Neha Das on Reservation, Rahul Kaushik on BJP, UGC, Caste politics & more | UnPack with OpIndia

UGC Guidelines & Caste Politics: जातिवादी नैरेटिव बनाने का प्रयास? UnPack with OpIndia

Summary
ऑपइंडिया के 'UnPack with OpIndia' कार्यक्रम में UGC की नई गाइडलाइंस, जाति आधारित राजनीति और सामान्य वर्ग की बदलती मानसिकता पर चर्चा हुई। इस चर्चा में मुख्य रूप से एक्टिविस्ट नेहा दास, राहुल कौशिक, ऑपइंडिया की EIC नूपुर शर्मा और सीईओ राहुल रौशन ने भाग लिया।

हाल ही में ऑपइंडिया के ‘UnPack with OpIndia’ कार्यक्रम में यूजीसी की नई गाइडलाइंस, जाति आधारित राजनीति और सामान्य वर्ग (General Category) की बदलती मानसिकता पर चर्चा हुई। इस चर्चा में मुख्य रूप से एक्टिविस्ट नेहा दास, राजनीतिक कमेंटेटर राहुल कौशिक, ऑपइंडिया की एडिटर-इन-चीफ नूपुर शर्मा और सीईओ राहुल रौशन ने भाग लिया।

यहाँ इस विमर्श के मुख्य बिंदु दिए गए हैं जो वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य को समझने में मदद करेंगे:

यूजीसी गाइडलाइंस और ‘डी-रिजर्वेशन’ का सच

चर्चा की शुरुआत विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) की उन गाइडलाइंस से हुई, जिसमें विशेष परिस्थितियों में खाली रह गई आरक्षित सीटों को ‘डी-रिजर्व’ करने का प्रावधान था। पैनल ने विश्लेषण किया कि कैसे इस प्रशासनिक प्रक्रिया को विपक्ष द्वारा “आरक्षण खत्म करने की साजिश” के रूप में पेश किया गया। इस पूरे विवाद के दौरान बसपा प्रमुख मायावती के रुख को अन्य नेताओं की तुलना में काफी संतुलित और नपा-तुला माना गया।

सामान्य वर्ग की बढ़ती सक्रियता (Upper Caste Activism)

एक्टिविस्ट नेहा दास ने तर्क दिया कि सामान्य वर्ग अब अपनी समस्याओं और अधिकारों को लेकर पहले से कहीं अधिक मुखर है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह सक्रियता किसी विशेष राजनीतिक दल के विरोध में नहीं है, बल्कि उस नैरेटिव के खिलाफ है जो सामान्य वर्ग को हमेशा ‘शोषक’ (Oppressor) के रूप में चित्रित करता है। उनका कहना था कि लड़ाई ‘अवसर की समानता’ (Equality of Opportunity) के लिए है।

जातिगत चेतना और ‘जीरो सम गेम’

चर्चा में यह बात उभर कर आई कि आज के दौर में हर वर्ग अपनी जातिगत पहचान को लेकर जागरूक हो रहा है। यदि अन्य समुदाय अपनी जाति को राजनीति का आधार बना रहे हैं, तो सामान्य वर्ग भी अब अपने हितों के लिए संगठित होने को मजबूर है। पैनल का मानना था कि आरक्षण का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति (जैसे वाल्मीकि समाज के अति-पिछड़े लोग) तक पहुँचना अनिवार्य है, ताकि यह व्यवस्था केवल कुछ प्रभावशाली लोगों तक सीमित न रहे।

राजनीतिक हताशा और ‘नोटा’ का विकल्प

पैनल ने इस महत्वपूर्ण बिंदु पर भी चर्चा की कि क्या सामान्य वर्ग सत्ताधारी दल (भाजपा) की नीतियों से असंतुष्ट है? एससी-एसटी एक्ट और आरक्षण जैसे संवेदनशील मुद्दों पर सरकार के कड़े रुख के कारण सामान्य वर्ग के मतदाताओं के बीच ‘नोटा’ (NOTA) दबाने या मतदान से दूरी बनाने का रुझान बढ़ा है। यह हताशा आने वाले चुनावों में एक निर्णायक भूमिका निभा सकती है।

