औरंगज़ेबी अचकन, रेशमी पायजामा, घुंघराले बालों पर चॉकलेट-फ्लेवर टोपी, और ज़ेहन में जमा हुआ सदियों का जिहादी गुबार। और इस ग़ुबार में बैरिस्टर बड़े ओवैसी साहब ने इस मुल्क में बुर्का ढकी औरत के अधिकारों की बहस छेड़ी है।
पूरा उम्मा उस रोज़ इत्र में भीगा हुआ था, जब सदर-ए-रियासत, जिल्ल-ए-इलाही, और ज़माने के ख़ुदसाख़्ता जाहिल-ए आज़म ने मिम्बर-ए-सोलापुर से यह फ़रमाया- “कि वो रहें या न रहें, इस मुल्क की क़िस्मत में अब एक बुर्क़ानशीं हुक्मरान लिखी जा चुकी है।”
जब ये एलान ज़मीन पर उतरा, तो यूँ लगा जैसे इस्लाम के बुझते चराग़ में किसी ने बदबूदार कैरोसीन उँडेल दिया हो। मगर अफ़सोस, इतिहास इतना मासूम नहीं होता। जिनके वालिदों के वालिद निज़ाम के ग़ुलामों के बिस्तर रज़ाकारी ख़िदमत से नरम किया करते थे, वही आज ख़ुद को रियासत-ए-मदीना के मख़मली तख़्त का वारिस समझ बैठे हैं।
हज़रत जो भी कहते हैं, फ़तवे के लहजे में कहते हैं। मगर इस बार ऐसा कह गए कि ख़ुद दीन ने शर्म से निगाहें झुका लीं। कहा गया कि इस मुल्क की प्रधानमंत्री काले बुर्क़े में होगी।
अरे हुज़ूर, अगर किताब को सिर्फ़ नारे की तरह नहीं, आइना समझकर पढ़ा जाए, तो साफ़ दिखता है कि ये बयान नहीं, किताब से बग़ावत है। सहीह बुख़ारी की स्याही आज भी गवाह है। जब फ़ारस ने एक औरत को तख़्त सौंपा, तो रसूल ने फ़रमाया कि जिस क़ौम ने अपनी बागडोर औरत के हाथ दी, वो कभी फ़लाह नहीं पाएगी। और आप फ़रमा रहे हैं कि बुर्क़ानशीं हुक्मरान आएगी?
ये तो दीन की खुली बेअदबी है जनाब। हैरत बस इस बात की है कि बड़े-बड़े आलिम आजकल मुँह में दही जमाए बैठे हैं। पूरे उम्मा को मानो सांप सूंघ गया हो। मैं एक सच्ची सेक्युलर होने के नाते मज़हब की इस तौहीन पर ख़ामोश नहीं रह सकती।
छोटे पायजामों वालों को खुला न्योता देती हूँ, किस इस ऐलान की कड़ी निंदा करो, लंगर की फ़िक्र मत करो, रूहअफ़ज़ा वाले बिरादर लोग सड़क पर प्याऊ और बिरियानी का इंतज़ाम कर देंगे।
अब ज़रा तसव्वुर कीजिए, मान लीजिए वो बुर्क़ानशीं खातून वाक़ई प्रधानमंत्री बन जाए, और 7 लोक कल्याण मार्ग का नाम रख दे 786 तैमूर पंचर मार्ग। दीनी बुर्क़े में क़ैद प्रधानमंत्री। अब अफ़सर कन्फ़्यूज़ हैं, दस्तख़त सलमा के हैं या सलमान के?
और क्या मंज़र होगा जब लालक़िले की फ़िज़ा में हवा रुखसार से ख़ातून के नक़ाब हटा दे और पता चले कि बुर्क़े के अंदर बिना मूंछ और लंबी पूंछ वाला ओवैसी छुपा बैठा है और रजनीगंधा चबा रहा है। इसी डर से बल्लीमारान का शायर कहकर गया था। कि ख़ुदा के वास्ते पर्दा न काबे से उठा ज़ालिम, कहीं ऐसा न हो, यहाँ भी वही काफ़िर सनम निकले…
अब मान लीजिए, थकी-हारी बुर्क़ानशीं प्रधानमंत्री दफ़्तर की फ़ाइलों, फ़ैसलों और फ़र्ज़ों से चूर होकर अपने महल में आराम चाहती है। मगर उसी वक़्त शौहर साहब के ज़ेहन में अल-बक़रा की आयत 223 बिजली बनकर कौंध जाती है। वही आयत, जिसमें औरत को इंसान नहीं, इख़्तियार नहीं, बल्कि खेती कहा गया है।
वही खेत, जिस पर मालिक का हक़ होता है, जिसे जोतने का वक़्त भी मालिक तय करता है, दिशा भी वही डिसाइड करता है, और इन्कार की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ी जाती। ये आयत कहती है “तुम्हारी औरतें तुम्हारी खेती हैं, तो जब चाहो, जिस तरह चाहो, उस खेती में दाख़िल हो जाओ।”
अब सोचिए कि जब हुकूमत का तख़्त और खेती का खेत एक ही वक़्त पर एक ही औरत के जिस्म से टकरा जाए, तो जीत किसकी होगी? प्रधानमंत्री की या किसान की? और अगर बुर्क़ानशीं हुक्मरान इस खेती से इंकार कर दे? तो क्या वो किसानों के हक़ मारने वाली किसान विरोधी प्रधानमंत्री नहीं ठहराई जाएगी? और जब औरत का इंकार फिर भी जारी रहे, तो शौहर साहब सिर्फ़ आयत पर नहीं रुकते।
