गिग वर्कर को हड़ताल के लिए भड़काने वालों को दीपिंदर गोयल ने दिया डेटा

Summary
एक सम्मानजनक कमाई देने वाले इन गिग प्लेटफॉर्म्स से ये माँग ये अनस्किल्ड काम के लिए वो सारे बेनिफिट्स दें जो एक रेगुलर इम्प्लॉयी को मिलते हैं, ये सिर्फ़ कम्युनिस्ट ही कर सकते हैं। 

एक बड़े मशहूर अमेरिकी अर्थशास्त्री डब्ल्यू एडवर्ड्स डेमिंग ने कहा था, इन गॉड वी ट्रस्ट, ऑल अदर्स मस्ट ब्रिंग डेटा। यानी हम केवल भगवान पर विश्वास करते हैं, और किसी को अपनी बात मनवानी है तो डेटा लेकर आए। 

गिग वर्कर्स यानी स्विगी जोमैटो जैसे प्लेटफॉर्म्स के लिए डिलीवरी बॉय का काम करने वालों को लेकर चल रही बहस के बीच इसी डेटा ने हवा का रूख बदल दिया है। जहाँ एक ओर कोलकाता और कानपुर जैसे शहरों को बर्बाद करने वाली कम्युनिस्ट जमात ने अब इन्हें भड़काने का ठेका लिया है तो वहीं जोमैटो और ब्लिंकइट जैसी कंपनियां खड़ी करने वाले फ़ाउंडर दीपिंदर गोयल ने ध्रुव राठी और कुणाल कामरा जैसे इन न्यू एज कम्युनिस्टों को डेटा देकर चुप करवा दिया है। 

डिलीवरी वाले भैया या ऑफिशियली गिग वर्कर्स कहे जाने वाले लोग कितना कमाते हैं, उनके लिए कंपनियां क्या करती हैं और 10 मिनट में डिलीवरी कैसे होती है, सब कुछ उन्होंने समझाया है।

 ये बात क्यों लॉजिकल है, ये भी मैं आपको एग्जाम्पल से बताऊंगा। सबसे पहले बात कमाई पर, क्योंकि कम्युनिस्टों और कथित समाजवादियों ने इसी को लेकर सर्वाधिक हल्ला मचाया है। 

दीपिंदर गोयल ने बताया है कि उनकी कंपनी के लिए अगर कोई गिग वर्कर हर महीने 26 दिन और हर दिन 10 घंटे काम करता है तो उसे महीने में औसतन ₹26500 की कमाई होती है। 

इसमें से पेट्रोल का खर्च निकाल कर भी ₹21000 बचते हैं। इसके ऊपर से उन्हें साल में लगभग औसतन ₹7488 रुपए की कमाई टिप से होती है। 

और याद रखिए ये पैसा कमाने के लिए आपको ना कोई डिग्री चाहिए ना डिप्लोमा। सिर्फ़ टू व्हीलर चलाने आना चाहिए। अगर आपके पास बाइक नहीं है तो इसके भी इंतजाम हैं। 

अब सोचिए ऐसे स्किल सेट वाले अगर जोमैटो या स्विगी, पोर्टर, ब्लिंकइट या ऐसी कोई कंपनी में काम नहीं करें तो उनके पास और क्या ऑप्शन है। 

इस देश में केवल एक और ऐसा प्लेटफार्म है जहाँ इस अनस्किल्ड लेबर को जॉब मिल सकती है और वो है MNREGA या फिर G राम जी। आपको पता है जी राम जी में मैक्स कमाई क्या है? 

अगर हम हरियाणा का एग्जाम्पल लें तो वहाँ भी प्रतिदिन केवल 400 रुपए ही दिए जाते हैं। और ये ट्रांसलेट होता है 26 दिन के काम के हिसाब से ₹10,400 में। 

और ये काम आपको साल के 365 दिन मिलेगा, इसकी कोई गारंटी नहीं है, ना ही यहाँ कोई एम्प्लोयी बेनिफिट्स आपको मिलने वाले हैं। यहाँ काम भी मैनुअल लेबर वाला है और ये उपलब्ध भी है तो सिर्फ़ और सिर्फ़ ग्रामीण इलाक़ों में। 

और सरकार अगर चाहे भी तो इसे देश व्यापी स्तर पर लागू नहीं कर सकती क्योंकि इससे बजट का भट्ठा बैठ जाएगा। 

तो एक सम्मानजनक कमाई देने वाले इन गिग प्लेटफॉर्म्स से ये माँग ये अनस्किल्ड काम के लिए वो सारे बेनिफिट्स दें जो एक रेगुलर इम्प्लॉयी को मिलते हैं, ये सिर्फ़ कम्युनिस्ट ही कर सकते हैं। 