निष्कर्ष

इस चर्चा का मुख्य निष्कर्ष यह था कि आरक्षण और जाति जैसे विषय, जिन्हें लंबे समय तक ‘पॉलिटिकली इनकरेक्ट’ मानकर टाला जाता रहा, अब मुख्यधारा के विमर्श का हिस्सा बन गए हैं। सामान्य वर्ग का अपनी मांगों को लेकर मुखर होना भारतीय राजनीति में एक नए अध्याय की शुरुआत है।

इस बातचीत में गेस्ट एवं होस्ट द्वारा कही गयी कुछ प्रमुख बातें:

राहुल रौशन: मैं अपनी बात संक्षिप्त ही रखूँगा। मेरा इस वक्त जो थोड़ा कंसर्न (चिंता) है, वह यह है कि जिस तरीके से एक अपरकास्ट एक्टिविज्म (सवर्ण सक्रियता) उभर कर आई है और उन्होंने अपनी पहली सफलता का स्वाद भी चखा है कि सुप्रीम कोर्ट ने स्टे कर दिया। अब उसमें मुद्दा यह है कि कहीं आप अपनी क्षमता या अपने नैरेटिव को ओवरएस्टीमेट (ज़रूरत से ज़्यादा आंकना) न कर लें। हमारे बिहार में तो कहते हैं कि ‘चढ़ जा बेटा सूली पे, भगवान तेरा भला करे’, तो पीछे से हवा देने वाले बहुत मिल जाएंगे।

अभी जो एक सीमित सफलता मिली है, उसे हम आगे किस तरीके से ले जाएं? क्योंकि उसमें हर बात गलत नहीं है और हर बात सही भी नहीं है। मैं खुद कई सारी चीजों से सहमत नहीं हूँ, लेकिन मेरा डर यह है कि यह मोमेंटम (गति) कहीं जल्दी डिरेल (पटरी से उतरना) न हो जाए। इस चक्कर में खुद को ओवरएस्टीमेट न कर लिया जाए कि अब तो हम सब कुछ बदल सकते हैं, हम सरकार को झुका सकते हैं या सरकार गिरा सकते हैं। यह सच्चाई नहीं है। अभी कोर्ट में जो हुआ, वह एक प्रक्रिया है। मैं यह चैलेंज भी नहीं करना चाहता कि जाओ पार्टी बना लो और हरा के दिखा दो। मेरा इरादा नेक है कि आपके जो वाजिब (valid) कंसर्न्स हैं, वे इस चक्कर में डिरेल न हो जाएं कि ‘अब तो भाई हमें रुकना नहीं है’। जो रेटरिक मुझे सुनने में आ रहा है, वही मेरी चिंता है। इस पर हम आगे बात करेंगे। अब हमारे मेहमान अपनी बात रख सकते हैं, लेडीज फर्स्ट।

नेहा दास: आप जो कह रहे हैं कि जब वे (आरक्षित वर्ग) सड़कों पर उतरते हैं, तो वे हंगामा करते हैं, और वे कहते हैं कि हमें OBC में डालो, हमें SC में डालो, हमें ST में डालो। वे मांग करते हैं कि SC-ST एक्ट को और भी ज्यादा सख्त बनाया जाए। तो फिर आप उन्हें हिंदू एकता का वह ज्ञान क्यों नहीं देते जो आप हमें (सामान्य वर्ग को) देती हैं कि हमें ऐसा नहीं करना चाहिए?

