तारीख़ थी, 6 अप्रैल 2010। दिन था मंगलवार। मंगलवार को, हनुमान जी का दिन माना जाता है। वही हनुमान जी, जिन्होंने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा छत्तीसगढ़ के दंडकारण्य में यानी जंगलों में बिताया। वो जंगल जहाँ से कभी भगवान राम और लक्ष्मण, माता सीता के साथ गुजरे थे। 6 अप्रैल, 2010 को दंडकारण्य यानी छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा के उन पवित्र जंगलों से 80 सीआरपीएफ के जवान गुजर रहे थे।
वो एक ऑपरेशन पूरा करके बस में लौट रहे थे। बीच रास्ते में नक्सलियों ने लैंडमाइंस से उस बस को उड़ा दिया। 76 जवान वीरगति को प्राप्त हुए, सिर्फ नक्सलियों के हमले में। पाकिस्तान की गोलीबारी में, कश्मीर में और LoC पर भी, एक बार में हमारे इतने जवान कभी नहीं मारे गए थे। अगर कोई आपसे पूछे कि भारत का सबसे बड़ा दुश्मन कौन है? तो आपमें से कई लोग पाकिस्तान का नाम लेंगे।
कुछ लोग चीन का भी नाम ले सकते हैं। आप ये नाम इसलिए लेंगे क्योंकि कई बार हमारे सैनिकों की झड़प इन देशों से होती है, जिसमें हमारे कुछ सैनिक वीरगति को भी प्राप्त होते हैं। आपका कारण बिल्कुल सही है। क्या आपको पता है, कारगिल युद्ध में हमारे कितने जवान वीरगति को प्राप्त हुए थे? 527 जवान। लेकिन भारत के अंदर नक्सलियों के लगातार हमले से हमने अब तक कितने जवानों को खोया है? लगभग 3000 जवान वीरगति को प्राप्त हुए हैं, इसके अलावा 5000 से ज्यादा सिविलियन्स मारे गए हैं। वो भी आमने सामने की लड़ाई में नहीं, बल्कि छिप के इनके ऊपर वार किया गया है। 8000 से ज्यादा भारतीयों की हत्या की गई, सिर्फ नक्सलियों के द्वारा।
तो अब आप बताइये, बड़ा दुश्मन कौन है? भारत का सबसे बड़ा दुश्मन अगर कोई है, तो वह नक्सलवाद है। और यह बात सिर्फ मैं नहीं कह रहा हूँ, बल्कि मनमोहन सिंह से लेकर नरेंद्र मोदी तक हमारे प्रधानमंत्रियों ने भी यह बात बोली है।
कई लोगों के मन में यह प्रश्न आता है, कि आखिर ये नक्सलवाद है क्या? और ये लोग क्या चाहते हैं? ये क्यों हमारे सुरक्षा बलों को मारते हैं? ये क्यों हमारे नागरिकों को मारते हैं? और सबसे बड़ी बात, कि ये न तो कोई जिहादी हैं, न ही कोई दुश्मन देश के हैं, तो फिर आखिर क्या कारण है कि ये नक्सली जिनकी जन्मभूमि भारत है, जिनकी पहचान सनातन संस्कृति है, वो इस तरह से भारत के खिलाफ़ ही क्यों षड्यंत्र कर रहे हैं? इन प्रश्नों का उत्तर हम इस वीडियो में जानने की कोशिश करेंगे।
नक्सलवाद को अक्सर माओवाद कहकर भी संबोधित किया जाता है। माओवाद यानी, चीन के माओ त्से तुंग द्वारा शुरू की गई एक विचारधारा। एक विचारधारा, जिसका उद्देश्य था आर्म्ड इंसर्जेंसी यानी हथियारों के साथ सशस्त्र विद्रोह करना और राज्य की सत्ता पर कब्ज़ा करना। इस विचारधारा के केंद्र में ही वॉयलेंस था। भारत में इस विचारधारा को अपनाया CPI (माओइस्ट) ने, जो CPI (मार्क्सिस्ट) और CPI (लेनिनिस्ट) का मिश्रण है। इस विचारधारा को बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों तक फैलाया गया। CPI से चारु मजूमदार नाम के व्यक्ति ने भारत में नक्सलवाद को एक वैचारिक जमीन प्रदान की। चारु मजूमदार का एकमात्र एजेंडा यह था कि कैसे भी करके भारत के लोकतंत्र को बर्बाद किया जाए, और भारत में हथियारों के आधार पर एक विद्रोह शुरू किया जाए। जल्द ही चारु मजूमदार के लिए वह अवसर भी आ गया।
1967 में पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले के एक छोटे से कस्बे ‘नक्सलबाड़ी’ में एक घटना घटी। हुआ यह था कि कुछ भूमिहीन किसानों ने, हथियारों के बल पर ज़मींदारों से उनकी ज़मीन छीन ली और उसपर खेती करना शुरू कर दिया। मामला बढ़ गया, पुलिस आई, टकराव हुआ। किसी ने तीर चलाकर एक पुलिसवाले को जान से मार दिया। पुलिस ने भी जवाबी कार्रवाई में गोली चला दी। इस पूरी घटना में वालों के साथ कुछ किसानों की भी जान गई। फिर इस मामले को नेशनल कवरेज मिली। चारों तरफ़ विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। अमार बाड़ी तोमार बाड़ी नक्सलबाड़ी, इस नारे के साथ यह आंदोलन शुरू हुआ।
चारु मजूमदार नाम के उस माओवादी नेता ने इस विद्रोह को नया दिशा दी। उसने इस विद्रोह को अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए माध्यम बनाया। उसने कहा, “बोलने से बदलाव नहीं आता, हथियार उठाने से आता है।” सत्ता का रास्ता बंदूक की नली से होकर गुजरता है। और फिर इसके बाद चारु मजूमदार के नेतृत्व में, इस हिंसक विचारधारा के साथ भारत में शुरू हुआ नक्सलवाद। शुरुआत में यह आंदोलन किसानों की बात करता था, ग़रीबों के हक़ की बात करता था, लेकिन फिर…धीरे-धीरे सब कुछ बदल गया। किसानों के हक़ के नाम पर वे खुद किसानों की हत्या करने लग गए। ये लोग पुलिसवालों को और सुरक्षा बलों को टारगेट करके मारने लग गए।
