हर देश में सोशल मोबिलिटी यानी समाज की सीढ़ियाँ चढ़ने के अलग अलग रास्ते होते हैं। अमेरिका में खूब पैसा कमाना, जर्मनी और स्कैंडनेवियन देशों में वैज्ञानिक, रिसर्चर बनना, अरब देशों में इस्लामी विद्वान बनना सोशल मोबिलिटी के रास्ते समझे जाते हैं, लेकिन भारत में सोशल मोबिलिटी का एक दूसरा रास्ता है।
हमारे देश में उस युवा को अधिक इज्जत मिलती है, जिसके पास सरकारी नौकरी हो। अगर मैं थोड़ा फ्रैंक होकर कहूँ तो हमारे सोशल पिरामिड में कलेक्टर साहब के दफ़्तर का बाबू हमेशा फोन-पे के फाउंडर से ज्यादा प्रभाव रखेगा। ये अच्छी बात है या नहीं, ये तो समाज के ऊपर है, लेकिन इससे ये तथ्य नहीं बदल सकता कि सरकारी नौकरी ही इस देश के लाखों करोड़ों युवाओं का अल्टीमेट ड्रीम है।
और इस ड्रीम की वैल्यू तब और बढ़ती है जब आप उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में रहते हों, जहाँ रोजगार के साधन सीमित हैं। लेकिन आप सोचिए कि इस राज्य में आप किसी भर्ती की सारी प्रक्रिया पूरी कर लें और इसके बाद भी आपको नौकरी ना मिले।
क्या हो जब प्री, मेन्स, इंटरव्यू और काग़ज़ का सत्यापन करवाने के बाद भी आपकी रोजगार यात्रा में दो चरण अनाधिकारिक तौर पर जोड़ दिए जाएँ? ऐसा ही कुछ हाल उत्तर प्रदेश में सरकारी भर्तियों में 2017 से पहले था। चाहे पुलिस की भर्ती हो या अनुदेशक, अभ्यर्थियों के मन में हमेशा इस बात को लेकर डर होता था कि हमें नियुक्ति पत्र तो कोर्ट से ही मिलेगा।
ऐसी शायद कोई भर्ती नहीं थी जो कोर्ट में जाकर फँसती ना हो या जिसके लिए लखनऊ के दिल हजरतगंज में स्थित विधानसभा के सामने अभ्यर्थी एक बार उत्तर प्रदेश के सर्वोत्तम बल यानी PAC के लट्ठ ना खा लें। ये राजधानी के अख़बारों में एक रेगुलर फ़ीचर था।
चाहे UPPSC की भर्ती हो या PCS-J या फिर UDA और LDA भर्तियां, या फिर 2015 में हुई 72 हज़ार शिक्षक भर्तियाँ, 2016 में हुई सहायक शिक्षक भर्ती या पुलिस भर्ती। हर बार अभ्यर्थियों के भविष्य पर ग्रहण लगा है। हर बार भर्ती कोर्ट में गई है, हर बार उस पर जाँच बैठी है और इसके चलते सिस्टम पंगु हो गया।
लेकिन अब यह चैप्टर बंद हो गया है। योगी सरकार में बेरोजगारी, भर्ती और बाक़ी चीजों को लेकर समाजवादी पार्टी ने भले ही शोर मचाए लेकिन अगर आप एक बार नंबर्स पर नजर डालें तो सच्चाई सामने आ जाएगी।
60000 पुलिस की भर्ती के लिए लाखों बेरोज़गारों की ये तस्वीर भाजपाई देखें और फिर हिम्मत हो तो रोज़गार के आँकड़े दें।
— Akhilesh Yadav (@yadavakhilesh) February 18, 2024
लोकसभा चुनाव में बेरोज़गार युवा भाजपा के झूठ पर बुलडोज़र चलाकर निर्णायक समाधान निकालेंगे। pic.twitter.com/iwgt3XdaTc
सबसे पहले बात करते हैं उस विभाग की जो सरकार का सबसे विजिबल पार्ट है, यानी पुलिस। एक रिपोर्ट कहती है कि 2012 से 2017 के बीच यानी अखिलेश सरकार ने कुल 49,965 पुलिसकर्मियों की भर्ती की। ये नंबर्स राज्य की जनसंख्या और सुरक्षा जरूरतों के मुकाबले ऊंट के मुंह में जीरे के समान है।
अब इसके विपरीत देखिए। 2017 से अब तक योगी सरकार 2,18,262 से ज्यादा नियुक्तियां कर चुकी है। सोचिए, अखिलेश शासन की तुलना में 4 गुना ज्यादा भर्तियां और आगामी 20 अप्रैल को उत्तर प्रदेश पुलिस के 60 हज़ार से ज्यादा सिपाहियों की पासिंग आउट परेड होगी।
