कौन है गुलफिशा फ़ातिमा? जानिए दिल्ली में हुए हिंदू-विरोधी दंगों में क्या थी भूमिका

Summary
गुलफिशा फ़ातिमा को लेफ्ट-लिबरल इकोसिस्टम ‘मासूम लड़की’ बताता है। लेकिन दिल्ली दंगों की चार्जशीट में उसका क्या रोल था?

“आज़ाद परिंदे का नाम है गुलफिशा…. कभी ना डरने वाली, कभी ना टूटने वाली, कभी ना झुकने वाली… हिम्मत वाली लड़की का नाम है गुलफिशा…”

इस शेर को सुनने के बाद अगर आपको मिर्ज़ा ग़ालिब या फिर जावेद अख्तर याद आ रहे है तो रुकिए यहाँ कोई मुशायरा नहीं हो रहा है।यहाँ जिस गुलफिशा की बात हो रही है वो किसी शायर की ग़ज़ल वाली गुलफिशा नहीं और ना ही ये  लाइने तालिबान से लड़ने वाली किसी कबीलाई लड़की को समर्पित की जा रही हैं। 

लेफ्ट लिबरल लॉबी ये लाइनें उस गुलफिशा को समर्पित कर रही है, जिसने 2020 में हुए हिंदू विरोधी दिल्ली दंगों के ब्रेन्स में से एक थी। सोशल मीडिया पर एक वीडियो को खूब शेयर किया जा रहा है। वीडियो में एक महिला को फूल-माले पहना कर स्वागत किया जा रहा है। वीडियो में दिख रही लड़की ही गुलफिशा है। वही गुलफिशा है जिसने मुसलमान औरतों को तेजाब और मिर्च इकट्ठा करवाया था। लेकिन आज भला मैं गुलफिशा की बात क्यों कर रहा हूँ? बताता हूँ क्यों कर रहा हूँ। 

थोड़ा सा दिमाग़ पर ज़ोर डालिए और याद कीजिए कि दिल्ली दंगों से जुड़ी आख़िरी बड़ी खबर आपने कब और क्या सुनी थी? मैं याद दिलाता हूँ, जनवरी 2026 में दिल्ली दंगों के मामले में दंगाइयों की बेल याचिका पर सुनवाई हुई थी। 

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में असम को भारत से काटने की बात करने वाले शरजील इमाम और कश्मीर को भारत से अलग मानने वाले उमर ख़ालिद की बेल याचिका ख़ारिज कर दी थी। लेकिन इसी के साथ पाँच दंगाई लीडर्स को जमानत मिल भी गई थी। 

आपने इस बात पर तो खूब हल्ला सुना होगा कि उमर और शरजील को जमानत नहीं मिलना देश में न्याय व्यवस्था का फेलियर है, डेमोक्रेसी की मौत है, रवीश और आरफ़ा के वीडियो और कई सारे ऑप एड्स भी देख लिए होंगे। लेकिन इस शोर के बीच जो जिहादी जेल से बाहर निकले हैं, उनके बारे में आपने कुछ नहीं सुना होगा। ये कितने खतरनाक हैं और इनका जेल से बाहर आना क्यों समस्या है, ये मैं आपको एक एक करके बताऊंगा। आज सबसे पहले बात होगी गुलफिशा फ़ातिमा की। 

पहले गुलफिशा का छोटा सा इंट्रोडक्शन आपको दे देता हूँ। वायर और बाक़ी वामपंथी मीडिया के अनुसार वो एक साधारण सी दिल्ली की लड़की है जिसके अब्बा परचून की दुकान चलाते हैं, जिसकी अम्मी उसे पढ़ने वाली लड़की बताती हैं और वामपंथी-इस्लामी मीडिया उसे एक्टिविस्ट और MBA ग्रेजुएट बताता है। उस पर दुखभरी कहानियाँ लिखता है। 

अब इस गुलफिशा की दूसरी पहचान सुनिए और जानिए कैसे इसी एक पढ़ने लिखने वाली लड़की ने दिल्ली में हिंदू विरोधी दंगे चालू करवाए थे। आपको आगे जो मैं डिटेल्स बताऊंगा उनमें से कई आज तक पब्लिक फोरम में नहीं आई हैं और सिर्फ़ दिल्ली पुलिस की चार्जशीट में हैं। 