स्कूलों को ‘पूंजीवादी संस्थान’ कहकर जला दिया गया। वनवासियों को इन्होंने अपने समूह में शामिल किया। उन्हें बंदूकें दी। विडंबना देखिए, कि इन वनवासियों के पेट खाली थे लेकिन उनके कंधों पर बंदूकें थीं। नक्सलबाड़ी से शुरू हुआ यह आंदोलन, धीरे-धीरे एक हिंसक, अनिश्चित, और निरर्थक युद्ध में बदलता गया, जिसका कोई नैतिक आधार नहीं था, और कोई स्पष्ट भविष्य नहीं था। स्कूलों को उड़ाना, आम नागरिकों को मारना, सड़कों पर बारूदी सुरंगें बिछाना, सुरक्षा बलों को घात लगाकर छिपकर मार देना—यही इनका उद्देश्य बन गया। भारत के पूर्वी क्षेत्रों में कई जिलों तक इनका प्रभाव फैला। जहाँ-जहाँ नक्सलवाद का प्रभाव था, वह पूरा क्षेत्र रेड कॉरिडोर के नाम से जाना गया।
छत्तीसगढ़ और झारखंड के कुछ इलाकों को तो नक्सलियों ने अपना गढ़ बना रखा था। लंबे समय तक विकास उन इलाकों तक पहुंचा ही नहीं। छत्तीसगढ़ का दंतेवाड़ा हो, इंद्रावती नदी के आसपास का इलाका हो, या फिर झारखंड की बोडा पहाड़ियां हों, ये सारे नक्सलियों के गढ़ थे। (यहाँ मैप दिखाना है) दंतेवाड़ा… देवी दंतेश्वरी की नगरी… एक ऐसा इलाका जहाँ आज भी महिलाएं पेड़ों से बातें करती हैं, और वनवासी जंगल को माँ मानते हैं। यहाँ के लिए जंगल सिर्फ जंगल नहीं है… ये उनका धर्म है… संस्कृति है… जीवन है।
यह वही दंडकारण्य है, जहाँ कभी भगवान राम ने अपना वनवास काटा था। यही वो जगह है जहाँ शबरी ने राम को बेर खिलाए थे। वहीं दूसरी तरफ़, झारखंड की बोडा पहाड़ियाँ, जो सिर्फ प्राकृतिक सुंदरता की निशानी नहीं हैं, ये वनवासी अस्मिता के संघर्ष की प्रतीक भी हैं। वहाँ के जंगलों में आज भी भारत की ऐतिहासिक संस्कृति बसती है। चाहे महुआ का रस हो, चाहे सरना पूजा हो या फिर वनवासियों के त्योहारों में ढोल नगाड़े हों, उनकी गूँज भारत की संस्कृति की ध्वनि है। नक्सलियों ने दंतेवाड़ा के जंगलों से लेकर बोडा की पहाड़ियों तक, हर जगह वनवासियों को बरगलाया और उन्हें विकास की मुख्यधारा से अलग कर दिया।
वनवासियों के हाथों में इन लोगों ने बंदूकें दी, और बड़े पैमाने पर ये नक्सली देश में अराजकता फैलाने लगे। वैसे तो छिटपुट हत्याएं नक्सलियों द्वारा नक्सलबाड़ी के बाद से ही शुरू हो गईं थीं, लेकिन 1985 के बाद से इन हत्याओं को संगठित रूप से अंजाम दिया जाने लगा। 1985 में आंध्र प्रदेश के वारंगल जिले में पुलिस सब इंस्पेक्टर एन. यादवगिरी रेड्डी की हत्या नक्सलियों द्वारा कर दी जाती है। इसके जवाब में आंध्र प्रदेश की सरकार इसके बाद केंद्र सरकार के साथ मिलकर ‘ग्रेहाउंड्स’ नामक एक स्पेशल फोर्स बनाती है।
एक ऐसी फोर्स, जिसको जंगलों में युद्ध करने की टेक्निक सिखाई गई और गुरिल्ला वारफेयर के बारे में विशेष रूप से प्रशिक्षित किया गया। इस फोर्स के द्वारा इसके बाद कई नक्सलियों को ऑपरेशन चलाकर खत्म किया गया। ऑपरेशन्स के अलावा, आंध्र प्रदेश और ओडिशा जैसे राज्यों ने नक्सलियों के विरुद्ध कठोर कानून बनाए। जिसमें पुलिस को और पावर दी गई। साथ ही, कई राज्य की सरकारों ने सरेंडर कर देने वाले नक्सलियों के लिए पुनर्वास कार्यक्रम भी शुरू किए। लेकिन नक्सली थम नहीं रहे थे। बिहार में 1990 के दशक में अनेक समुदायों के विरुद्ध नक्सलियों ने कई हिंसक हमले किए। कई गाँवों में नरसंहार हुए।
सरकार से जब मदद नहीं मिली तो बिहार में अनेक जातियों ने नक्सलियों से लड़ने के लिए खुद की सेना बना ली। ब्रह्मेश्वर मुखिया के नेतृत्व में रणवीर सेना बनी। यादवों ने लॉरिक सेना बना ली। कुर्मियों ने भूमि सेना बना ली। उसके बाद बिहार में नक्सलवाद के कारण जाति के आधार पर दंगे, हिंसा सब कुछ हुआ। नक्सलियों के खिलाफ आम जनता ने कई राज्यों में खुद का मोर्चा बनाया, क्योंकि उस दौर में सरकारों की तरफ से किए जा रहे प्रयास काफी नहीं थे।
अगर बिहार में रणवीर सेना का गठन हुआ, तो आंध्र प्रदेश में ग्रीन टाइगर्स का गठन हुआ। छत्तीसगढ़ में सलवा जुडूम का गठन हुआ। सलवा जुडूम के बारे में थोड़ा सा इनसाइट मैं आपको देना चाहता हूँ, क्योंकि आगे की कहानी में भी इसका जिक्र आएगा। सलवा जुडूम की शुरुआत 2005 में छत्तीसगढ़ राज्य के दंतेवाड़ा जिले में हुई थी। इसका उद्देश्य था, नक्सलवाद के खिलाफ वनवासियों को संगठित किया जाए, और उन्हें आत्मरक्षा के लिए तैयार किया जाए।
