मेरे हाथ में जो चीज इस समय है, यह यदि तलवार नहीं है, तो तलवार से कम भी नहीं है।
यह दिखने में भले एक साधारण कलम है, लेकिन इस कलम ने चाणक्य से अर्थशास्त्र लिखवा कर भारत को एक राष्ट्र के रूप में पिरो दिया। इस कलम ने भारत की आजादी में भी बड़ी भूमिका निभाई। इस कलम के शौर्य की न जाने कितनी गाथाएँ हैं।
लेकिन एक समय ऐसा भी आया, जब यह कलम भी बदनाम हुई, और इसे बेचने वाले लोग भी। यदि कलम की ताकत किसी युग में सबसे ज्यादा कलंकित हुई, तो वह कालखंड था — emergency का।
उस दौर में अखबारों की आत्मा सत्ता के कक्ष में दासियों की तरह खड़ी थी— अधोवस्त्रों से रहित, विचारों से विहीन।
आपातकाल कितना विध्वंसक था, उस दौरान देश की जनता के साथ क्या-क्या अत्याचार हुए, इसके लिए तो Opindia ने अलग से एक series ही बना दी है, जिसका link आप description में देख सकते हैं। इस video में हम बात करेंगे मीडिया के उस आत्मसमर्पण की, जो उसने emergency के दौरान किया।
मीडिया। इसे लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहा जाता है। Emergency के दौरान जब लोकतंत्र पर इंदिरा गाँधी का चाबुक चला, तो मीडिया से यह उम्मीद थी कि वह कम से कम भारत के शरीर पर उस चाबुक से उभरे हुए निशान को तो दिखाएगा ही….. मगर अफ़सोस मीडिया ने अपनी आँखों पर पट्टी बाँध ली।
The hindu जैसे बड़े अख़बार ने neutral stance अपना लिया, कि हम ना तो emergency का support करेंगे और ना ही उसका विरोध करेंगे। The hindu शायद यह भूल गया, कि कल जो लोग तटस्थ थे, आज समय उनका अपराध लिख रहा है।”
The हिंदू अखबार ने जो किया, वह तो फिर भी छुप कर किया। लेकिन टाइम्स ऑफ़ इंडिया जैसे बड़े अखबारों ने तो खुलेआम या घोषणा करवा दी, कि प्रकाशन आपातकाल का विरोध नहीं करेगा।
जब देश जल रहा था तो इन अखबारों से यह उम्मीद थी कि वह देशवासियों के जख्म दिखाएगा। लेकिन इन अखबार में नहीं तो जलाने वाले के प्रति ही भक्ति दिखानी शुरू कर दी। एक शेर मुझे याद आ रहा है, कि
बड़े शौक से मेरा घर जला
तुझपर आँच न इक आएगी
ये जबाँ किसी ने खरीद ली
ये कलम किसी की गुलाम है।
क्रांतिवीर में नाना पाटेकर ने कहा था कि कलम वाली बाई क्रांति लाना चाहती थी, कलम के जोर पर काले अंधकार को मिटाना चाहती थी।
लेकिन emergency के दौरान इसका उल्टा हुआ था। कलम वाली बाइयों ने और कलम वाले बाबाओं ने emergency के काले अंधकार को प्रकाश पुंज के रूप में दिखाया।
एक बड़े प्रसिद्ध कलम वाले बाबा थे, खुशवंत सिंह। देश का एक वर्ग उन्हें तथाकथित बुद्धिजीवी मानता रहा है। खुशवंत सिंह ने तो खुलेआम इमरजेंसी का सपोर्ट किया था। हालांकि उनको अपना जमीर बेचने का इनाम मिला। उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया गया और बाद में राज्यसभा भी भेजा गया। ऐसे सैंकड़ों कलम वाले बाबा, इमरजेंसी के दौरान जनता की बजाय सरकार के पक्ष में खड़े होकर साहित्य लिख रहे थे।
चाटुकारिता की हद तो इंडिया टुडे ने पार कर दी थी। इंडिया टुडे ने आपातकाल के समर्थन में ऐसे-ऐसे articles लिखे कि उन्हें पढ़कर हँसी और गुस्सा दोनों आए। एक article में तो यहाँ तक लिखा गया कि हमने emergency के दौरान एक unbelievable चीज देखी, हमने देखा कि बच्चे पढ़ रहे थे और शिक्षक पढ़ा रहे थे।
ऐसा लग रहा था जैसे आपातकाल के पॉजिटिव प्रचार के लिए इंडिया टुडे को टेंडर मिला हुआ है। टेंडर पर काम करने वाले मजदूर भी मालिक के प्रति इतनी भक्ति नहीं दिखाते हैं।
ख़ैर, अब बच्चों की पढ़ाई को भी उपलब्धि मानने वाले मीडिया से क्या ही उम्मीद की जा सकती थी?
Emergency के दौरान मीडिया के व्यवहार को देखकर लाल कृष्ण आडवाणी जी ने तो यहाँ तक कह दिया था कि, सरकार मीडिया को बस झुकाना चाहती थी, लेकिन मीडिया सरकार के सामने रेंगने लग गई।
यह कथन अपने आप में emergency के समय की मीडिया के स्वभाव को बताने के लिए पर्याप्त है।
Emergency में जब लोकतंत्र को ज़ंजीरें पहनाई जा रही थीं, तब मीडिया ने उन ज़ंजीरों को गहना समझ लिया था। Emergency में देश ने एक तरफ सत्ता का पागलपन देखा, तो वहीं दूसरी तरफ मीडिया का मौन भी देखा। इमरजेंसी का वह दौर मीडिया की सबसे बड़ी परीक्षा थी, पर अफ़सोस, बहुत सारे बड़े नाम उस परीक्षा में फेल हो गए। आज का यह नया भारत उन्हें कभी क्षमा नहीं करेगा….. कभी नहीं।


