प्रदूषण के नाम पर जो प्रदर्शन इंडिया गेट के बाहर 09 नवंबर और 23 नवंबर को किए गए उसमें प्रदूषण के मुद्दे को भुलाकर नक्सली आतंकी हिडमा और फ़िलिस्तीन समर्थन के नारे और पोस्टर लहराए गए। नये लेबर कोड के खिलाफ विपक्ष ने जिस विरोध प्रदर्शन का ऐलान किया है, उसमें भी जेएनयू के वामपंथी छात्र संगठन शामिल होने ही वाले हैं। ऑपइंडिया की टीम जब इस प्रोटेस्ट की कहानी जानने दिल्ली जेएनयू कैंपस जाकर वहाँ के छात्र एक्टिविस्टों से बातचीत की जिसमें कई तरह के खुलासे हुए। ऑपइंडिया ने अपने लेख में इस पूरे प्रदर्शन की टूलकिट को उजागर कर दिया। लेकिन हम उन छात्रों से बात करने गए जो JNU में प्रोटेस्ट की पढ़ाई करते हैं।
हमने प्रोटेस्ट की पढ़ाई इस शब्द का इस्तेमाल किया, इससे आप चौंकिए मत। क्योंकि हर बड़े सरकार विरोधी आंदोलन का बीजारोपण ऐसे ही शिक्षा संस्थान में हुआ है, जिसमें वामपंथी छात्र संगठन का जोर चलता है। हर आंदोलन को युवा फूट सोल्जर्स की सप्लाई करवाने में यही संगठन अपना योगदान देकर संस्थान को बदनाम कर देते हैं। हम तो ये जानना चाहते हैं, कि आखिर इनके नायक कौन हैं? हर सरकारविरोधी या देशविरोधी प्रदर्शन में शामिल होने के लिए ये क्यूँ प्रेरित हो जाते हैं? अपनी रेगुलर पढ़ाई के अलावा इनकी नजरों को ऐसा क्या दिखाई देता है, जो ये अपना करियर-वरियर छोड़-छाड़कर झोला उठाने के लिए आतुर हो जाते हैं?
सबसे पहले हमने वामपंथी संगठनों के छात्रों से इस बारे में बातचीत की और उनके राय जानने की कोशिश की।
सागर से बातचीत (SFI वामपंथी छात्र संगठन से तालुक रखता है )
सागर से जब हमारे रिपोटर हर्ष वर्धन ने जेएनयू के वामपंथी छात्रों को हाल में हुए प्रदर्शन में देखा गया उसको लेकर सवाल किया तो उन्होंने अपने जवाब में कहा कि – “मुझे क्लियर नहीं है कि कौन से प्रोटेस्ट की बात हो रही है। क्योंकि दो प्रोटेस्ट हुए एक 9 नवंबर को और एक प्रोटेस्ट हुआ कल शाम (23 नवंबर, 2025) को। मुझे नहीं लगता है कि इसमें JNUSU (JawaharLal Nehru University Student Union) के कोई सदस्य था या फिर अदिति मिश्रा इसमें शामिल नहीं थी या फिर लीड कर रही थी।” लेकिन सागर यहाँ अपने तथ्य से भटके हुए पाए गए क्योंकि सोशल मीडिया पर साफ़-साफ़ दिख रहा है कि 09 नवंबर को हुए प्रोटेस्ट में अदिति मिश्रा उस प्रोटेस्ट को लीड कर रही थी जिसकी वजह से उसको गिरफ्तार किया गया।
सागर से जब हमने गाजा और फ़िलिस्तीन के नारे लगाएं उसको लेकर उन्होंने कहा – “किसी भी आंदोलन में 10 तरह की माँग होती है। यह उनका अधिकार है। गाजा और फ़िलिस्तीन के पोस्टर लेकर खड़े हैं। हमारा फ़िलिस्तीन के ऊपर जो पॉलिटिकल टेक है वहाँ जो भी हो रहा है। वो रुकना चाहिए। आप यह नहीं कह सकते हैं यहाँ लोग किसी और चीज़ के लिए खड़े हुए है वहाँ किसी और चीज़ की बात नहीं कर सकते हैं। इस जेएनयू में भी जब प्रोटेस्ट मनाते हैं तब दस तरह के नारे लगाते हैं। इसमें कुछ ग़लत नहीं है।”
लेबर कोड बिल प्रोटेस्ट को लेकर जब सवाल किया गया तो सागर ने कहा कि 26 नवंबर को प्रोटेस्ट का कॉल लिया गया हैं। हमारा संगठन (SFI) इसमें जॉइन करेगा। इसमें कोई इफ या बट नहीं है। मोदी सरकार जब से आई हैं तब से लेबर बिल में चनेज की हैं। उनके हक की बात नहीं हो रही हैं। किसान बिल के वक्त भी ऐसा ही हुआ। उनके हक में बात नहीं की गई। सागर ने आगे कहा- यह आंदोलन किसान आंदोलन से बड़ा होगा। इसे किसान आंदोलन 2.0 के तरह देखना चाहिए।
