rahul gandhi

क्यों कांग्रेस के कॉकरोच हैं राहुल गांधी? किसने बनाया DK Shivkumar को Karnataka का CM?

Summary
कर्नाटक में एक लंबे वक्त के विवाद के बाद अचानक से वर्तमान मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने इस्तीफा दे दिया और लगे हाथों एक लंबे वक्त से कर्नाटक के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर नजर गड़ाए बैठे उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार की ताजपोशी का ऐलान भी हो गया।

एक लंबे वक्त से राहुल गांधी भारत की राजनीतिक चर्चा से बाहर थे, लेकिन अब उनकी वापसी हो गई है। और दिलचस्प बात ये है कि ये वापसी राहुल गांधी के कुछ करने नहीं, बल्कि कुछ भी न कर पाने की वजह से हुई है।

दरअसल कर्नाटक में एक लंबे वक्त के विवाद के बाद अचानक से वर्तमान मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने इस्तीफा दे दिया और लगे हाथों एक लंबे वक्त से कर्नाटक के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर नजर गड़ाए बैठे उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार की ताजपोशी का ऐलान भी हो गया। ये घटनाक्रम जितनी तेजी से घटित हुआ, उसने कई तरह के सवाल खड़े किए।

और सबसे बड़ा सवाल ये कि जो लड़ाई पिछले तीन वर्षों या उससे भी लंबे वक्त से डीके शिवकुमार लड़ रहे थे और मुँह की खा रहे थे, अचानक से वो लड़ाई जीत कैसे गए? किसका वीटो था जिसने सिद्धारमैया को इस्तीफा देने पर मजबूर किया और डीके शिवकुमार को कर्नाटक का मुख्यमंत्री बना दिया? क्योंकि राहुल गांधी का वोट तो सिद्धारमैया के ही साथ था, तो सवाल ये भी कि कांग्रेस में राहुल गांधी से बड़ा और ताक़तवर वोट किसका हो चला है? और ये पहली बार नहीं हुआ कि राहुल गांधी के वीटो के आगे एक और वीटो चल रहा है, जिससे राहुल गांधी मात खा रहे हैं।

हाल का ही केरल विधानसभा चुनाव भी देखा जाना चाहिए। केरल में राहुल गांधी चाहते थे कि केसी वेणुगोपाल को ही मुख्यमंत्री बनाया जाए। यहाँ तक कि AICC के ऑब्जर्वर मुकुल वासनिक की एक तस्वीर भी मीडिया में आई, जिसमें बैठक के बाद जो कथित फ़ैसला हुआ था, उसमें केसी वेणुगोपाल पहली प्राथमिकता थे और दूसरी प्राथमिकता के तौर पर रमेश चेन्नीथला का नाम था। लेकिन जब मुख्यमंत्री बनने का ऐलान हुआ, तो वीडी सतीशन का नाम निकलकर सामने आया। और सवाल तब भी खड़ा हुआ कि आख़िर राहुल गांधी जिसे सीएम बनाना चाहते थे, केरल में उसको छोड़िए, दूसरे नंबर पर भी जो राहुल गांधी की पसंद का नाम था, वो रमेश चेन्नीथला का नाम था, लेकिन उनको भी पीछे छोड़ते हुए वीडी सतीशन के नाम का ऐलान कैसे हो गया?

और अब कर्नाटक के सारे घटनाक्रमों के बाद जो रिजल्ट आया है, उसमें डीके शिवकुमार को मुख्यमंत्री बनाया जाना है। उसने भी इसी सवाल को जन्म दिया है कि राहुल गांधी की बात कैसे कट जा रही है? क्योंकि राहुल गांधी ने तो सोनिया गांधी के सबसे करीबी और कांग्रेस में नंबर दो कहे जाने वाले अहमद पटेल तक को एक दौर में कांग्रेस से किनारे लगा दिया था। अहमद पटेल को राजनीति छोड़ने के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया था। मीडिया में हेडलाइंस बनने लगी थीं कि राहुल कांग्रेस के ओल्ड गार्ड्स को ख़त्म करके नई और मॉडर्न कांग्रेस बनाने जा रहे हैं। और राहुल गांधी कांग्रेस के हाथ की लकीर का आकार तय करने वाले इकलौते चित्रकार के तौर पर देखे जाने लगे थे। तो क्या अब उनकी कूँची का पेंट ख़त्म होने लगा है, या जिस चित्रकारी को पूरे देश ने नकार दिया था, अब उसे उनकी अपनी पार्टी ने भी ज़ोर से नकारना शुरू कर दिया है?

