पिछले अनगिनत दशकों से गर्मियों के आने के साथ बुन्देलखण्ड से आने वाली तस्वीरें लोगों को डराती थी। सर पर पानी भरने के बर्तन लिए जाती हुई महिलाएं शायद बुंदेलखंड की इकलौती पहचान बन गई थी। कोई ऐसा साल नहीं जाता था जब इस इलाके से धरती की फटी दरारों को ताकते किसानों की तस्वीरें ना आती हों, जिसे देखकर हम सभी का कलेजा फट जाया करता था और मान लिया गया था कि बुंदेलखंड भले ही रेगिस्तान नहीं है लेकिन यहाँ के लोग हमेशा के लिए रेगिस्तान जैसा ही जीवन जीने के लिए मजबूर होंगे।
बुंदेलखंड के महान और समृद्ध इतिहास के बावजूद यहाँ जन्मे लोगों की जबान यही कहती थी कि अब कभी बुंदेलखंड में जन्म ना मिले। महीने दो भर की बरसात होती और फिर ये इलाका बंजर हो जाता था, ट्रैक्टरों में बैठकर लोग आठ आठ महीने के लिए पलायन कर जाते थे, गांव में जिनके पास बीस बीघा भी ज़मीन होती वो जाकर किसी भट्ठे पर मजदूरी या कहीं फैक्ट्री में मजदूरी करने को मजबूर होते थे।
जमीनें कौड़ियों के भाव बिकती और अनमोल इंसान का मोल साहूकारों की जरूरत तय करती थी। और इसकी वजह क्या थी? तो बुंदेलखान में महीने के तीन सौ दिन पड़ने वाली तेज धूप धरती का पानी और इंसान का ख़ून सोख लेती थी। और सरकारों ने क्या किया? उन्होंने तो मानो सिर्फ़ डाकुओं के छुपने के लिए इस इलाके को छोड़ रखा था।
ददुआ, बालखड़िया, ठोकिया जैसे डाकू इस इलाके की दूसरी पहचान थे, समाजवादी पार्टी के टिकट पर इनमे से कइयों के रिश्तेदारों ने विधानसभा की एसी की ठंडी हवा खाई और मिनरल वाटर पिया और बुंदेलखंड, वो बस प्यासा ही रहा। धूप उसका अभिशाप थी। लेकिन एक दिन, एक फैसले से कहानी बदल गई।
जहाँ से पलायन एक सामाजिक वास्तविकता बन चुका था। जिस बुंदेलखंड की पहचान वर्षों तक सूखे, बेरोजगारी और बदहाली से जुड़ी रही। अब यही बुंदेलखंड भारत के सबसे बड़े सौर ऊर्जा केंद्रों में शामिल होने की तैयारी कर रहा है। और मैं आपको यही कहानी बताने जा रहा हूँ कि सौर ऊर्जा ने पूरे बुंदेलखंड की तस्वीर को कैसे बदला है?