सोचिए एक साथ 60 हज़ार युवा यूपी में रोजगार पाएंगे। जानते हैं ये भर्ती 2023 के दिसंबर महीने में चालू हुई थी। यानी नोटिफिकेशन रिलीज होने से लेकर नौकरी शुरू होने तक मात्र ढाई साल में अभ्यर्थी सारे चरण पार कर चुके हैं और अब फिर से भर्तियां होने वाली हैं।
इसी तरह शिक्षक भर्ती का नंबर भी लाखों में रहा है, एक रिपोर्ट कहती है कि और योगी सरकार ये सारी रिक्रूटमेंट भी कोई छोटी मोटी नहीं कर रही है बल्कि वो एक एक बार में 68 हज़ार, 69 हज़ार, ऐसे भर्तियाँ करती जा रही है।
इसके अलावा लेखपाल भर्ती हो, नलकूप ऑपरेटर की बात हो या फिर UP SI की भर्तियां सभी समय से हुई हैं और इसके लिए अभ्यर्थियों को लाठियाँ नहीं खानी पड़ी हैं। UP सरकार के आंकड़े बताते है कि उत्तर प्रदेश में अब तक 8.5 लाख युवाओं को सरकारी नौकरियां इस सरकार के अंतर्गत मिली हैं।
सरकार ने ये भी प्लान किया है कि वो अपने इस कार्यकाल के दौरान 1.5 लाख और भर्तियां सुनिश्चित करेगी। अब अगर ऐसा होता है तो फिर यह आंकड़ा 8.5 लाख से बढ़कर 10 लाख हो जाएगा।
10 लाख सरकारी नौकरियां किसी भी राज्य के लिए बड़ा नंबर होता है। लेकिन ये हुआ कैसे? इसके पीछे वजह है सरकार की नीयत और कमिटमेंट।
आपको याद होगा कि यूपी में नकल और पेपर लीक एक बड़ा कारोबार रहा है और कई बार खुद सरकार भी इसके सपोर्ट में दिखी है। मुलायम सिंह यादव सरकार तो 1993 में यही वादा कर सत्ता में आई थी कि वो पिछली कल्याण सरकार के नकल विरोधी अध्यादेश को खत्म कर देगी। समाजवादी पार्टी के सत्ता में आते ही यही हुआ भी… तब राजनाथ सिंह यूपी के शिक्षा मंत्री थे और वो हार गए थे।
अब आप नीयत में फर्क देखिए। योगी आदित्यनाथ सरकार ने उत्तर प्रदेश सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों का निवारण) विधेयक 2024 लाया जिसमें संगठित नकल गिरोहों से जुड़े लोगों के लिए अधिकतम आजीवन कारवास की सजा और एक करोड़ रुपये तक जुर्माना का प्रावधान किया गया। यह कठोर कानून दिखाता है कि योगी सरकार कैसे भर्ती परीक्षाओं में सुधार लाना चाहती है।
योगी सरकार ने इस सड़े हुए सिस्टम को जड़ से खत्म करने का प्रयास किया है। अब प्रक्रिया डिजिटल और सख्त है। बायोमेट्रिक पहचान, हर परीक्षा केंद्र पर लाइव CCTV स्ट्रीमिंग और सबसे महत्वपूर्ण 4 सेट क्वेश्चन पेपर सिस्टम।
इससे पेपर लीक की गुंजाइश को न्यूनतम किया गया और बिचौलियों के नेटवर्क को ध्वस्त कर दिया गया। योगी सरकार में यह सिस्टम बना कि भैया फॉर्म वगैरह भरते समय ही यह अनुमान लग जाता है कि अगर कोई युवा अपना एग्जाम पास कर लेता है तो उसे नियुक्ति पत्र कितने दिनों में मिल जाएगा। वो कब से ट्रेनिंग पर जाएगा।
तो एक तरफ वो दौर था जहां पुलिस भर्तियां पर्ची और खर्ची के शोर में दब जाती थीं, जहां युवाओं को नियुक्तियों के लिए सालों इंतजार और आंदोलनों का सहारा लेना पड़ता था। वहीं दूसरी तरफ आज का दौर है, जहां रिकॉर्ड संख्या में, पारदर्शी तरीके से भर्तियां हो रही हैं। सुधार की गुंजाइश हमेशा रहेगी लेकिन जो बुनियादी बदलाव बीते कुछ सालों में आए हैं, उन्होंने नीयत, कमिटमेंट और युवाओं का अपनी सरकार पर भरोसे को नई एक दिशा दी है।




