महाराष्ट्र का ‘गढ़चिरौली’, जहाँ कभी नक्सलियों का आतंक हुआ करता था, वहाँ आज पुलिस ने नक्सलियों के 44 Maoist Memorials को ध्वस्त कर दिया है। यानी जिस इलाके में कभी नक्सलियों का दबदबा था, वहाँ अब उनके आतंक को लगभग ‘टाटा-बाय-बाय’ बोल दिया गया है।
देश के Red Corridor वाले राज्य, जैसे झारखंड, छत्तीसगढ़ और ओडिशा, नक्सलवाद से सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्रों में गिने जाते थे। 2014 में देश के 126 इलाके नक्सल प्रभाव से प्रभावित थे, लेकिन 2025 तक यह संख्या घटकर सिर्फ 11 प्रभावित क्षेत्रों तक रह गई।
असली क्लाइमैक्स तो अक्टूबर 2025 में आया, जब नक्सलियों का मास्टरमाइंड ‘भूपति’, जिस पर 1 से 10 करोड़ रुपये तक का इनाम घोषित था, उसने अपने 60 साथियों के साथ गढ़चिरौली में सरेंडर कर दिया। मतलब, जिस आदमी को पकड़ने के लिए सरकार करोड़ों रुपये खर्च करने को तैयार थी, उसने खुद ही आकर सरेंडर की रसीद कटवा ली।
लेकिन नक्सलियों की सफाई अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। फरवरी 2026 में ही तीन दिनों तक चला एक बड़ा एनकाउंटर हुआ, जिसमें C-60 Commando Unit ने 25 लाख रुपये के इनामी कमांडर प्रभाकर समेत 7 खूंखार नक्सलियों को सीधे ‘यमराज’ के पास पार्सल कर दिया।
देशभर में लाल सलाम वालों की लाल निशानियों को मिटाया जा रहा है। सरकार जिस Naxalism को खत्म करने की कोशिश में वर्षों से लगी हुई थी, उसका असर अब ज़मीन पर दिखाई देने लगा है।
यह प्रोजेक्ट थोड़ा कठिन ज़रूर है, क्योंकि लाल सलाम का जोंक अभी भी कई Educational Institutions से चिपका हुआ है। चाहे वह Course Books के जरिए हो या फिर Maoism और Marxism की घुट्टी लोगों को पिलाने की कोशिशों के रूप में।
गढ़चिरौली के जंगलों से सफाई शुरू तो हो चुकी है, लेकिन उसकी धूल बड़े-बड़े शहरों के ड्रॉइंग रूम और विश्वविद्यालयों के सोफों पर अभी भी जमी हुई है। फिर भी, Naxal-Free और Urban Naxal-Free India के लक्ष्य पर काम लगातार तेज़ी से आगे बढ़ रहा है।





