Ram Mandir donation

राम मंदिर ट्रस्ट की वो एक गलती… जिसने ‘Free The Temples’ आंदोलन की हवा निकाल दी

Summary
क्या इस विवाद के लिए सीधे तौर पर उत्तर प्रदेश की योगी सरकार जिम्मेदार है, या फिर यह 'श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट' के प्रबंधन और अनुभव की कमी का नतीजा है? सबरीमाला और पद्मनाभस्वामी मंदिर के ऐतिहासिक उदाहरणों के साथ समझिए कि कैसे इस प्रशासनिक चूक ने हिंदुओं के 'Free The Temples' (मंदिरों को स्वतंत्र करो) के सबसे बड़े वैचारिक आंदोलन को एक तगड़ा झटका दे दिया है।

किसी रोज़ आप ऑफिस के लिए तैयार हो रहे हैं, और अचानक बॉस का फरमान आए कि आज से दफ्तर में अंडरवियर पहनकर आना मना है.. सुनकर अजीब लगा होगा? लेकिन साल 2008 में भारत के एक मानवाधिकार आयोग को सच में दखल देना पड़ा था, क्योंकि दक्षिण भारत के कुछ बेहद अमीर मंदिरों के तहखानों में काम करने वाले कर्मचारियों के अंडरगारमेंट्स पहनने पर बैन लगा दिया गया था। वजह क्या थी? ताकि काउंटिंग स्टाफ चढ़ावे का सोना या कीमती सिक्के अपने अंडर गारमेंट्स में छिपाकर बाहर न ले जा सके.. और आपको जानकर हैरानी होगी कि केरल के मशहूर सबरीमाला अयप्पा मंदिर में आज भी चढ़ावे की गिनती करने वाले स्टाफ के लिए यह बेहद सख्त नियम लागू है कि वे अंडरगारमेंट्स नहीं पहनेंगे और ड्यूटी के बाद उनकी बकायदा फिजिकल चेकिंग होगी।

अब आप सोच रहे होंगे कि राम मंदिर के चंदे के विवाद में, मैं आपको सबरीमाला और अंडरवियर ना पहनने की कहानी क्यों सुना रहा हूँ? क्योंकि कहानी इंटरकनेक्टेड है।

जनवरी 2024 में जब रामलला अपनी जगह विराजमान हुए, तो हर सनातनी की आंखों में आंसू थे, जीत के आंसू, सदियों के अन्याय के बात हिंदुओं के नए दौर का उत्साह।। लोग खुश थे कि आखिरकार इस लड़ाई को जीत लिया गया है। लेकिन, आज इस मंदिर से एक ऐसी खबर आ रही है जिससे हर रामभक्त आहत है। रामलला के चढ़ावे और चंदे में हेराफेरी की न्यूज़ तो आपने भी सुन ही ली होंगी। शुरुआत में खबर आई कि 5 करोड़ से 75 करोड़ का हिसाब गायब है, लेकिन अब कुछ रिपोर्ट्स ये भी कह रही हैं कि यह गड़बड़ी 200 करोड़ रुपए से भी ज्यादा की हो सकती है। कैश काउंटिंग स्टाफ का वाउचर में हेरफेर और सोने-चांदी के आभूषणों के मैनेजमेंट पर सवाल उठ रहे हैं। आखिर ये हुआ कैसे? और सबके दिमाग़ में एक ही सवाल है कि आख़िर इसका विलेन कौन है? क्या यह सिस्टम का फेलियर है या नीयत का??

जैसे ही ये विवाद बढ़ा, राजनीति शुरू हो गई। तो इसलिए इस राम मंदिर की क्रोनोलॉजी को समझ लेते हैं कि इस पूरे मामले को लेकर कब, कैसे और क्या हुआ..