नेहा दास: सबसे पहले मैं यही बताना चाहूँगी कि मुख्य समस्या (मेजर प्रॉब्लम) क्या है। जैसा कि राहुल जी ने कहा, सफलता की बात… देखिए, हम इसे केवल एक ‘सफलता’ के रूप में नहीं देख रहे हैं। हमारा उद्देश्य केवल स्टे (Stay) लेना नहीं था। हमारा उद्देश्य उस मानसिकता को चुनौती देना था जिसके तहत ये गाइडलाइंस लाई गई थीं।

अगर आप उन गाइडलाइंस को गहराई से पढ़ें, तो आपको समझ आएगा कि वे केवल भेदभाव रोकने के लिए नहीं थीं, बल्कि एक खास तरह का इकोसिस्टम बनाने के लिए थीं। इसमें ‘अप्रत्यक्ष कृत्य’ (Implicit Acts) जैसी जो परिभाषाएं दी गई हैं, वे इतनी खतरनाक हैं कि किसी भी सामान्य छात्र या प्रोफेसर को बिना किसी ठोस सबूत के फंसाया जा सकता है।

मेरा कंसर्न यह है कि जब आप समानता की बात करते हैं, तो वह सबके लिए होनी चाहिए। आप एक वर्ग को विशेषाधिकार दे रहे हैं और दूसरे वर्ग को इस डर में रख रहे हैं कि उनके द्वारा कही गई किसी भी सामान्य बात को ‘भेदभाव’ मान लिया जाएगा। राहुल जी ने जो कहा कि हमें खुद को ओवरएस्टीमेट नहीं करना चाहिए, मैं उससे सहमत हूँ कि यह लंबी लड़ाई है, लेकिन शुरुआत तो कहीं से करनी ही होगी।

राहुल रौशन: नेहा, मेरा पॉइंट बस इतना है कि जब आप एक्टिविज्म (सक्रियता) करते हैं, तो जोश में आकर कभी-कभी हम ‘पॉलिटिकल पॉसिबिलिटी’ (राजनीतिक संभावनाओं) को भूल जाते हैं। सरकार के पास भी अपने दबाव होते हैं। अगर हम बहुत ज्यादा रेडिकल (उग्र) हो जाएंगे, तो जो लोग हमारी जायज मांगों का समर्थन कर रहे हैं, वे भी पीछे हट सकते हैं।

नेहा दास: लेकिन राहुल जी, पिछले कई सालों से क्या हो रहा है? सामान्य वर्ग को हमेशा ‘बलिदान’ देने के लिए कहा जाता है। हिंदू एकता के नाम पर हमसे अपेक्षा की जाती है कि हम चुप रहें। लेकिन जब नीतियां हमारे अस्तित्व पर हमला करने लगें, तब चुप रहना मुश्किल हो जाता है। UGC की ये गाइडलाइंस उसी हमले का एक हिस्सा थीं। इसीलिए हमने आवाज उठाई, और यह सिर्फ ट्विटर तक सीमित नहीं है, जमीन पर भी लोग अब इस भेदभाव को महसूस करने लगे हैं।

नेहा दास: आपकी बात सही है, लेकिन ट्रांजेक्शनल होने के लिए पहले एक संगठित ‘वोट बैंक’ या ‘वॉइस’ की ज़रूरत होती है। सवर्ण हमेशा बिखरा हुआ रहा है। हम उसी बिखराव को खत्म करने की कोशिश कर रहे हैं। हम यह नहीं कह रहे कि हम कल अपनी पार्टी बना लेंगे, लेकिन हम यह ज़रूर कह रहे हैं कि अब हमारा वोट ‘गारंटीड’ नहीं है। आपको हमारी चिंताओं पर ध्यान देना होगा, चाहे वह UGC की गाइडलाइंस हों या आरक्षण के भीतर ‘क्रीमी लेयर’ लागू करने की बात।

नेहा दास: और इसमें एक बात और जोड़ दूँ। लोग हमसे पूछते हैं कि हमारा विकल्प क्या है? विकल्प बाद की बात है, पहले वर्तमान व्यवस्था की खामियों को तो उजागर किया जाए। अगर हम आज चुप रहे, तो कल को शिक्षण संस्थानों में जो माहौल बनेगा, वह किसी के हित में नहीं होगा।

