1000 years of Somnath Temple being rebuilt after desecration by Mughal invader - Mahmood Ghaznavi

सोमनाथ: महमूद गजनवी सिर्फ मंदिर तोड़ने नहीं आया था, प्राचीन भारतीय समुद्री अर्थव्यवस्था और Marine Power का केंद्र था गुजरात

Summary
सोमनाथ का टूटना भारत की समुद्री हार नहीं था, लेकिन उसी क्षण से समुद्र भारत की कहानी से बाहर होना शुरू हो गया। आज जो लौट रहा है, वह समुद्र नहीं है। वह भारत की वही भूली हुई सभ्यतागत आदत है। यही हमारी मैरीटाइम Muscle Memory है, और शायद इसी स्मृति का पर्व हम आज सोमनाथ में मना रहे हैं।

आपने ये लाइन ज़रूर सुनी होगी, “Those who control the rimland, control the heartland” यानी, जो समुद्र को संभालता है, वही ज़मीन को बचाता है। आजकल की जियो पॉलिटिक्स इसे 20वीं सदी का सिद्धांत मानती है। लेकिन भारत के लिए यह कोई नया विचार नहीं था। भारत यह जानता था कि जो समुद्र को समझता है, वही ज़मीन को सुरक्षित रख सकता है और इसी ज्ञान का सबसे बड़ा प्रतीक था
एक मंदिर, जो सिर्फ़ पूजा का स्थल नहीं था, बल्कि हिंद महासागर से जुड़ी एक पूरी सभ्यता का प्रवेश-द्वार था। उस मंदिर का नाम था “सोमनाथ”।

सोमनाथ को समझने की सबसे बड़ी भूल यह है कि उसे हिस्ट्री की एक पृथक घटना मान लिया जाए। जैसे ग़ज़नी आया, मंदिर टूटा और कहानी ख़त्म हो गई। जबकि सच यह है कि सोमनाथ एक लंबी और सुनियोजित श्रृंखला का पहला बड़ा प्रहार था। उस भारतीय समुद्री सभ्यता पर, जो सदियों से हिंद महासागर को अपने नियमों पर चला रही थी। अगर हम सोमनाथ को कच्छ, भरूच, सूरत, कोंकण और अंत में गोवा से जोड़कर नहीं देखते, तो इतिहास का असली पैटर्न कभी सामने ही नहीं आएगा।

साम्राज्य के बिना समुद्री शक्ति – Maritime Power without Empire

11वीं सदी से पहले भारत को केवल ज़मीन तक सीमित मानना, उसके इतिहास को अधूरा पढ़ने जैसा है। भारत उस दौर में एक  मैरी-टाइम पावर विदाउट एम्पायर था (Maritime power without empire) । एक ऐसी समुद्री शक्ति, जो उपनिवेश नहीं बनाती थी, लेकिन महासागरों में मौजूद थी। अरब सागर और हिंद महासागर में भारतीय व्यापारी, नाविक और तीर्थयात्री बिना किसी डर के आवाजाही करते थे।

पहली सदी का यूनानी ग्रंथ “पेरिप्लस ऑफ़ द एरिथ्रीअन सी” (Periplus of the Erythraean Sea) यानी, एरिथ्रियन सागर का समुद्री वृत्तांत साफ़ बताता है कि भारत का व्यापारिक नेटवर्क ओमान, यमन, बसरा और पूर्वी अफ्रीका तक फैला हुआ था।

और ये सारी बातें सिर्फ़ किताबों तक सीमित नहीं हैं। भारत की समुद्री समझ कोई खोई हुई कहानी नहीं बल्कि एक जीवित परंपरा है बल्कि इसीका एक एक्ज़ाम्पल आज हमारे सामने है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आर्थिक सलाहकार Sanjeev Sanyal इन दिनों INSV कौंडिन्य नाम के एक खास जहाज़ की यात्रा पर हैं।  संज़ीव सान्याल खुद इस जहाज़ पर सवार होकर रोज़ाना इस यात्रा के अपडेट भी शेयर कर रहे हैं।

ये जहाज़ ख़ास इसलिए, क्योंकि यह कोई आम नौसेना का जहाज़ नहीं है। यह जहाज़ बिल्कुल उसी तरह बनाया गया है, जैसे हज़ार साल पहले भारतीय व्यापारी जहाज़ बनाए जाते थे। इसमें एक भी लोहे की कील नहीं है। पूरा जहाज़ नारियल की रस्सियों से सिला हुआ है। यानी वही तकनीक, जिससे भारत मजबूती से कभी समुद्रों में मौजूद था। इस INSV कौंडिन्य जहाज़ की यात्रा गुजरात से शुरू हुई है और ओमान तक, लगभग 1400 किलोमीटर का समुद्री सफ़र तय कर रही है। Indian Navy का यह विशेष अभियान दुनिया को यह दिखाने के लिए है कि भारत की Maritime Heritage कोई हवा हवाई बातें नहीं, बल्कि ये एक प्रमाणित, प्रैक्टिकल और वैश्विक प्रणाली रही है।