बिहार और छत्तीसगढ़ के अलावा नक्सलियों का प्रभाव भारत के और भी कई राज्यों तक फैला। नक्सलियों द्वारा की जाने वाली हिंसा का एक बड़ा रूप देश को 2003 में देखने को मिला। जब आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू के काफिले पर नक्सलियों ने हमला किया। 1 अक्टूबर 2003 को चंद्रबाबू नायडू पर हुए हमले ने स्पष्ट कर दिया कि नक्सली नेतृत्व अब लोकतंत्र और सरकार के खिलाफ जंग छेड़ चुका है।
इस घटना के बाद आंध्र प्रदेश की राज्य सरकार ने अपनी पुलिस को और मॉडर्न बनाया, उन्हें टेक्नोलॉजी दी, उन्हें और ज्यादा पावर्स दी। जिसका परिणाम यह हुआ कि उस वर्ष 246 नक्सलियों को आंध्र प्रदेश में खत्म किया गया। लेकिन इससे नक्सलियों के मनोबल पर कोई असर नहीं पड़ा। 2005 में जहानाबाद जेल पर हमला करके 300 से अधिक कैदियों को नक्सलियों ने छुड़ा लिया। 2007 में झारखंड में संसद सदस्य सुनील महतो की हत्या करके नक्सलियों ने सरकार को एक बार फिर ठेंगा दिखाया।
नक्सली सिर्फ यहीं नहीं रुके, उन्होंने विदेशी नागरिकों का अपहरण करके भी सरकार पर अंतर्राष्ट्रीय दबाव बनवाया। आप में से कई लोगों को यह बात पता होगी, कि विदेशी नागरिकों का अपहरण करने की जो तकनीक है, उसे बड़े स्तर पर ISIS और अलकायदा जैसे इस्लामी आतंकवादी संगठन भी अपनाते हैं। वो लोग ऐसा इसलिए करते हैं ताकि बड़े स्तर पर, पूरी दुनिया को संदेश भेज पाएँ। उनके ही ढर्रे पर चलते हुए, नक्सली भी विदेशी नागरिकों का अपहरण करते रहे, ताकि दुनिया को यह संदेश जाए कि सरकार की नक्सलियों के सामने कोई औकात नहीं है।
नक्सलियों द्वारा किए गए इन हमलों के बारे में, मैं आपको इसलिए बता रहा हूँ, क्योंकि आज भले ही आपको नक्सली खत्म होते दिख रहे हों लेकिन एक समय ऐसा भी था, जब ये सरकार के सर पर चढ़ के नाच रहे थे। एक समय ऐसा भी था जब इन्होंने हमारे सुरक्षा बलों की नाक में दम कर रखा था। 2009 आते-आते नक्सलियों ने सरकार को इतना परेशान कर दिया कि इन सारी चीजों के बाद 2009 में केंद्र सरकार ने यह सोचा, कि अब छिटपुट तरीके से नक्सलियों से नहीं लड़ा जा सकता।
बड़े स्तर पर एक ऑपरेशन की जरूरत है। इसलिए 2009 में केंद्र सरकार ने ‘ऑपरेशन ग्रीन हंट’ की शुरुआत कर दी। जिसके अंतर्गत यह तय किया गया, कि अब पैरामिलिट्री फोर्सेज और राज्यों की पुलिस मिलकर नक्सलियों को खत्म करेगी। नक्सलियों ने सरकार के इस प्लान पर बहुत तगड़ा रिटलीएशन किया। कुछ ही महीनों बाद 6 अप्रैल 2010 को नक्सलियों ने घात लगाकर हमला किया, और 76 CRPF जवानों की हत्या कर दी। जिसका जिक्र मैं शुरुआत में ही कर चुका हूँ।
ऐसा ही एक हमला नक्सलियों ने 2013 में भी किया, लेकिन इस बार टारगेट पर सुरक्षा बल नहीं, बल्कि लीडरशिप थी। 2013 में गवर्नमेंट ऑफिशियल्स को टारगेट करने का सबसे बड़ा इंसिडेंट हुआ। जब छत्तीसगढ़ के दरभा वैली में छत्तीसगढ़ कांग्रेस के 27 नेताओं को नक्सलियों द्वारा मार दिया गया। जिसमें कई बड़े नाम थे। विद्याचरण शुक्ला, जो एक समय संजय गांधी के बड़े करीबी हुआ करते थे, वो मारे गए।
छत्तीसगढ़ के कांग्रेस प्रेसिडेंट नंद कुमार पटेल मारे गए। नक्सलियों के खिलाफ ‘सलवा जुडूम’ नामक आंदोलन की शुरुआत करने वाले कांग्रेस मिनिस्टर महेंद्र कर्मा भी मारे गए। एक तरह से छत्तीसगढ़ कांग्रेस की टॉप लीडरशिप को ही नक्सलियों ने खत्म कर दिया। यह एक ऐसी घटना थी, जिसने सरकार को हिलाकर रख दिया।
सरकार अब तक बहुत बिखरे हुए तरीके से नक्सलियों को हैंडल कर रही थी। बड़े स्तर पर सरकार की तरफ से कोई इंटीग्रेटेड अप्रोच अब तक देखने को नहीं मिला था। 2013 तक ऐसे सैकड़ों इंसिडेंट्स हुए, जिसमें नक्सलियों ने कई जगहों पर जेनोसाइड किया। नक्सलियों को कंट्रोल करने के लिए, केंद्र सरकार ने 2009 में ऑपरेशन ग्रीन हंट चलाया तो था, लेकिन वह ऑपरेशन उतना सफल नहीं हो पाया। क्योंकि एक तरह से उस दौर में सरकार के स्तर पर आपस में ही थोड़ी सी खींचतान देखने को मिली थी।
सरकार यह बात नहीं समझ पा रही थी, कि नक्सलियों की लड़ाई किसी भाजपा या कांग्रेस से नहीं है, बल्कि नक्सली स्टेट के खिलाफ, यानी भारत के खिलाफ लड़ रहे हैं। एक तरफ जहाँ पी चिदंबरम जैसे नेता नक्सलियों पर हार्ड लाइन रखने के पक्षधर थे, तो वहीं दूसरी तरफ दिग्विजय सिंह जैसे नेता नक्सलियों से बातचीत के पक्षधर में थे। दिग्विजय सिंह ने तो पी चिदंबरम को “इंटेलेक्चुअल एरोगेंट” तक कह दिया था। सलवा जुडूम के फाउंडर महेंद्र कर्मा ने तो 2010 में यह भी कह दिया था कि, हमारी सरकार ने नक्सलियों को वॉकओवर दे दिया है।