बुंदेलखंड चलें उसके पहले आप पूरे उत्तप्रदेश का ही हाल देख लीजिए, दरअसल उत्तर प्रदेश हमेशा से बिजली संकट से जूझता रहा। 25 करोड़ से अधिक आबादी वाले इस राज्य में बिजली आना भगवान के किसी आशीर्वाद से कम नहीं था। ग्रामीण इलाकों में घंटों बिजली कटौती सामान्य बात थी। DISCOM घाटे में थे और सौर ऊर्जा को लेकर नीति तो छोड़िए, बात भी करने वाला कोई नहीं था। मैं यूपी से ही आता हूँ और मुझे अच्छे से याद है 2012 या तेरह में सौ वाट के दो बहुत छोटे सोलर पैनल हमारे घर पर लगाए गए थे, और वो हमारी मार्केट में नहीं मिले थे बल्कि दिल्ली से आने वाली एक बस पर रखकर मंगवाया गया था, इंस्टॉल होने के बाद पूरे गांव में लोगों ने ऐसे रियेक्ट किया था कि मानो यूएफओ का लैंडिंग स्टेशन हमारे छत पर बन गया हो।
लेकिन 2014 के बाद थोड़ा सा सोलर पैनल का प्रचार होना शुरू हुआ, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जिनकी छवि ही नवाचारों का स्वागत करने वाली थी उन्होंने इसके बारे में अपनी रैलियों में बोलना शुरू किया, कुछ पॉलिसी आई, सब्सिडी मिलनी शुरू हुई लेकिन फिर भी उत्तप्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार थी और वो उस टाइम पर गन्ना किसानों को सिंचाई के लिए बिजली और नहर के पानी का मैनेजमेंट नहीं देख पा थी तो सोलर में क्या ही काम करती। 2017 में सरकार बदली, डबल इंजन का टर्म उत्तरप्रदेश को समझ आया और बीजेपी की सरकार बन गई। तब उत्तर प्रदेश की कुल सौर क्षमता केवल 288 MW थी। उस समय उत्तर प्रदेश सौर ऊर्जा के क्षेत्र में देश के बाक़ी राज्यों काफी पीछे ही था। उस समय गुजरात और राजस्थान जैसे राज्य सौर ऊर्जा के क्षेत्र में काफी आगे निकल चुके थे। गुजरात में सोलर से 2017 तक 12 सौ बासठ मेगावाट बिजली उत्पादन हो रहा था। अन्तर देख सकते हैं आप।
लेकिन 2017 के बाद राज्य सरकार ने ऊर्जा को केवल बिजली उत्पादन के रूप में नहीं बल्कि भविष्य की आर्थिक और रणनीतिक आवश्यकता के रूप में देखना शुरू किया। इसी सोच के साथ उत्तर प्रदेश ने सौर ऊर्जा के क्षेत्र में बड़े स्तर पर नीतिगत बदलाव किए। इसका सबसे बड़ा उदाहरण UP Solar Energy Policy 2022 रही। इस नीति के तहत अगले पाँच वर्षों में 22,000 MW सौर क्षमता का लक्ष्य रखा गया। इसमें 14,000 MW सोलर पार्क, 4,500 MW रेजिडेंशियल रूफटॉप, 1,500 MW गैर-आवासीय रूफटॉप और 2,000 MW PM-KUSUM के तहत शामिल किए गए।
इस पूरी व्यवस्था के केंद्र में UPNEDA को रखा गया। राज्य की नोडल एजेंसी के रूप में इसे मिशन मोड में सक्रिय किया गया। सरकार ने इसे केवल एक प्रशासनिक संस्था की तरह नहीं बल्कि सौर ऊर्जा परिवर्तन के मुख्य संचालन केंद्र की तरह इस्तेमाल किया। आज 5,000 से अधिक कंपनियाँ UPNEDA के साथ पंजीकृत बताई गई हैं और अगले पाँच वर्षों में 30,000 युवाओं को “Surya Mitras” के रूप में प्रशिक्षित करने की योजना बनाई गई है, आजकल आप देखिए तो लगभग हर इलाके में दो चार लड़के सोलर के बारे में बताते, उसका फ़ायदा गिनवाते मिल जाएँगे। ये वही सूर्य मित्र योजना के तहत ट्रेन किए गए लोग हैं।
