जम्मू और कश्मीर के लिहाज़ से आज जब भी बात होती है तो 5 अगस्त 2019 को एक बिंदु के तौर पर देखा जाता है। सवाल होता है कि धारा 370 के निराकरण के बाद और पहले की घाटी कैसी दिखती है। लेकिन मुझे लगता है कि घाटी की कहानी अगर समझनी है तो एक और तारीख़ है जिसके बाद और पहले की कहानी को देखा और समझा जाना चाहिए – 8 जुलाई 2016 की तारीख़।
इस जवाब को जानने से पहले एक और तारीख़ अहम है, 1 जुलाई 2015। इस तारीख़ को एक फेसबुक अकाउंट से एक तस्वीर पोस्ट की गई। इस तस्वीर में कैमोफ्लाज ड्रेस पहने ग्यारह जवान कश्मीरी लड़के थे, जिनके हाथों में कलाश्निकोव राइफलें थीं। पहली नज़र में कोई देखे तो लगे कि भारतीय सेना की कोई टुकड़ी है, लेकिन ये आतंकवादी थे। ऐसा पहली बार हो रहा था जब आतंकवादी खुद अपनी पहचान खुद डिस्क्लोज कर रहे थे।
इस तस्वीर के केंद्र में जो चेहरा था, उसने अपनी हर एक्टिविटी को इंटरनेट पर प्रसारित और प्रचारित करना शुरू किया। इस चेहरे का नाम था बुरहान मुजफ्फर वानी। आज की जेन ज़ी को शायद याद भी न हो कि इन तस्वीरों ने इंसर्जेंसी में डूबे कश्मीर के उस दौर की तरुण पीढ़ी पर क्या असर छोड़ा था। 1994 में एक सरकारी स्कूल के हेडमास्टर के घर में जन्मे बुरहान वानी ने पंद्रह साल की उम्र में हथियार उठाया और 21 साल की उम्र में वो पाकिस्तान के आतंकी संगठन हिजबुल मुजाहिदीन का सबसे बड़ा पोस्टर बॉय बन गया था।
फेसबुक, व्हाट्सएप और दूसरे ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर उसकी तस्वीरें, वीडियो और संदेश तेज़ी से फैलाए जाते, जिनका असर विशेषकर दक्षिण कश्मीर के मुस्लिम युवाओं पर बहुत ज़्यादा पड़ा। और इसके लिए बाकायदा सोशल मीडिया की एक कोऑर्डिनेटेड टीम बनाई गई थी। बाकायदा ग्रुप्स बनाए गए, जिनके ज़रिए ये सुनिश्चित किया गया कि उसकी तस्वीरें हर कश्मीरी तक पहुँचें।
ये समझना होगा कि ये तस्वीरें केवल हथियारों का प्रदर्शन भर नहीं थीं, बल्कि आतंकवादियों की सोची-समझी साइकोलॉजिकल रणनीति का हिस्सा थीं। अगर आप उन तस्वीरों को ध्यान से देखेंगे तो पाएंगे कि इनमें किसी के चेहरे पर कोई तनाव या डर नहीं है, बल्कि बड़े आत्मविश्वास के साथ हँसते हुए, एक समूह के तौर पर एकजुट नजर आते हैं। और इन तस्वीरों में एक खास बात ये थी कि उनमें रखी कुरान, इस्लामी झंडे और दूसरे मज़हबी प्रतीक इस बात का इंप्रेशन देने की कोशिश करते थे कि वे सिर्फ़ एक आतंकी संगठन का हिस्सा नहीं, बल्कि इस्लाम की लड़ाई लड़ने वाले “भाई” हैं।