कुल मिलाकर कहें तो उस समय की कांग्रेस सरकार एक तरह से नक्सलियों के दबाव में आने लगी थी और नैरेटिव के मामले में कहीं न कहीं अर्बन नक्सल्स सरकार पर हावी होने लगे थे, इसलिए सरकार खुद ही अपने एजेंडे को लेकर असमंजस की स्थिति में थी। लेकिन इसके ठीक एक साल बाद, यानी 2014 में देश में एक राजनीतिक परिवर्तन हुआ, जहाँ से नक्सलियों का काउंटडाउन शुरू हुआ।
नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में, भाजपा केंद्र की सत्ता में आई, और प्रधानमंत्री मोदी ने अपना गृहमंत्री बनाया राजनाथ सिंह को। 2014 में गृह मंत्री बनते ही राजनाथ सिंह ने नक्सलवाद को खत्म करने के लिए एक इंटीग्रेटेड अप्रोच पर काम करना शुरू कर दिया। सरकार इस बार पूरी तरह से एकजुट थी, और तैयार भी थी। नक्सलवाद को खत्म करने के लिए एक एक्शन प्लान बनाया गया। गृह मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, 2014 में, करीब 10,000 पैरामिलिट्री ट्रूप्स को छत्तीसगढ़ में नक्सलियों को खत्म करने के लिए भेजा।
रेड कॉरिडोर, यानी नक्सलियों के गढ़ में सेना को भी भेजा गया। अगस्त 2014 में, जंगलों में लड़ने में माहिर सेना की नागा बटालियन से 2000 सैनिकों को छत्तीसगढ़ के बस्तर में भेजा गया। सुरक्षा बलों को सेटेलाइट फोन्स दिए गए। DRDO और वायु सेना की तरफ से भी कई इक्विपमेंट सुरक्षा बलों को दिए गए। नक्सलवाद से प्रभावित क्षेत्रों में CRPF की मदद के लिए 5000 km से अधिक सड़कें बनवाई गईं। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में आधारभूत विकास पर फोकस किया गया।
इसके अलावा गृह मंत्री ने नक्सलवाद के विरुद्ध SAMADHAN Doctrine भी पेश की।
S: Smart Leadership
A: Aggressive Strategy
M: Motivation of Security Forces
D: Dashboard (Real-time Intel)
H: Harnessing Tech (Drones, UAVs)
A: Actionable Intelligence
N: No Access to Financing
नक्सलवाद की कमर तोड़ने के लिए उनके वित्त पर प्रहार किया गया। उनके खिलाफ कई ऑपरेशंस चलाए गए। CRPF और पैरामिलिट्री फोर्सेज को आधुनिक हथियार दिए गए। इन सारे प्रयासों का परिणाम यह निकला कि 2014 से ही नक्सलियों की कमर टूटनी शुरू हो गई। 2013 में नक्सलवाद का जो रेड कॉरिडोर इतने क्षेत्रों तक फैला था, वह 2018 आते-आते सिमटकर इतने क्षेत्रों में रह गया। यह मोदी सरकार की सबसे बड़ी सफलता थी, कि उनके कार्यकाल में केरल समेत भारत के अनेक क्षेत्र पूरी तरह से नक्सल मुक्त हो गए।
इसके बाद देश में 2019 से गृह मंत्रालय का कार्यभार आया अमित शाह के पास। यहाँ से नक्सलवाद के विरुद्ध कार्रवाई में और तेजी आई। नक्सलियों की फंडिंग को रोकने का काम NIA को सौंपा गया। NIA ने इनके वित्त पर करारा प्रहार किया। हवाला के माध्यम से जो इनको फंडिंग होती थी, उस नेक्सस को तोड़ा गया।
CRPF को GPS-Enabled हथियार दिए गए। नक्सल प्रभावित क्षेत्र में विकास को बढ़ावा देने के लिए Aspirational Districts Program शुरू किए गए। आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों के पुनर्वास के लिए पॉलिसीज लाई गईं। इंटेल बेस्ड ऑपरेशन पर अधिक जोर दिया गया। नक्सलियों को खत्म करने के लिए बड़े स्तर पर इंटीग्रेटेड अप्रोच के साथ काम किया गया। 2022 में छत्तीसगढ़ में 90 से अधिक नक्सली कैम्प्स को तबाह किया गया।
2023 में आंध्र प्रदेश और ओडिशा में ग्रेहाउंड्स ने बड़े ऑपरेशन चलाकर बड़ी संख्या में नक्सलियों को खत्म किया। यदि आंकड़ों की बात करें, तो पिछले 6 वर्षों में 1000 से अधिक नक्सलियों को हमारे सुरक्षा बलों ने खत्म किया। इसमें जो सबसे बड़ा हमला नक्सलियों पर किया गया, वह अभी कुछ दिन पहले ही सम्पन्न हुआ। इस ऑपरेशन का नाम था, ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट। यह ऑपरेशन छत्तीसगढ़ और तेलंगाना की सीमा पर स्थित कुर्रागुट्टालु की पहाड़ियों में चलाया गया, जो नक्सलियों के सबसे अहम और दुर्गम गढ़ों में से एक माना जाता था।
इस ऑपरेशन की सबसे खास बात यह रही कि इसमें 20,000 से अधिक सुरक्षा बलों ने हिस्सा लिया, जिसमें ड्रोन्स, हेलीकॉप्टर, और गुप्तचर एजेंसियों की विशेष सहायता का भरपूर उपयोग किया गया। और फिर 21 मई को वह ऐतिहासिक क्षण आया जब नंबाला केशव राव उर्फ बसवराजू मारा गया। पहली बार इतने बड़े नक्सली को हमारे सुरक्षा बलों ने निपटाया। उसके साथ 26 और नक्सली भी मारे गए। बसवराजू की मौत को हमारी सरकार ने “नक्सलवाद पर अब तक का सबसे निर्णायक प्रहार” कहा। आज देश में नक्सलवाद की स्थिति यह है कि गृह मंत्रालय के एक आंकड़े के अनुसार नक्सलवाद अब पूरे देश में सिर्फ 6 जिलों तक सिमट कर रह गया है।
