Partition के वक्त Pakistan जाने वालों का क्या हुआ?

Summary
पाकिस्तान को सेक्युलर और प्रोग्रेसिव मुल्क समझने वालों का क्या हश्र हुआ? बंटवारे के बाद की वो कहानियाँ, जिन्हें इतिहास अक्सर छिपा देता है।

जब भारत और पाकिस्तान का बँटवारा हो रहा था, तब भी कई सेक्युलरों को ठीक वैसे ही डर लग रहा था, जैसे आज कुछ लोगों को भारत में हिंदुओं से डर लगता है। उन्हें लगता था कि विभाजन के बाद अगर वे पाकिस्तान चले जाएंगे, तो वहाँ उनकी तथाकथित सेक्युलर और प्रोग्रेसिव भावनाओं का सम्मान किया जाएगा।

लेकिन 14 अगस्त 1947 से लेकर आज की तारीख तक पाकिस्तान की ज़मीन पर किसी भी सेक्युलर और प्रोग्रेसिव इंसान या विचार को ज़िंदा नहीं रहने दिया गया। जिस हिंदू ने पाकिस्तान को चुना, उसे उसके घर के सामने काफिर कहकर मार दिया गया। और जिस मुसलमान ने प्रोग्रेसिव होने की कोशिश की, उसे या तो मुल्क छोड़ने पर मजबूर कर दिया गया, या फिर अवसाद में धकेल कर मरने के लिए छोड़ दिया गया।

मुल्क छोड़ने के बाद ये सारे मोमिन हज़रात हिंदुस्तान में आए, और उनकी ही पुश्तें आज तक इक़बाल की नज़्म के वो शेर अपनी इस्लामिक करतूतों के साथ गा रही हैं—
“ऐ आब-ए-रू-ए-गंगा, अब तक है याद हमको,
उतरा तेरे किनारे, जब क़ाफ़िला हमारा।”

पाकिस्तान के पहले क़ानून मंत्री से लेकर पाकिस्तान का पहला क़ौमी तराना लिखने वाले तक की कहानी हम आपको बताएँगे—कि कैसे उन्हें ज़लालत झेलनी पड़ी, कैसे मॉब लिंचिंग की गई, और कैसे उन्हें कथित अच्छे पाकिस्तान से भागकर, बताए गए बुरे हिंदुस्तान में आकर, जान बचानी पड़ी।

इनमें सबसे पहला नाम अर्थशास्त्री प्रोफेसर बृज नारायण का है। इन्होंने खुलकर जिन्ना की ‘टू नेशन थ्योरी’ का समर्थन किया। पाकिस्तान को भारत से बेहतर आर्थिक मॉडल और अधिक बेहतर भविष्य की संभावनाओं वाला देश करार दिया। और इसका नतीजा यह हुआ कि अपनी आज़ादी के ही दिन, 14 अगस्त 1947 को, इस्लामी भीड़ ने काफिर कहकर लाहौर में बृज नारायण के घर के सामने ही उन्हें मार डाला।

उनके ही एक और दोस्त थे जोगेंद्र नाथ मंडल। इनका नाम तो आपने सुना ही होगा। जिन्ना के साथ मिलकर इन्होंने भी एक थ्योरी दी। कहा कि भारत में दलित और मुसलमान दोनों ही अल्पसंख्यक हैं, और पाकिस्तान बनेगा तो मुसलमान बहुसंख्यक होने के बावजूद भी दलितों के अधिकारों की रक्षा करेंगे। आजकल असदुद्दीन ओवैसी जो ‘जय भीम’ और ‘जय मीम’ की बात करते हैं न, यह कुछ वैसा ही था।

मोहम्मद अली जिन्ना ने जोगेंद्र नाथ मंडल को पाकिस्तान का पहला क़ानून मंत्री बनाया। जिन्ना की मौत के साथ इनका मंत्रालय भी गया और क़ानून भी। 1950 में मंडल ने जब वहाँ की इस्लामी सत्ता द्वारा हिंदुओं को दी जा रही यातनाओं को देखा, तो डरकर ऐसे भागे कि सीधे भारत आ लौटे।

इस्लाम के नाम पर बन रहे मुल्क के तराने में उस समय की प्रोग्रेसिव आवाज़ों ने जमकर अपना क़ौमी कोरस दिया था। शायर साहिर लुधियानवी, मौसिकी के उस्ताद बड़े गुलाम अली ख़ान और उर्दू अदब के बेअदब सरताज सआदत हसन मंटो—ये सब पहले तो क़ायद-ए-आज़म के पाकिस्तान में ही रुक गए। लेकिन वहाँ रहते हुए उन्हें समझ आया कि उन्होंने किस स्वर्ग को छोड़कर कौन-सा नर्क चुन लिया है।