नेहा दास: यहाँ एक और महत्वपूर्ण बात है—’अफरमेटिव एक्शन’ (सकारात्मक कार्रवाई)। हम इसके पूरी तरह खिलाफ नहीं हैं, लेकिन हमें यह देखना होगा कि इसका असली लाभार्थी कौन है। क्या एक IAS अधिकारी का बेटा, जो दिल्ली के महंगे स्कूल में पढ़ा है, अभी भी आरक्षण का उतना ही हकदार है जितना कि गाँव का कोई वंचित व्यक्ति? जब आप जाति को ही एकमात्र पैमाना बना देते हैं, तो आप उस गरीब व्यक्ति का हक मार रहे होते हैं जिसे वास्तव में मदद की ज़रूरत है।

बिल्कुल, और यही वह ‘दुष्चक्र’ है जिसकी हम बात कर रहे हैं। आप राजनीति के लिए कोटा बढ़ाते जाते हैं, लेकिन कभी यह नहीं देखते कि क्या उसका प्रभाव जमीन पर पड़ रहा है। ऐतिहासिक रूप से जो गलतियाँ हुईं, उन्हें सुधारने के नाम पर आप नई गलतियाँ नहीं कर सकते। आज का युवा, जो मेहनत करके प्रतियोगी परीक्षाओं में बैठता है, वह जब देखता है कि योग्यता (Merit) को दरकिनार किया जा रहा है, तो उसमें गुस्सा आना स्वाभाविक है. ..

नेहा दास: राहुल रौशन जी, आपने ‘पॉलिटिकल पॉसिबिलिटी’ की बात की। लेकिन मेरा सवाल यह है कि क्या पार्टियाँ वाकई समाधान चाहती हैं? या वे केवल हमें जातियों के नाम पर लड़वाकर अपना वोट बैंक सुरक्षित रखना चाहती हैं? जब हम OBC आरक्षण की बात करते हैं, तो डेटा कहाँ है? रोहिणी कमीशन की रिपोर्ट को दबाकर क्यों रखा गया है? अगर आप वास्तव में पिछड़ों का भला चाहते हैं, तो उप-वर्गीकरण (Sub-categorization) से क्यों डरते हैं?

असल में, सवर्ण समाज को हमेशा एक ‘विलेन’ की तरह पेश किया गया है। अगर हम अपने अधिकारों की बात करें, तो हमें ‘जातिवादी’ कह दिया जाता है। लेकिन अगर कोई दूसरा वर्ग अपनी जाति के लिए सड़कों पर उतरकर सरकारी संपत्ति जलाता है, तो उसे ‘क्रांतिकारी’ या ‘अधिकारों की लड़ाई’ माना जाता है। यह जो ‘डबल स्टैंडर्ड’ (दोहरा मापदंड) है, इसे अब चुनौती देना ज़रूरी है।

राहुल रौशन: मैं समझता हूँ, लेकिन आपको यह भी समझना होगा कि भारत जैसे देश में जहाँ जाति की जड़ें इतनी गहरी हैं, वहाँ किसी भी सरकार के लिए रातों-रात आरक्षण खत्म करना या उसमें बड़े बदलाव करना ‘पॉलिटिकल सुसाइड’ (राजनीतिक आत्महत्या) जैसा है। इसीलिए मैं कह रहा था कि अपने नैरेटिव को इतना उग्र न करें कि आप अलग-थलग पड़ जाएं।

नेहा दास: हम उग्र नहीं हो रहे हैं, हम सिर्फ तर्क संगत (Rational) होने की मांग कर रहे हैं। क्या यह मांग करना गलत है कि जो संपन्न हो चुके हैं, उन्हें आरक्षण के दायरे से बाहर किया जाए (Creamy Layer)? क्या यह मांग करना गलत है कि गाइडलाइंस ऐसी हों जो सबको सुरक्षा दें, न कि किसी एक वर्ग को निशाना बनाने का हथियार बनें?