तो आपको आज की कहानी जानने के लिए मई 2023 का महीना याद करना चाहिए। जब कर्नाटक में कांग्रेस ने 224 में से 135 सीटें जीती थीं, लेकिन मुख्यमंत्री पद को लेकर लड़ाई होने लगी थी। डीके शिवकुमार खुले मंचों से कहने लगे कि ये 135 सीटें मैंने अपने दम पर जिताई हैं, इसलिए मुख्यमंत्री की कुर्सी का असली हकदार मैं हूँ। हालांकि लंबी लड़ाई के बाद भी डीके शिवकुमार को खास कुछ सकारात्मक नतीजे नहीं मिले और आख़िर में राहुल गांधी ने ये तय किया कि सिद्धारमैया को ही मुख्यमंत्री बनाया जाएगा और डीके शिवकुमार के पास उपमुख्यमंत्री की कुर्सी रहेगी। दबी ज़बान में ये बात भी फैली कि फ़ॉर्मूला तय हुआ है कि ढाई साल के बाद मुख्यमंत्री पद डीके शिवकुमार को दिया जाएगा।

फिर आइए जुलाई 2025 में। डीके शिवकुमार उस वादे को याद दिलाते हुए दिल्ली आते हैं, लेकिन इस बार वो राहुल गांधी या सोनिया गांधी से नहीं मिलते हैं, बल्कि नई-नवेली सांसद बनी प्रियंका गांधी वाड्रा से मिलते हैं। और यहाँ से कहानी जो बदलती है, उसकी तस्वीर हमें आज देखने को मिल रही है। उस समय पर ही कांग्रेस पर डीके शिवकुमार दबाव बनाने में कामयाब हो गए थे, लेकिन उस वक्त हवाला तमिलनाडु और केरल के विधानसभा चुनावों का दिया गया और कांग्रेस नेता रणदीप सुरजेवाला को आकर इसके बारे में काफ़ी मान-मनौव्वल करनी पड़ी थी।

आज आप कर्नाटक के लोकल मीडिया से लेकर नेशनल मीडिया की हेडलाइंस को देखेंगे, तो इसमें प्रियंका गांधी और डीके शिवकुमार के नाम ही आपको नजर आएंगे। राहुल गांधी अचानक से हेडलाइंस से गायब हो गए हैं। और याद रखने की बात है कि यही चीज़ केरल में भी हुई थी। वीडी सतीशन के नाम को चुने जाने के पीछे दिखाने के लिए तमाम तर्क दिए गए थे कि समाज में पकड़ मजबूत है, मुस्लिम लीग और यूडीएफ भी इनका समर्थन करेंगे, लेकिन जो असली कहानी थी, उसमें आप प्रियंका गांधी के रोल को नकार नहीं सकते हैं। कम से कम तीन दौर की आधिकारिक बैठक राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा में हुई थीं और उसके बाद वीडी सतीशन के नाम पर कहीं जाकर सहमति बनी थी। और यह हमेशा से स्पष्ट था कि राहुल गांधी केसी वेणुगोपाल के अलावा किसी और नाम पर मुहर नहीं लगाएंगे, लेकिन केरल में ऐसा पहली बार दिखाई दिया कि राहुल गांधी की बात के आगे भी किसी की बात चली।

वापस कर्नाटक आते हैं। जब प्रियंका गांधी और डीके शिवकुमार की मुलाक़ात के बाद छह महीने का वक्त माँगा गया था, तो यह स्पष्ट हो गया था कि अब टालमटोल से काम नहीं बन सकता है। एक वक्त पर जिस ओल्ड गार्ड को हटाने की बात राहुल गांधी ने की थी और नया ऑर्डर या नए निजाम को स्थापित करने की बात करके अपनी पारिवारिक विरासत की कुर्सी हासिल की थी, अब तस्वीर ऐसी नजर आ रही थी कि अब राहुल गांधी ख़ुद ओल्ड गार्ड हो गए हैं और नया निजाम उन्हें चैलेंज कर रहा है।

नया निजाम कौन है? नया निजाम हैं प्रियंका गांधी वाड्रा। कर्नाटक के सत्ता परिवर्तन की इस लड़ाई में आख़िरी वक्त तक राहुल गांधी के लॉयलिस्ट ने कोशिश की कि किसी भी तरह से इस परिवर्तन को टाला जा सके। 26 मई को कांग्रेस के बड़े नेताओं के बीच बैठकों का एक लंबा दौर चला। कांग्रेस आधिकारिक रूप से इस बात से इनकार करती रही कि कर्नाटक में कोई चेंज होने वाला है। ये बैठकें तो केवल राज्यसभा सीट के मद्देनजर की जा रही हैं। लेकिन छनकर खबरें आती रहीं कि प्रियंका गांधी ने अपनी समस्त शक्तियों का प्रयोग करके यह सुनिश्चित करवा दिया है कि सिद्धारमैया की विदाई हो ही जाए। और आज हम जब चर्चा कर रहे हैं, तो वही तस्वीर हमें दिखाई भी दे रही है।

अब सवाल ये है कि राहुल गांधी की कहानी क्या होने वाली है? क्या कांग्रेस एक राज्य के गेम ऑफ़ थ्रोन्स के ख़त्म होने के बाद पार्टी की विरासत के गेम ऑफ़ थ्रोन्स की लड़ाई में उलझ जाएगी? और प्रियंका गांधी की सक्रियता और उससे भी बढ़कर लगातार फैसलों में उनके वोट का मजबूत होते जाना क्या इशारा करता है?