यह ऐसा सिस्टम नहीं था जो एक जगह से कंट्रोल होता हो; यह कई हाथों में बँटा हुआ, लेकिन फिर भी मज़बूती से चलने वाला डी-सेंट्रलाइज्ड नेटवर्क था। इसका केंद्र राज्य नहीं, मंदिर थे। मध्यकालीन भारत में, विशेषकर 10वीं से 12वीं सदी के चोल और सोलंकी काल में, मंदिर केवल पूजा के स्थल नहीं थे। वे उस समय की अर्थव्यवस्था के सेंट्रल बैंक थे, वेंचर कैपिटलिस्ट थे और इंस्योरेंस मैकेनिज्म भी थे।

राजा और व्यापारी अपनी आय का बड़ा हिस्सा मंदिरों को दान करते थे, लेकिन यह पैसा तिजोरियों में बंद नहीं रहता था। मंदिर इस पूंजी को व्यापारी श्रेणियों यानी मर्चेंट यूनियन और गिल्ड्स को ब्याज पर उधार देते थे, ताकि वे सुमात्रा, जावा, ज़ांज़ीबार और पूर्वी अफ्रीका तक की लंबी और जोखिमभरी समुद्री यात्राएँ कर सकें।

समुद्र पार व्यापार बहुत रिस्की होता था। जहाज़ डूब सकते थे, माल लुट सकता था, मौसम बदल सकता था। एक अकेला व्यापारी यह झटका सह नहीं सकता था, लेकिन मंदिर का बड़ा खजाना इस जोखिम को सहन कर सकता था। जब व्यापारी सफल होकर लौटते थे, तो वे लाभ का एक हिस्सा मंदिर को अर्पित करते थे। यह केवल भक्ति नहीं थी। यह भरोसे का बेंचमार्क था, जिसे आप एक तरह का क्रेडिट स्कोर कह सकते हैं। जिसने जितना बड़ा दान दिया, उसे अगली यात्रा के लिए उतना ही बड़ा ऋण, उतनी ही सामाजिक प्रतिष्ठा और नेटवर्क में उतनी ही मज़बूत जगह मिलती थी।

इसी कारण हिंदू समुद्री व्यापार व्यक्तिगत नहीं था, बल्कि संस्थागत था। दक्षिण और पश्चिम भारत में मणिग्रामम (Manigramam)और ऐन्नुरुवर Ayyavole 500 (Ainurruvar) जैसी (Merchant guilds) व्यापारी श्रेणियाँ थीं, जिन्हें “पाँच सौ स्वामी” भी कहा जाता था

(Merchant Guild, History of India | 750-1206)

ये केवल व्यापारी संघ नहीं थे। इनके पास अपनी निजी सेनाएँ और नौसेनाएँ होती थीं, जो समुद्री डाकुओं से जहाज़ों की रक्षा करती थीं। शिलालेखों में लिखा है कि ये Merchant guilds विदेशी द्वीपों और दूर देशों में व्यापार करती थीं। वे राजाओं से संधियाँ कर सकती थीं, अपने सिक्के जारी कर सकती थीं और कई मामलों में राज्य के भीतर एक राज्य की तरह काम करती थीं।

और पश्चिमी भारत में इस पूरी व्यवस्था का सबसे बड़ा केंद्र था सोमनाथ। प्रभास पाटन का बंदरगाह हड़प्पा काल से सक्रिय था। रोमन साम्राज्य से लेकर पश्चिम एशिया और अफ्रीका तक का व्यापार यहीं से ऑपरेट होता था। द्वारका से लेकर सोमनाथ और खंभात तक फैला तटीय मार्ग केवल व्यापार का नहीं, बल्कि तीर्थ, संस्कृति और सामाजिक जुड़ाव का मार्ग था। समुद्र से जहाज़ आते थे, उन पर सामान भी होता था और यात्री भी, और मंदिरों के आसपास बसते शहर मिलकर एक ही सभ्यता की तरह सांस लेते थे। इस तरह से सोमनाथ केवल भगवान शिव का निवास नहीं था। वह समुद्री भारत का फाइनेंशियल, सांस्कृतिक और कानूनी केंद्र था।

10वीं से 13वीं शताब्दी के बीच पश्चिमी तट पर जहाजी मार्ग द्वारका (कच्छ की खाड़ी) से सोमनाथ (सौराष्ट्र तट) होते हुए खंभात की खाड़ी तक जाता था। इन तटीय केंद्रों, विशेषकर सोमनाथ और द्वारका, की ख्याति अपने विशाल और भव्‍य मंदिरों के लिए दूर-दूर तक थी। समुद्री मार्गों के जरिये तीर्थयात्री और व्यापारी इन मंदिर-नगरों में आते, जिससे “मंदिर नेटवर्क” के रूप में एक सांस्कृतिक-व्यापारिक तंत्र विकसित हुआ। इतिहासकार हिमांशु प्रभा रे लिखती हैं कि उस दौर में तटीय तीर्थों की परस्पर जुड़ी यात्रा-परंपरा थी और राजाओं द्वारा मंदिरों एवं ब्राह्मण भूस्वामियों को अनुदान देने से सामुदायिक जुड़ाव बढ़ा। इन मंदिर नगरों का विस्तार साम्राज्यों से परे एक स्वतंत्र नेटवर्क की तरह हुआ करता था। कई शासकों के ताम्रपत्रों में Merchant guilds (व्यापारी संघों) की भी चर्चा मिलती है, जो मंदिरों के प्रबंधन तथा नगर प्रशासन में शामिल थे। उदाहरणस्वरूप, छठी-सातवीं शताब्दी के एक संस्कृत अभिलेख से ज्ञात होता है कि गुजरात में लोहराटा (वर्तमान रोहार, कच्छ) के राजा विष्णुसेन ने व्यापारी समुदाय द्वारा चलाए जा रहे प्रथागत व्यापारिक कानूनों की पुष्टि की थी, जिसमें समुद्री जहाज़ों पर लगने वाले कर तथा छूट का विस्तृत वर्णन है। यह दर्शाता है कि प्राचीन भारत में व्यापार व तीर्थयात्रा आपस में जुड़े हुए थे, और तटीय मंदिर इन गतिविधियों के केंद्र थे।