PM सूर्य घर योजना इसका सबसे बड़ा उदाहरण बनकर सामने आई है। फरवरी 2024 में शुरू हुई इस योजना का लक्ष्य 1 करोड़ घरों पर सोलर पैनल लगाना था और उत्तर प्रदेश इसके क्रियान्वयन में अग्रणी राज्य बनकर उभरा। राज्य में 4,48,233 घरों में सोलर पैनल इंस्टॉल किए गए और इतना कॉमन हो गया कि अब मेरे गाँव की तरह किसी ने नहीं सोचा कि ये यूएफओ का लैंडिंग स्टेशन है। मार्च 2026 में अकेले 52,729 मासिक रूफटॉप इंस्टॉलेशन हुए, और 2017 में पूरे देश में सबसे पीछे रहा स्टेट, 2026 में सोलर इंस्टालेशन में नंबर वन हो गया। और सरकार ने इसको प्रमोट करने के लिए लोगों की मदद भी की, अक्टूबर 2025 तक ₹1,808.09 करोड़ की सब्सिडी वितरित की गई।
इसका आर्थिक असर भी आपको देखना चाहिए। बहुत सारे लोग जो खेती के लिए महंगे बिजली कनेक्शन और डीजल इंजनों पर निर्भर थे उन लोगों ने सोलर पंप्स लगवा लिए हैं, उसपर सब्सिडी मिल रही है और बिना बिल की टेंशन के खेतों की सिंचाई कर रहे हैं। मेरे अपने गांव में आज कम से बीस सोलर पंप दिखने लगे हैं, जो अपना खेत भी सींच रहे हैं और कुछ पैसे लेकर दूसरों के खेत की सिंचाई भी कर रहे हैं। 3kW सोलर सिस्टम वाले परिवारों को सालाना ₹27,000–30,000 तक की बचत हो रही है। इसके साथ 1.25 लाख से अधिक प्रत्यक्ष और परोक्ष रोजगार तथा 16.5 लाख मीट्रिक टन वार्षिक कार्बन इमिशन में कमी का दावा किया गया।
ये कहानी हुई पूरे उत्तरप्रदेश की लेकिन हमने शुरू बुंदेलखंड से किया था तो अब वापस बुंदेलखंड पर आते हैं। और ये जानना बहुत जरूरी है कि जहाँ सामान्य परिस्थितियां थी वहाँ तो ये चेंज एक टेक्नोलॉजी चेंज के तौर पर देखा जाएगा। कि पहले डीजल इंजन था, आज सोलर पंप है। पहले बिजली कनेक्शन था अब सोलर कनेक्शन है। लेकिन जहाँ कुछ नहीं था, जहाँ का जमींदार भी एक वक्त पर किसी ठेकेदार का मजदूर बनने को मजबूर था वहाँ आपकी तकनीकी ने क्या किया? जो खेत सदियों से पानी नहीं धूप पी रहे थे वहाँ आपके सोलर पैनल क्या कर रहे हैं इसको समझना जरूरी है।
तो आज बुंदेलखंड में टोटल 4995 मेगावाट क्षमता के 8 बड़े सोलर पार्क विकसित किए जा रहे हैं, जो इन टोटल दुनिया का सबसे बड़ा सोलर पार्क बनेगा, वैसे सिंगल लार्जेस्ट अभी भी राजस्थान भादला सोलर पार्क ही रहेगा। अभी केंद्र सरकार की सोलर पार्क योजना के तहत उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के जॉइंट बुंदेलखंड क्षेत्र में इन परियोजनाओं को मंजूरी दी गई है। इनमें सबसे बड़ा 1200 मेगावाट का सोलर पार्क जालौन में प्रस्तावित है। इसके अलावा चित्रकूट में 800 मेगावाट, झाँसी और ललितपुर में 600-600 मेगावाट, छतरपुर में 950 मेगावाट, बरेठी में 630 मेगावाट और कल्पी में 65 मेगावाट क्षमता की परियोजनाएँ शामिल हैं।