जो क्षेत्र पहले नक्सलियों के आतंक से काँपते थे, आज वहाँ सड़कें, अस्पताल, स्कूल और कॉलेज पहुंच चुके हैं। जो दंतेवाड़ा कभी नक्सल हब था, आज वो एजुकेशन हब बन रहा है। आज वहाँ बच्चे मोबाइल चला रहे हैं, कंप्यूटर चला रहे हैं, बड़े सपने देख रहे हैं। रेड कॉरिडोर के नाम से विख्यात भारत का पूर्वी क्षेत्र अब ग्रोथ कॉरिडोर में बदल रहा है।
आज सोशल मीडिया पर जब गृह मंत्री ट्वीट करते हैं कि हमारी फोर्सेस ने इस रीजन को नक्सल मुक्त कर दिया, हमारी फोर्सेस ने फलां नक्सली को मार दिया, तो आप लोग भले ही इसे एक खबर मान कर आगे बढ़ जाते होंगे लेकिन इस खबर के पीछे कई वर्षों की मेहनत है। पिछले 10 वर्षों में, सरकार ने भारत को नक्सल मुक्त करने के लिए एक प्रतिबद्धता दिखाई है। जो उसकी नीतियों में भी झलकता है। सरकार ने नक्सल प्रभावित इलाकों में केवल हथियारों के जरिए लड़ाई नहीं लड़ी, बल्कि एक सुव्यवस्थित रणनीति बनाई, जिसमें राज्य सरकारों को भी सशक्त बनाया गया।
सरकार ने यह समझा कि नक्सलवाद से सिर्फ लड़ना काफी नहीं है, बल्कि उन वनवासियों को भी मुख्यधारा में लाना होगा जिन्हें नक्सलियों द्वारा बरगला दिया गया है। सरकार ने इस बात को समझा कि नक्सलवाद उन्हीं जगहों पर पनपता है, जहां सरकार की उपस्थिति नहीं होती। मोदी सरकार ने इस निर्वात को भरने के लिए 2017 में ‘स्पेशल सेंट्रल असिस्टेंस’ योजना शुरू की। इसका मकसद था- नक्सली इलाकों में बिजली, पानी, सड़क, स्कूल, अस्पताल जैसे बुनियादी ढांचे की कमी को दूर करना।
यह कोई मामूली बात नहीं कि अब तक ₹3,563 करोड़ उन जिलों पर खर्च किए गए हैं, जो कभी रेड कॉरिडोर के नाम से जाने जाते थे। राज्यों की इंटेलिजेंस एजेंसियां और पुलिस को मजबूत किया गया। किलेबंद पुलिस स्टेशन्स का निर्माण हुआ, ताकि हर पुलिस स्टेशन अपने आप में एक सुरक्षा किला बन जाए। 2014 में जहां पूरे देश में सिर्फ 66 किलेबंद पुलिस स्टेशन्स थे, वहीं अब इनकी संख्या 612 हो चुकी है। यह सिर्फ आंकड़ा नहीं है, यह एक स्पष्ट संदेश है कि अब देश नक्सलवाद के खिलाफ पीछे नहीं हटेगा।
सरकार ने केवल ज़मीनी ताकत पर ही नहीं, बल्कि हवाई सहायता पर भी ध्यान दिया। हेलीकॉप्टर खरीदने, आधुनिक हथियार खरीदने और इंफ्रास्ट्रक्चर मजबूत करने के लिए केंद्रीय एजेंसियों को ₹1,120 करोड़ से अधिक की मदद दी गई। सरकार ने इस बात को भी गहराई से समझा कि बंदूक और विकास के साथ-साथ वनवासियों के साथ संवाद भी जरूरी है। इसलिए सरकार ने वनवासियों को समझाया, उनके मन में यह विश्वास पैदा किया, कि ये जो जंगलों में सुरक्षा बल घूम रहे हैं, ये आपके मित्र हैं, आपके शत्रु नहीं।
मैं सरकार द्वारा किए गए ये प्रयास आपको इसलिए बता रहा हूँ, क्योंकि ये बातें आपके लिए जाननी जरूरी हैं। आप तक ये बातें पहुंचने नहीं दी गईं। आप सोचिए, कि नक्सली इलाकों में पहले नेटवर्क भी नहीं होता था- ना मोबाइल, ना इंटरनेट। आजादी के 75 वर्षों बाद भी लोग डिजिटल दुनिया से कटे हुए थे। फेसबुक इंस्टा तो बहुत दूर की बात है, इंटरनेट तक की बेसिक फैसिलिटी भी उनके पास नहीं थी, मोबाइल टावर नहीं थे। लेकिन अब, ये सब कुछ हो रहा है। केंद्र सरकार ने उन इलाकों में 10,500 मोबाइल टावरों को स्थापित करने की योजना बनाई, जिनमें से 7,768 टावर चालू हो चुके हैं।
1 दिसंबर 2025 तक हर नक्सल क्षेत्र में मोबाइल नेटवर्क पहुंच चुका होगा। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में 48 नए ITI और 61 कौशल विकास केंद्र खोले गए। साथ ही, वनवासी ब्लॉकों में 178 एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालय शुरू किए गए। इनसे शिक्षा और रोजगार का ऐसा पुल बना, जिससे हजारों युवा मुख्यधारा से जुड़ गए। हजारों वनवासी युवा जो कभी बंदूक उठाकर सरकार से लड़ते थे, आज वो युवा सुरक्षा बल में शामिल हो रहे हैं, और बंदूक उठाकर देश की सुरक्षा कर रहे हैं।
आपमें से जो लोग बड़े-बड़े विश्वविद्यालयों में रहकर पढ़ाई करते हैं। वहां पर आप देखिए कि कुछ लोग जरूर ऐसे होंगे जो नक्सलियों को गरीबों का मसीहा बताते हैं। कुछ लोग जरूर ऐसे होंगे जो नक्सलियों को वनवासियों का हितैषी बताते हैं। सरकार ने सबसे बड़ा प्रहार इन नक्सलियों के इसी नैरेटिव पर किया है। मोदी सरकार ने वनवासियों के साथ शासन और प्रशासन हर स्तर पर संवाद किया, उन्हें समझाया। अब वनवासी यह समझने लगे हैं कि असली दुश्मन कौन है।
