पाकिस्तान जैसा देश और जिहादी मेंटेलिटी वाले जो लोग 1971 में अपने देश के दो टुकड़े होने के बाद भी खुद को ‘विजेता’ बताते हैं… जो 93 हजार सैनिकों के सरेंडर को हार नहीं मानते… वो आज अयोध्या का नाम आते ही बिलबिला क्यों जाते हैं? वो आज धार की भोजशाला का फैसला आते ही कोर्ट से लेकर सड़क तक छटपटाने क्यों लगते हैं? क्यों अचानक उन्हें ‘ज़मीन के बदले ज़मीन’ का फॉर्मूला याद आने लगा है?
भोजशाला को लेकर जो कानूनी और सांस्कृतिक बहस छिड़ी है, उसने एक बार फिर भारत के इतिहास और एक विशेष धार्मिक मानसिकता को आमने-सामने खड़ा कर दिया है। इतिहास इस बात का गवाह है कि मध्यकाल में जहाँ भी इस्लामी आक्रांता गए, उन्होंने केवल पूजा स्थलों को नहीं तोड़ा, उन्होंने अपनी मज़हबी संप्रभुता स्थापित करने के लिए मंदिरों के ऊपर मस्जिदों का निर्माण किया। ये संदेश देने की कोशिश की गई थी कि मुस्लिमों का ईश्वर दूसरों के ईश्वर से अधिक शक्तिशाली है।
आज जब भारत अपने स्वाभिमान और ऐतिहासिक धरोहरों को पुनः प्राप्त कर रहा है, रिक्लेम कर रहा है, तो हमें उस मानसिक प्रतिरोध को समझना होगा जो इसके विरोध में खड़ा है। इसके पीछे एक गहरा कुरानिक और रणनीतिक मनोविज्ञान है, जिसे समझे बिना हम इस विमर्श को कभी पूरा नहीं कर सकते।
हार को नकारने की ग्रंथि (The Denial of Defeat)
आप कभी किसी मुस्लिम या पाकिस्तानी विचारक, विश्लेषक या नागरिक से पूछिए कि क्या वे 1947, 1965, 1971 या कारगिल का युद्ध हारे हैं? उनका उत्तर होगा कि “नहीं, हम कभी नहीं हारे।” वे आज भी सिंधु (भारतीय सेना के पराक्रम) के सामने अपनी हार को नकारते हैं।
भारत में भी जो मुस्लिम कट्टरपंथी मौजूद हैं, वो भी भारतीय सेना के ऑफ़िसिशियल डॉक्यूमेंट्स के बजाय पाकिस्तान के इस झूठे नैरेटिव पर भरोसा करते हैं कि पाकिस्तान तो कभी हारा ही नहीं। आखिर ऐसा क्यों है? कोई समाज अपनी प्रत्यक्ष और ऐतिहासिक हार को इतनी बेशर्मी से कैसे नकार सकता है?
इसका उत्तर आपको आर्मी हेडक्वार्टर्स में नहीं मिलने वाला है क्योंकि इसका उत्तर कुरानिक कांसेप्ट ऑफ वॉर (Quranic Concept of War) के भूमि सिद्धांत में छिपा है।
जीत और हार की ‘इस्लामी परिभाषा’
इस्लामी war स्ट्रेटेजी – युद्ध रणनीति – में हार और जीत के पैमाने मॉडर्न डिफेंस साइंस से बिल्कुल अलग हैं। यहाँ जीत और हार को तीन मेन कॉन्सेप्ट पर तौला जाता है:
- संपूर्ण विजय (Total Victory): यदि किसी गैर-मुस्लिम (काफिर) से युद्ध में मुस्लिमों को जीत मिले और वे उनकी भूमि पर कब्जा कर लें, तो यह उनके लिए ईश्वर की ओर से दी गई स्पष्ट विजय है।
- यथास्थिति भी एक जीत (Status Quo as Victory): यदि युद्ध भीषण हो, लेकिन मुस्लिम पक्ष अपनी एक इंच भूमि भी न खोए, तो सैन्य रूप से कमजोर होने के बावजूद उसे ‘विजय’ ही माना जाता है।
- हार की एकमात्र परिभाषा (The Only Definition of Defeat): इस्लामी मानसिकता में पराजय केवल और केवल तब स्वीकार की जाती है, जब उनके नियंत्रण वाली ‘इस्लामिक भूमि’ (Islamic Land) का एक इंच हिस्सा भी उनके हाथ से हमेशा के लिए निकल जाए।
इतिहास के आईने में इस सिद्धांत का प्रमाण:
- 1947 का विभाजन: उनके लिए यह जीत थी क्योंकि उन्होंने भारत का सीना चीरकर ‘पाकिस्तान’ और ‘POK’ के रूप में एक नई इस्लामिक Land का निर्माण किया।
- 1965 का युद्ध: भारतीय सेना लाहौर तक पहुँच गई थी, लेकिन ताशकंद समझौते में भारत ने जीती हुई जमीन वापस कर दी। चूँकि उनकी जमीन नहीं गई, इसलिए उन्होंने इसे अपनी जीत घोषित कर दिया।
- 1971 का बांग्लादेश संकट: टेक्निकली देखें तो पाकिस्तान के दो टुकड़े हुए, लेकिन जो नया देश बना (बांग्लादेश), वह भी एक मुस्लिम बहुल देश ही रहा। यानी, ‘इस्लामिक भूमि’ का एक इंच भी कम नहीं हुआ, सिर्फ शासक बदला। इसलिए उनकी नजर में यह इस्लाम की हार नहीं थी।
- कारगिल और बालाकोट: कारगिल में LOC वैसी ही रही और बालाकोट में हवाई हमले हुए पर जमीन नहीं छिनी। इसलिए वे आज भी कहते हैं कि “हम नहीं हारे।”
ऑपरेशन सिंदूर में हमने उन्हें घर में घुस कर मारा लेकिन तब भी वो शान से यही कहते हैं कि उनकी हार नहीं हुई..