इस्लाम की एंट्री और उम्मा का इकॉनमी आतंक

लेकिन इतिहास स्थिर नहीं रहता। सातवीं सदी के बाद हिंद महासागर में एक नया खिलाड़ी आया। अरब और फ़ारसी व्यापारी। उन्होंने “अंजुवन्नम” (Anjuvannam) नाम की अपनी अलग merchant guilds बनाई, जिसमें यहूदी, ईसाई, पारसी और मुस्लिम व्यापारी शामिल थे। हिंदू नेटवर्क जहाँ मंदिर और गिल्ड्स पर आधारित था, वहीं इस्लामिक नेटवर्क मस्जिद, बाज़ार और उम्माह की मज़हबी यूनिटी पर। बग़दाद से गुजरात और इंडोनेशिया तक एक मुस्लिम व्यापारी को एक भरोसेमंद नेटवर्क मिलता था, जिससे क्रेडिट लेटर (सुफ़्तजा) और व्यापार आसान हो गया। धीरे-धीरे दसवीं और ग्यारहवीं सदी के बीच इस्लामिक नेटवर्क ने गहरे समुद्र के व्यापार में हिंदू गिल्ड्स को पीछे धकेलना शुरू कर दिया। हिंदू व्यापारी आंतरिक व्यापार (Hinterland) तक सीमित होने लगे, जबकि ‘ब्लू वाटर’ (गहरे समुद्र) का व्यापार अरब और फारसी व्यापारियों के हाथों में चला गया।

इसी रणनीतिक टकराव के बीच महमूद गजनवी का सोमनाथ अभियान होता है। यह कोई भावनात्मक या आकस्मिक हमला नहीं था। यह एक cold और calculated रणनीति थी। गजनवी ने सोमनाथ से लगभग 20 मिलियन दीनार की संपत्ति लूटी, जो सदियों के समुद्री व्यापार का जमा surplus था। इस कैपिटल/पूंजी के नष्ट होने से गुजरात के व्यापारियों की इन्वेस्टमेंट (निवेश) क्षमता टूट गई। इसके साथ ही अरबी घोड़ों का व्यापार बाधित हुआ, जो उस समय युद्ध का सबसे महत्वपूर्ण संसाधन था। सोमनाथ और वेरावल इसके मुख्य द्वार थे।

यहाँ एक बात बहुत साफ़ दिखती है। सोमनाथ टूटने के बाद वहाँ मस्जिद नहीं बनी। अगर मक़सद सिर्फ़ धर्म बदलवाना होता, तो यही सबसे पहला काम किया जाता। लेकिन ऐसा नहीं हुआ, क्योंकि असली निशाना मंदिर नहीं, उसकी भूमिका थी। ऐसा नहीं हुआ क्योंकि यह हमला केवल Conversion के लिए नहीं था। यह Corrosion के लिए भी था – उस कानूनी और आर्थिक यूनिट को समाप्त करने के लिए, जिसके नाम पर बंदरगाह और व्यापार चलता था। मध्यकालीन भारत में देवता (विग्रह) को कानूनी रूप से संपत्ति का स्वामी माना जाता था। गजनवी द्वारा शिवलिंग को खंडित करना उस लीगल एंटिटी को समाप्त करने जैसा था। यह केवल धार्मिक अपमान नहीं था, यह एक ‘Hostile Corporate Takeover’ था।

ख़िलाफ़त और इस्लामी सल्तनतों के लिए व्यापार पैसा कमाने की चीज़ नहीं, सत्ता बढ़ाने की रणनीति था। जब उन्होंने देखा कि हिंद महासागर का बड़ा हिस्सा एक ऐसे नेटवर्क के सहारे चल रहा है, जिसे न तलवार से जीता जा सकता है और न सीधे कंट्रोल किया जा सकता है, तो उन्होंने रास्ता बदल लिया और सीधी लड़ाई की जगह उस नेटवर्क की रीढ़ तोड़ने पर ध्यान दिया।

इसी रणनीति का पहला बड़ा, प्रतीकात्मक वार था, Mahmud of Ghazni का सोमनाथ अभियान।

सोमनाथ के साथ एक और चीज़ टूटी, जिसे अक्सर नज़रअंदाज़ किया जाता है। वो था भारतीय समुद्री आत्मविश्वास। यानी भारत को धार्मिक क्षति के साथ साथ स्ट्रेटेजिक नुकसान पहुंचाना भी इसका मकसद था। और ये भारतीय समुद्री नेटवर्क को भीतर से खोखला करने के लिए किया गया। और सोमनाथ ही उस समय समुद्री भारत का चेहरा था। इसी करण से सोमनाथ पर यह हमला हिंदू टेम्पल ट्रेड नेटवर्क के प्रतीक पर हमले के लिए किया गया। उनका मकसद सभ्यतागत मनोबल तोड़ना था, जिसे आज हम अयोध्या श्री राम मंदिर, काशी, सोमनाथ में कल्चरल इकॉनमी का नाम दे रहे हैं।

