आपने अभी हाल में मेरठ में एक दलित युवती की हत्या के दो महीने बाद हुए एक कथित प्रदर्शन का एक वीडियो देखा होगा। जिसमें एक SSP ने एक व्यक्ति को पुलिस वेन में थप्पड़ मारे। आपको लगा होगा कि ये कितना ग़लत हो रहा है। लेकिन जरा रुकिए, पाँच मिनट में हम आपको उस वीडियो का वो सच बतायेंगे कि आप शायद कहें कि पुलिस वाले ने ठीक ही किया होगा।
भारत की राजनीति में हमने चंद्रशेखर आजाद और मंगल पांडे जैसे बलिदानी देखें हैं और सावरकर जैसे नेताओं की जेल की कठिन यात्राएँ भी देखी हैं। इंदिरा गांधी की इमरजेंसी के समय पुलिसिया दमन के सामने खड़े होने का साहस करने वाले नेताओं को भी देखा है और उसके अलावा भी समय समय पर व्यवस्था की नाकामी के ख़िलाफ़ आवाज बुलंद करने वाले और भी नेताओं को देखा है।
हालांकि एक समय पर ये लोग असली मकसद और मोटिवेशन से लड़ते थे लेकिन कालांतर में फार्मूला बना कि राजनीति में चमकना है तो सबसे आसान तरीका है कि आप सिस्टम से लड़ जाइए। उसकी वजह से केजरीवाल जैसे नेता निकले जो मंच पर अनशन करते थे और टेंट के पीछे नारियल पानी पिया करते थे। फिर उसके बाद इस सिस्टम से लड़ने वाली राजनीति के फार्मूले का और पतन हुआ। इंटरनेट के आने के बाद हर लड़ाई एक वायरल रील के लिए लड़ी जाने लगी। हर जवान बेरोजगार की ख्वाहिश बनी कि वो भी किसी पार्टी का गमछा गले में डाले और भइया का नाम लेकर पुलिस से भिड़ जाये और एक रील बन जाए जिसके बैकग्राउंड में कोई सबसे बड़ा लड़ैया वाला गाना लगा हो और कैप्शन आपको भगत सिंह से नीचे का नायक ना सिद्ध कर रहा हो।
इसी फार्मूले को आत्मसात बड़े अच्छे से एक पार्टी और एक नेता ने किया। नेता का नाम है चंद्रशेखर आजाद। लेकिन ये वो चद्नरशेखर नहीं हैं जिन्होंने अंग्रेज़ों की दमनकारी नीति का विरोध करते हुए अंग्रेज़ पुलिस से संघर्ष किया तो आख़िर में ख़ुद को गोली इसलिए मार ली ताकि उनके जीवित रहते अंग्रेज़ उन्हें छू भी ना सकें। ये चाहते हैं कि काश पुलिस मुझे छू ले ताकि मैं उनसे लड़ सकूँ। ये दूसरे चंद्रशेखर की कहानी है। वो जनेऊ धारी, इनका तो विरोध ही जनेऊ का है। ये हैं भीम आर्मी आज़ाद समाज पार्टी… कांशी राम, के संस्थापक और मालिक। और इनका एक स्टाइल है, मूछों पर ताव देकर पुलिस से भिड़ना। ये सुबह उठते हैं तो इसी ख्वाहिश में इनकी बाँछे खिल उठती हैं कि आज एक पुलिस वाले से लड़ने को मिल जाए बस।
भारत में बहुसंख्यक आबादी के पास इंटरनेट और चंद्रशेखर दोनों एक साथ पंहुचे। और चंद्रशेखर ने दक्षिण भारत की किसी फ़िल्म के रेबेल का किरदार अपनाया और ऐलान किया कि देश में कांशीराम के बाद अगर कोई दलित उद्धारक और चिंतक और योद्धा और काबिल नेता हुआ है तो वो मैं हूँ। और दलितों की लड़ाई लड़ने के लिए मैं सच में लड़ाई लड़ूँगा। उसके बाद एक ट्रेंड बना कि गले में नीला गमछा, साइकिल, मोटरसाइकिल, कार पर नीला झंडा और नीले आसमान के नीचे विशेषतः उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश और राजस्थान में कई जिलों में जवान दलित लड़के अपने आप को नेता कहते हुए निकलने लगे। और चूँकि चंद्रशेखर के वीडियोज उन्होंने देखें थे कि कहीं किसी एसपी को धमका रहे हैं, कहीं किसी दारोग़ा और उसके दो सिपाही को पकड़कर क्लास ले रहे हैं और बता रहे हैं कि मैं सिर्फ़ दलित नेता नहीं हूँ बल्कि वकील भी हूँ। अगर मेरी बात नहीं मानी तो पुलिस के ख़िलाफ़ पुलिस ही मुकदमा कर दूँगा।
