कॉन्ग्रेस का MGNREGA के नाम पर देश-विरोधी और ‘राम विरोधी’ एजेंडा, पी चिदंबरम ने संभाली कमान

Summary
VB-G-RAM- G ; 'राम' नाम आने से इन लिबरल की सुलग गई। क्यूंकि अगर हिंदी नाम से दिक्कत होता तो जब साल 2008 में पी चिदंबरम देश के गृह मंत्री थे, उस वक्त "THE GRAM NYAYALAYAS ACT 2008" को भी अंग्रेज़ी में लिखा जाता, ना की हिंदी शब्द को अंग्रेज़ी लिपि में लिखा जाता।

एक बार फिर से हिंदी vs नॉन हिंदी भाषा विवाद शुरू हो गया है। इस बार इस विवाद को हवा दी है, कांग्रेस के राज्यसभा सांसद पी.चिदंबरम ने। सोमवार को लोकसभा में सरकार एक बिल पेश करती है। जिसमें मनरेगा का नाम बदल कर अब “विकसित भारत गारंटी फॉर रोज़गार एंड आजीविका मिशन” किया जाएगा। आप कहोगे इसमें विवाद क्या है?

दरअसल, पी.चिदंबरम ने ट्वीट करते हुए यह कह दिया कि सरकार जिस तरह से बिल में अंग्रेज़ी नाम के जगह भी हिंदी नामों का उपयोग कर रही है। नाम हिंदी और लिपि अंग्रेज़ी, इससे नॉन हिंदी भाषी लोगों को दिक्कत होगा। और मुझे कही ना कही लगता है अंग्रेज़ी को जो एसोसिएट ऑफिसियल भाषा का दर्जा मिला है ये सरकार उसको भी वापस ले लेगी।

सही मायने में ये विवाद है ही नहीं। विवाद है ये है कि जब “विकसित भारत गारंटी फॉर रोज़गार एंड आजीविका मिशन” को शोर्ट में लिखा जाता है तो उसका मतलब निकलता है। VB-G-RAM- G ; ‘राम’ नाम आने से इन लिबरल की सुलग गई। क्यूंकि अगर हिंदी नाम से दिक्कत होता तो जब साल 2008 में पी चिदंबरम देश के गृह मंत्री थे, उस वक्त “THE GRAM NYAYALAYAS ACT 2008” को भी अंग्रेज़ी में लिखा जाता, ना की हिंदी शब्द को अंग्रेज़ी लिपि में लिखा जाता।

और इस विवाद में सिर्फ़ पी.चिदंबरम का ही नाम नहीं है बल्कि ख़ुद को देश की सबसे बेहतरीन पत्रकार कहनी वाली सुहासिनी हैदर भी है। मनरेगा के नाम बदली पर सुहासिनी हैदर ने यह कह दिया कि पीएम और विदेश मंत्री विदेशी धरती पर महात्मा गांधी का गुणगान करते हैं और देश में आती ही उनके नामों को मिटाने की कोशिश में लग जाते है।

सुहासिनी हैदर और पी.चिदंबरम जैसे लोग यह देखना भूल जाते हैं कि इस बिल से देशवासियों को क्या फ़ायदा मिलेगा। उन मजदूरों को क्या फ़ायदा मिलेगा जो मनरेगा के भरोसे अपना जीवन यापन करते है। इस बिल में रोजगार की गारंटी , वेज रेट के बारे में कहा गया है।और सबसे अहम बात, जो लेफ्ट लिबरल गांधी की बात करते हैं तो उसी गांधी के “The soul of India lives in its villages” वाले बयान को भुनाती है। वही लेफ्ट लिबरल ये नहीं देखना चाहते हैं कि सिंबॉलिक तरीके से ही सही मगर आज राम फिर उन गांवों में लौट रहे हैं जिन्हें गांधी ने देश का सबसे जरूरी हिस्सा बताया था।

कांग्रेस के सभी नेता मनरेगा के नाम बदलने और उसमें राम के ज़िक्र पर अपनी आपत्ति जाता रहे हैं। खैर गांधी जी ने तो अपने अंतिम समय में भी हे राम ही कहा था। उन्हें राम नाम प्रिय भी था, मगर आज के नए गांधीवादियों को ना ही गांधी से प्रेम है और ना ही राम है, उन्हें अगर कुछ प्रिय है तो वो है दोगलापन।

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