इन सभी परियोजनाओं को मिलाकर बुंदेलखंड देश के सबसे बड़े सौर ऊर्जा क्लस्टरों में शामिल हो रहा है। उत्तर प्रदेश सरकार और UPNEDA इन परियोजनाओं के जरिए बुंदेलखंड को सौर ऊर्जा हब के रूप में विकसित करने की योजना पर काम कर रहे हैं। सरकार का फोकस उन इलाकों पर है जहाँ लगातार सूखा, कम बारिश और सिंचाई संकट की वजह से खेती प्रभावित रही। यही कारण है कि बड़ी मात्रा में उपलब्ध बंजर और कम उत्पादक जमीन को सौर परियोजनाओं के लिए चिन्हित किया गया।
दरअसल बुंदेलखंड की भौगोलिक परिस्थितियाँ बिना किसी विजन के अभिशाप लगती थी आज सिर्फ़ सोच और विजन का फ़र्क़ है कि वही धूप एक तरह से सोना नजर आ रही है। साल के करीब 300 दिन तेज धूप और विशाल खाली जमीन इस क्षेत्र को बड़े सोलर पार्कों के लिए आदर्श बनाती है। यही वजह है कि केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार और उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने इस इलाके में बड़े स्तर पर सौर निवेश बढ़ाने की रणनीति तैयार की है।
इसे पूरे क्षेत्र के ऊर्जा नेटवर्क का अहम हिस्सा बनाया जा रहा है। महोबा के कबरई को अगर आप देखें तो यहाँ ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर-2 परियोजना के तहत यहां बने 220 केवी उपकेंद्र से पहली बार 70 मेगावाट सोलर से बनी बिजली यूपी के ग्रिड में भेजी गई। दूसरा जिला जालौन देखिए इस जिले में पिछले पांच वर्षों में 300 मेगावाट से अधिक क्षमता की परियोजनाएं स्थापित हुई हैं, जिनमें लगभग 1500 करोड़ रुपये का निवेश हुआ है।
जिला प्रशासन ने करीब 23 हजार एकड़ ज़मीन का बैंक तैयार किया है, जिसके जरिए लगभग 4000 मेगावाट बिजली उत्पादन की उम्मीद की जा रही हैं। झाँसी और ललितपुर को भी बुंदेलखंड के सौर ऊर्जा हब की रीढ़ माना जा रहा है। दोनों जिलों में 600-600 मेगावाट क्षमता की परियोजनाएं प्रस्तावित हैं। बांदा जिले में पहले से 90 मेगावाट की सौर परियोजना संचालित हो रही है और यह क्षेत्र भी ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर से जुड़ रहा है। वहीं बुंदेलखंड के विभिन्न जिलों में फैली कुल 25 हजार एकड़ भूमि पर सौर परियोजनाएं स्थापित हो चुकी हैं या निर्माणाधीन हैं।
इसके साथ करीब 296 किलोमीटर लंबे बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे के किनारे 450 से 500 मेगावाट क्षमता की सोलर परियोजनाएँ विकसित करने की योजना बनाई गई है। जिसे सोलर एक्सप्रेसवे कहा जा रहा है, ये अपने आप में बहुत अनूठा एग्जाम्पल बनेगा।
उत्तर प्रदेश सरकार एक्सप्रेसवे और सोलर परियोजनाओं को जोड़कर ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर मॉडल पर काम कर रही है। इसका उद्देश्य बिजली उत्पादन, ट्रांसमिशन और औद्योगिक निवेश को एक साथ बढ़ाना है। इसी वजह से एक्सप्रेसवे से जुड़े इलाकों में जमीन चिन्हित करने और निजी कंपनियों की भागीदारी बढ़ाने की प्रक्रिया तेज की गई है।