नवंबर 2019 में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद, ठीक 3 महीने के भीतर 5 फरवरी 2020 को केंद्र सरकार ने एक अधिसूचना जारी की और श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का गठन किया.. कोर्ट के आदेश के अनुसार अधिग्रहित की गई पूरी जमीन इस स्वतंत्र, Autonomous ट्रस्ट को सौंप दी गई।

यह पूरी बात भावनाओं से नहीं, बल्कि कानूनी और प्रैक्टिकल नजरिए से समझने की जरूरत है। हमारे देश की कई शेयर बाजार में सूचीबद्ध कंपनियों के बोर्ड में सरकार या बड़े निवेशकों के मनोनीत प्रतिनिधि भी शामिल होते हैं। लेकिन किसी बोर्ड में सरकारी प्रतिनिधि की मौजूदगी का मतलब यह नहीं होता कि सरकार उस कंपनी को चला रही है या उसके रोजमर्रा के फैसले ले रही है। कंपनी का संचालन उसके अपने स्वतंत्र प्रबंधन के हाथ में ही रहता है, जबकि ऐसे प्रतिनिधियों की भूमिका मुख्य रूप से निगरानी और जवाबदेही सुनिश्चित करने तक सीमित होती है।

श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का ढांचा भी कुछ इसी तरह का है। यह एक स्वतंत्र और स्वायत्त संस्था है, जो अपने अध्यक्ष, महासचिव और कोषाध्यक्ष का चुनाव खुद करती है। मंदिर का प्रशासन, दान का प्रबंधन, वित्तीय निर्णय और पूरा लेखा-जोखा इसी ट्रस्ट के अधिकार क्षेत्र में आता है। और चाहे केंद्र सरकार हो या उत्तर प्रदेश सरकार.. इनकी भूमिका मुख्य रूप से सुरक्षा व्यवस्था, कानून-व्यवस्था, भीड़ प्रबंधन और प्रशासनिक कॉर्डिनेशन तक सीमित है। ट्रस्ट बोर्ड में मौजूद राज्य सरकार के मनोनीत सदस्यों को वित्तीय मामलों में वोटिंग का अधिकार भी नहीं है। यहां तक कि अयोध्या के जिलाधिकारी की भूमिका भी केवल समन्वय की है, मंदिर के खातों या चंदे के प्रबंधन से उनका कोई सीधा संबंध नहीं होता।

इसीलिए चंदे में कथित गड़बड़ी या चोरी के आरोपों की सीधी जवाबदेही राज्य सरकार पर नहीं, बल्कि मंदिर प्रबंधन, ऑडिट व्यवस्था और दान संग्रह की जिम्मेदारी संभालने वाले लोगों पर आती है। हालांकि इसका यह मतलब भी नहीं है कि किसी आर्थिक अनियमितता को हल्के में लिया जाए। यदि प्रभु राम के नाम पर श्रद्धालुओं के दान में हेराफेरी हुई है, तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ ऐसी सख्त कार्रवाई होनी चाहिए जो भविष्य के लिए मिसाल बने। 

यही कारण है कि विवाद सामने आने के बाद स्वयं ट्रस्ट के अनुरोध पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने एक SIT का गठन किया, जिसमें प्रशासन, पुलिस और वित्त विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों को शामिल किया गया है। अब उम्मीद यही है कि जांच निष्पक्ष, पारदर्शी और तथ्यों के आधार पर पूरी हो, ताकि दोषियों की पहचान हो सके और राम मंदिर जैसी आस्था की सर्वोच्च संस्था पर उठे सवालों का स्पष्ट जवाब मिल सके।

अब सवाल उठता है कि इतनी बड़ी गड़बड़ी हुई कैसे? क्या ये सब पहले से तय था? क्या राम मंदिर बनाने के पीछे यही मकसद था? या फिर अचानक आए भारी फंड और उसके प्रबंधन की जिम्मेदारी कुछ कम अनुभवी लोगों के हाथों में चली गई थी?

सोचिए, जनवरी 2024 के बाद से देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु रोज आ रहे हैं। कोई नकद दे रहा है, कोई सोना, कोई चांदी। मंदिर में दर्जनों दानपेटियां रखी हैं। लेकिन क्या इस भारी-भरकम चढ़ावे को संभालने के लिए हमारे पास कोई एडवांस सिस्टम था?