संसद में, भारत सरकार के गृह मंत्री ने यह बात कही है, कि 31 मार्च 2026 तक नक्सलवाद पूरे देश से समाप्त हो जाएगा। अब जिस सरकार ने नक्सलवाद को 100 जिलों से लाकर मात्र 6 जिलों तक समेट दिया है, वह सरकार बाकी 6 जिलों से भी देर-सबेर नक्सलवाद को खत्म कर ही देगी। लेकिन इन सारी चीजों को जानकर एक आम आदमी के मन में 2 प्रश्न उठेंगे। पहला यह, कि अगर नक्सली इतने बुरे हैं, तो सरकार अंधाधुंध फायरिंग करवाकर सीधे इनको खत्म क्यों नहीं कर देती है? इसका उत्तर देने से पहले, मैं आपको एक फिल्मी दृश्य की याद दिलाना चाहूंगा। आपमें से बहुत लोगों को बाहुबली फिल्म का एक दृश्य याद होगा।
जब दुश्मन ने बाहुबली के अपने लोगों को आगे रख दिया, तो ऐसी स्थिति में एक अच्छा राजा क्या करेगा? क्या उसे अपने लोगों को अपने दुश्मनों को मारना चाहिए? उन निर्दोषों ने तो कुछ नहीं किया। उनका क्या दोष? ऐसी स्थिति आने पर उस फिल्म में बाहुबली ने क्या किया? पहले दुश्मन के चंगुल से अपने लोगों को मुक्त कराया। सरकार भी अपने स्तर पर यही करती है। नक्सलियों ने बड़े ही रणनीतिक तरीके से निर्दोष वनवासियों को अपने चंगुल में फंसा रखा है।
इन नक्सलियों ने वनवासियों के सामने एक तरह का कास्ट नैरेटिव सेट किया। सुधा भारद्वाज, वरवर राव, अरुण फेरेरा, और वेर्नोन गोंजाल्विस जैसे हजारों लोग, जो नक्सलियों को डिफेंड करते हैं, उन्होंने कास्ट नैरेटिव के नाम पर कई बार नक्सलियों का इस्तेमाल करते हुए देश में भी अराजकता फैलाने की कोशिश की। 2018 में पुणे में भीमा कोरेगांव में इन माओवादियों ने जो प्रोपेगंडा फैलाया, उसने बड़े पैमाने पर पूरे देश में हिंसा फैलाई। कुछ सूत्रों तो यह भी बताते हैं, कि नक्सली सोच वाले इन माओवादियों ने प्रधानमंत्री मोदी की हत्या करने की भी योजना बनाई थी। ये लोग खुद भले ही बंदूक नहीं चलाते, लेकिन जंगलों में जो गोलियां चलती हैं, उसके पीछे का बारूद इन्हीं के लैपटॉप से निकलता है
इनकी जबान पर देशद्रोह संस्कारों की तरह बैठा है, जिसे ये ‘विचार’ कहकर बेचते हैं, और मानवाधिकार के नाम पर गिद्ध भोज करते हैं। इन माओवादियों ने जंगलों में रहने वाले वनवासियों को ब्राह्मणवाद के नाम पर बरगलाकर हथियार उठाने के लिए प्रोत्साहित किया है। तुम्हारे यहां सड़क नहीं आई, तो इसका कारण ब्राह्मणवाद है।
तुम्हारे यहां स्कूल नहीं बने तो इसका कारण ब्राह्मणवाद है। तुम्हारे बच्चे भूखे मर रहे हैं, तो इसका कारण ब्राह्मणवाद है। ऐसे बरगलाया गया इनको। जबकि वास्तविकता यह थी कि नक्सलियों ने ही उन जंगलों तक सड़क नहीं पहुंचने दी, इन नक्सलियों ने ही उन वनवासी बच्चों तक स्कूल-कॉलेज की सुविधा नहीं पहुंचने दी। ताकि उन वनवासियों के बच्चे पढ़-लिख न जाएं। इन नक्सलियों ने उन वनवासियों की मेहनत से बनाए हुए स्थानीय उत्पादों, जैसे कपड़े, घड़े, और हथकरघे उत्पादों को भी बाजार की पहुंच से दूर रखा, क्योंकि अगर डायरेक्ट मार्केट तक उनके प्रोडक्ट्स का एक्सेस हो गया, तो जंगलों में रहने वाले लोगों के पास पैसे आएंगे, वह विकास की मुख्य धारा से जुड़ेंगे। और अगर वह विकास की मुख्य धारा से जुड़ गए, तो फिर नक्सलियों का तो एजेंडा ही खत्म हो जाएगा।
इन नक्सलियों ने जंगलों में रहने वाले लोगों को एक नारकीय जीवन जीने पर मजबूर कर दिया। खुद यह नक्सली एसी कमरों में रहे। उनके बच्चे विदेश में पढ़ने गए। इन नक्सलियों ने जंगलों में रहने वाले वनवासी महिलाओं को सेक्स स्लेव के रूप में इस्तेमाल किया। लेकिन वही दूसरी तरफ आप वनवासियों को देखें, तो उनकी तो कोई निजी जिंदगी ही नहीं रही।
अपने घर से दूर, अपने बीवी बच्चों से दूर, हमारे वनवासी लोग केवल नक्सलियों के प्रभाव में आकर हमारी सिक्योरिटी फोर्सेस से लड़ रहे थे। क्योंकि उनका ब्रेनवाश किया गया, और जो लोग नहीं हुए उन्हें डराया गया धमकाया गया। डराने धमकाने पर भी जो लोग नक्सलियों का साथ देने नहीं आए उन्हें नक्सलियों द्वारा मार दिया गया। ये नक्सली हर बार निर्दोष वनवासियों को चारे के रूप में इस्तेमाल करते हैं।
जब भी हमारे सुरक्षा बल नक्सलियों को मारने जाते हैं, तो इन निर्दोष वनवासियों को नक्सली आगे कर देते हैं। ऐसी स्थिति में अपने ही भोले-भाले वनवासियों पर सरकार भला कैसे गोली चला सकती है? इसलिए सरकार ने धीरे-धीरे इन वनवासियों को विकास के रास्ते से जोड़ने की कोशिश की। इनको सरेंडर करवा के, इनके पुनर्वास की ओर काम किया गया। कई वनवासियों ने सरेंडर किया। उनको नौकरी और अन्य जरूरतें उपलब्ध कराई गईं।
इसके बाद नक्सलियों के समूह में जब केवल आपराधिक प्रवृत्ति के लोग रह गए, तो फिर लंबे समय तक एक रणनीतिक युद्ध में चुन-चुनकर नक्सलियों को मारा गया। यह लड़ाई लंबी इसलिए रही, क्योंकि यह लड़ाई उन नक्सलियों से थी जिन्होंने हमारे अपने लोगों को बरगला कर, उन्हें बहला-फुसला कर, उन्हें ब्रेनवाश करके, उन्हें डरा धमका कर, सरकार के खिलाफ हथियार उठाने के लिए मजबूर कर दिया। और अब यह लड़ाई इसलिए खत्म हो रही है क्योंकि एक बड़े स्तर पर सरकार के प्रयासों के बाद वनवासियों ने खुद को मुख्य धारा से जोड़ा है, वनवासियों ने नक्सलियों का साथ छोड़ा है, और अकेले पड़ गए तो नक्सलियों पर हमारी सिक्योरिटी फोर्सेस कहर बनकर टूटी हैं।
