what the BJP did to reclaim a democracy that Congress had long hijacked in the name of 'democracy' after Independence

शेखर गुप्ता जी, लोकतंत्र सुरक्षित है; आपका ईकोसिस्टम इसे नहीं समझा पा रहा है

Summary
मुस्लिम वोटबैंक का भाजपा ने तोड़ा तिलिस्म तो शेखर गुप्ता को परेशानी हुई है, इसीलिए वो कह रहे हैं कि नई राजनीति में भाजपा को मुसलमानों की जरूरत नहीं है। असल में ये है लोकतंत्र का पुनर्जागरण, जहाँ वोट भीड़ बन कर नहीं बल्कि पार्टी और उम्मीदवार देख कर दिए जा रहे हैं।

आज हम एक ऐसी दुकान का पोस्टमार्टम करेंगे जिसका नाम है द प्रिंट। इनके मालिक हैं शेखर गुप्ता, जो आजकल बंगाल में भाजपा की जीत के बाद एक नया रोना रो रहे हैं। रोना क्या है? कि भाई, मोदी और शाह को अब लोकतंत्र में मुसलमानों की जरूरत ही नहीं रही। ये क्लेम कर रहे हैं कि भाजपा ने मुसलमानों को लोकतांत्रिक प्रक्रिया से बाहर कर दिया है।

लेकिन सच ये है कि आपको लोकतंत्र की चिंता नहीं है, आपको उस इंजीनियर्ड वोट बैंक की चिंता है जो अब धराशायी हो चुका है। आप जिसे लोकतंत्र की मौत कह रहे हैं, वो दरअसल उस  Hijacked Democracy  की आज़ादी है जिसे आपके पसंदीदा दलों ने दशकों तक बंधक बनाकर रखा था।

तो कुछ फैक्ट्स देख लेते हैं और जानते हैं कि लोकतंत्र का असली मतलब और इंजीनियरिंग का खेल क्या होता है 

जब दुनिया के प्रोग्रेसिव देशों में लोकतंत्र का विचार आया था, तो उसके पीछे विचार क्या था? Of the people, By the people, For the people. कोई भी चुनाव लड़ सकता था, जनता उसमें उम्मीदवार का विजन सुनती थी। लेकिन फिर आए लोकतंत्र के सो कोल्ड इंजीनियर। इन्होंने शुरू की सोशल इंजीनियरिंग । इन्होंने जनता को इंसानों के बजाय नंबर्स में देखना शुरू किया। यहीं से पैदा हुआ En-masse वोट बैंक का ज़हरीला कांसेप्ट।

यहाँ से आपने उम्मीदवार की योग्यता देखना बंद कर दिया, आपने उसका विजन सुनना बंद कर दिया, आपने सिर्फ विचारधारा और मजहब के नाम पर थोक में वोट डालना शुरू किया। 

एन मासे का कांसेप्ट जब आया तो लोगों ने अपने कैंडिडेट की बात या उसका विजन ना सुनकर के उसकी आइडियोलॉजी देख के En MAsse वोट डालना शुरू किया.. तो डेमोक्रेसी की हत्या तो वहींपर हो गई थी जहाँ विजन से बड़ी विचारधारा हो गई थी.. 70s के दशक तक मुस्लिम आबादी देश में इतनी नहीं थी लेकिन उसके बाद जो बूम आया उनकी पॉपुलेशन में वो एक सॉलिड वोट बैंक भी बन गया. और उनके भीतर भी एक विचार पनपने लगा कि वो भी एन मासे वोट कर सकते हैं.. और यहीं से शुरू हुई अपीजमेंट की पॉलिटिक्स. जिसमें मुस्लिमों को मजा आने लगा था.. ये डेमोक्रेसी के नाम पर सबसे बड़ा टूल बन गया था डेमोक्रेसी को हाईजैक करने का. ये पूरी तरह से हत्या नहीं थी.. और इसके लिए जिम्मेदार है कांग्रेस. 