जिससे इनके उम्माह यानी इस्लामिक ब्रदरहुड के इस तरह के प्रदर्शन से कश्मीर के नॉन-मिलिटेंट मुस्लिम युवा इन्हें अपने जिहादी रहनुमा भाई के तौर पर देखें। और ये प्रूवन ट्रुथ है कि बुरहान वानी की तस्वीरें सिर्फ़ फोटो नहीं थीं, बल्कि कश्मीर के नॉन-मिलिटेंट मुस्लिम युवाओं को प्रभावित करने वाला एक वेल-क्राफ्टेड, सुनियोजित प्रोपेगेंडा थीं। और उसे जिहाद अल-असग़र का जिहादी साबित करने की योजना बनाई गई। इसी वजह से आपको दिखेगा कि सेक्युलर्स इसे गरीब हेडमास्टर का बेटा बताने की कोशिश करते हैं। और कश्मीर घाटी में इसे आदर्श जिहादी के तौर पर प्रचारित किया जाता रहा। एक सिक्के के दो पहलू, जिसका एक नाम था बुरहान वानी।
और इस पूरे मिलिटेंट-कम-जिहादी भाई के प्रोपेगेंडा को इंपोज करने का इम्पैक्ट ये हुआ कि 2015-16-17-18 में कश्मीर में मिलिटेंट बनने वालों की संख्या में बढ़ोतरी भी दर्ज की गई। तत्कालीन जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती द्वारा विधानसभा में लिखित उत्तर में दिया गया था कि 2015 में 66, 2016 में 88 और 2017 में 126 स्थानीय कश्मीरी मुस्लिम युवा आतंकवादी संगठनों में जाकर जिहादी बने थे।
और रिक्रूटमेंट के लिए अगर आप देखेंगे तो बाकायदा फंडिंग की व्यवस्था होती थी, जिसमें लोकल एक्सटॉरशन नेटवर्क से लेकर पाकिस्तान-बैक्ड हवाला नेटवर्क काम करता था। आपने फिल्म ‘धुरंधर’ में जावेद खानानी का किरदार देखा होगा, जिसमें खनानी ब्रदर्स नाम की एक कंपनी होती है और क्रॉस-बॉर्डर टेररिज्म से लेकर नक़ली नोट छापने तक का काम होता था। उसका इस्तेमाल भारत में आतंकवाद फैलाने और बुरहान वानी जैसे पोस्टर बॉय तैयार करने के लिए किया जाता था।
स्पेशल इंसेंटिव रखे जाते थे जिससे कि यंग लड़कों को आतंकवाद की तरफ़ धकेला जा सके, जिसमें मज़हबी मोटिवेशन से लेकर हवाला के पैसों का सपोर्ट इन्वॉल्व होता था।
और दुनिया भर में जिहाद से प्रेरित आतंकवाद का यही पैटर्न रहा है। 97 फ़ीसदी सुन्नी मुस्लिम आबादी वाले लीबिया के सिविल वॉर पर एक रिसर्च भी की गई और उसके मुताबिक भी यही बात निकल आई कि वहाँ किसी भी आतंकवादी या मिलिटेंट ग्रुप की सबसे बड़ी ताक़त उसका हथियार नहीं था, बल्कि अंसार अल-शरिया और लिबियन मुस्लिम ब्रदरहुड जैसे मिलिटेंट ग्रुप ने उन मिलिटेंट्स के बीच जो इमोशनल बॉन्ड बनाया – जिसे हम कई बार कॉमरेडरी या ब्रदरहुड कहते हैं – वो बहुत ज़्यादा था। और उसने इस जंग को एक लिमिट से बाहर तक लड़ने का मोटिवेशन दिया। और इन लड़ाकों को पैसों और रिसोर्स की चिंता न हो, इसके लिए वहाँ भी पूरे हवाला नेटवर्क का इस्तेमाल किया जाता था।
और इसी तरह से बुरहान वानी के ज़रिए कश्मीर में मिलिटेंसी को दोबारा ज़िंदा करने की कोशिश पाकिस्तान ने की। और बुरहान की वजह से ये परसेप्शन और ज़्यादा मजबूत हुआ कि बंदूक़ उठाना बहुत सामान्य और अपमानजनक तो बिल्कुल नहीं है। मदरसों और सो-कॉल्ड सेपरेटिस्ट लीडर्स का एक सिस्टम बनाया गया, जिसके ज़रिए जिहाद को बहुत कम उम्र से प्रमोट किया जाता और उसे नॉर्मल बताया जाता। और इसके लिए सैयद अली शाह गिलानी जैसे टीवी पर दिखने वाले चेहरों तक को मदरसों में भेजा जाता। बड़ी मस्जिदों के इमाम और मौलानाओं को भेजा जाता, जहाँ वो जस्टिफाई करते कि भारत के खिलाफ़ जंग एक जिहाद है, जिसे लड़ने से जन्नत मिलेगी।
