अगर आप भारतीय सड़कों पर चलते हैं, तो आपकी नजर बहुत से ट्रक्स पर पड़ती होगी! इन ट्रक्स पर दुल्हन ही दहेज है, बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ और हम दो-हमारे दो जैसे स्लोगन्स लिखे रहते हैं। ये भारतीय ट्रक आर्ट का एकदम अभिन्न हिस्सा है। बेसिकली ट्रक्स पर लिखी ये सारी लाइनें सोशल अवेयरनेस कैंपेन का हिस्सा रही हैं और दहेज प्रथा, महिला सशक्तिकरण और जनसंख्या विस्फोट जैसी बड़ी सामाजिक समस्याओं को सीधे ढंग से एड्रेस करने के एक टूल का काम करती है।
लेकिन अब दक्षिण भारत के एक राज्य ने इनमें से एक स्लोगन यानी हम दो हमारे दो को त्याग दिया है। आपने अब तक खबर पढ़ ली होगी कि आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री नारा चंद्रबाबू नायडू ने राज्य में तीसरे और चौथे बच्चे के लिए इंसेंटिव का ऐलान किया है! कहा गया है कि तीसरे बच्चे पर उनके पैरेंट्स को ₹30 हज़ार और चौथे बच्चे के जन्म पर ₹40 हज़ार सिंगल इंस्टॉलमेंट में दिए जाएँगे।
दिल्ली मेट्रो में भीड़ के बीच धक्का खाते, DTC की बस में सीट के लिए मारपीट करते और अस्पताल की लाइन में एक पर्चा बनवाने के लिए खड़े हुए किसी भी शख्स को जाकर आप कहेंगे कि भाई आंध्र प्रदेश की सरकार ने 4 बच्चे पैदा करने के लिए इंसेंटिव का ऐलान किया है तो शायद आपको या तो कुछ अभद्र सुनना पड़ जाए या फिर मामला हिंसा में भी बदल सकता है। उसका स्टैण्डर्ड जवाब होगा कि देश पहले ही 150 करोड़ लोगों का हो गया, अब क्यों बढ़ा रहे हो?
लेकिन कोई भी पॉलिसी इतनी सीधी नहीं होती और ना ही उसके कारण इतने सीधे होते हैं। आख़िर जब पूरे देश में लोग भीड़ में जूझ रहे हैं, जब अलग अलग रिसर्च बता रही हैं कि देश की जनसंख्या आने वाले समय में 170 करोड़ तक पहुँचेंगी तो भला इसे और बढ़ाने का कोई तो पक्का रीजन होगा, जिसकी वजह से 76 वर्ष के चंद्रबाबू नायडू ने इतना बोल्ड फैसला लिया है।
और ये फैसला तब लिया है जब पहले ही उनकी सरकार इसी काम के लिए कई योजनाएं चला रही है। आंध्र प्रदेश का ये स्टेप समझने के लिए सबसे पहले हमें समझना पड़ेगा कि आख़िर जनसंख्या होना जरूरी क्यों है? इसके लिए कई सारे मीट्रिक्स हैं जो बताते हैं कि जनसंख्या कम होने पर क्या होता है।
जनसंख्या के मामले में सबसे फेमस और सबसे पहला मीट्रिक है TFR यानी टोटल फर्टिलिटी रेट। टोटल फर्टिलिटी रेट बेसिकली किसी महिला के 15-49 वर्ष की आयु के बीच पैदा हुए बच्चों की संख्या है। एक समुदाय या एक देश का यह औसत देश का एवरेज TFR बनाता है। अब TFR का नंबर अगर 2.1 होता है तो जनसंख्या स्थिर बनी रहती है।
इससे नीचे आने पर जनसंख्या घटती है और ज्यादा होने पर बढ़ती है। ये देखा गया है कि जैसे जैसे कोई देश या प्रदेश विकास में आगे बढ़ता है, उसका TFR घटता जाता है। और TFR के मामले में आंध्र प्रदेश देश में काफ़ी चिंताजनक स्थिति में है। आंध्र प्रदेशमें TFR 2005-06 में ही रिप्लेसमेंट रेट से नीचे जा चुका था। तब आंध्र प्रदेश का TFR 1.8 था।