शेखर गुप्ता को ये जानने की जरूरत है कि लोकतंत्र की मौत तो उसी दिन हो गई थी जब आपने वोट को सौदा बना दिया था। और इस सौदेबाजी के पीछे सबसे बड़ी ज़िम्मेदार कांग्रेस है। और ऐसा कहने के मेरे पास प्रमाण भी हैं..

90 के दशक की उनकी स्कीमें देखिए, आपको समझ आ जाएगा कि कैसे उन्होंने मुस्लिमों को डराकर उसे सिर्फ एक वोटिंग मशीन बना दिया। Places of Worship Act, अल्पसंख्यक आयोग, Waqf Act,  हिंदूवादी संगठनों पर प्रतिबन्ध, शाह बानो का केस,.. इन नीतियों को कांग्रेस ने ‘धर्मनिरपेक्षता’ और ‘अल्पसंख्यक सुरक्षा’ के नाम पर पेश किया, जबकि ये बहुसंख्यक हिंदू समाज के हितों की अनदेखी और मुस्लिम वोट बैंक को लुभाने की कोशिश थी. 

भाजपा कोई खैराती पार्टी नहीं 

अब आते हैं द प्रिंट के उस रोने पर कि BJP मुसलमानों को टिकट क्यों नहीं देती… देखिए, भाजपा कोई पारंपरिक तुष्टिकरण वाली पार्टी नहीं है। भाजपा एक प्रोफेशनल पार्टी है जिसका एक राष्ट्रवादी विजन है और वो है नेशन फर्स्ट। अब मैं आपसे ही पूछता हूँ कि कितने मुस्लिम नेता सीना ठोक कर ये कह सकते हैं कि मेरे लिए मजहब नहीं, राष्ट्र प्रथम है? 

तो फिर जो नेता पार्टी के विजन से मेल नहीं खाता, उसे भाजपा टिकट क्यों देगी? क्या राजनीति कोई खैरात बांटने की जगह है?

दूसरी बात: Winability फैक्टर। ये तो कोई हिडन बात नहीं है कि चुनाव जीतने के लिए लड़ा जाता है, फोटो खिंचवाने के लिए नहीं।

अगर किसी उम्मीदवार के जीतने के चांस ही नहीं हैं, तो क्या पार्टी अपना टिकट और रिसोर्स बर्बाद करे? कल को अगर आरफा खानम जैसी लोग गारंटी दें कि वो नेशन फर्स्ट; के विजन पर चलेंगी और सीट जीतकर देंगी, तो शायद उन्हें भी बीजेपी से टिकट मिल जाए। लेकिन दिक्कत ये है कि आपका एजेंडा राष्ट्र नहीं, कुछ और है।

BJP ट्रेडिशनल पार्टी नहीं है जो अपीजमेंट के लिए केंडिडेट खड़े करे,  BJP प्रोफेशनल पार्टी है जिसका नेशनलिस्ट विजन है और उसकी थीम ही नेशन फर्स्ट की है.. तो कितने मुस्लिम ऐसे हैं जो ये कहने को तैयार हैं कि उनके लिए उनका इस्लाम बाद में आता है लेकिन राष्ट्र पहले..? 

कश्मीर का आईना और कड़वा सच

आप कश्मीर के चुनाव देख लीजिए। वहां भाजपा मुस्लिम उम्मीदवार उतारती है। लेकिन क्या वो जीतते हैं? नहीं… क्यों? क्योंकि वहां का वोटर मुस्लिम उम्मीदवार को नहीं देख रहा, वो सिर्फ ये देख रहा है कि सामने भाजपा है। उनका मकसद सिर्फ भाजपा को हराना है।

तो जब वहां का समुदाय खुद भाजपा को अछूत मानता है, तो आप भाजपा से ये उम्मीद कैसे कर सकते हैं कि वो उन लोगों पर दांव लगाए जो उन्हें वोट ही नहीं देना चाहते? ये प्रोफेशनल काम है ना भाई… It used to be side job in 90s…   Political immunity के लिए लोग राजनीति जॉइन कर लिया करते थे.. आप उदाहरण देख लो उठाकर के.. लेकिन BJP ने इसी सिस्टम को तोड़ा, उनके लिए राजनीति ही प्रोफेशन है..