तो गुलफिशा फ़ातिमा, शरजील और उमर  जैसे के साथ पहले दिन से जुड़ी थी। जब दिसंबर 2019 और जनवरी 2020 में CAA NRC के विरोध में मुसलमान दिल्ली की सड़कें कब्जा रहे थे, तो उसके पीछे गुलफिशा का ही दिमाग़ चल रहा था। 

गुलफिशा पिंजरा तोड़ नाम के संगठन की मेंबर है जो रेडिकल लेफ्ट हैं और दिल्ली में हिंसा चालू करवाने में  इनका बड़ा रोल था। गुलफिशा दिल्ली दंगों के लिए बनाए गए व्हॉट्सएप ग्रुप DPSG यानी दिल्ली प्रोटेस्टर सपोर्ट ग्रुप की कोर मेंबर थी। ये ग्रुप में दिल्ली में हुए हिंदू विरोधी दंगों की प्लानिंग का सबसे टॉप समूह था। इसमें उमर, राहुल दीवान और बाक़ी सारे दंगाई शामिल थे। इसी ग्रुप में दंगे की पटकथा लिखी गई थी। 

वैसे गुलफिशा ने DPSG के इतर 29 दिसंबर 2019 को दो और ग्रुप बनाए थे, जिसका नाम था – Warrior और Aurton Ka Inquilab। गुलफिशा के पास स्पेसिफिक टास्क था कि वो मुसलमान औरतों को मोबिलाइज करेगी। और उसने किया भी, इसके वीडियो मिलते हैं। 

दिल्ली के हिंदू विरोधी दंगे से पहले जब मुसलमान राजधानी की सड़कें एक एक करके कब्जा रहे थे तो गुलफिशा को जिम्मेदारी दी गई थी कि वह सीलमपुर के मदीना मस्जिद के पास जो प्रोटेस्ट्व साईट बनाया गया था वहाँ पर 24*7 सर्विलाइंस करे। और वो 24 घंटे उमर के टच में थी।  

अब तक आपको अंदाजा लग गया होगा कि गुलफिशा फ़ातिमा कोई साधारण लड़की नहीं बल्कि उमर के दर्जे की जिहादन है। चूंकि गुलफिशा ख़ुद जाफराबाद की रहने वाली है इसलिए उसे उमर ख़ालिद ने इंस्ट्रक्शन दिया था कि वो सीलमपुर के 66 फूटा चौक के पास चक्का जाम करे। 66 फूटा रूट सीलमपुर को वज़ीराबाद से जोड़ता है। इसलिए उसी पॉइंट को चक्का जाम करने का पॉइंट बनाया गया। गुलफिशा के साथ उनका पिंजरा तोड़ गैंग भी था। ये वही पिंजरा तोड़ है जिसकी मेंबर नताशा नरवाल और देबांगला थीं।

और जो लोग उसको मासूम बताते हैं वो ये भूल जाते हैं कि इनके साथ दंगों में शामिल मुसलमानों ने भी ख़ुद इनकी करतूतों की जानकारी पुलिस को दी है। ये लोग अब सरकारी गवाह बन चुके हैं और इनके नाम जाहिर नहीं किए जा सकते। लेकिन चार्जशीट में इन्होंने जो बताया है, उससे पता चल जाएगा कि गुलफिशा का इनवॉल्वमेंट का लेवल क्या था। 

ऐसे ही एक सरकारी गवाह स्मिथ (बदला हुआ नाम) ने बताया है कि 23 जनवरी 2020 को सीलमपुर के यमीन हाउस में एक सीक्रेट मीटिंग हुई थी। इस मीटिंग में उमर ख़ालिद और तशलीम अहमद भी मौजूद था। 

दूसरे सरकारी गवाह एको ने बताया है कि उमर ख़ालिद के तरफ़ से मीटिंग में गुलफिशा को इंस्ट्रक्शन दिया गया कि सीलमपुर में मुस्लिम महिलाएँ आ रही है। उनको कह देना है कि वो लोग एसिड यानी तेजाब के पाउच, चिली पाउडर और डंडे अपने पास रखने के लिए स्टॉक करना शुरू कर दे। बाद में उसने ये सामान ख़ुद भी ख़रीदा। 