इसी वजह से जब बुरहान की मौत बतौर आतंकवादी हुई – राष्ट्रीय राइफल्स के एनकाउंटर में हुई – उसके बाद उसके पिता ने, जो सरकारी स्कूल का हेडमास्टर था, उसने बुरहान वानी का ना सिर्फ़ समर्थन किया बल्कि ये कहा कि उसे गर्व है कि उसके बेटे ने “अल्लाह की राह” में शहादत हासिल की। उसके अपने शब्द ये थे, ‘उसने अल्लाह का रास्ता चुना और उसी के पास लौट गया।’ अब सोचकर बताइए कि कौन नहीं मानेगा कि कश्मीर का हीरो वही है जिसके हाथ में हथियार है।
और भारत की सेना और इंटेलिजेंस को ये दिख रहा था कि बुरहान वानी अब सिर्फ़ एक और आतंकवादी नहीं है। वो एक टेररिस्ट इंफ्लुएंसर बन चुका है।
और चूँकि 2014 के बाद इंडियन स्टेट की पॉलिसी में एक मेजर शिफ्ट आया और इसकी वजह से ट्रेडिशनली जो LOC पर करके पाकिस्तान से आने वाले आतंकी थे, उनकी तादाद कम हुई। उसके बदले में 90s में पैदा हुई कश्मीर की जिस मुस्लिम जनरेशन ने पहले दिन से हथियार देखा था, उन्हें रिक्रूट किया जाने लगा। ऑलरेडी एग्ज़िस्टिंग हवाला नेटवर्क, मस्जिद और मदरसा इकोसिस्टम और OGW नेटवर्क ने उस रिक्रूटमेंट में बड़ी भूमिका निभाई।
और बुरहान वानी बेसिकली उनके लिए एक आइडियल बन गया। जिसके बाद भारतीय सेना ने एक नया ट्रेंड नोटिस किया कि पहले आतंकी अपनी पहचान छिपाते थे, यहाँ तक कि अगर किसी लोकल ने उनकी तस्वीर बनाने में सेना की मदद कर दी तो उसे सज़ा भी देते थे। लेकिन अब कुछ नया हो रहा था। अब हर दिन सोशल मीडिया पर एक ना एक आतंकी की तस्वीर देखने को मिल जाती, जिसकी उम्र से ज़्यादा वजन वाली AK-47 उसके हाथों में होती।
दूसरी तरफ़ जब नरेंद्र मोदी 2014 में प्रधानमंत्री बने तो उनके कोर वादों में ही टेररिज्म-मुक्त भारत था। अजीत डोवाल जैसे काबिल अधिकारी थे, जो पाकिस्तान की नस-नस से वाकिफ़ थे। और भारतीय सेना थी, जो हर साल इन आतंकियों की वजह से सैकड़ों ज़ख़्म खाती थी। बरसों की ट्रेनिंग और इन्वेस्टमेंट से तैयार हुआ एक स्पेशल फोर्सेज़ का जवान एक रैंडम मदरसा-छाप जिहादी द्वारा धोखे से मार दिया जाता था।
6 अप्रैल 2015 को जम्मू-कश्मीर में महज़ चार घंटे के भीतर आतंकवादियों ने तीन अलग-अलग हमले किए। शोपियां में घात लगाकर तीन पुलिसकर्मियों की हत्या कर दी गई, जबकि बारामूला में एक पुलिस अधिकारी को गोली मारकर गंभीर रूप से घायल कर दिया गया। और इसके बाद बुरहान वानी का एक छह मिनट का वीडियो आया, जिसमें उसने कहा कि भारतीय सेना तो हमारी दुश्मन है ही, लेकिन जम्मू-कश्मीर पुलिस को तो हमने साथ देने के लिए कहा था। वो हमारे अपने हैं। उन्हें हमारा साथ देना चाहिए, नहीं तो हम उन्हें मारने से बचेंगे नहीं।