दुर्गा पूजा के दौरान जब एबीवीपी छात्र संगठन के स्टूडेंट्स को मारा गया तो उसको लेकर सागर ने कहा – “उमर ख़ालिद और शरजील इमाम का रावण बनाकर पुतला जलाना हाइली प्रोब्लेमाटिक है। एक ज़िंदा इंसान का पुतला कैसे जलाया जा सकता है। एबीवीपी के छात्रों के साथ कोई मारपीट नहीं की गई। मैं ख़ुद वहीं पर था। चप्पल और पत्थर की ग़लत हैं।”
सोचिए इस सागर के लिए उमर ख़ालिद और शरजील इमाम का पुतला जलाना हाइली प्रोब्लेमाटिक हैं। वही शरजील इमाम और उमर ख़ालिद जिनसे दिल्ली में हिंदू विरोधी दंगे करवाए। जिस दंगे में मासूम हिंदू मारे गए। दिल्ली पुलिस ने अपनी चार्जशीट में तमाम बातें लिख दी हैं। उमर ख़ालिद उस दंगे की आड़ में रेजिम चेंज करनी की साजिश कर रहा था। लेकिन जेएनयू के वामपंथी छात्र संगठन के एक सदस्य को उस उमर ख़ालिद और शरजील इमाम का पोस्टर जलाना प्रोब्लेमाटिक लग रहा है।
क्या जेएनयू प्रोटेस्ट का हब बन रहा है तो सागर ने कहा कि “हमेशा से जेएनयू प्रोटेस्ट का हब रहा है। जेएनयू प्रोटेस्ट से ही बना है।”
09 नवंबर के बाद 23 नवंबर को दिल्ली के इंडिया गेट के सामने दुबारा प्रदूषण के नाम पर प्रदर्शन हुआ। इसमें भी वामपंथी संगठनों से जुड़े कुछ छात्र दिखाई दिए। आंदोलन प्रदूषण के मुद्दे से शुरू हुआ और माओवादी नक्सली मड़वी हिडमा के महिमा मंडन में कब तब्दील हो गया यह पता ही नहीं चला। हमने इससे जुड़े सवाल भी जेएनयू के वामपंथी सगठनों के कुछ छात्रों से पूछे।
शुभम का बयान (AISF वामपंथी छात्र संगठन से तालुक रखता है)
हमारे रिपोर्टर हर्ष वर्धन ने जब शुभम से हाल में हुए प्रोटेस्टों को लेकर और उसमे जेएनयू की भागीदारी को लेकर सवाल किया तो शुभम ने कहा – “आज पोल्युशन बहुत इम्पोर्टेंट मुद्दा बन चुका है। डॉक्टर्स इमरजेंसी घोषित कर चुके हैं। 28,000 हज़ार के आस पास लोगों की मौत पोल्युशन को लेकर हुआ है। हमे लगता है सरकार को इस मुद्दे पर ध्यान देना चाहिए और ऐकडेमिक स्पेस के सजेशन मानना चाहिए।”
अब शुभम उस ऐकडेमिक स्पेस की बात कर रहे हैं। वैसे तो उमर खालिद और शरजिल इमाम का विमर्श ही शुरुआत में एकेडमिक स्पेस से ही चला था। और हमने देखा है कि किस तरह से उसकी परिणति दिल्ली में 2020 में हुए हिन्दू विरोधी दंगों में हुई थी। एकेडमिक स्पेस से सरकार के प्रति इनका रिएक्शन कैसा होता है?
मिसाल के तौर पर लाइब्रेरी के एंट्रेंस पर फेस रेकग्निशन मशीन लगाया, ताकि लाइब्रेरी का एक्सेस छात्रों को ही हो और किसी अनऑथोराइज्ड व्यक्ति को ना हो। ये एकदम बेसिक चीज है जहाँ पर सरकार एकेडमिक स्पेस के साथ इंटरएक्ट कर रही है, कुछ सुविधा दे रही है। तो उस मशीन का इन शांतिप्रिय वामपंथी संगठनों के छात्रों ने उसे तोड़ा दिया और उसके ऊपर चढ़कर नारे बाजी की।
23 नवंबर को इंडिया गेट पर हिडमा को लेकर जो नारेबाजी की गई उसको लेकर जब सवाल किया गया तो शुभम ने अपने बयान में ऐसा बतलाया की जैसे सरकार ने हिडमा को मार के ग़लत किया है। वो तो लैंडलेस फार्मर थे, जिसने ग़रीबी से तंग आकर बन्दूक उठाई। उसके बाद जब डायलॉग और डिस्कशन की बात की गई तो शुभम ने बताया कि बहुत लॉयर्स और बुद्धिजीवी लोगों का कहना है कि “हिडमा का एनकाउंटर फेक है।”
और यह बुद्धिजीवी कौन सब है, आपको पता है? कहोगे नहीं, असल में यह है कपिल सिब्बल, योगेंद्र यादव, अरुंधति राय, द वायर जैसे संस्थान।
अंजलि का बयान (AISA वांपनाथी संगठन से तालुक रखती है)