एक बड़ा मुद्दा ‘हिंदू एकता’ का है। हमें बार-बार सिखाया जाता है कि हिंदू एकता के लिए अपनी जातिगत पहचान को त्याग दो। लेकिन क्या यह नियम सब पर लागू होता है? जब दूसरे वर्ग अपनी जाति के नाम पर संगठित होते हैं, रैलियां करते हैं और आरक्षण के लिए दबाव बनाते हैं, तब उन्हें कोई ‘हिंदू एकता’ का पाठ नहीं पढ़ाता। केवल सामान्य वर्ग से ही यह अपेक्षा क्यों है कि वह अपना हक छोड़कर ‘बड़ा दिल’ दिखाए?

राहुल कौशिक:  मैं इसमें एक बात जोड़ना चाहूँगा। मैं शाखा जाता हूँ और जमीन की हकीकत जानता हूँ। संघ (RSS) का जो दृष्टिकोण है, वह केवल सवर्णों के लिए नहीं है। वे वाल्मीकि समाज, रविदासिया समाज और हर हिंदू वर्ग को यही सिखाते हैं कि अपनी जाति से ऊपर उठकर ‘हिंदू’ के रूप में सोचें। संघ कभी जाति-आधारित संगठन नहीं बनाता। उनका उद्देश्य एक समरस समाज का निर्माण करना है।

नेहा दास: राहुल जी, कागजों पर या बौद्धिक चर्चाओं में यह सुनने में बहुत अच्छा लगता है। लेकिन जमीन पर क्या हो रहा है? अगर मैं सार्वजनिक रूप से कहूँ कि मुझे ‘ब्राह्मण’ होने पर गर्व है, तो मुझे तुरंत ‘जातिवादी’ करार दे दिया जाता है। लेकिन अगर कोई और अपनी जाति का झंडा उठाकर सड़कों पर हंगामा करे, तो उसे उसका ‘अधिकार’ माना जाता है। यह जो सवर्णों पर एक ‘बौद्धिक और नैतिक दबाव’ बनाया गया है कि आप अपनी पहचान मिटा दें, यह एकतरफा है।

राहुल रौशन: देखिए, राजनीति में ‘संख्या बल’ (Numbers) का बहुत महत्व है। सरकारें केवल सिद्धांतों पर नहीं चलतीं, वे वोटों पर चलती हैं। अगर आप संगठित होकर अपनी बात नहीं रखेंगे, तो कोई भी पार्टी—चाहे वह भाजपा हो या कोई और—आपकी बात को गंभीरता से नहीं लेगी। मेरा बस इतना कहना है कि इस गुस्से को सही दिशा में चैनललाइज (Channelize) करने की ज़रूरत है।

नेहा दास: हम वही करने की कोशिश कर रहे हैं। हम यह कह रहे हैं कि अगर आप ‘हिंदू एकता’ चाहते हैं, तो वह ‘बराबरी’ (Equality) पर आधारित होनी चाहिए, ‘बलिदान’ पर नहीं। आप एक वर्ग को गाली देकर या उसे हाशिए पर रखकर हिंदू एकता की उम्मीद नहीं कर सकते। UGC के मामले में जो सवर्णों का गुस्सा दिखा, वह इसी दोहरेपन के खिलाफ था।

राहुल रौशन: आप भले ही कहें कि ऐसा नहीं है, लेकिन एक बात तो साफ़ है कि टारगेट (निशाने) पर हमेशा बीजेपी ही रहती है। अब जैसे, जब कर्नाटक में कांग्रेस ‘रोहित वेमुला एक्ट’ या बिल लाने वाली थी, तब भी यह देखा गया था कि सामान्य वर्ग (General Caste) के लोग बीजेपी से ही सवाल कर रहे थे कि ‘तुम चुप क्यों हो?’ मुझे नहीं पता कि बीजेपी उस वक्त चुप थी या नहीं, लेकिन सवाल उन्हीं से था। भले ही आप इसे खुलेआम न करें, लेकिन निशाने पर हमेशा बीजेपी ही रहती है। चाहे बिल कांग्रेस लाए या गाइडलाइंस यूजीसी (UGC) जारी करे, राजनीतिक मार बीजेपी को ही पड़ती है। तो अगर कोई यह कहे कि आप अनजाने में या अप्रत्यक्ष रूप से कांग्रेस की मदद कर रहे हैं, तो आप इसका क्या जवाब देंगी?