इस्लामिक आक्रमणों के बाद, धीरे-धीरे धर्मशास्त्रों में समुद्र पार करने को ‘काला पानी’ कहकर सामाजिक रूप से हतोत्साहित किया जाने लगा। यह एक भू-राजनीतिक हार को सामाजिक नियम में बदलने जैसा था। राधाकुमुद मुकर्जी अपनी किताब में बताते हैं कि कैसे प्राचीन भारत की जीवंत नेविगेशन परंपरा मध्यकाल में शिथिल हो गई। 

यहीं पर एक अहम तुलना सामने आती है। जब पश्चिम में ग़ज़नी सोमनाथ को लूट रहा था, उसी समय पूर्व में राजेंद्र चोल अपनी नौसेना के साथ सुमात्रा पर हमला कर रहे थे। चोलों ने आक्रामक नौसैनिक अभियानों के ज़रिये समुद्र में अपनी शक्ति दिखाई। जबकि गुजरात और सोलंकी राजवंश वाले इलाके ने समंदर को कभी कम नहीं समझा! उन्होंने समंदर को अपनी ताकत बनाया- एक तरफ़ रक्षा के लिए, मतलब दुश्मन आए तो समुद्री रास्तों से मुंहतोड़ जवाब देने की काबिलियत, और दूसरी तरफ़ व्यापार की कमाई के लिए।

ग़ज़नी के हमले ने भारत की पश्चिमी भुजा को काट दिया। लेकिन भारत की पूर्वी भुजा कुछ और सदियों तक सक्रिय रही। यही कारण है कि भारत की समुद्री सभ्यता एक दिन में नहीं गिरी। उसे हिस्सों में तोड़ा गया।

सोमनाथ सिर्फ़ पैसे या व्यापार का केंद्र नहीं था, वह एक दिशा-ज्ञान और समुद्री समझ का केंद्र भी था। आज की भाषा में कहें तो वह एक geospatial centreथा। Geo-spatial यानी ऐसा स्थान, जो दिशा, दूरी और समुद्री रास्तों को समझने का रेफरेंस बनता हो।

सोमनाथ मंदिर परिसर में खड़ा बाण स्तंभ इसका साफ़ सबूत है। यह स्तंभ दिखाता है कि प्राचीन भारतीय नाविकों को दिशा की समझ थी, खगोल का ज्ञान था, और उन्हें यह भी पता था कि पृथ्वी गोल है। स्तंभ पर लिखा है कि इस बिंदु से दक्षिण ध्रुव तक कोई ज़मीनी रुकावट नहीं है। आज के उपग्रहों ने साबित कर दिया है कि यह बात सही है। यानी यह कोई प्रतीकात्मक बात नहीं थी, यह एक प्रैक्टिकल समुद्री जानकारी थी।

‘बाण स्तंभ’ (Baan Stambh) इस बात का अकाट्य प्रमाण है कि प्राचीन भारत के पास न केवल नौसैनिक क्षमता थी, बल्कि एक उन्नत ‘जियोडेटिक’ (Geodetic) और खगोलीय समझ भी थी। जिस प्रकार आधुनिक विश्व ‘ग्रीनविच’ को समय और भूगोल का केंद्र मानता है, यह संभव है कि प्राचीन भारतीय नाविकों के लिए सोमनाथ का यह देशांतर एक ‘रेफरेंस पॉइंट’ रहा हो। अरब सागर में यात्रा करने वाले जहाजों के लिए, जहां कोई भी ज़मीनी निशान (Landmark) नहीं होता, सोमनाथ का यह अक्षांशीय और देशांतरीय स्थान एक ‘लाइटहाउस’ की तरह कार्य करता था। तटीय मंदिर अनेक बार प्रकाशस्तंभ या दिशासूचक केंद्र के रूप में भी कार्य करते थे – जैसे ओड़िशा का कोणार्क सूर्य मंदिर और गुजरात का सोमनाथ, जो नाविकों को तट का संकेत देते थे (कोणार्क के विशाल मंदिर कलश को प्राचीन नाविक दूर से पहचानते थे, ऐसी कथाएँ मिलती हैं)। मंदिरों के वार्षिक उत्सव और मेलों में दूर देशों के व्यापारी आते, जिससे व्यापार नेटवर्क को सांस्कृतिक मेलजोल का भी अवसर मिलता। कुल मिलाकर, हिंदू शासित काल में धर्म और व्यापार एक-दूसरे के पूरक बनकर तटीय विकास को संचालित करते थे।