भारतीय सेना और सरकार के सामने ये एक खतरनाक ट्रेंड था। और ये 1990 से 2010 के समय में पैदा और जवान हुई जनरेशन थी। बुरहान वानी इस जनरेशन का सबसे बड़ा इंफ्लुएंसर था।
और इस बात को समझना होगा कि अगर 8 जुलाई 2016 की तारीख़ को जो हुआ, वो नहीं हुआ होता तो शायद अंदर ही अंदर कितना बड़ा सैलाब जन्म ले लेता, उसे समझने का भी मौका हमें नहीं मिलता।
Lt General Syed Ata Hasnain उस दिन को याद करते हुए लिखते हैं कि 8 जुलाई 2016 को शाम लगभग 6 बजे कोकरनाग में एक बार फिर गोलियों की आवाज़ गूंजने लगी। मुठभेड़ शुरू होने के कुछ ही मिनटों के भीतर मुझे पहला फोन आया और उसी से अंदाज़ा हो गया कि यह कोई सामान्य एनकाउंटर नहीं है। फोन करने वाले ने कहा, ‘नब्बे प्रतिशत संभावना है कि घेराबंदी के भीतर बुरहान वानी ही मौजूद है।’
जो लोग नहीं जानते, उन्हें बता दें कि बुरहान वानी कश्मीर घाटी का सबसे वांछित आतंकवादी था। उसे दक्षिण कश्मीर में तथाकथित न्यू मिलिटेंसी की लहर खड़ी करने का प्रमुख चेहरा माना जाता था। 8 जुलाई 2016 की शाम 7:30 बजे उसी व्यक्ति का दोबारा फोन आया। इस बार उसने पुष्टि कर दी कि मुठभेड़ में मारा गया आतंकवादी वास्तव में बुरहान वानी ही था। उसे भारतीय सेना की यूनिट 19 राष्ट्रीय राइफल्स-सिख लाइट इन्फैंट्री ने मार गिराया था।
Lt General के मुताबिक जब बुरहान वानी को एहसास हो गया कि वह पूरी तरह घिर चुका है, तो उसने घेराबंदी तोड़कर बाहर निकलने की कोशिश की। इसी दौरान सुरक्षा बलों ने उसे गोली मार दी। इससे वह उस घर के भीतर ज़िंदा जलकर मरने से बच गया, जिसमें वह छिपा हुआ था और जो रॉकेट तथा अन्य हथियारों के इस्तेमाल के कारण आग की चपेट में आ गया था। जिससे उसकी पहचान हो पाई।
बुरहान वानी के एनकाउंटर के दो हफ्तों के बाद ही अमरनाथ यात्रा भी होने वाली थी। सेना के सामने सबसे बड़ा सवाल खड़ा हुआ कि क्या इसकी लाश को परिवार को सौंपना चाहिए या चुपचाप दफ़ना दिया जाए? तय हुआ कि परिवार को लाश सौंपी जाएगी। इसके अपने खतरे थे लेकिन लाश न देना एक अलग तरह के विवाद को जन्म दे सकता था। क्योंकि ऊपर आपको मैंने बताया है कि बुरहान वानी कश्मीर की न्यू मिलिटेंसी का कितना बड़ा पोस्टर बॉय बन चुका था। और अब वो आतंकवादियों का शहीद पोस्टर बॉय था।
आप इस तस्वीर को देखिए, ये बुरहान वानी के जनाज़े की तस्वीर है। अब उसका जनाज़ा उठाए लोगों को देखिए। ये सभी अठारह से बीस-बाईस साल के कश्मीरी मुस्लिम युवा हैं। इस एनकाउंटर के बाद कश्मीर में एक भीषण तूफ़ान उठा।
8 जुलाई 2016 की शाम जैसे ही यह खबर फैली कि बुरहान वानी मारा गया है, तो ये कश्मीर में सिर्फ़ एक आतंकी की मौत की खबर नहीं फैली थी। ऐसा लग रहा था मानो पूरी घाटी किसी विस्फोट का इंतज़ार कर रही हो और अब वह विस्फोट हो चुका था। सबसे पहले खबर उसके गाँव के इलाके यानी त्राल पहुँची और फिर दक्षिण कश्मीर के दूसरे इलाकों में पहुँची। देखते ही देखते हजारों लोग सड़कों पर उतर आए। टायर जलाए गए, सड़कें जाम कर दी गईं और भारत-विरोधी तथा कश्मीर की कथित आज़ादी के समर्थन में नारे लगने लगे।