और अब तो ये और भी नीचे जा चुका है और RBI की रिपोर्ट कहती है कि यह अब 1.5 हो चुका है। यानी आंध्र प्रदेश की जनसंख्या आने वाले समय में घटती जाएगी। लेकिन आपके मन में सवाल उठेगा कि आख़िर जनसंख्या घटना बुरी बात थोड़े है, इससे तो ज़्यादा रिसोर्स ज्यादा कम लोगों के लिए अवैलीबल होंगे।
लेकिन जनसंख्या का घटना इतना सीधा गेम नहीं है, दरअसल, TFR घटने से आगे और कई सारे मीट्रिक्स पर नुकसान होता है जो अल्टीमेटली एक क्राइसिस बनता है। ये कैसे, इसके लिए मैं आपको दूसरे कुछ डिटेल्स बताता हूँ! जब TFR कम होता है तो कम बच्चे पैदा होते हैं, कम बच्चे पैदा होने से युवा जनसंख्या घटती है, युवा जनसंख्या घटने से ज्यादा उम्र के लोग का शेयर ज्यादा होता है और जब ये होता है तो उस स्टेट को एजिंग यानी बूढ़ा करार दिया जाता है।
आंध्र प्रदेश में युवा जनसंख्या लगातार कम हो रही है और अब वो उन प्रदेशों की श्रेणी में पहुँच रहा है जिन्हें Aeging यानी बूढ़े होते स्टेट्स कहा जाता है। इंटरनेशनल लेबर ऑर्गेनाइजेशन कहता है कि कोई भी ऐसा स्टेट जहाँ 15% se ज्यादा जनसंख्या 60 साल से ज्यादा की हो, उसे एजिंग यानी बूढ़ा होता स्टेट कहा जाएगा।
रिजर्व बैंक ऑफ़ इंडिया की साल 2025-26 की रिपोर्ट कहती है कि आंध्र प्रदेश में 2026 में 14.1% जनसंख्या 60 से साल से ऊपर की होगी। यानी आंध्र प्रदेश एजिंग स्टेट बनने के मामले में एकदम Edge पर है। since इसका TFR कम है और नए लोग जनसंख्या में बेहद धीमी गति से जुड़ रहे हैं तो आने वाले समय में ये और बूढ़ा होता जाएगा।
RBI रिपोर्ट कहती है कि साल 2031 में आंध्र प्रदेश की 16.4% और 2036 में 18.9% जनसंख्या 60 साल के ऊपर होगी। वैसे आंध्र प्रदेश के साथ ये प्रॉब्लम यूनिक नहीं है बल्कि उसके पड़ोसी केरल और तमिलनाडु ऑलरेडी Aeging states की श्रेणी में जा चुके हैं।
खैर हम बात कर रहे हैं आंध्र प्रदेश की। आंध्र प्रदेश के पास युवा जनसंख्या रहे और जब तक उसका Aeging पॉपुलेशन का शेयर और भी ज्यादा हो जाए, उससे पहले ही वो लोगों से 3-4 बच्चे पैदा करने की अपील कर रहा है। लेकिन आपके मन में अब भी सवाल बाक़ी बचा होगा कि ज्यादा जनसंख्या बूढ़ी हो भी गई तो आख़िर क्या हो जाएगा।
यहीं पर आता है हमारा तीसरा मीट्रिक, और ये है ओल्ड एज डिपेंडेंसी रेशियो। ओल्ड एज डिपेंडेंसी रेशियो बेसिकली वो नंबर होता है जो बताता है कि राज्य में 100 कामकाजी लोगों पर कितने बूढ़े लोगों यानी 65 साल से ऊपर के लोगों के खर्चे उठाने का भार है। इस नंबर का सीधा इम्पैक्ट होता है उस राज्य के खर्च पर और प्रेफ़रेंस पर।