इसका मतलब साफ़ है। सोमनाथ केवल आस्था का केंद्र नहीं था, वह जहाज़ों की दिशा तय करने, समुद्री रास्तों को समझने और नेविगेशन का भी एक अहम बिंदु था। जो सभ्यता जानती थी कि उसके तट से अंटार्कटिका तक समुद्र खुला है, वह निश्चित रूप से एक ‘सी-फारिंग’ (Seafaring) या समुद्री सभ्यता थी, न कि केवल कृषि-प्रधान समाज। भारत की यही पारंपरिक समुद्री समझ हमेशा से बाहरी ताक़तों की नज़र में रही, चाहे वे मुग़ल शासक हों या बाद में आने वाले ब्रिटिश उपनिवेशवादी।

पुरातत्वविद एस.आर. राव और अन्य विद्वानों के अनुसार, प्रभास पाटन में बस्ती के प्रमाण 2000 ईसा पूर्व (सिंधु घाटी सभ्यता के अंतिम चरण) से मिलते हैं । यह निरंतरता बताती है कि सोमनाथ का उदय रातों-रात नहीं हुआ, बल्कि यह सहस्राब्दियों से भारत के पश्चिमी तट का प्रहरी था। यह स्थान ‘त्रिवेणी संगम’ (कपिला, हिरण्य और सरस्वती नदियों का संगम) होने के कारण आंतरिक व्यापार मार्गों को समुद्री मार्गों से जोड़ता था ।

सोमनाथ के बाद यही कहानी पूरे पश्चिमी तट पर दोहराई गई। भरूच, कोंकण और सौराष्ट्र के पुराने व्यापारिक नगर धीरे-धीरे दबाव में आने लगे। दिल्ली सल्तनत और उसके बाद मुग़ल साम्राज्य मूल रूप से ज़मीन पर टिकी हुई ताक़तें थीं। उनकी शक्ति खेतों, किलों और सेनाओं पर थी, समुद्र पर नहीं। उन्होंने कभी एक मज़बूत और संगठित नौसेना खड़ी करने की गंभीर कोशिश नहीं की।

यहाँ तक कि मुग़लों को अपनी हज यात्राओं की सुरक्षा के लिए भी विदेशी नाविकों और बेड़ों पर निर्भर रहना पड़ा। यानी समुद्र उनके लिए शक्ति स्थापित करने का क्षेत्र नहीं था, बल्कि एक ऐसी जगह थी जिसे दूसरों के भरोसे छोड़ा गया था। और यही दूरी धीरे-धीरे भारत को उसके समुद्र से और दूर ले जाती चली गई।

मुग़ल पीरियड

इसीलिए मैंने कहा कि सोमनाथ की घटना सिर्फ़ एक हमले की कहानी नहीं थी। वह असल में एक लंबी ऐतिहासिक प्रक्रिया का पहला बड़ा प्रहार था। 1299 में, जब अलाउद्दीन ख़िलजी की सेनाएँ दोबारा सोमनाथ पहुँचीं, तो मंदिर फिर तोड़ा गया और गुजरात को दिल्ली सल्तनत में मिला लिया गया। इसके साथ ही केवल एक धार्मिक स्थल नहीं गिरा, बल्कि उस पूरे समुद्री तंत्र पर पहला स्थायी प्रशासनिक नियंत्रण स्थापित हुआ। खंभात और सूरत जैसे बंदरगाह, जो कभी हिंदू व्यापारी गिल्ड्स और मंदिर नेटवर्क के सहारे चलते थे, अब मुस्लिम सत्ता के अधीन आ गए। यह बदलाव अचानक तो नहीं था, लेकिन निर्णायक जरूर था।

14वीं सदी में गुजरात सल्तनत स्वतंत्र हुई, लेकिन स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं था कि समुद्री व्यवस्था पुरानी हो गई। व्यापार अब इस्लामिक नेटवर्क का हिस्सा बन चुका था। बंदरगाह वही थे, समुद्र वही था, लेकिन नियंत्रण की भाषा बदल चुकी थी। हिंदू मंदिर-आधारित नेटवर्क, जो डी-सेंट्रलाइज्ड और समुदाय-आधारित था, धीरे-धीरे हाशिये पर जाने लगा।

15वीं सदी में यह प्रक्रिया और आगे बढ़ी, जब बहमनी सल्तनत और उससे निकली आदिलशाही ने कोंकण और गोवा पर कब्ज़ा कर लिया। गोवा, जो कभी कदंब और फिर विजयनगर साम्राज्य का हिस्सा था, अब मुस्लिम शासन के अधीन चला गया। पश्चिमी तट पर हिंदू समुद्री प्रभुत्व की आख़िरी बड़ी कड़ी भी यहीं टूट गई। यही कारण है कि यूरोपीय यात्री टॉम पायर्स ने गोवा को उस समय ‘मुस्लिम गोवा’ कहा है।

जहाँ-जहाँ इस्लामी व्यापारिक प्रभाव पहुँचा, वहाँ केवल व्यापार नहीं पहुँचा। मस्जिदें बनीं, सराय बनीं, और स्थायी समुदाय बसाए गए। यह केवल इस्लाम का प्रसार नहीं था, ये एक Organised community-based trade system (संगठित समुदाय आधारित व्यापर) का विस्तार था। इन व्यापारियों को ख़लीफ़ाओं और इस्लामी सत्ता केंद्रों का राजनीतिक संरक्षण प्राप्त था, जिससे लंबी समुद्री यात्राएँ सुरक्षित हो सकीं। हिंद महासागर अब सिर्फ़ व्यापार का मार्ग नहीं रहा, वह एक राजनीतिक-धार्मिक नेटवर्क का विस्तार बन गया।