राम मंदिर ट्रस्ट ने इस लेवल के फंड्स को पहले कभी मैनेज नहीं किया था। इसमें भी कोई संदेह नहीं है कि ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय जी एक सम्मानित और जमीनी आंदोलनकारी हैं, उन्होंने मंदिर आंदोलन को जिया है, लेकिन सनातनी आस्था के इतने बड़े केंद्र के फाइनेंस और सिक्योरिटी को मैनेज करने की जो कॉर्पोरेट और हाई टेक स्किल्स चाहिए, वहां शायद कमी रह गई। कैश काउंटिंग के वक्त सीसीटीवी की सख्त निगरानी, डिजिटल बारकोडिंग और थ्री-लेयर ऑडिटिंग जैसी चीजें शुरुआत से ही फुलप्रूफ होनी चाहिए थीं, जो नहीं हुई। और इसीलिए आज एक ऐसे व्यक्ति को भी हिंदुओं की नाराजगी झेलनी पड़ रही है..और ये नाराज़गी शायद सही भी है क्योंकि ट्रस्ट और चंपत राय को ये बिल्कुल मालूम होना चाहिए था क्योंकि इस किस्म की गड़बड़ी पहले भी हो चुकी हैं..

मंदिर के पैसे पर नियत ख़राब होना या काउंटिंग स्टाफ द्वारा चोरी की कोशिशें कोई नई बात नहीं हैं। भारत के बड़े-बड़े मंदिरों का इतिहास उठाकर देखेंगे तो हर कोई सोचेगा कि क्या वहाँ भी ऐसे किस्से हुए हैं? बेशक हुए हैं और कुछ मंदिरों में तो प्रशासन को बेहद कड़े और अजीबोगरीब नियम बनाने पड़े।

अगर दक्षिण भारत के मंदिरों की बात करें, तो साल 2008 में एक मानवाधिकार आयोग को दखल देना पड़ा था। वजह यह थी कि कुछ प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय मंदिरों के तहखानों में काम करने वाले कर्मचारियों के लिए नियम था कि वे ड्यूटी के दौरान सिर्फ धोती पहनेंगे, अंडरवियर नहीं। ऐसा इसलिए किया गया था ताकि कोई चढ़ावे का सोना या कीमती सामान छिपाकर बाहर न ले जा सके। बाद में विरोध बढ़ने पर कर्मचारियों को अंडरवियर पहनने की अनुमति दे दी गई।

लेकिन केरल के प्रसिद्ध सबरीमाला अयप्पा मंदिर में आज भी चढ़ावे की गिनती करने वाले स्टाफ पर बेहद सख्त नियम लागू हैं। वहां चोरी रोकने के लिए काउंटिंग स्टाफ को अंडरगारमेंट्स पहनने तक की मनाही होती है और ड्यूटी के बाद उनकी बकायदा फिजिकल चेकिंग होती है।

इसके अलावा, दुनिया के सबसे अमीर मंदिरों में गिने जाने वाले पद्मनाभस्वामी मंदिर में भी पहले कीमती सामान गायब होने की खबरें सामने आ चुकी हैं। इसके बाद वहां सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में मॉडर्न सिक्योरिटी सिस्टम और डिजिटल रिकॉर्ड रखने की व्यवस्था लागू करनी पड़ी।

कहने का मतलब ये है कि जब इतने बड़े पैमाने पर पैसा और सोना आता है, तो वहां सिर्फ भरोसे पर काम नहीं चलता। वहां कड़े प्रोटोकॉल, CCTV सर्विलांस और बायोमेट्रिक सिक्योरिटी की जरूरत होती है। यही सारे सबक अयोध्या में भी तुरंत लागू करने की जरूरत थी। 

इस पूरी कहानी का सबसे दुखद पहलू सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि वैचारिक भी है। सालों से हिंदू समाज की एक बड़ी और जायज मांग रही है, Free The Temples। हिंदुओं का तर्क रहा है कि जब दूसरे धर्मों के पूजा स्थलों का प्रबंधन उनका समाज खुद करता है, तो हिंदू मंदिरों का नियंत्रण सरकार के हाथ में क्यों हो?