जहाँ ओल्ड एज डिपेंडेंसी रेशियो ज्यादा होता है, वहाँ पेंशन औ हेल्थकेयर जैसी चीजों पर ज्यादा खर्च होता है।अब आंध्र प्रदेश के केस में ये नंबर भी उसका फ़ेवर नहीं करता। RBI की रिपोर्ट कहती है कि आंध्र प्रदेश का ओल्ड एज डिपेंडेंसी रेशियो लगातार बढ़ रहा है। अभी ये 21.1% है, 2031 में 24.7% होगा और 2036 में ये बढ़ कर 28.9% हो जाएगा।
अलग अलग सोर्सेज कहते हैं कि अगर ये नंबर 10-20% के बीच में हो तो फेवरेबल होता है, 20% से ऊपर ये आपके बजट को थोड़ा सा प्रभावित करता है और अगर नंबर 35% के पार हो जाए तो ये बर्डन आपको हर्ट करने लगता है। जैसे वर्तमान में जापान का ओल्ड एज डिपेंडेंसी रेशियो 50% के ऊपर है और इसके चलते जापान को हेल्थ और पेंशन, दोनों तरह की स्पेंडिंग बढ़ानी पड़ी है।
यहाँ तक कि इस बढ़ते पेंशन के बोझ को लेकर जापान रिफॉर्म्स भी लाया है। अब अगर आंध्र प्रदेश के साथ भी जापान जैसी ही स्थिति बने तो फिर उसका भी पेंशन और हेल्थकेयर स्पेंडिंग का बोझ बढ़ेगा। ऐसे में इस खतरे को पहले ही Pre empt करने के लिए आंध्र प्रदेश ये पालिसी रिफॉर्म्स ला रहा है।
इन मीट्रिक्स के अलावा कुछ और बातें भी हैं जो बताती हैं कि किसी स्टेट में यूथ का होना क्यों जरूरी है। RBI की ही रिपोर्ट कहती है कि जहाँ बूढ़ी जनसंख्या ज़्यादा है वहाँ पर हेलथकेयर पर खर्च ज्यादा होता है और बूढ़ी जनसंख्या सेविंग आदि की तरफ़ ज्यादा जाती है जबकि युवा जनसंख्या ऐसा खर्च करती है जो इकॉनमी को ड्राइव करती हैं।
यानी कुल मिलाकर बात ये है कि किसी स्टेट में यूथ यानी युवा जनसंख्या का होना उसका आर्थिक तरक्की को ज़्यादा तेजी से ड्राइव करता है जबकि बढ़ती बूढ़ी जनसंख्या इसे हैंपर करती है। इसके अलावा घटती जनसंख्या आपके पोलिटिकल वेट को भी इम्पैक्ट करता है। – आंध्र में कौन कमा रहा?
किसी भी कम्यूनिटी या प्रदेश की देश की राजनीति में कितनी हिस्सेदारी होगी, इसका सीधा सबंबंध उसका संसद में हिस्सेदारी से है। अब अगर आंध्र प्रदेश में जनसंख्या कम होती जाएगी तो उसका भी पॉलिटिकल वेट घट जाएगा। चंद्रबाबू नायडू के दिमाग़ में कुछ ऐसे ही कारण होंगे कि वो इंसेंटिव्स का ऐलान कर रहे हैं।
और इसमें सिर्फ़ वन टाइम कैश ट्रांसफर ही बल्कि किसी भी परिवार के तीसरे बच्चे को 5 साल की उम्र तक हर महीने ₹1000 और 18 साल तक की उम्र तक फ्री एजुकेशन जैसे मेजर्स भी शामिल हैं। आंध्र प्रदेश जैसी ही समस्या तमिलनाडु और केरल को भी होने वाली है लेकिन ये राज्य पालिसी को लेकर इतना आगे नहीं बढ़ रहे।
देखने वाली बात होगी कि इन पॉलिसीज़ का इम्प्लीमेंटेशन राज्य की जनसंख्या में आने वाले सालों में क्या इम्पैक्ट लाता है और आंध्र प्रदेश को कोरिया या जापान जैसी घटती जनसंख्या का सामना करना पड़ता है या फिर वो अपने स्टेप्स से इससे पार पा लेता है।
आंध्र प्रदेश के सीएम की एप्रोच थोड़ी सी अनकन्वेंशल जरूर है, लेकिन कितनी कारगर इसके लिए अभी काफ़ी दिन वेट करना पड़ेगा।