15वीं शताब्दी तक आते-आते हिंद महासागर के अधिकतर प्रमुख बंदरगाह मुस्लिम नियंत्रण या प्रभाव में थे। पूर्वी अफ्रीका के स्वाहिली नगर-राज्य से लेकर इंडोनेशिया के मलक्का तक मुसलमान सुल्तानों ने व्यापारिक साम्राज्य खड़े कर लिए थे। भारत के सन्दर्भ में, गुजरात के खंभात (कैम्बे), सोमनाथ, थाणे, कोचीन, कालीकट, मसूलिपट्टनम इत्यादि में मुस्लिम व्यापारी बड़ी संख्या में बस गए थे। कई जगह इन व्यापारियों ने स्थानीय मुस्लिम सुल्तान के अधीन राजनैतिक शक्ति भी हासिल कर ली – जैसे गुजरात सल्तनत, मालाबार तट पर मापिला मुस्लिम समुदाय, बंगाल में सुल्तान आदि। इस्लामी नेटवर्क के तहत व्यापार पर धार्मिक एकरूपता और वैश्विक इस्लामी भाईचारे का लाभ था, जिससे सूचनाओं और तकनीक का तेज़ प्रसार हुआ। जैसे-जैसे इस्लामी शक्तियाँ राजनीतिक रूप से मज़बूत होती गईं, प्रतिस्पर्धा बढ़ी। मुस्लिम नियंत्रित बंदरगाहों ने हिंदू तीर्थ-बंदरगाहों को व्यापार में पछाड़ना शुरू कर दिया। उदाहरणस्वरूप, जब गुजरात सल्तनत ने खंभात और सूरत को विकसित किया तो सोमनाथ/प्रभास पाटन का महत्व घट गया।

और ठीक इसी समय, एक और निर्णायक बदलाव हो चुका था। भारतीय सभ्यता समुद्र से मानसिक रूप से कट चुकी थी। इसी वजह से जब पंद्रहवीं सदी में पुर्तगाली गोवा पहुँचे, तो उन्हें किसी संगठित भारतीय नौसेना का सामना नहीं करना पड़ा। प्राचीन युग में सोमनाथ जैसे तीर्थ और बंदरगाह भारत की समृद्धि के द्वार थे, जहाँ से भारतीय जहाज़ विदेशों तक जाते और विदेशी माल हिंदुस्तान पहुँचता था। मंदिर-आधारित नेटवर्क ने सांस्कृतिक और आर्थिक जुड़ाव दोनों को साधा, जिसमें आध्यात्मिकता और व्यापार साथ-साथ फले-फूले। लेकिन मध्यकालीन आक्रमणों और शक्तिपरिवर्तन ने इस संतुलन को बिगाड़ दिया।

1498 में जब Vasco da Gama गोवा के रास्ते भारत पहुँचा, तो वह एक ऐसे समुद्र में दाख़िल हुआ, जो कभी भारतीय जहाज़ों से भरा रहता था, लेकिन अब लगभग खाली था। पुर्तगाली केवल व्यापार करने नहीं आए थे। वे समुद्र पर राज करने (Lords of the Sea) आए थे। और 16वीं शताब्दी में उनके प्रवेश ने पुराने हिंदू-नेतृत्व वाले समुद्री नेटवर्क को लगभग समाप्त कर दिया।  

11वीं से 16वीं सदी के बीच घटित घटनाओं की यह श्रृंखला दिखाती है कि पश्चिमी तट पर स्थित हिंदू शक्तियों को एक साथ नहीं, बल्कि किश्तों में समुद्री मार्गों से बेदखल किया गया। पहले प्रतीक टूटा, फिर संस्थान कमजोर हुए, फिर प्रशासन बदला, और अंत में समुद्र ही हाथ से निकल गया। जो काम महमूद ग़ज़नी ने प्रतीकात्मक रूप से शुरू किया था, उसे यूरोप ने संरचनात्मक रूप से पूरा किया। भारत को उसके ही समुद्र से काट दिया गया।

इस पूरी कहानी में दो अलग-अलग नेटवर्कों का टकराव साफ़ दिखाई देता है। एक था हिंदू टेम्पल नेटवर्क, जो विकेंद्रीकृत (De-centralised) था, मंदिरों, नगरों और व्यापारी गिल्ड्स के सहारे चलता था, और नियमों व परंपरा पर आधारित था। दूसरा था इस्लामिक नेटवर्क, जो Centralised था, जिसे राज्य का समर्थन हासिल था, और व्यापार को सत्ता विस्तार का हथियार मानता था। पहला मॉडल समय के साथ जड़ें जमाता था, दूसरा तलवार के साथ आगे बढ़ता था। पहला टिकाऊ था, दूसरा आक्रामक। और यही कारण था कि पहला टूटकर भी स्मृति में बचा रहा, जबकि दूसरा हमला करता रहा।