Gen Z और बदलता भारत

अब बात करते हैं उस वर्ग की जिससे आप और आपके जैसे लुटियंस पत्रकार पूरी तरह कट चुके हैं – Gen Z।

शेखर गुप्ता जैसे लोग अपनी एलीट ऑफिसों में बैठकर फैंटेसी देखते रहते हैं, जबकि जमीन पर युवा बदल चुका है। आज का युवा प्राउड नेशनलिस्ट है। उसे अपनी संस्कृति पर गर्व है। आप भजन क्लबिंग का क्रेज देख लो इस जेनरेशन में.. उसे ख़ुद को हिंदू कहने में कोई शर्म नहीं आती.. जबकि कांग्रेस ये मानकर बैठी है कि आज भी वो लोग मौजूद हैं जिन्हें आप हिंदू-ब्राह्मण या बनिया कह देंगे तो उनका सर शर्म से झुक जाएगा.. या अगर आप उन्हें राष्ट्रवादी कहकर लेबल करने की कोशिश करेंगे तो वो अपमानित होगा.. 

एक टाइम था जब कम्युनिस्ट आइडियोलॉजी के नाम पर आँख बंद कर के वोट पड़ते थे, लेकिन आज नक्सलबाड़ी कम्युनिस्टों के आतंक से आजाद हो गया है.. आज हर युवा के हाथ में मोबाइल है, वो फैक्ट-चेक करता है। फैक्ट चेक नहीं तो ट्रस्ट नहीं… ये वो दौर नहीं है जब नेहरू और इंदिरा के भाषण मात्र से लोग ग़रीबी को अपना नसीब मान लेते थे और तब भी कहते थे कि इन दो जैसा कोई लीडर ही नहीं हुआ.. आज का जेन Z एनलाइटेंड है और वो West के जैसा भी नहीं है कि मौज मस्ती के लिए gvt हाइजैक कर ली.. उन्होंने बाक़ी देश में Gen Z की गलतियों से सबक लिया है कि वो लोग इस मस्ती के चक्कर में गड्ढे में जा रहे हैं .. तभी तो यहाँ जेन Z के नाम पर कोई प्रोटेस्ट नहीं कामयाब हुए इतने टाइम से.. 

आज का युवा शेयर मार्केट में इन्वेस्ट कर रहा है। उसे पता है कि इकॉनमी कैसे स्ट्रॉन्ग होती है। उसे समझ है कि मुफ्त की रेवड़ियां और अपीजमेंट देश को गर्त में ले जाएंगी और ये बिजनेस के लिए भी अच्छा कल्चर नहीं है। इसलिए ये विक्टिम कार्ड वाला आर्टिकल पूरी तरह से वाहियात और कूड़ा है।

लोकतंत्र सुरक्षित है

शेखर गुप्ता या आरफ़ा जैसों की तकलीफ ये है कि भाजपा ने वो कोड क्रैक कर लिया है जिससे कांग्रेसी इकॉसिस्टम वाली गैंग लोकतंत्र को हाइजैक करके बैठे थे। इसे गणित मानकर कुछ साल तक कांग्रेस ने राज किया भी लेकिन अब वो गणित fail हो गई है क्योंकि BJP ने वो डिकोड कर लिया ताकि डेमोक्रेसी को हाईजैक करने से बचाने के लिए उसे सुरक्षित किया जा सके.

आपने वोट काउंट की राजनीति की, जबकि भाजपा ने नेशन फर्स्ट की राजनीति की। भाजपा ने जो किया है, वो लोकतंत्र को खत्म करना नहीं, बल्कि उसे उस ब्लैकमेलिंग से बचाना है जो दशकों से चल रही थी। आपका आर्टिकल लोकतंत्र की चिंता में नहीं, बल्कि अपनी डूबती हुई दुकान की चिंता में लिखा गया है।

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