और ये कोई ऐसे लोग नहीं हैं जो इन गिग वर्कर्स का भला चाहते हैं। ये वही लोग हैं जो सिर्फ़ हड़ताल, चक्का जाम और धरने में विश्वास करते हैं और  लोगों की  भावनाएँ भड़का कर अपना मार्केट तैयार करते हैं। 

कुणाल कामरा, ध्रुव राठी और वीर दास जैसे इन्फ़्लुएंसर्स ने शायद आज तक एक मक्खी के लिए भी रोजगार ना पैदा किया हो। 

और जो कम्पनियाँ आज के समय में लगभग 1 करोड़ लोगों को ग़रीबी से निकाल रहीं हैं, उन्हें अपना बेसिक फाइनेंसियल स्टेबिलिटी अचीव करने का मौक़ा दे रहीं हैं, उन पर ये कम्युनिस्ट जमात दुनिया भर के प्रश्न कर रही है। 

इन कम्युनिस्टों की एक और बहस है कि इन प्लेटफॉर्म्स से 10 मिनट में डिलीवरी होती है इसलिए गिग वर्कर्स प्रेशर में काम करते हैं। 

लेकिन इसकी सच्चाई ये है कि जल्दी डिलीवरी इसलिए नहीं होती क्योंकि डिलीवरी ब्वायज फ़ास्ट एंड फ्यूरियस की तरह गाड़ी चलाते हैं, बल्कि इसलिए होती है क्योंकि सिस्टम ऐसा बनाया गया है। 

दीपिंदर गोयल का कहना है कि उनका एक एवरेज ऑर्डर 2 किलोमीटर में डिलीवर होता है। ऐसे में 10-15 मिनट में इसे डिलीवर करना आसान होता है क्योंकि दूरी कम है, यानी डिलीवरी जल्दी होने का कारण तेज ड्राइविंग नहीं बल्कि ब्लिंकइट या जेप्टो जैसे प्लेटफॉर्म्स का इंफ्रा है, जो इसे पॉसिबल बनाता है। 

इसके लिए भी एक उदाहरण समझिए, आज से 25 साल पहले अगर आपको किसी को पैसा ट्रांसफर करना होता तो आप क्या करते। सीधी सी बात है कि बैंक जाते, फॉर्म भरते, लाइन में लगते और फिर पैसा ट्रांसफर होता। इस प्रक्रिया में कम से कम आधा घंटा लगता। 

लेकिन क्या आज ये काम हम कुछ सेकेंड्स में नहीं कर लेते। इसी तरह पैसा निकालने के लिए भी आपको आधा घंटा खर्च करना पड़ता, लेकिन आज आप किसी ATM में जाइए और विदिन मिनट्स आपके हाथ में कैश होगा। तो हर समस्या का समाधान तेज गाड़ी चलाना नहीं बल्कि इंफ्रा सुधारना भी होता है। 

इसके बाद बात आती है एंप्लाई बेनिफिट्स की। यानी PF, ESIC और मैटरनिटी बेनिफिट्स जैसी चीजें। दीपिंदर गोयल का कहना है कि उनके प्लेटफार्म पर रजिस्टर करने वाले गिग वर्कर्स ने औसतन 38 दिन ही काम किया। इसका सीधा सा मतलब है कि लोग तभी गिग वर्कर का काम करते हैं जब उनके पास कोई और स्टेबल जॉब नहीं है। 

जो लोग कंपनी के रेगुल एम्प्लोयी हैं ही नहीं, उन्हें भला ये बेनिफिट्स कैसे मिल सकते हैं और इन्हें अगर रेगुलर एम्प्लोयी बनाया जाएगा तो 50 नई समस्याएँ खड़ी होंगी। 

इन कंपनियों का बिजनेस मॉडल ही है कि गिग वर्कर फ्लेक्सिबिलिटी के साथ काम करें। आज अगर जोमैटी में तो कल स्विगी में और परसो पोर्टर के लिए। 

इन सबके बाद मैं आपसे एक सवाल पूछता हूँ, साल में अगर 45 दिन आपके यहाँ काम करे तो आप उसे ये बेनिफिट्स कैसे प्रोवाइड करवाएँगे? 