इस मीटिंग की ये एक्सक्लूसिव तस्वीर है जो आपको स्क्रीन पर दिख रही होगी। इसमें उमर ख़ालिद के दाएँ हाथ पर बैठी लड़की ही गुलफिशा है।  खैर कहानी को आगे बढ़ाते हैं। 

गुलफिशा ने उमर से मिले तेजाबी इंस्ट्रक्शन को मुसलमान औरतों को बढ़ा दिया और उसके बाद क्या हुआ, ये भी गवाह एको ने बताया है। 

गुलफिशा चूंकि पढ़ी लिखी है इसलिए होशियार भी थी। आपको पता है वो मुसलमान औरतों को कैसे मोबिलाइज करती थी, उसने इसके लिए विशेष कोडवर्ड डिजाइन किए हुए थे। 

गुलफिशा का एक कोड वर्ड था, “कल ईद है, कल नैनीताल जाना है।” इसका मतलब पता है आपको क्या था?  कल रोड ब्लॉक करने जाना है। कल चक्का जाम करना है। एक और कोड वर्ड था, आज चाँद की रात है, इसका मतलब था आज रात को चक्का जाम करना है। 

जब गुलफिशा ये सब कर रही थी तो उस दौरान दिल्ली को मुसलमान लगातार बंधक बना रहे थे। क्या शाहीन बाग और क्या जाफराबाद, हर जगह वो ये दिखा रहे थे कि तुम भले ही संसद में कानून ले आओ लेकिन स्ट्रीट वीटो तो हमारे पास है, देखो हम सड़क जाम कर देंगे, अपनी बात मनवाने के लिए औरतों को सड़क पर बिठा देंगे और फिर भी नहीं मानोगे तो इसके आगे के भी कदम उठाएँगे। 

खैर तुजुक ए गुलफिशा को आगे बढ़ाते हैं, गुलफिशा इस प्रोटेस्ट में लगातार मुसलमान महिलाओं को इन्वॉल्व कर रही थी और CAA NRC पर केंद्र सरकार के ख़िलाफ़ उनके मन में ज़हर की खेती को बढ़ा रही थी। 

17 फ़रवरी, 2020 को चांदबाग में हुई एक मीटिंग में भी गुलफिशा फ़ातिमा शामिल थी।  ये मीटिंग दंगे की प्लानिंग फ़ाइनल करने के लिए की गई थी। यानी इनके चक्का जाम वाले स्टार्ट अप को फूल स्केल वायलेंस में कैसे तब्दील किया जाए इस पर बात हुई थी। 

वैसे गुलफिशा सिर्फ़ मीटिंग्स ही नहीं करती थी बल्कि वो किसी भी तालिबान कमांडर की तरह दंगा चालू करवाने में सबसे आगे थी। दिल्ली पुलिस की चार्जशीट कहती है कि जब दंगा ढंग से नहीं भड़का तो 23 फ़रवरी, 2020 को गुलफिशा ने नताशा और देबांगना के साथ मिल कर 300 मुसलमान औरतों-बच्चों को  पहले जहाँगिरपूरी से शाहीनबाग और फिर जाफराबाद ले गई। ये वही औरतें हैं जो चक्का जाम में शामिल थी।

दिल्ली पुलिस को Protected witness हीलियम ने बताया है कि गुलफिशा, नताशा और देवांगना उन 300 मुस्लिम औरतों को वही लेकर गई, जहाँ हिंदू CAA और NRC के समर्थन में बैठे थे। 

उन महिलों के हाथ में चिली पाउडर, एसिड और काँच की बॉटलें थी। गुलफिशा ने उन मुस्लिम महिलों से यह भी कहा था कि अपने साथ अपने बच्चों भी धरने की जगह रखो। जिससे यह होगा कि दिल्ली पुलिस तुम्हें अरेस्ट नहीं करेगी या कोई गिरफ्तार भी हुआ तो उन बच्चों के नाम पर सिम्पथी ली जाएगी। 

और अब मैं आपका सामना उस सच से करवाऊँगा जो बताएगा कि ये मासूम सी बताई जाने वाली मुसलमान लड़की क्या करने में सक्सेस हुई थी। जिस जगह जाफराबाद में ये मुसलमान औरतों को लेकर गई थी, वहीं पर 23 फ़रवरी, 2020 को दिल्ली दंगा चालू हुआ था। 