इसके बाद की सदियों में भारतीय तट के एक-एक Gems विदेशी हाथों में जाते रहे। कभी ख़िलजी, कभी गुजरात सल्तनत, और आख़िर में पुर्तगाली। परिणाम यह हुआ कि भारत सदियों के लिए समुद्री प्रभुत्व से वंचित हो गया। ग़ज़नी से लेकर यूरोप तक एक ही रणनीति दोहराई गई। हिंदू नेटवर्क के प्रतीकों और नोड्स को तोड़ो, और भारत को उसके समुद्र से काट दो।

मॉडर्न इंडिया

1951 में सोमनाथ का पुनर्निर्माण उस समुद्री भारत की स्मृति को वापस लाने का प्रयास था, जिसे सदियों पहले रणनीतिक रूप से मिटा दिया गया था। सरदार वल्लभभाई पटेल इसे सभ्यतागत आत्मविश्वास की वापसी मानते थे, जबकि जवाहरलाल नेहरू तो इसे भारत के सेक्युलर ढांचे के लिए खतरा मानते थे। इस करण वो हमेशा आशंकित ही रहे और यह आशंका दरअसल उस आत्मविश्वास की थी, जो समुद्र के रास्ते फिर लौट सकता था।

अल-बेरूनी ने बहुत पहले लिखा था कि हिंदू अपने राज्य हार सकते हैं, अपने देवता नहीं। आज इसे थोड़ा और आगे बढ़ाकर कहा जा सकता है कि हिंदू सभ्यता को समुद्र से काटा जा सकता है, लेकिन समुद्र की स्मृति उससे छीनी नहीं जा सकती। सोमनाथ से गोवा तक की यह कहानी सिर्फ़ मंदिर बनाम मस्जिद की नहीं है। यह उस क्षण की कहानी है जब एक सभ्यता को समझ में आ गया कि उसे हराने के लिए पहले उसे उसके समुद्र से अलग करना होगा।

Indo-Pacific में भारत की वापसी: एक अधूरी सभ्यता का पुनरागमन

मुग़लों के आक्रमणों और उसके बाद की राजनीतिक प्रक्रियाओं में, सोमनाथ से गोवा तक भारत को धीरे-धीरे उसके समुद्र से काट दिया गया। लेकिन इतिहास कभी भी एक सीधी रेखा में नहीं चलता। सभ्यताएँ गिरती नहीं हैं, वे बस लंबे अंतराल लेती हैं। इसलिए अगर आज हम इंडो-पैसिफ़िक में भारत की मौजूदगी को सही संदर्भ में देखें, तो यह कोई अचानक पैदा हुई रणनीति नहीं लगती। यह उस यात्रा की वापसी जैसी महसूस होती है, जो लगभग हज़ार साल से अधूरी पड़ी थी।

भारतीय नौवहन परंपरा भी अब नए सिरे से जाग रही है – सरकारें ब्लू इकॉनमी और समुद्री शक्ति को पुनः स्थापित करने के प्रयास कर रही हैं। एक सहस्राब्दी पहले जिस समुद्री शक्ति को खंडित किया गया था, भारत उसे फिर से अर्जित करने की राह पर है।

आज जब भारत “Indo-Pacific” शब्द का इस्तेमाल करता है, तो अक्सर इसे या तो अमेरिकी रणनीति का विस्तार मान लिया जाता है, या चीन-विरोधी गठबंधन के चश्मे से देखा जाता है। लेकिन यह नज़रिया अधूरा है। इंडो-पैसिफ़िक दरअसल वही भू-क्षेत्र है, जहाँ कभी भारतीय व्यापार, संस्कृति और नौसैनिक प्रभाव बिना किसी औपनिवेशिक झंडे के फैला हुआ था। यह भारत के लिए कोई नया मंच नहीं है, यह तो वही पुराना समुद्री संसार है, जिसे हमने बीच में भुला दिया था।

चोल साम्राज्य की नौसैनिक यात्राएँ, दक्षिण-पूर्व एशिया में आज भी खड़े भारतीय मंदिर, और संस्कृत-तमिल शिलालेख इस बात के ठोस प्रमाण हैं कि भारत कभी केवल एक Continental State नहीं था। वह एक Maritime Civilization था।

इतिहासकार के.ए. नीलकांत शास्त्री और आर.सी. मजूमदार बताते हैं कि चोल नौसेना ने श्रीलंका, सुमात्रा और मलय प्रायद्वीप तक सैन्य अभियान तो चलाए ही, साथ ही साथ  व्यापारिक और सांस्कृतिक मार्गों को भी सुरक्षित किया। यह कोई औपनिवेशिक कब्ज़ा नहीं था, ये कनेक्टिविटी और सिक्योरिटी का मॉडल था।

यही मॉडल पश्चिमी भारत में मंदिर-आधारित समुद्री नेटवर्क के रूप में दिखता है। समुद्र यहाँ नियंत्रण का माध्यम था, अधिकार थोपने का साधन नहीं। इसीलिए भारत की मौजूदगी समुद्रों में थी, लेकिन भारतीय साम्राज्य समुद्रों पर नहीं थोपे गए। भारत का समुद्री स्वभाव वर्चस्व का नहीं, प्रवाह का था।