क्या अनस्किल्ड लेबर्स को ये बेनिफिट्स मिलते हैं, क्या सड़क बनाने वाले मजदूरों को ये बेनिफिट मिलता है? क्या मकान बनाने वालों को ये बेनिफिट मिलता है? हो सकता है ये बात इमोशनली आपको उतनी फिट ना लगे और लेबर फ्रेंडली ना साउंड करे लेकिन सच्चाई और प्रैक्टिकैलिटी यही कहती है। 

अब आते हैं असल मुद्दे पर कि दिक्कत किसे है? देश में लाखों करोड़ों गिग वर्कर मजे से काम कर रहे हैं। 31 दिसंबर को इन न्यू एज कम्युनिस्टों ने जो स्ट्राइक का ऐलान किया था, वो भी फेल हो गई। इसका हमने फैक्ट चेक किया था।

लेकिन इन कम्युनिस्टों के मन में उन पुराने हसीन दिनों की याद अभी भी है जब वो एक ऐलान करते थे और मिल जाम हो जाती थी। 

ये वो लोग हैं जो कारोबारियों को दुश्मन मानते हैं, पैसा कमाने को पाप बताते हैं और प्रॉफिट को क्राइम। ये पहले उन मासूम और कम पढ़े लिखे फैक्ट्री वर्कर्स या मजदूरों को भड़काते हैं, फिर स्ट्राइक्स करवाते हैं, इसके बाद ऐसी मांगे रखते हैं जो कोई भी बिजनेस मैन मान ही नहीं सकता। 

इसके बाद जब फैक्ट्रियाँ या कंपनियां बंद हो जाती हैं तो इसे मजदूरों की जीत के रूप में प्रचारित  किया जाता है। लेकिन इससे नुकसान उस आम मजदूर का होता है जो कल तक एक निश्चित कमाई कर रहा था, उसे बढ़ा पैसा तो छोड़िए, अब वो भी नहीं मिलता जो पहले कभी वह कमाया करता था। 

इस बीच ये कम्युनिस्ट बड़े नेता बनते हैं, संसद पहुंचते हैं, देश भर में अपने फॉर्म हाउस बनाते हैं और विदेशों में सरकारी फंड पर घूमते हैं। इसका प्राइम इक्जाम्पल आपको देखना है, कानपुर और सुभाषिनी अली का देख लीजिए और अगर उतना पीछे नहीं जाना चाहते तो बंगाल चलिए। 

बंगाल में जब टाटा मोटर्स ने नैनो का प्लांट लगाया तो कम्युनिस्ट साथ थे लेकिन न्यू एज कम्युनिस्ट ममता दीदी ने इसे अपने लिए पोलिटिकल पिच की तरह यूज किया। टाटा के सिंगूर में प्लांट लगाने के बाद भी उन्होंने लगातार प्रदर्शन, धरने और हड़ताल कीं। अंत में क्या हुआ, सिंगूर में सिर्फ़ टाटा मोटर्स के खंडहर बचे। 

ममता बनर्जी मुख्यमंत्री बन गईं, उनका भतीजा सांसद बन गया और फैक्ट्री गुजरात चली गई और नुकसान किसका हुआ? नुकसान हुआ बंगाल की जनता का, वही जनता जो कभी वहाँ फैक्ट्री में एक इज्जतदार नौकरी करती, उसके आसपास दूसरी फैक्ट्रियाँ आतीं। पूरा इकोसिस्टम तैयार होता। 

लेकिन अब बंगाल से लाखों लोग ट्रेनों में भर कर दिल्ली, गुजरात और तमिलनाडु काम की तलाश में जाते हैं। इस बीच कम्युनिस्ट नेता गिरी करते हैं और अपनी पार्टियों में गरीबों की पीड़ा पर जाम लड़ाते हैं, लेख लिखते हैं, सेमिनारों में भाषण फटकारते हैं और मजदूर वहीं का वहीं रह जाता है। 

किसी भी मेहनत करने वाले शख्स को उसकी मेहनत के अनुसार पैसा मिलना चाहिए, लेकिन क्या कंपनियां बंद करके और हड़तालें करके ये ये संभव होगा? जवाब है नहीं! चाहे कुणाल कामरा हों या ध्रुव राठी या फिर राघव चड्ढा। जोमैटो या ब्लिंकइट बंद होने से इनके जीवन में कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा। 

ध्रुव राठी जर्मनी और कुणाल कामरा तमिलनाडु में मजे से रहेंगे। राघव चड्ढा सांसदी की कमाई उठाते रहेंगे और दिल्ली के बंगले पर पार्टियां करेंगे, मालदीव में एनवरसिरी मनाएँगे। 

और ना ही दीपिंदर गोयल खाने के मोहताज हो जाएँगे, हाँ लाखों लोगों के लिए जो रोजगार की ऑपर्च्युनिटी तैयार हुई थी, वो जरूर ख़त्म हो जाएगी और ये लोग वापस उस सिस्टम में धकेल दिए जाएँगे, जहाँ इन्हें ₹10 हज़ार की नौकरी के लिए भटकना पड़ेगा! 

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