माता मीनाक्षी की भूमि को मुक्त कराने जा रहा था। भारत की एकता का इससे बड़ा Example और क्या होगा। 

बहरहाल, सेना तैयार हुई। क्योंकि खुद सेनापति कुमारकम्पन का आदेश था, इसलिए सूर्योदय के तुरंत बाद सेना मदुरै की ओर निकल पड़ी। 

कुमारकंपन की सेना मदुरै की सीमा में प्रवेश करने ही वाली थी, कि कंपन को पीले वस्त्रो को धारण किये हुए, एक देवी दिखी। वह देवी थाल में एक तलवार सजाकर कुमारकंपन के रथ के पास आई। कंपन खुद आश्चर्यचकित हो गए, इतनी बड़ी सेना के बीच में यह स्त्री अचानक से कैसे आ गई। किसी ने इनको आते हुए क्यों नहीं देखा। आज भी तमिलनाडु तथा कर्नाटक के कुछ हिस्सों में यह मानता है कि वह देवी और कोई नहीं बल्कि स्वयं मां मीनाक्षी थी। चंद्रमा जैसी शीतलता और सूर्य जैसा तेज एक साथ अपने अंदर समाहित किए हुए माँ मीनाक्षी कुमारकम्पन के सामने आईं।

माँ ने थाल में रखी हुई वह तलवार कुमारकंपन को सौंपते हुए कहा, कि हे महाराज, यह तलवार मूल रूप से भगवान शिव की है, जिसे भगवान विश्वकर्मा ने तैयार किया था।  यह तलवार जिसे कल्पना में भी अन्य राजा धारण नहीं कर सकते, वह अब आपके कमलनुमा हाथों में आसीन हो रही है। इसे लीजिए और जाकर मदुरै की धरती को उन मलेच्चों की खोपड़ियों से ढक दीजिए। उन दुष्टों का रक्त इस तलवार पर बरसा कर इसे शीतल करिए महाराज। मदुरै की मेरी जनता को, इन अताताइयो के शासन से मुक्त कराइये।

कुमारकंपन ने माँ मीनाक्षी को प्रणाम करते हुए उनसे वह तलवार लिया और मदुरै की सीमा में प्रवेश किया। कुमारकंपन की सेना ने अपने हाथियों के साथ, हसन कंगू की सेना पर घातक हमला किया। कुछ ही घंटे के युद्ध में हसन कंगू की सेना का मनोबल टूट गया। जब हसन कांगू को यह लगा कि अब वह युद्ध हार जाएगा, तो उस बर्बर मलेच्छ ने कुमारकंपन को द्वन्द युद्ध के लिए ललकारा। फिर तय हुआ कि अब सेना नहीं लड़ेगी, बल्कि केवल कुमारकंपन और हसन कंगू लड़ेंगे। 

द्वन्द युद्ध शुरू हुआ। कुमारकंपन ने उस युद्ध में जो साहस दिखाया, उसका वर्णन अनेक कवियों ने किया है। कुमारकंपन ने पहले तो अपने बाणों से हसन कंगू के धनुष को काट दिया। फिर अपने बाणों से ही कौवे के निशान वाले मदुरै सल्तनत के ध्वज को नीचे गिरा दिया। और उसके बाद हाथी पर बैठे हसन कंगू के सिर को एक ही बार में उसी तलवार से काट दिया, जो उन्हें माँ मीनाक्षी ने प्रदान किया था। मूर्तियों का विध्वंस करके, मंदिरों को तोड़ के, और हिंदुओं की लाशों पर अट्टाहास करते हुए हसन कंगू का जो सिर गर्व से इठलाता रहता था, वही सिर अब धूल में पड़ा हुआ था। मदुरै स्वतन्त्र हो चुका था। माँ मीनाक्षी अब मलेच्चो के चंगुल से मुक्त हो चुकी थीं। और इस युद्ध के बाद मदुरै इस्लामिक शासन से हमेशा के लिए मुक्त हो गया।

विजयनगर साम्राज्य के युवराज कुमारकंपन ने माँ मीनाक्षी के आशीर्वाद से मदुरै को मुक्त कराया और वहाँ पर एक कल्याणकारी शासन की स्थापना की। लेकिन कुमारकंपन का नाम हमें इतिहास में कहीं पढ़ने को नहीं मिलता। इतिहास की जानकारी रखने वाले सामान्य लोगों को तो छोड़िए, कई Scholars तक कुमार कंपन की इस वीरता के बारे में नहीं जानते।

यह कुमारकंपन ही थे, जिन्होंने दक्षिण भारत से अततायी जिहादियों का अंत कर दिया। यह कुमारकम्पन ही थे, जिन्होंने इस्लामिक कट्टरपंथियों को मदुरै से ऐसा उखाड़ कर फेंका, कि उसके बाद दक्षिण भारत में कोई भी इस्लामी सत्ता वापस नहीं आ सकी। यह कुमारकंपन ही थे जिन्होंने मां मीनाक्षी के मंदिर को तथा रंगनाथ स्वामी मंदिर को मलेच्चों के चंगुल से मुक्त कराया। यह कुमार कंपन ही थे, जिन्होंने अपने नेतृत्व से, एक छोटी सी रियासत को विजयनगर साम्राज्य का दर्जा दिलाया। यह कुमारकंपन ही थे, जिनकी वीरता ने उनके पिता महाराज बुक्का को राजाओं के राजा के रूप में प्रतिस्थापित किया। 

इस्लाम दक्षिण भारत को पराधीन करने आया था, लेकिन कुमारकंपन ने अपनी वीरता से ऐसा नहीं होने दिया। इतने महान सेनापति को, इतने प्रतापी और देवतुल्य राजकुमार को, इस देश के मक्कार इतिहासकारों के द्वारा छुपा लिया गया। किंतु जैसे पत्थरों का वक्ष चीरकर भी नन्हे पौधे पल्लवित हो आते हैं, ठीक उसी प्रकार सत्य के भी प्रकट होने के हजारों मार्ग होते हैं। इस देश के हिंदुओं से विशेष कर युवा पीढ़ी से यह आह्वान किया जाय, कि वे अध्ययन करें, शोध करें और मध्यकालीन इतिहास में, इस्लामी आक्रांताओं के विरुद्ध, हिंदुओं के साहसी संघर्ष के सत्य को सबके सामने लाएं। प्रत्येक राजवंश का इतिहास और बलिदान लोगों के सामने आना चाहिए। 

याद रखिये, फूलों के खिलने का समय आ गया है।

और हज़ार बर्क़ गिरे लाख आँधियाँ उट्ठें

वो फूल खिल के रहेंगे जो खिलने वाले हैं।

Editorial team:
Production team:

More videos with Rohit Pandey as Anchor/Reporter