Doors of Death

दिल्ली से लखनऊ तक: स्मार्ट डोर लॉक कैसे बन रहे हैं जानलेवा?

Summary
दिल्ली के ओल्ड राजिंदर में बेसमेंट में पानी भरना हो, मालवीय नगर के होटल में आग लगना हो, या फिर कल लखनऊ की एक लाइब्रेरी में आग के चलते बच्चों का मरना, सबमें एक प्रॉब्लम कॉमन है। ये प्रॉब्लम है कि आग लगते ही इलेक्ट्रिसिटी चली गई और यहाँ लगे बायोमेट्रिक वाले स्मार्ट डोर लॉक हो गए, इससे आग या फ़्लडिंग में फँसें लोग अंदर रह गए और वहीं फँस कर उनकी दुखद मौत हो गई।

आख़िर कोई नॉर्मल सा दरवाजा 15 लोगों की जान कैसे ले सकता है? कैसे कोई दरवाजा डोर्स ऑफ़ डेथ बन जाता है? 

दिल्ली के ओल्ड राजिंदर में बेसमेंट में पानी भरना हो, मालवीय नगर के होटल में आग लगना हो, या फिर कल लखनऊ की एक लाइब्रेरी में आग के चलते बच्चों का मरना, सबमें एक प्रॉब्लम कॉमन है। 

ये प्रॉब्लम है कि आग लगते ही इलेक्ट्रिसिटी चली गई और यहाँ लगे बायोमेट्रिक वाले स्मार्ट डोर लॉक हो गए, इससे आग या फ़्लडिंग में फँसें लोग अंदर रह गए और वहीं फँस कर उनकी दुखद मौत हो गई। लेकिन ऐसा क्यों होता है? ऐसा होता है स्मार्ट डोर्स की एक मैकेनिज्ज्म के कारण।  

आज के समय में बायोमेट्रिक डोर्स दो प्रिनिसिपल्स पर काम करते हैं, पहला है Fail Secure और दूसरा है Fail Safe सबसे पहले फेल सिक्योर की बात। फेल सिक्योर का मतलब होता है, कि दरवाजा बिजली हो या ना हो, वो लॉक ही रहेगा। यहाँ दरवाज़े को खोलने के लिए बिजली का होना एक प्री रिक्विज़िट है। 

बिजली होने पर ऐसे दरवाज़ों के बाहर जब आप अपना थंब लगाते हैं या फेस दिखाते हैं तो वो पहले से लॉक डोर्स को एक बिजली का सिग्नल भेजता है जो अंदर लगे मैग्नेट को एक्टिवेट करता है, इसके बाद वो स्प्रिंग पीछे हट जाता है और दरवाजा खुल जाता है। 

अगर किसी केस में बिजली नहीं है तो दरवाजा नहीं खुलेगा , क्योकि ये दरवाज़े हर वक्त लॉक रहने के लिए डिजाइन किए गए हैं। शायद लखनऊ में हुई अग्निकांड में ऐसे दरवाज़े लगे थे और मालवीय नगर में होटल में हुए अग्निकांड में भी। इसीलिए जैसे ही आग लगी, बिजली चली गई और दरवाज़ों ने वही किया, जिसके लिए वो डिजाइंड थे। 

अब बात Fail Safe Doors की। इस टाइप के लॉक्स फेल सिक्योर से ठीक उल्टे मैकेनिज्म पर काम करते हैं। इनमें परमानेंटली एक मैग्नेट ही दरवाज़े के दो हिस्सों को चिपका कर रखता है, जब आप अपना बायोमेट्रिक देते हैं तो इस मैग्नेट को जाने वाली पॉवर ख़त्म हो जाती है और डोर अनलॉक हो जता है। 

फेल सेफ़ टाइप डोर्स में अगर बिजली चली जाए तो मैग्नेट काम करना बंद कर देते हैं और ऐसे में दरवाज़े लॉक ही नहीं होते। अब आपके मन में सवाल आएगा कि अगर ऐसा है तो सभी जगह पर फेल सेफ़ टेक्नोलॉजी क्यों यूज नहीं होती। ऐसा इसलिए क्योंकि भारत एक लो ट्रस्ट सोसायटी है। 

लोगों को पहले तो ये विश्वास नहीं है कि हर समय बिजली रहेगी और दूसरा ये विश्वास नहीं है कि अगर बिजली नहीं रही और उनका दरवाजा अनलॉक हो गया तो उसमें चोरी नहीं होगी। क़ायदे में फेल सिक्योर टेक्नोलॉजी वाले डोर्स का यूज ऐसी जगहों पर होना चाहिए, जहाँ कोई महंगा एसेट सिक्योर करना हो। 

और इतना ही नहीं बल्कि हर ऐसे दरवाज़े पर एक मैकेनिकल ओवरराइड होना चाहिए, यानी कुछ भी हो जाए ये दरवाजा किसी तरह से खुल जाए। लेकिन हमारे देश में सेफ्टी गाइडलाइंस का हाल आप जानते ही हैं। लखनऊ वाले केस में भी बच्चों की जिंदगी से ज्यादा क़ीमती लाइब्रेरी मालिक को अपना फर्नीचर लगा होगा, ऐसे में फेल सिक्योर टेक लगाया गया, नतीजा ये हुआ कि बच्चे अंदर फँस गए और उनकी मौत हो गई। 

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