बड़े गुलाम अली ख़ान ने तो सीधे कहा कि वहाँ सिर्फ मुसलमान रह सकते हैं, और भारत आ गए।

साहिर लुधियानवी को ‘सवेरा’ नामक उर्दू पत्रिका में कम्युनिस्ट विचारधारा को बढ़ावा देने वाले और सरकार के ख़िलाफ़ अवाम को उकसाते उत्तेजक लेख लिखने के कारण गिरफ़्तारी और फिर मौत का डर सताने लगा। लाहौर की रौशन-ए-दीन सड़कों पर सरे बाज़ार घूमते हुए उन्हें लगता था कि कोई आएगा और उनका सिर तन से जुदा कर देगा। उन्हें अचानक हिंदोस्तान ही सारे जहाँ से अच्छा लगने लगा। उन्हें रातों-रात भेस बदलकर, अपनी पहचान पर बुर्क़ा डालकर भारत आना पड़ा। और भारत आकर उन्हें प्रकाश पंडित नामक एक हिंदू के ही संरक्षण में पूरा जीवन गुज़ारना पड़ा।

सआदत हसन मंटो भारत से पाकिस्तान गए। उनकी ‘ठंडा गोश्त’ जैसी रचनाओं के लिए उन पर मुकदमे हुए। उन्हें इस्लामी शासन व्यवस्था द्वारा प्रताड़ना झेलनी पड़ी। उनके आय के स्रोत खत्म कर दिए गए और वे अवसाद में चले गए। मज़हब की आग ने ‘ठंडा गोश्त’ को सिर्फ भूना ही नहीं, बल्कि लेखक की जिजीविषा तक को जला दिया। पाकिस्तान बनने के कुछ वर्षों के भीतर ही शराब पी-पीकर लीवर सड़ने से वे अल्लाह को प्यारे हो गए।

सज्जाद ज़हीर कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया के संस्थापक सदस्य थे। उन्होंने भी मज़हब के नाम पर बने पाकिस्तान को चुना। वहाँ जाकर कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ पाकिस्तान बनाई। लेकिन उन्हें रावलपिंडी षड्यंत्र मामले में गिरफ़्तार किया गया, जेल में यातनाएँ दी गईं, और 1955 में जेल से छूटते ही वे ऐसे भागे कि सीधे भारत आ गए।

इनके अलावा जावेद अख़्तर के ससुर कैफ़ी आज़मी, क़ुर्रतुल ऐन हैदर जैसे दर्जनों नाम थे, जिन्हें बँटवारे के वक्त पाकिस्तान अच्छा लगता था। और पाकिस्तान बनते ही उन्हें वहाँ से भागने के लिए मजबूर किया गया। ऐसे भी कई नाम हैं जो पार्टीशन के वक़्त मुस्लिम लीग में थे, जिन्होंने भर-भरकर मुस्लिम लीग को वोट दिलवाए। लेकिन बँटवारे के बाद भारत में ही रुक गए—अधूरे मक़सद को पूरा करने के लिए। और अपने महान सामाजिक कार्य को बौद्धिक जामा पहनाने के लिए रातों-रात कम्युनिस्ट विचारधारा के कार्ड-होल्डर सदस्य भी बन गए।

आज भी इस सरज़मीन-ए-हिंद में ऐसे किरदार मौजूद हैं, जिनकी नज़रें सरहद पार के उस मुल्क में कोई मसीहा तलाशती हैं। किसी के दिल में औलाद के मुस्तक़बिल की फ़िक्र जलती है, तो किसी को लगता है कि हिंदुवादी हुकूमत के साए में भारत, हिंदुओं का पाकिस्तान या तालिबान बन चुका है।

मगर ऐ अहल-ए-सुकूनत-ए-सेक्युलर! ज़रा उन पुराने दौर के नामचीन सेक्युलर हुलियों को पढ़ लो, उनके चेहरे अपनी आँखों में बसा लो, और ता-क़यामत याद रखो कि पाकिस्तान में उनका क्या अंजाम हुआ।

यह याद रखो कि पाकिस्तान नाम की सोच कोई फ़िक्र नहीं, कोई रूहानी तसव्वुर नहीं। वह तो बस एक आसमानी किताब के पन्नों की आड़ में बहकाकर, बरगलाकर जमा की गई मज़हबी जुनूनियत का वहशी हुजूम है। और याद रखो कि जिसने भी उस हुजूम से इश्क़ किया, अंजाम में वही हुजूम उसे नोच-नोचकर खा जाएगी।

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