अलगाववादी नेताओं सैयद अली शाह गिलानी और यासीन मलिक ने तत्काल बंद का ऐलान कर दिया और लोगों से बुरहान वानी के जनाज़े में बड़ी संख्या में शामिल होने की अपील की।
इसके बाद जो हुआ, उसने यह साफ़ कर दिया कि बुरहान वानी केवल एक आतंकी कमांडर नहीं था। वह घाटी के एक हिस्से में एक प्रतीक में बदल चुका था। उसके जनाज़े में कितने लोग शामिल हुए, वो ऐतिहासिक था। दो लाख से ज़्यादा लोग इस आतंकवादी के जनाज़े में आए। हजारों लोग पाकिस्तान के झंडे, हिजबुल मुजाहिदीन के झंडे और भारत-विरोधी नारों के साथ मौजूद थे। यह केवल एक अंतिम संस्कार नहीं था, बल्कि पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद के लिए खुले समर्थन का सार्वजनिक प्रदर्शन बन चुका था।
प्रशासन को हालात का अंदाज़ा पहले ही हो चुका था। श्रीनगर समेत घाटी के कई हिस्सों में कर्फ्यू जैसे प्रतिबंध लगा दिए गए। मोबाइल इंटरनेट बंद कर दिया गया, दक्षिण कश्मीर में मोबाइल सेवाएं भी सीमित कर दी गईं ताकि अफवाहें और भीड़ को इकट्ठा होने से रोका जा सके। हिंदुओं की अमरनाथ यात्रा तत्काल प्रभाव से रोक दी गई। अलगाववादी नेताओं को एहतियातन नज़रबंद कर दिया गया, लेकिन इसके बावजूद बवाल नहीं रुके। कई इलाकों में मस्जिदों के लाउडस्पीकरों से बुरहान वानी के पुराने ऑडियो संदेश चलाए गए। पत्थरबाज़ों की भीड़ सुरक्षा बलों के कैंपों की ओर बढ़ी और कई जगह सुरक्षाबलों पर पथराव शुरू हो गया।
और अगर आपको लगता है कि ये सब सिर्फ़ एक दिन चला तो आप ग़लत हैं। बुरहान वानी की मौत के बाद कश्मीर कई महीनों तक हिंसा की आग में जलता रहा। कम से कम दो सौ लोगों की मौत हुई। इनमें से अधिकतर वो थे जिन्होंने इस एनकाउंटर के बाद भारत के खिलाफ़ हथियार उठाए, सेना पर हमले किए, पत्थरबाजी की और सेना के कैंपों में आग लगाने की कोशिश की।
और इन सबकी वजह उसकी वह छवि थी, जिसने एक आतंकवादी को घाटी के मुस्लिम युवाओं के बीच ‘पोस्टर बॉय’ बना दिया था। 8 जुलाई 2016 का एनकाउंटर सिर्फ़ एक आतंकी का अंत नहीं था, बल्कि उसी दिन यह भी सामने आ गया कि रैंडम-सी दिखने वाली उन तस्वीरों का असली मकसद क्या था। कश्मीर के इतिहास में 8 जुलाई 2016 को केवल एक एनकाउंटर की तारीख़ नहीं, बल्कि उस मोड़ के रूप में देखा जाता है जहाँ आतंकवाद ने बंदूक के साथ-साथ सोशल मीडिया की ताक़त का भी पूरा इस्तेमाल करके घाटी को एक बार फिर हिंसा की ओर धकेलने की कोशिश की। और उस दिन ने नई केंद्र में आई नरेंद्र मोदी सरकार को कश्मीर की समस्या को लेकर और अधिक गंभीरता और इंटेंसिटी के साथ सोचने पर मजबूर किया।
और क्या हुआ उसके बाद?