अयोध्या, वक्फ और वर्तमान छटपटाहट
लेकिन, पिछले कुछ वर्षों में यह भ्रम टूटा है। और यही कारण है कि आज जिहादी कट्टरपंथियों में हल्ला मचा हुआ है। आपने ध्यान दिया होगा तो बाबरी ढांचे के कानूनी पतन ने जिहादियों के इस मनोविज्ञान को सबसे गहरी चोट पहुँचाई है।
अयोध्या में उन्होंने न केवल एक मुकदमा हारा, बल्कि अपने कॉन्सेप्ट के अनुसार ‘इस्लामिक भूमि’ हमेशा के लिए खो दी। यही कारण है कि आज वैश्विक स्तर पर आतंकी संगठन और कट्टरपंथी तत्व इसी एक बात पर सबसे ज्यादा हाय-तौबा मचाते हैं, क्योंकि उनके सिद्धांतों के अनुसार यह उनकी पहली वास्तविक और स्थायी हार है। आपको याद होगा जिहादियों ने क्या तबाही मचाई थी, जब कारसेवकों ने विवादित ढांचे को समतल किया था.. क्योंकि उन्हें अपनी ज़मीन खोने का डर पहली बार अपने सामने सच होता नजर आया..
यही छटपटाहट आज ‘वक्फ बोर्ड कानून’ में संशोधन के विरोध में दिख रही है। जैसे ही सरकार ने वक्फ की अवैध जमीनों पर नियंत्रण कसना शुरू किया, पूरे तंत्र में आक्रोश फैल गया। क्योंकि जमीन का घटना, उनके लिए उनके वर्चस्व का घटना है। और सबसे रीसेंट चीज बंगाल में BJP की जीत भी वही सिविलाइजेशनल जीत है.. इसी करण बंगाल में भाजपा की जीत के बाद इतना हाय तौबा मच रही है..
अब तस्वीर बदल चुकी है। आज जिहादियों के लिए सीधा और हिंसक आक्रमण करना असंभव हो गया है। हमारी इंटरनल सिक्योरिटी के मजबूत होने के कारण ‘व्हाइट कॉलर कवर’ भी बेअसर हो रहा है। आप TCS से लेकर, अल फ़लाह यूनिवर्सिटी जैसे तमाम एग्जाम्पल देखिए, जो अब पकड़ लिए जा रहे हैं.. और इन्हें जल्दीबाजी में फटना पड़ रहा है.. या PFI जैसी संस्था बैन कर दी गई हैं जो देश में जिहाद की जड़ों को गहरा करने के काम आती थीं…
इसलिए अब वे एक नई रणनीति पर आ गए हैं कि “चुपचाप और चुपके से समझौता कर लो, और कोर्ट के बाहर जमीन के बदले दूसरी जमीन की मांग करो” ताकि कागजों पर उनकी ‘जमीन’ बची रहे।
अब सवाल यह उठता है कि भूमि को लेकर यह कड़ा रुख और यह परिभाषा आई कहाँ से? इसके पीछे शरिया और इस्लामी न्यायशास्त्र का एक अकाट्य सिद्धांत है।
क़ुरान की सूरह अल-बकरा (आयत 191) में एक आदेश आता है:
‘وَأَخْرِجُوهُم مِّنْ حَيْثُ أَخْرَجُوكُمْ’ (और उन्हें वहां से निकाल बाहर करो, जहां से उन्होंने तुम्हें निकाला था।)
मूल रूप से यह आयत मक्का की भूमि को वापस पाने के संदर्भ में थी, लेकिन मध्यकाल से लेकर आज तक के कट्टरपंथी विचारकों ने इसका विस्तार पूरे वैश्विक भू-भाग पर कर दिया। उनके सिद्धांतों के अनुसार, ‘एक बार जो भूमि दार-अल-इस्लाम (इस्लामी शासन के अधीन) बन गई, वह कयामत तक के लिए अल्लाह की जमीन हो गई।’ उसे किसी गैर-मुस्लिम (काफिर) के हाथों में वापस जाने देना शरिया के अनुसार ‘कुफ्र’ (विश्वासघात) और सबसे बड़ी धार्मिक हार माना जाता है।