गुलफिशा ने जिन मुसलमान औरतों से हमला करवाया था वो दिल्ली के हिंदू विरोधी दंगों की पहली किश्त थी। मौजपुर स्टेशन के पास हुई इस हिंसा की उस दिन की तस्वीरें आप स्क्रीन पर देख सकते हैं। इसके बाद दिल्ली जलना चालू हो गई और उसका परिणाम हुआ कि अंकित शर्मा, रतन लाल, राहुल सोलंकी और दिलबर नेगी जैसे दर्जनों हिंदुओं की मौत का कारण बनी। 

लेकिन सवाल उठता है कि आख़िर गुलफिशा फ़ातिमा के पीछे और कौन था, उमर ख़ालिद जैसे लोग इंस्ट्रक्शन दे रहे तो इन्हें पैसा कौन दे रहा था, इनके कनेक्शन आख़िर और कहाँ तक हैं। ये भी आपको बताता हूँ। 

तो इसके पीछे था ताहिर हुसैन। वही ताहिर हुसैन जो PFI के ऑफिस में उमर ख़ालिद से मुलाक़ात की थी। और इस मुलाक़ात में उमर ख़ालिद ने ताहिर हुसैन से कहा था कि पैसों की चिंता मत करो। 

protected witness सैटर्न ने बताया कि ताहिर ये पैसे प्रोटेस्ट वाले जगह पर दिया करता था और कहता कि आगे काम आयेगा। मुझसे कहा कि सीलमपुर चल वहाँ कोई गुल मैडम है उनसे मिलना है। फिर उसके बाद ताहिर हुसैन ने मैडम गुल को एक बंडल पैसा दिया और कहा कि काम आयेगा। आपको पता है वो मैडम गुल कौन थी? गुलफिशा फ़ातिमा। 

गुलफिशा दंगे की हर डेवलपमेंट उमर ख़ालिद तक पहुँचा रही थी। गुलफिशा के साथ नताशा, देवांगना और तस्लीम अहमद भी। 5 jan , 14 jan, 11 feb, 22 feb इन सारे डेट्स की पल-पल की खबर उमर ख़ालिद तक पहुँची गई।  chat page 10 

गुलफिशा को 9 अप्रैल 2020 को इस मामले में गिरफ्तार किया गया था और अब वो जेल के बाहर है लेकिन उसे बाहर निकालने की कोशिशों में इतने दिन कोई कमी इस गैंग ने नहीं छोड़ी थी। गुलफिशा इस इस्लामी वामपंथी गैंग की कितनी अहम मेंबर है, इसका अंदाजा अप्रैल 2025 में चले इस कैंपेन से लगाइए। 

फ्री गुलफिशा वाले इस कैंपेन में आरफ़ा से  लेकर प्रशांत भूषण तक और तीसता सीतलवाड़ से लेकर जीशान अय्यूब और आकार पटेल तक की मंडली ने हिस्सा लिया था। जिनके साथ ये गैंग खड़ी हो जाए, जान जाइए कि वो कोई आम मुसलमान लड़की नहीं है बल्कि उस गैंग का हिस्सा है जो भारत को हर रोज़ तोड़ने की बात करते हैं। 

दिल्ली दंगों पर उमर और शरजील से आगे आपने कहीं कुछ नहीं सुना होगा। नहीं सुना होगा क्योंकि इकोसिस्टम आपको इससे ज़्यादा कुछ बताना नहीं चाहता। खेल के चेहरे और हैं और उसके मोहरे और हैं। जब मोहरे बाहर आ जाएँगे तो चेहरे तो बाहर लाने ही पड़ेंगे। 

जितना बड़ा जिहादी शरजील है, उससे कहीं ज़्यादा जहर गुलफिशा में भरा है, वो इसलिए क्योंकि शरजील तो खुले तौर पर आंतकी धमकी देता है लेकिन गुलफिशा चुपके से मुसलमान औरतों को मोबिलाइज़ कर देती है। जहाँ बाकियों की तक़रीरें वायरल होती हैं तो गुलफिशा की पोएम्स वायरल करवाई जाती हैं। 

ऐसे लोग जेल में ही नहीं बल्कि देश के किसी हिस्से में रहेंगे तो उसे तोड़ने की ही बात करेंगे लेकिन शायद आपको कभी इनके बारे में पता ही नहीं चले। लेकिन हम आपको सब बताएँगे। 

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