तो एक बात हमें समझनी होगी कि प्रियंका गांधी को लेकर आज से नहीं, क़रीब दो दशकों से हाइप बनी हुई है। राहुल गांधी ने जब अमेठी से पहली बार चुनाव लड़ा था, तब भी मंच के सामने कांग्रेस के लोग प्रियंका गांधी के चुनाव लड़ने की माँग किया करते थे। कांग्रेस के भीतर एक वर्ग है, जो आज भी लगातार प्रियंका गांधी की शक्तियों को बढ़ाए जाने का समर्थन करता है और इस आशा में देखता रहता है कि अगर within party power center बदलेंगे, तो मलाई में हिस्सेदारी लेने वालों की संख्या बढ़ सकती है। जो डीके शिवकुमार या वीडी सतीशन के केस में आप देख भी सकते हैं। ये दोनों जो घटनाएँ हुई हैं, ये प्रियंका की ताक़त या योग्यता को नहीं दिखाती हैं, बल्कि प्रियंका की आड़ में राहुल के विरुद्ध जो within party स्वर हैं, उनके ताक़तवर होने को दिखाती हैं।

आज की तारीख़ में राहुल गांधी संभवतः देश के लोकतांत्रिक इतिहास के इकलौते नेता हैं, जिनके नेतृत्व में उनकी पार्टी कम से कम 63 चुनावों में हार चुकी है। और लगातार हारती ही जा रही है। इससे कांग्रेस के अपने नेताओं को भी नजर आ रहा है कि अगर सब कुछ ऐसा ही चलता रहा, तो कहानी और बुरी ही होती जाएगी। इसी वजह से प्रियंका गांधी, जिनमें एक्चुअल में कोई लीडरशिप क्वालिटी नहीं है, उनको कांग्रेस के भीतर का वह वर्ग कंधे के तौर पर इस्तेमाल कर रहा है।

इस बात को समझना होगा कि कांग्रेस ने राहुल गांधी को इसलिए स्वीकार किया था क्योंकि एक मोरालिटी का बाउंडेशन था, एक कोलोनियल माइंडसेट पूरी पार्टी में था। इस वजह से स्वीकार किया था। एक जेनरेशनल लीडरशिप लॉयल्टी थी इनके पास, लेकिन अब वो ख़त्म हो रही है। विशेषतः डीके शिवकुमार का चुना जाना इस बात को दिखाता है कि कांग्रेस का बचा-खुचा कैडर अब अपने इन छोटे-छोटे किलों को बचाना चाहता है। और राहुल गांधी आज की तारीख़ में उनके लिए पोलिटिकल कॉकरोच बन गए हैं और अपने साथ-साथ अपनी पार्टी को भी वही बना दिया है। जैसे अभी जिस कॉकरोच जनता पार्टी का फ़ॉर्मूलेशन हुआ, तो उसमें जो सो-कॉल्ड कॉकरोच होने की एलिजिबिलिटी बताई गई थी कि आलसी, सुस्त, बेरोज़गार टाइप हो, यानी एक फ़ेल्ड व्यक्ति हो। ऐसा लग रहा है कि देश की जनता के बाद कांग्रेस पार्टी भी अपने कथित नेता राहुल गांधी को उसी रूप में देखने लगी है।

और ये समय भी दिलचस्प है। आज से बारह साल पहले जब मोदी vs राहुल की बैटल की शुरुआत हुई थी, तब बीजेपी के पास सात राज्य थे। आज बारह साल बाद बीजेपी के पास 21 से ज़्यादा राज्य हैं। ये अंतर अपने आप में इस कहानी को स्पष्ट करता है कि राहुल गांधी की लीडरशिप पर सवाल क्यों उठ रहे हैं? क्यों प्रियंका गांधी को ढाल बनाई जा रही है और क्यों वो सो-कॉल्ड कांग्रेस हाईकमान का भ्रम टूट रहा है।

बेसिकली कर्नाटक का ये शिफ्ट सिर्फ़ एक स्टेट में पावर ट्रांसफर नहीं है, बल्कि ये माना जाना चाहिए कि कांग्रेस में आधिकारिक रूप से राहुल गांधी के ख़िलाफ़ बगावत की पटकथा लिखी जा चुकी है, जिसका चेहरा तो भले आपको प्रियंका नजर आ रही हों, लेकिन उसके पीछे हर वो कांग्रेसी है जिसने हिमंत बिस्वा सरमा और ज्योतिरादित्य सिंधिया को जाते हुए देखा है, जिसने सचिन पायलट जैसे मास अपील वाले लीडर्स को साइडलाइन किए जाने का खामियाज़ा भुगता है।

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