जब सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद राम मंदिर के लिए एक स्वतंत्र ट्रस्ट बनाया गया, जिसमें संतों और समाज के प्रमुख लोगों को जगह दी गई, तो देशभर के हिंदुओं में एक नई उम्मीद जगी थी। चंपत राय जी ने भी शुरुआत में कहा था कि इसका प्रबंधन रामानंद संप्रदाय और सनातनी समाज के हाथ में होगा। इसके पीछे सोच यह थी कि एक ऐसा मॉडल बनाया जाए जो जाति और भेदभाव जैसी सीमाओं से ऊपर उठकर रामभक्ति का आदर्श प्रस्तुत करे। इसलिए इसकी नीयत और आस्था पर किसी को कोई संदेह नहीं था।

यह ‘स्वतंत्र मंदिर’ का वो ब्लूप्रिंट बनने जा रहा था, जिसे दिखाकर हिंदू समाज गर्व से कह सकता था कि, देखो, बिना किसी सरकारी दखल के भी हमारा समाज अपने सबसे बड़े मंदिर का वर्ल्ड-क्लास, पारदर्शी और बेदाग मैनेजमेंट कर सकता है।

लेकिन राम मंदिर में चंदे की इस हेराफेरी ने पूरे आंदोलन और उससे जुड़ी उम्मीदों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। जो लोग मंदिरों पर सरकारी नियंत्रण के पक्ष में हैं, उनके लिए यह एक तर्क का विषय बन गया है। वो कहेंगे ही कि आज के समय में सिर्फ आस्था नहीं, बल्कि बेहतर प्रबंधन और पेशेवर स्किल्स भी जरूरी हैं। उनकी नजर से देखें तो, केवल आस्था के भरोसे व्यवस्था चलाने का नतीजा ही ऐसी गड़बड़ियों के रूप में सामने आता है।

राम मंदिर के ट्रस्टियों की जिम्मेदारी सामान्य से कहीं ज्यादा थी। उन्हें ज्यादा सतर्क, ज्यादा प्रोफेशनल और ज्यादा पारदर्शी होना था क्योंकि वे सिर्फ एक मंदिर नहीं संभाल रहे थे, वे करोड़ों हिंदुओं की आत्मनिर्भरता के सपने को भी संभाल रहे थे। और शायद, इस शुरुआती दौड़ में हमने वो ऐतिहासिक मौका गंवा दिया है।

अब हर कोई यही उम्मीद कर रहा है कि SIT की जांच पूरी तरह निष्पक्ष और पारदर्शी हो। जिन लोगों ने भी रामलला के चरणों में आए दान में गड़बड़ी की है, उनके नाम सामने आएँ और उन पर ऐसी सख्त कार्रवाई हो जो भविष्य के लिए मिसाल बने। रामायण में भी शायद इसी दिन के लिए लिख दिया था कि, ‘कुल नासक जो प्रभू की थाती, राखइ सो धौं कवन भांति’… यानी प्रभु के चंदे और धरोहर को चुराने वालों का बचना नामुमकिन है।

इसके साथ ही, राम मंदिर की पूरी वित्तीय व्यवस्था को जल्द से जल्द हाई-टेक, डिजिटल और पूरी तरह सुरक्षित बनाया जाना चाहिए। क्योंकि राम मंदिर सिर्फ हमारी आस्था का केंद्र नहीं है, बल्कि इसे सनातनी प्रबंधन की पारदर्शिता, ईमानदारी और शुचिता का प्रतीक भी बनना होगा। 

बाबा तुलसीदास सदियों पहले लिख गए थे कि “उघरहिं अंत न होइ निबाहू। कालनेमि जिमि रावन राहु….” प्रभु के काज में भी अगर कोई कपट का कालनेमि छुपा बैठा है, तो अंत में उसका मुखौटा उतरना तय है।

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