नेहा दास: देखिए, ऐसा है कि बहुत से लोग अभी-अभी जाग रहे हैं, इसलिए उन्हें पूरी बात पता नहीं है। रोहित वेमुला एक्ट के खिलाफ हम 2016 से विरोध कर रहे हैं। 2016 से लेकर 2024 तक के इन आठ सालों में हमारा संघर्ष बहुत बढ़ गया है। शुरुआत में क्या था कि सोशल मीडिया का शुरुआती दौर था और लोग इतने जागरूक नहीं थे। तब जब भी हम कोई बात बोलते थे, तो हमें ‘एंटी-बीजेपी’ (भाजपा विरोधी) कह दिया जाता था।

हकीकत यह है कि जब कांग्रेस की कोई ऐसी पॉलिसी आती थी, हम उसके खिलाफ भी बोलते थे। किसी भी राजनीतिक दल की गलत नीति के खिलाफ बोलने पर हमें कहा जाता था कि ‘तुम तो बिकाऊ हो’, ‘तुम एंटी-हिंदू हो’, या ‘तुम हिंदुओं को आपस में लड़ा रहे हो’। यहाँ तक कि हमें कांग्रेस की साजिश का हिस्सा भी बताया जाता था।

लेकिन 2016 से 2024 के बीच एक ‘ट्रांजिशन पीरियड’ (परिवर्तन का दौर) रहा है। शुरू में यह बहुत कठिन था; केवल 10-20 एकल आवाजें थीं जो बिना किसी संगठन या तालमेल के इस आंदोलन को आगे बढ़ा रही थीं। पिछले तीन-चार सालों में हमने ज्यादा संगठित होकर काम करना शुरू किया है। हम चीजें डिस्कस करते हैं, प्लानिंग करते हैं, इसीलिए अब हमारी विजिबिलिटी (दृश्यता) और विरोध की आवाज ज्यादा दिखाई देती है।

रोहित वेमुला एक्ट के मामले में अगर आप चेक करें, तो हम सबसे ज्यादा मुखर थे। हमने उस समय कांग्रेस की जमकर आलोचना की थी। हमारा कंसर्न (चिंता) यह था कि जब कोई गलत पॉलिसी आती है, तो विपक्ष का काम उसका विरोध करना होता है, जो हमने अपनी पूरी ताकत लगाकर किया। लेकिन हम दूसरी पार्टियों से भी तो समर्थन की उम्मीद करते हैं। उस समय तक बीजेपी हमारी समझ में रोहित वेमुला एक्ट के खिलाफ थी, इसलिए हम उन्हें टैग करके पूछते थे कि ‘आप क्यों नहीं बोल रहे?’ यह एक अत्यंत दमनकारी (Draconian) एक्ट था जिसमें सीधे दंडात्मक कानून डाले गए थे। हमारा सवाल बीजेपी से इसलिए था क्योंकि हमें उनसे जवाब चाहिए था, न कि इसलिए कि हम कांग्रेस का समर्थन कर रहे थे।