लेकिन ग़ज़नी से गोवा तक जिस ऐतिहासिक प्रक्रिया ने भारत को समुद्र से काटा, उसका सबसे गहरा असर यह हुआ कि भारत ने अपनी Maritime Imagination ही खो दी। मुग़ल काल में शक्ति ज़मीन पर केंद्रित रही। समुद्र को या तो अनदेखा किया गया, या दूसरों के भरोसे छोड़ दिया गया। अंग्रेज़ों ने आते ही इस दूरी को स्थायी बना दिया। समुद्र को भारतीय चेतना से लगभग अलग कर दिया गया। यही कारण है कि आज़ादी के बाद भी भारत दशकों तक एक Land-obsessed state बना रहा।

21वीं सदी में परिस्थितियाँ बदलीं। चीन का समुद्री विस्तार, South China Sea का सैन्यीकरण, और हिंद महासागर में बढ़ती चीनी मौजूदगी ने भारत को वही सवाल फिर याद दिलाया, जिसे सोमनाथ के बाद धीरे-धीरे भुला दिया गया था – कि आख़िर समुद्र किसका है? यहीं से भारत की इंडो-पैसिफ़िक सोच को सही मायने में समझना चाहिए।

भारत आज Indian Ocean Region में जिस तरह नेवल पार्टनरशिप्स (Naval partnerships) बना रहा है, QUAD जैसे ढाँचों में शामिल हो रहा है, और अपनी नौसेना को कैरियर सेंट्रिक बना रहा है, यह किसी पश्चिमी एजेंडे की नकल नहीं है। यह हमारी सिविलाइजेशनल मेमरी की वापसी है। INS Vikrant या अंडमान-निकोबार कमान केवल सैन्य ठिकाने नहीं हैं। वे उस टूटे हुए समुद्री भारत के प्रतीक हैं, जो दोबारा खड़ा हो रहा है।

Indo-Pacific हिंद महासागर और प्रशांत महासागर को जोड़ने वाला वह विशाल क्षेत्र है, जहाँ आज दुनिया का आधे से ज़्यादा व्यापार, एनर्जी सप्लाई और आर्थिक गतिविधि केंद्रित है। भारत इसे “Free, open और inclusive Indo-Pacific” कहता है। इसका मतलब यह नहीं कि भारत प्रभुत्व चाहता है, बल्कि यह कि कोई एक ताक़त समुद्र को अपनी जागीर न बना ले। 2018 में प्रधानमंत्री Narendra Modi ने Shangri-La Dialogue में इसी दृष्टि को स्पष्ट शब्दों में रखा था। उन्होंने  Indo-Pacific को वो जगह बताया, जहां सभी देश प्रोग्रेस और प्रोस्पेरिटी् के लिए साथ आ सकते हैं।

यह कोई संयोग नहीं है कि भारत आज “Rules-based order” की बात करता है। इसका सीधा अर्थ है कि अंतरराष्ट्रीय मामलों में नियम चलें, मनमानी नहीं। यह वही मॉडल है, जो कभी हिंदू टेम्पल नेटवर्क में था। जहाँ व्यापार नियमों से चलता था, तलवार से नहीं। जहाँ समुद्र संपर्क का माध्यम था, वर्चस्व का नहीं। भारत की कोशिश यही है कि क्षेत्र में शांति बनी रहे, व्यापार बढ़े, और कोई दबंगई न करे।

यही कारण है कि भारत का Indo-Pacific दृष्टिकोण अमेरिकी या चीनी मॉडल से अलग दिखता है। चीन जहाँ समुद्र को hard power और debt traps से नियंत्रित करना चाहता है, वहीं भारत cultural familiarity, trade continuity और strategic restraint पर ज़ोर देता है। यह कोई नई policy नहीं है। यह प्राचीन समुद्री सभ्यता की घरवापसी है।

अगर सोमनाथ उस क्षण का प्रतीक था, जब भारत को समुद्र से काटा गया, तो इंडो-पैसिफ़िक में भारत की वापसी उस क्षण का संकेत है, जब एक सभ्यता अपनी अधूरी कहानी को फिर से लिखना शुरू करती है। यह कहानी अभी पूरी नहीं हुई है। लेकिन इतना तय है कि जो सभ्यता कभी हिंद महासागर की धड़कन थी, वह हमेशा के लिए किनारे पर नहीं रह सकती।

और शायद इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा सबक यही है। सोमनाथ का टूटना भारत की समुद्री हार नहीं था, लेकिन उसी क्षण से समुद्र भारत की कहानी से बाहर होना शुरू हो गया। आज जो लौट रहा है, वह समुद्र नहीं है। वह भारत की वही भूली हुई सभ्यतागत आदत है। यही हमारी मैरीटाइम Muscle Memory है, और शायद इसी स्मृति का पर्व हम आज सोमनाथ में मना रहे हैं।

इस लेख में शोध के लिए निम्न पुस्तकों/रेफरेंस की मदद ली गई है:

  1. (Radhakumud Mookerji) – A History of Indian Shipping
  2. (Sanjeev Sanyal) – The Ocean of Churn: How the Indian Ocean Shaped Human History
  3. (K.M. Munshi) – Somanatha: The Shrine Eternal
  4. (Andre Wink) – Al-Hind: The Making of the Indo-Islamic World (Vol II)
  5. (V.K. Jain) – Trade and Traders in Western India (AD 1000–1300)
  6. (Nilakanta Sastri) – The Cholas by Professor KA Nilakanta Sastri

Editorial team:
Production team:

More videos with Ashish Nautiyal as Anchor/Reporter