2016 के बाद भारत सरकार ने पहली बार आतंकवाद को सिर्फ़ सीमा पार से आने वाली समस्या मानकर नहीं देखा। इस बात पर ज़ोर दिया गया कि असली चुनौती अब लोकल भर्ती, सोशल मीडिया प्रोपेगेंडा, आतंकियों के जनाज़ों से होने वाली भीड़ और पत्थरबाज़ी के उस पूरे इकोसिस्टम की है, जो आतंकवाद को लगातार ऑक्सीजन दे रहा था।
जिस सोशल मीडिया ने बुरहान को पोस्टर बॉय बनाया था, अब उसी नेटवर्क को तोड़ना भारत का लक्ष्य बन गया। इसलिए पहली बार सिर्फ आतंकियों पर नहीं, बल्कि उन्हें पैसा देने वालों, उन्हें हीरो बनाने वालों और उनके लिए भीड़ जुटाने वालों पर भी कार्रवाई शुरू हुई।
सबसे पहले सुरक्षा बलों ने ‘Operation All Out’ शुरू किया। इसका मकसद साफ़ था – कश्मीर में सक्रिय हर बड़े आतंकी कमांडर को एक-एक करके खत्म करना। सेना, जम्मू-कश्मीर पुलिस, CRPF और इंटेलिजेंस एजेंसियों ने पहले से कहीं ज़्यादा बेहतर तालमेल के साथ काम करना शुरू किया। नतीजा यह हुआ कि अगले दो-तीन वर्षों में हिजबुल मुजाहिदीन, लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद के दर्जनों टॉप कमांडर मारे गए। एक समय ऐसा आया जब आतंकवादी संगठनों को अपने कमांडर बार-बार बदलने पड़े। जिसे बुरहान मॉडल कहा जाने लगा – कि आतंकी अपनी पहचान खुलेआम सोशल मीडिया पर बताएंगे। फिर से वो अंडरग्राउंड रहने लगे।
इसके साथ ही आतंकवाद की फंडिंग पर भी सीधा वार हुआ। NIA ने घाटी में अलगाववादी नेताओं, हवाला नेटवर्क और टेरर फंडिंग से जुड़े लोगों के खिलाफ़ बड़े पैमाने पर कार्रवाई शुरू की। जिन लोगों पर वर्षों से आरोप तो लगते थे कि वे पाकिस्तान से पैसा लेकर घाटी में हिंसा का माहौल बनाए रखते हैं, लेकिन कार्रवाई नहीं होती थी। ऑपरेशन ऑल आउट के बाद उनके घरों और दफ्तरों पर छापे पड़े, गिरफ्तारियाँ हुईं और करोड़ों रुपये की संदिग्ध संपत्तियों की जांच शुरू हुई। पहली बार अलगाववाद का आर्थिक ढांचा भी निशाने पर था।
और इसका नतीजा जो हुआ वो बस एक टेबल के ज़रिए अगर मैं बता दूँ तो उसके अलावा कुछ और कहने की ज़रूरत ही नहीं रह जाएगी। 2016 में बुरहान वानी के एनकाउंटर के बाद आतंकवाद अपने चरम पर पहुँच गया था। 2017 में सुरक्षा बलों ने 217 और 2018 में 266 आतंकवादियों को मार गिराया, जो इस बात का संकेत था कि घाटी में बड़े पैमाने पर ऑपरेशन चल रहे थे। लेकिन इसके बाद तस्वीर बदलनी शुरू हुई। 2019 के बाद मारे जाने वाले आतंकवादियों की संख्या लगातार गिरती गई। 2023 में यह संख्या 85 रह गई, 2024 में 68, 2025 में 46 और 2026 में अब तक सिर्फ़ 10 रह गई है।
भारतीय सेना के होने वाले नुकसान और सैनिकों की शहादत का नंबर भी काफ़ी कम हुआ है। 2016 में 88 जवान शहीद हुए थे। 2018 में भी यह संख्या 94 थी। लेकिन 2026 में अब तक यह आंकड़ा घटकर सिर्फ़ 1 रह गया है।
और मैं मानता हूँ कि अगर 8 जुलाई 2016 को बुरहान वानी का एनकाउंटर नहीं हुआ होता तो शायद कश्मीर दोबारा से जिस तरह सुलगा और आतंकी माइंडसेट एक्सपोज हुआ, वो नहीं हो पाता। और क्या पता हम अभी भी छोटे-छोटे हमलों में अपने नागरिकों और सैनिकों को गँवा रहे होते।
और आखिर में दो बातें और। पहली कि आज भी आतंक का नेटवर्क पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। आज भी हमारे सामने दिल्ली से लेकर पहलगाम तक के हमले हैं। लेकिन उस एक एनकाउंटर और उसके बाद के ऑपरेशन और व्यवस्था ने ये तय किया कि अब घाटी में दूसरा बुरहान सर नहीं उठाएगा।
दूसरी बात हमें ये समझनी होगी कि एक रियल आतंकी हमले और एक आतंकी पोस्टर बॉय में, पोस्टर बॉय कभी भी ज़्यादा खतरनाक होता है। दुनिया भर की जंगों और युद्धों में नायकों और खलनायकों ने ही जन्म लिया है। और उन्होंने ही तय किया कि इस मानव सभ्यता का भविष्य क्या और कैसा होगा। हिटलर हो, मुसोलिनी हो या ओसामा बिन लादेन हो। इन्होंने अपने हाथों से कितनों को मारा, किसी को नहीं पता। लेकिन इनके होने ने कितनों को मारा, इसे जानने के लिए गिनती गिनने की ज़रूरत नहीं है।