इस बदलाव का सबसे महत्वपूर्ण असर उन किसानों पर दिखाई दे रहा है जिनके पास जमीनों तो बहुत थी लेकिन उनसे होने वाला प्रोडक्शन उन किसानों का अपना पेट नहीं भर पा रहा था। झाँसी और आसपास के कई गाँवों में किसान अपनी जमीन सोलर कंपनियों को लीज पर दे रहे हैं। किसानों का कहना है कि खेती से सालभर में जितनी कमाई नहीं हो पाती थी, उससे ज्यादा रकम अब किराये के रूप में मिल रही है। और ये समझना बहुत जरूरी है कि ये सिर्फ़ पैसे के बारे में बात नहीं है। ये बेसिक जरूरत की बात है, रोटी कपड़ा मकान, जिन मूलभूत आवश्यकताओं की बात होती है ये उसकी बात है।
बेहद कम कम बारिश, भयंकर धूप और सिंचाई का संकट की वजह से खेती असेट नहीं लायबिलिटी बनती जा रही थी। अब ऐसे में सोलर कंपनियों के साथ 25 से 30 साल तक के अनुबंध किसानों के लिए स्थायी आय का जरिया बन गए हैं। कई किसानों की वह जमीन जो पहले बंजर या कम उत्पादक मानी जाती थी, अब बड़े स्तर पर सोलर परियोजनाओं का हिस्सा बन रही है।
यानी जिस बुंदेलखंड को कभी सूखा और पलायन की भूमि कहा जाता था, वहीं आज जिले-दर-जिले सौर ऊर्जा की वजह से निवेश, रोजगार और नई आर्थिक गतिविधियों का केंद्र बनता दिखाई दे रहा है। और ये समझना होगा कि यह कहानी केवल बिजली उत्पादन की नहीं है, बल्कि जिस इलाके को डाकुओं के हवाले एक वक्त की सरकारों ने छोड़ दिया था, जिस इलाके के लोगों को पलायन के लिए मजबूर कर दिया था अब वो इलाका कैसे थ्राइव कर रहा है उसे देखना चाहिए।
महोबा के पनवाड़ी क्षेत्र के किसान अवधेश प्रताप सिंह इसका एक उदाहरण हैं। पहले वे 30 एकड़ में गेहूं और चना उगाते थे, लेकिन खेती की लागत, मौसम और जंगली जानवरों की वजह से आमदनी अनिश्चित रहती थी। आज उनकी उसी जमीन पर 15 मेगावाट का सोलर प्लांट लगा है। 29 साल 11 महीने की लीज के तहत उन्हें प्रति एकड़ 50 हजार रुपये वार्षिक किराया मिलता है, जिसमें हर साल 3% बढ़ोतरी भी तय है। नतीजा यह है कि बिना खेती किए, बिना अपने पैसे को डायरेक्टली रिस्क पर लगाए उनकी सालाना आय लगभग 15 लाख रुपये तक पहुंच गई है।
और ये सिर्फ़ एक उदाहरण मैंने बताया है, ऐसे लाखों किसानों के जीवन पर अलग अलग ढंग से इम्पैक्ट पड़ रहा है। हमें ये समझना होगा कि परिस्थियाँ संसाधनों से नहीं, नज़रिये से बदलती हैं। बुंदेलखंड की धूप आज से दस साल पहले भी उतनी ही तेज थी जितनी आज है। फर्क सिर्फ इतना है कि तब उसे अभिशाप माना जाता था और आज वही धूप हजारों मेगावाट बिजली, करोड़ों के निवेश और लाखों लोगों की उम्मीद बन चुकी है। जो सुबह को उगता सूरज दोपहर की धौंस देता था अब लोग एक तरह से उसका स्वागत कर रहे हैं।
याद रहे 2017 में उत्तर प्रदेश की सौर क्षमता केवल 288 मेगावाट थी। आज यह बढ़कर हजारों मेगावाट के स्तर पर पहुँच चुकी है। राज्य में लाखों घरों पर सोलर पैनल लग चुके हैं, हजारों किसानों को सोलर पंप मिले हैं और बुंदेलखंड जैसे क्षेत्र देश के सबसे बड़े सौर ऊर्जा क्लस्टरों में शामिल हो रहे हैं। और इसकी वजह सिर्फ़ और सिर्फ़ नजरिये की है। यूपी को जब केंद्र सरकार ने एक दिया तो यूपी ने अपना एक जोड़कर उसे सिर्फ़ दो बनाने तक ख़ुद को सीमित नहीं रखा बल्कि उसे ग्यारह कैसे बनाया जाये इस ओर प्रयास किया।