दूसरा प्रश्न किसी के भी मन में यह उठेगा, कि पिछले 50-60 वर्षों से सिर्फ जंगलों में रहकर नक्सली देश भर में हिंसा कैसे फैला पा रहे हैं? यह बिल्कुल सही प्रश्न है, क्योंकि सिर्फ जंगलों से कोई साँप भारत को 60 साल तक नहीं डंस सकता है? नक्सलवाद का जहर सिर्फ जंगलों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह जंगलों से कहीं बाहर तक फैला हुआ है। इस जहर को फैलाने में बहुत लोगों का योगदान रहा। देश के बड़े-बड़े विश्वविद्यालयों में नक्सलियों के लिए सहानुभूति कैम्पेन चलाए गए।
मीडिया में बैठे बड़े-बड़े पत्रकारों ने इनके समर्थन में नैरेटिव बनाया। ब्यूरोक्रेसी के कुछ लोगों का प्रोटेक्शन भी इन नक्सलियों को मिला। और अंत में कुछ राजनीतिक दलों ने तो हमेशा इनका साथ दिया। इस पूरे नेक्सस के कारण ही नक्सलवाद इतने बड़े स्तर तक फैल पाया। इसका कुछ उदाहरण मैं आपको देता हूँ। 2010 में जब छत्तीसगढ़ के जंगलों में 76 सीआरपीएफ जवानों की नक्सलियों द्वारा नृशंस हत्या हुई, तो पूरे देश को दुःख हुआ। लेकिन उसी समय दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में कुछ छात्र संगठनों ने इस घटना पर “उत्सव” मनाया। “भारत मुर्दाबाद, माओवाद जिंदाबाद” के नारे खुलेआम लगे।
बस्तर रेंज के उस समय के आईजी एसआरपी. कल्लूरी ने तो यहाँ तक कह दिया, कि जब उनको यह पता चला कि हमारे जवानों की हत्या के बाद जेएनयू में जश्न मनाया गया, तो उनकी आत्मा कांप उठी। यह वही कल्लूरी हैं, जो वर्षों से नक्सलियों के खिलाफ अपनी जान दांव पर लगाकर निर्णायक लड़ाई लड़ते रहे हैं।
आखिर एक विश्वविद्यालय में इस तरह की गतिविधियां कैसे हो सकती हैं? जेएनयू की बात छोड़िए, पश्चिम बंगाल के जादवपुर विश्वविद्यालय में तो नक्सलियों ने बाकायदा भर्ती केंद्र बना लिया। 2010 में ‘इंडियन एक्सप्रेस’ ने खबर दी थी कि एक गिरफ्तार नक्सली नेता ‘कंचन’ ने सिक्योरिटी एजेंसियों को बताया कि जादवपुर विश्वविद्यालय नक्सली कैडरों का नया अड्डा बन चुका है। यहां से नए लड़ाकों की भर्ती की जा रही है, जो जंगल में जाकर प्रशिक्षण ले रहे हैं। ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ की एक रिपोर्ट में इंटेलिजेंस ब्यूरो के एक अधिकारी ने चेतावनी दी थी कि कोलकाता में युवाओं का नक्सलियों की ओर बढ़ता झुकाव एक खतरनाक संकेत है। कई छात्र जंगलों में जाकर हथियार चलाना सीख रहे हैं। अर्बन नक्सल्स वह कॉकरोच बन चुके हैं, जो विश्वविद्यालयों, मीडिया संस्थानों, और साहित्यिक संस्थानों में पलते हैं।
वे विचार के नाम पर मस्तिष्क में हिंसा का कीड़ा बसाते हैं। इनके पास दर्शन के नाम पर एक वैचारिक शौचालय है, जिसे ये लोग क्लास स्ट्रगल के टॉयलेट पेपर से लपेटकर, अपनी एकेडमिक फाइल्स में रखते हैं। ये वो लोग हैं जो शब्दों के मुंह पर नकाब डालकर, देशद्रोह को भी ‘वैकल्पिक दृष्टिकोण’ बता देते हैं। इनका कहना है कि ये “शोषण के विरुद्ध आवाज” उठाते हैं, पर जिस दिन गांव का गरीब पहली बार इंटरनेट चलाता है, उस दिन इनकी विचारधारा का वाई-फाई डाउन हो जाता है। वैचारिक वायरस के रूप में ये धीरे-धीरे पूरे देश में फैलते गए। यह लड़ाई सिर्फ जंगलों की नहीं है, यह लड़ाई हमारे क्लासरूम, लाइब्रेरी, विश्वविद्यालयों और सेमिनार हॉल में भी लड़ी जा रही है।
एक स्वच्छता अभियान की जरूरत यहां भी है। अगर नक्सलवाद इतने वर्षों तक भारत की आत्मा पर घाव बनकर रहा, तो इसके पीछे ये अर्बन नक्सल्स सबसे ज्यादा जिम्मेदार हैं। जिन वनवासियों की सुरक्षा के नाम पर यह आंदोलन शुरू हुआ था, वही वनवासी आज सबसे ज्यादा पीड़ित हैं। उनके बच्चों के हाथों में किताबें नहीं, हथियार हैं। उनके गांवों में न तो स्वास्थ्य है, न शिक्षा।
जंगलों के बीच उन वनवासियों को न तो सम्मान मिल रहा है, और न ही सुरक्षा मिल रही है। ये नक्सली पागलपन से भरे हुए लोग हैं, जिनके पागलपन का असर हमारे सुरक्षाबलों पर भी पड़ रहा है। वे सैनिक भी तो किसी गरीब परिवार से ही आते हैं। वे भी तो अपने घरों से दूर जंगलों में तैनात हैं, ताकि कोई बच्चा आजादी की हवा में सांस ले सके। क्या उन नक्सलियों से कोई यह पूछेगा, कि जब नक्सली हमलों में, वो सैनिक बम से उड़ा दिए जाते हैं, तो उनकी मौत को ये नक्सली किस खाते में लिखते हैं?