यही कारण है कि जब वे स्पेन (अंडलुसिया) हारे, तो सदियों तक उसका विलाप किया गया। आज जब फिलिस्तीन, कश्मीर या भारत में अयोध्या और भोजशाला जैसी जमीनों पर उनका दावा कमजोर होता है, तो उनकी छटपटाहट सैन्य विफलता के बजाय सीधे इस ‘ईश्वरीय आदेश’ की विफलता से जुड़ जाती है। वे मानते हैं कि ज़मीन खोने का मतलब है, अपनी संप्रभुता और धार्मिक वर्चस्व को हमेशा के लिए खो देना।
इजरायल और अफगानिस्तान के उदाहरण देखिए; इस्लाम के इस मनोविज्ञान को दुनिया में केवल एक ही देश सबसे बेहतर तरीके से समझा है और वो देश है इजरायल। इजरायल जानता है कि इन ताकतों से केवल बातचीत या युद्ध लड़कर नहीं जीता जा सकता। इन्हें हराने का एकमात्र तरीका है इनकी भूमि पर कब्जा (Land Capture)।
यही वजह है कि इजरायल ने टेंपल माउंट से लेकर गाजा, वेस्ट बैंक और गोलन हाइट्स तक की जमीन पर सीधा कब्जा किया।
1967 के युद्ध में जब इजरायल ने मिस्र से पूरा सिनाई प्रायद्वीप (Sinai Peninsula) जीत लिया, तो मिस्र को घुटनों पर आना पड़ा। बाद में जब शांति समझौता हुआ, तब भी इजरायल ने रणनीतिक रूप से पूरी जमीन वापस नहीं की। बस कुछ ही हिस्सा उन्हें सौंपा ताकि उनके भीतर हार का संदेश बना रहे।
यही कारण है कि इजरायल के सामने वे बेचारा और असहाय महसूस करते हैं, क्योंकि इजरायल सीधे उनकी हार की परिभाषा (यानी, ज़मीन का नुकसान) पर अटैक करता है।
दूसरी ओर, अफगानिस्तान का उदाहरण देखिए। अमेरिका ने 20 साल तक वहां बमबारी की, लाखों लोग मारे गए, लेकिन अमेरिका ने वहां की जमीन पर कब्जा करके अपनी बस्तियां नहीं बसाईं। परिणाम क्या हुआ? अमेरिका के जाते ही तालिबान ने सीना तानकर कहा कि “हम कभी नहीं हारे, हमने महाशक्ति को हरा दिया।” क्योंकि उनकी जमीन उनके पास ही रही।
चाहे वह इजरायल की गोलन हाइट्स हो, या भारत में अयोध्या, काशी, मथुरा और भोजशाला का सांस्कृतिक पुनरुत्थान, रियलिटी यही है कि इस विशेष मानसिकता के शब्दकोश में हार का केवल एक ही अर्थ है: “भूमि का नियंत्रण खो देना।”
जिस दिन किसी इस्लामी देश या संगठन के आर्मी ऑफिसर या नेता ने यह स्वीकार कर लिया कि उन्होंने अपनी जमीन खो दी है, उस दिन वहां की जनता उन्हें सड़कों पर जूते मारेगी, उनका तिरस्कार कर देगी और बग़ावत हो जाएगी। भोजशाला से लेकर वक्फ तक का वर्तमान विवाद, इसी ‘भूमि और वर्चस्व’ के मनोविज्ञान की छटपटाहट है, जिसे आज समझने की जरूरत है। और हमारी सेना से लेकर सरकार तक को ये बात ध्यान रखनी चाहिए कि अगली बार जब पाकिस्तान को घर में घुसकर हम मारें, तो चाहे उनके 2 गांव ही सही, मगर उनकी ज़मीन के कुछ हिस्से अपने पास जरूर रख लें।