अब हदीस का दरवाज़ा खुलता है। इब्ने माजा की हदीस नम्बर 1853 याद दिलाई जाती है– जहाँ साफ़ लिखा है कि कोई औरत अपने रब का हक़, उस वक़्त तक अदा नहीं कर सकती, जब तक वो अपने शौहर का हक़ पूरी तरह अदा न कर दे। (Reference: Sunan Ibn Majah 1853)
हदीस आगे कहती है कि अगर शौहर अपनी ज़रूरत के लिए औरत को बुलाए, तो उसे इंकार का हक़ नहीं। भले ही वो ऊँट की जीन पर ही क्यों न बैठी हो। अब बताइए। जब ऊँट की जीन से उतरना भी दीन में मना है, तो क्या तख़्त-ए-हुकूमत कोई बड़ी चीज़ है? (Reference: Jami` at-Tirmidhi 1160)
दीन तो विरासत में औरत को हिस्सा देने का ढोल पीटता है, मगर वही दीन उसकी देह, उसकी मेहनत और उसकी ख़ामोशी को बिना रजिस्ट्री के मर्द की मिल्कियत घोषित कर देता है। इसलिए ओवैसी साहब बुर्क़ा ढकी वज़ीर-ए-आज़म नहीं चाहते। उन्हें मालूम है, तख़्त पर औरत बैठेगी, मगर हुक्म तो उसका शौहर ही चलाएगा।
यहाँ फ़र्ज़, फ़र्ज़ से टकराता नहीं, यहाँ फ़र्ज़ फ़र्ज़ को रौंद देता है। प्रधानमंत्री होना कोई एतराज नहीं, कोई बहाना नहीं। दीन के सामने, हुकूमत भी एक मामूली सवारी भर है।
प्रधानमंत्री फिर भी मना करे। तो सूर-ए-निसा का हुक्म ज़मीन पर उतरता है, तीन नई बेगमें – प्रधानमंत्री आवास में दाख़िल होती हैं। और अगर आपत्ति की तो तीन तलाक़ रेडी रहता है, और बेदख़ली तुरंत। कुछ दिन बाद जब जहन्नुम का डर हावी हो जाए और वही औरत वापसी की गुहार लगाए। तो हलाला का रास्ता बतलाया जाता है।
सोचिए। जब देश की प्रधानमंत्री पॉलिसी नहीं, हलाला के नियम पढ़ रही हो। और इस बीच इमाम साहब का दिल वहीं अटक जाए। क्या मुमकिन नहीं कि मौलाना बीवी लौटाने से इंकार कर दें?
फिर देश दुनिया के अख़बार चीख़ेंगे-
“देश की पहली बुर्क़ाधारी प्रधानमंत्री का हलाला”
“मौलाना ने प्रधानमंत्री पर क़ब्ज़ा किया”
“प्रधानमंत्री आवास बना बकरी पेलन… माफ कीजिएगा बकरी पालन केंद्र”
दुनिया भी देखेगी कि प्रधानमंत्री मस्जिद में हलाला करवाने जा सकती है, मगर नमाज़ पढ़ने नहीं।
और तब कुछ लोग समझेंगे। कि दीन दुनिया के सामने एक्सपोज़ हो गया। वो एक्सपोज मास्टर भी कहेगा कि “लगती है धूप तो पीता हूँ ग्लोकोज, इधर क्या देखता है कटुए, करता हूँ तुझे एक्सपोज”
ओवैसी साहब, जो ख़्वाब आप आँखों में सँजोए फिरते हैं, इस मुल्क को भी मालूम है और तारीख़ को भी कि उसे ही तो आप ग़ज़वा-ए-हिंद कहते हैं। मगर सवाल वही है, जो सदियों से हर तख़्त के नीचे पड़ा सिसकता रहा है। जो मज़हब औरत को खेती और खिलौने से ऊपर देखने से घबराता है, क्या वो कभी एक बुर्क़ानशीं औरत को ख़लीफ़ा मान पाएगा?
और ज़रा कान खोलकर सुनिए – अपने बनाए क़ायदे बुर्क़ा ढकी औरतों पर मत थोपिए। आप आज जिस बात को ज़ुबान से कह रहे हैं, उसे ISIS वाले ख़ून से लिख चुके हैं। बुर्क़ा ढकी औरतें पहली बार सियासत में नहीं उतरीं, ISIS ब्राइड्स याद हैं न? जिन्हें मिडिल ईस्ट की आग बुझाने तक के लिए इस्तेमाल किया गया? तो फिर ये कैसा झूठ है कि दीन वाले औरतों को आगे नहीं रखते?
सच ये है कि उन्हें बराबर नहीं रखते।
हमें किसी बुर्क़ा ढकी प्रधानमंत्री से डर नहीं लगता। डर बस इतना है कि कल को अगर कैबिनेट में कोई सवाल उठा, तो उस औरत की आवाज़ को “तौहीन” कहकर ख़ामोश न कर दिया जाए। क्योंकि जिस दीन में औरत बराबरी नहीं, फ़रमाबरदारी मानी जाती हो। वहाँ तख़्त पर बैठी औरत भी हुकूमत नहीं, एक पर्दानशीं तजुर्बा ही रह जाती है।