जब भी देश में नक्सलवाद की चर्चा होती है, तो दो पक्ष सामने होते हैं। एक पक्ष यह मानता है कि नक्सली ‘सही’ हैं। दूसरा पक्ष यह मानता है कि नक्सली ‘गलत’ हैं। इन तमाम बहसों में, हर कोई सिर्फ अपने-अपने पक्ष को सही ठहराने में लगा रहता है। लेकिन जो मुद्दा कभी केंद्र में नहीं आता, वो मुद्दा है, वनवासी। वही वनवासी, जिसके नाम पर नक्सलियों द्वारा बंदूकें उठाई जाती हैं, और फिर उन्हीं वनवासियों को आगे करके ये नक्सली सरकार पर, पुलिस पर, और सुरक्षा बलों पर गोलियां भी चलाते हैं। जब मैं वनवासी कह रहा हूँ, तो शायद आपके दिमाग में कुछ चेहरा न बन रहा हो। आप कल्पना करिए एक वनवासी बच्ची की। 8-10 साल की बच्ची।
एक मासूम सी बच्ची, जो न वह संविधान जानती है, और न क्रांति का मतलब। उसकी दुनिया सिर्फ जंगल है। पेड़ हैं, पत्ते हैं, नदियां हैं, सांप हैं, लाल चींटियां हैं। वही लाल चींटियां, जिनकी चटनी अनेक वनवासी इलाकों में बनती है, और उसे बड़े चाव से खाया जाता है। वो बच्ची बस इन जंगलों में खेलती है, लाल चींटियां पकड़ के लाती है, ताकि उसकी मां रात को खाने के लिए चटनी बना सके। उस बच्ची ने विकास के नाम पर कुछ नहीं देखा है। उसके पिता मजबूरी में नक्सलियों के साथ रहते हैं, क्योंकि अगर नहीं रहेंगे तो नक्सली ही उसके पिता को मार देंगे। उसके पिता ने अगर सरकार का साथ दिया, तो उस लड़की के पूरे परिवार को भी नक्सली मार देंगे।
किसी बड़े फाइव स्टार होटल में बैठ कर खाने-पीने वाले लोग उस वनवासी बच्ची का दर्द शायद न जान पाएं। वह बच्ची जिसके जेहन में कोई सपना ही नहीं आ पाया। उसे अंदाजा ही नहीं, कि नक्सलियों द्वारा उस बच्ची की जिंदगी नर्क बना दी गई है। उसे तो यही बताया गया है कि यही जीवन है। उसने कभी स्कूल नहीं देखा। उसने कभी कोई टेलीविजन नहीं देखा। पक्की सड़कें तक नहीं देखी। उसने तो बस वही देखा है जो रोज उसकी आंखों के सामने घट रहा है।
उस बच्ची को नहीं पता कि वो जिस भारत में जन्मी है, उस देश में हर साल इतना अनाज उगता है कि यूरोप के सारे देश मिलकर भी उतना न उगा पाएं। उसे ये भी नहीं पता कि उसी भारत में हर साल जितना खाना बर्बाद होता है, उतने में पूरा ब्रिटेन खा सकता है। उस बच्ची को नहीं पता कि उसका भारत चांद पर पहुंच गया है।
उस बच्ची को नहीं पता कि उसके भारत में दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी फिल्म इंडस्ट्री है। वो सिर्फ 8 या 9 साल की होगी। उसके सपनों में डॉक्टर – इंजीनियर, ब्यूरोक्रेट या आर्टिस्ट बनना नहीं आ रहा। उसके सपने सिर्फ लाल चींटियों को पकड़ने तक सीमित हैं। उस बच्ची की जिंदगी भूखे पेट रहने और बड़े होकर नक्सलियों की सेक्स स्लेव बनने तक सीमित कर दी गई।
किसी ने उसे कभी ये नहीं बताया कि पेट भर खाना भी एक अधिकार होता है। किसी ने उसे कभी ये नहीं बताया कि वह एक गरिमामयी जीवन डिजर्व करती है। किसी ने कभी उसे ये नहीं बताया कि वह भी बड़े सपने देख सकती है, उसे पूरा कर सकती है। हम लोग, जो इंटेलेक्चुअल डिबेट्स करते हैं, अपने घर में बड़े आराम से रहते हैं, अखबार पढ़ते हैं, टीवी पर डिबेट्स देखते हैं, अपने दोस्तों और परिवार वालों के साथ छुट्टियां मनाने जाते हैं, हम में से बहुतों के लिए वह वनवासी बच्ची एक ‘केस स्टडी’ हो सकती है, एक डिबेट पॉइंट हो सकती है। लेकिन उसके लिए, हम सब सिर्फ अजनबी हैं।
हममें से किसी ने उस बच्ची का हाथ नहीं थामा, हममें से किसी ने उस बच्ची को बताया नहीं कि इस जंगल के बाहर भी एक दुनिया है, जहां विकास हो रहा है, जहां इंसान को इंसान समझा जा रहा है, जहां उसके पिता को नक्सलियों के डर से हथियार उठाने की जरूरत नहीं है। हम जैसे लोग जो कुछ कर नहीं सकते, वो कम से कम इस बात से तो खुश हो ही सकते हैं, कि अब वाकई में कोई आया है, जो उस बच्ची के सपने को उड़ान देना चाहता है।
अब वाकई में कोई सरकार आई है, जो उस वनवासी बच्ची को हाथ पकड़ कर क्लासरूम तक पहुंचाना चाहती है। अब वाकई में कोई ऐसा राजनीतिक नेतृत्व आया है, जो उस बच्ची के पिता को नक्सलियों के चंगुल से मुक्त कराना चाहता है। जो उस बच्ची को पूरे भारत से जोड़ना चाहता है।
इसलिए एक राष्ट्र के रूप से यह हम सबके लिए प्रसन्नता की बात है, कि नक्सलवाद खत्म हो रहा है। हम यह देखकर तो खुश हो ही सकते हैं, कि जिन नक्सलियों ने भारत के टुकड़े कर देने का सपना देखा था, आज उन नक्सलियों के टुकड़े जंगलों में बिखरे पड़े हैं। जिन्होंने इस देश के वनवासियों को तबाह कर दिया, आज हमारी सिक्योरिटी फोर्सेस उनको खत्म कर रही हैं।
नक्सलवाद ने जीवन भर संविधान, लोकतंत्र और राष्ट्रप्रेम का विरोध किया। और अब उस नक्सलवाद को वही संविधान अग्नि दे रहा है, वही लोकतंत्र उस नक्सलवाद की चिता सजा रहा है, और उन्हीं राष्ट्रप्रेम के मंत्रों से ही नक्सलवाद का दाह संस्कार हो रहा है। उत्सव मनाइये, लाल सलाम को भारत अपना आखिरी सलाम दे रहा है।