यदि आप किसी भी सवर्ण (GC) एक्टिविस्ट को देखें, तो उनकी एक यात्रा रही है। ऐसा नहीं है कि वे कांग्रेस या किसी और पार्टी को सपोर्ट कर रहे थे; वे सभी ‘प्रो-बीजेपी’ (भाजपा समर्थक) ही थे। लेकिन पिछले तीन सालों में बदलाव आया है। कुछ लोग ‘प्रो-बीजेपी’ से शिफ्ट होकर अब बीच के रास्ते पर हैं, वे अनडिसाइडेड हैं कि किधर जाएं क्योंकि उन्हें दोनों तरफ एक जैसी स्थिति दिखती है। कुछ लोग पूरी तरह ‘एंटी-बीजेपी’ हो चुके हैं। हर किसी की जर्नी अलग है। मैं खुद भी कहीं से शुरू करके अब बीच की स्थिति में आ गई हूँ।

रही बात प्रधानमंत्री के लिए इस्तेमाल किए गए शब्दों की, तो जैसा राहुल कौशिक जी ने कहा कि वे उन शब्दों से आहत हैं—मैं व्यक्तिगत रूप से उन शब्दों से बिल्कुल सहमत नहीं हूँ। हम उस भाषा का समर्थन नहीं करते। लेकिन आपको उस गुस्से को समझना होगा जो लोगों के भीतर पनप रहा है। अलग-अलग मानसिकता के लोग होते हैं और हम सबको कंट्रोल नहीं कर सकते।

मुझे याद है, एक ‘स्पेस’ (Twitter/X Space) में एक युवा लड़की कह रही थी कि इस रिपब्लिक डे पर उसे कुछ भी लिखने का मन नहीं हुआ। उसने एक मैसेज डाला और फिर उसे डिलीट कर दिया। वह इस बात से बहुत दुखी थी कि सरकार हमारे साथ क्या कर रही है। उसने कहा कि अब उसे खुद में वह देशभक्ति महसूस नहीं होती। आप समझ सकते हैं कि लोग किस तरह के सेंटीमेंट्स (भावनाओं) से गुजर रहे हैं।

राहुल कौशिक: आप देश के प्रधानमंत्री को, जो 11 साल से पद पर हैं, दिन में 50 बार ‘तेली, तेली’ बुला रहे हैं।
नेहा दास: सबसे पहले तो मुझे प्रधानमंत्री को कुछ खास शब्दों से बुलाने की यह बात समझ नहीं आती।
राहुल कौशिक: कुछ खास शब्द नहीं मैडम, ‘तेली’।
नेहा दास: हाँ, तेली… हमने ऐसा नहीं कहा। हम राजनीतिक रूप से किसी के खिलाफ नहीं हैं; हम इस पार्टी को हराने या उस पार्टी को जिताने के लिए काम नहीं कर रहे हैं। हमारी मांग सिर्फ इतनी है कि जो भी राजनीतिक दल हमारी बात सुनेगा, हम उसी के साथ जाएंगे।

राहुल कौशिक: लेकिन जिस तरह की बातें सामान्य वर्ग (General Caste) के कार्यकर्ताओं ने कही हैं, उसने कहीं न कहीं मुझ जैसे व्यक्ति के मन में यह संदेह पैदा कर दिया है कि अगर यह एट्रोसिटी एक्ट और ऐसी चीजें न होतीं, तो मुझे लगता है कि लोग आज भी सड़कों पर एक-दूसरे को पीट रहे होते।

नेहा दास: आप अपना EWS ले लीजिए। हमें आपका वह 10% नहीं चाहिए।

नुपुर जे. शर्मा: मुझे तो यह भी नहीं पता था कि बनिया समुदाय के खिलाफ समाज में इतनी गालियाँ और अपशब्द मौजूद हैं, क्योंकि मेरा पालन-पोषण बहुत ही क्लास और कास्ट-ब्लाइंड (जाति के प्रति उदासीन) तरीके से हुआ है। इसलिए मुझे अपने बारे में इन रूढ़ियों का पता ही नहीं था। वास्तव में, मुझे यह भी नहीं पता था कि स्वयं डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने बनिया समुदाय के खिलाफ इतना कुछ लिखा है। यह तो SC-ST एक्ट की मेहरबानी है कि मुझे पता चला कि मेरे समुदाय के लिए कौन से अपशब्द इस्तेमाल किए जाते हैं।

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