AISA के संगठन से तालुक रखने वाली अंजलि से जब हमारी रिपोर्टर रितिका चंदौला ने हिडमा के नारे जो लगाए वो सही है या ग़लत इसको लेकर अंजलि ने कहा – “किसी जल-जंगल बचाने वाले को जानबुझकर भारत की सरकार मरवा रही है। हिडमा मेरे लिए कामरेड है। जो नारे लगाए उसको लेकर मुझे कोई नॉलेज नहीं हैं लेकिन मैं इस नारे के समर्थन में हूँ।”
जब हमारी रिपोटर ने जेएनयू कैंपस में साल 2010 में हिडमा ने सीआरपीएफ के जवानों को मारा था उस वक्त जो जश्न मनाया गया उसको लेकर भी सवाल किया। जिसका जवाब अंजलि के पास नहीं था। यह छात्रा बस वामपंथी संगठन को अपना 100% देने के चक्कर में ख़ुद को इतना झोंक चुकी हैं कि वो उन बातों को भी भूल गई कि उसके बारे ही परिवार के लोग भारतीय सेना में हैं। अंजलि की बातों सुनकर ऐसा लगता है कि किस तरह से वामपंथी संगठन ने इन लोगों का माइंडवाश किया है। उनको इन बातों से कोई लेना देना नहीं है हिडमा कौन है? उसने किसका मारा? बस उनको ये समझ में आता है कि हिडमा हमारा कामरेड हैं।
निशांत का बयान (ABVP छात्र संगठन से तालुक रखता है)
निशांत से हमारी रिपोर्टर रितिका ने जब यह सवाल किया कि किस तरह से जेएनयू में स्टूडेंट्स का माइंडवाश किया जा रहा है। तो निशांत ने बताया कि यह चलन सीताराम येचुरी के वक्त बनाया गया है। जान हिडमा ने सीआरपीएफ के जवानों की हत्या की तो उस वक्त इस जेएनयू में मिठाई बनती गई। जेएनयू के बगल वाले इलाक़े बेर सराय में भी इन वामपंथियों ने मिठाई बांटी।
तो आपने समझा और जाना, कि किस तरह इस मुल्क की राजधानी के दिल में बसा एक बड़ा शैक्षणिक संस्थान धीरे-धीरे वामपंथी अफ़कार का ऐसा अड्डा बन चुका है, जहाँ गमलों में उगते पौधे भी इल्म की जगह अफ़ीम की कहानी कहते हैं।
यहाँ आज़ादी-आज़ादी के नारे, गरीब और दूर-दराज़ के गाँवों से आए मासूम छात्रों के दिमाग़ पर एक ऐसा धुंधलका डाल देते हैं कि उन्हें यह यक़ीन दिलाया जाता है कि “यह सरकार तुम्हारी नहीं, तुम्हारा वजूद, तुम्हारी आवाज़, सब बेगाना है”
यहाँ नक्सलियों को “अब्बा-ए-फ़िक्र” बताया जाता है, उनकी फेंकी हुई मवादी सोच की बोटियों को जन्नत का पाक निवाला समझकर एक अनऑफ़िशल क्रैश-कोर्स चलाया जाता है, जिसमें दंगाइयों, अराजकतावादियों और आतंकियों को ‘रोमांस ऑफ़ रिवॉल्यूशन’ बनाकर पेश किया जाता है। इतना कि देश के लिए ख़ून बहाने वालों की औलादें भी ख़ूनी आंदोलनों के सरगनाओं को अपना आइडल समझने लगें। आतंकवाद के मॉड्यूल शहीद के फ़लसफ़े में बदल दिए जाते हैं।
आज दुनिया किसी और मसले पर बात कर रही हो, मगर हमारी नामी यूनिवर्सिटी के कई वामपंथी छात्र हर विमर्श को अपनी जहरीली मानसिकता के मायाजाल में ऐसा उलझा देते हैं कि मक़सद बहस की जगह शोर, अराजकता और बाँटने की फ़ितरत बन जाता है।
सवाल यही है कि सत्ता विरोध कब और कैसे देश-विरोध में ढल जाता है?
हम इस मंज़र को बरसों से कॉलेज कैंपस के इतिहास में देख रहे हैं। दिल्ली पहुँचते-पहुँचते जहाँ किसी छात्र के घर में फौज की तीन पीढ़ियों का इतिहास लिखा हो, वही छात्र कुछ महीनों में अपनी ही सेना पर सवालों की बौछार करने लगता है। उसी सेना पर, जो उसके ख़्वाबों और सरहदों की रखवाली करती है। और अब… देशभर में लेबर-लॉ के खिलाफ़ माहौल बनाया जा रहा है। उन्हीं छात्रों को दोबारा मोहरा बनाया जा रहा है। उन्हीं को, जिनके लिए ‘प्रतिवाद’ और ‘देशविरोध’ की लकीर जान-बूझकर धुंधली रखी जाती है।
आख़िर इस सबके पीछे कौन-सी हवा, कौन-सी सोच, कौन-सी ताक़तें काम करती हैं? यही इस संवाद, इस डॉक्यूमेंट्री का असल मक़सद था। हमारे इस सफ़र, इस प्रयास, और इन परतों को खोलने का अंदाज़ आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताइए।