दरअसल इसके पीछे का मकसद इंटरनेट पर अपने लिए समर्थन जुटाना था। लेकिन इससे एक और इम्पैक्ट हुआ, हर भीम आर्मी और आजाद समाज पार्टी का वर्कर अब चंद्रशेखर बनना चाहता था। वो भी चाहता था कि भैया की तरह ही हमारी भी रील बन जाए। कई जगहों पर छिटपुट घटनाएँ भी आनी शुरू हुई जिसमें लोकल लेवल पर भीम आर्मी का नाम लेकर मनमानी हरकतों को करते हुए पुलिस और प्रशासन के साथ झगड़े होने लगे।
मई 2017 में पहली बार चंद्रशेखर और पुलिस की भिड़ंत हुई। जिसमें एक गांव में दो जातीय वर्गों के बीच के झगड़े को चंद्रशेखर ने जातीय हिंसा में तब्दील कर दिया। दर्जनों पुलिस की गाड़ियाँ जलाई गई, एक व्यक्ति की मौत हुई और सैकड़ों लोग घायल हुए। जातीय हिंसा भड़काने और कानून व्यवस्था बिगड़ने की वजह से चंद्रशेखर पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत मुकदमा हुआ और चंद्रशेखर को अचानक से लेफ्ट लिबरल अंबेडकराइट फूलेवादी इकोसिस्टम ने सर पर उठा लिया।
इसके बाद चंद्रशेखर ने रुकने से इनकार कर दिया। यही हिट फार्मूला बन गया कि जहाँ पाओ वहाँ विवाद करो। अब तक ऐसा था कि चंद्रशेखर तो वायरल हो रहे थे लेकिन और कोई नहीं वायरल होता था, छोटी मोटी छिटपुट घटनाएँ ही भीम आर्मी के नाम की सुनने में आती थी। फिर साल आया 2024, इस साल हुए लोकसभा के चुनाव। कई अप्रत्याशित घटनाओं की तरह एक और घटना ये हुई कि चंद्रशेखर आजाद, सांसद बन गए। अब इस फार्मूले में कोई कमी नहीं रह गई कि पुलिस से भिड़ना आपको क्या से क्या बना सकता है।
फिर क्या हुआ हर रोज़ खबरों की हेडलाइन में भीम आर्मी और पुलिस की भिड़ंत की खबरें आने लगी। कभी मुजफ्फरनगर में टोल प्लाजा पर बवाल हुआ, वहाँ टोल प्लाजा पर लगे जाम को खुलवाने आई पुलिस के साथ धक्का मुक्की की, पुलिस ने जिन बवाल करने वालों को गिरफ्तार करने की कोशिश की उनको भीड़ बनकर छुड़ा लिया। इसके वीडियो बने और पूरे सोशल मीडिया पर एक खास किस्म की आक्रामकता के गाने के साथ इन्हें शेयर किया गया और ये वायरल हुए। और जिन लोगों को भीड़ ने पुलिस से छुड़वा लिया था उनमे से एक व्यक्ति का नाम था रवि गौतम। आज की हमारी कहानी का मुख्य किरदार यही है लेकिन उसपर बाद में आयेंगे, आप बस नाम याद रखिएगा रवि गौतम।
कभी ग्वालियर से खबर आती कि दतिया से बिना परमिशन लेकर हजारों लोग भीम आर्मी के बैनर तले सड़क पर उतर कर बवाल कर रहे हैं। पुलिस ने कहा कि जातीय संघर्ष हो सकता है इस वजह से इजाज़त नहीं मिलेगी, लेकिन अब तो सांसद बनने फार्मूला मिल गया था तो एक जिले के अंदर हजारों लोग सांसद बनने का ख़्वाब लिए सड़क पर निकल गए। पुलिस ने लाठीचार्ज और आँसू गैस के गोले छोड़कर इस भीड़ को कंट्रोल किया।
ऐसा ही मेरठ में हुआ। मेरठ में सोनू उर्फ रोनू कश्यप की हत्या के बाद जला हुआ शव मिलने पर पीड़ित परिवार से मिलने जा रहे चंद्रशेखर आजाद को मुजफ्फरनगर पुलिस ने जब रोक दिया तो चंद्रशेखर ने पुलिस को ललकारा और बोला कि, “मुझे गोली मार दो, वरना जब तक जिंदा हूं बोलता रहूंगा।” और इनके कार्यकर्ताओं ने अलग लेवल पर जाकर पुलिस से लड़ाई ले ली।
ऐसे ही कुंदरकी में चुनावी जनसभा के लिए प्रशासन से अनुमति न मिलने पर चंद्रशेखर आजाद गाड़ी के बोनट पर खड़े होकर समर्थकों को संबोधित करने लगे। पुलिस को धमकियाँ देने लगे। और इसका नतीजा हुआ कि इनके कार्यकर्ता पुलिस से भिड़ने लगे।
इसके अलावा साल 2025 का एक केस आप प्रयागराज का देखिए, चंद्रशेखर के इशारे पर भीड़ निकली थी। एक दलित युवक की हत्या का मामला था। पुलिस अपना काम कर रही थी। लेकिन चंद्रशेखर आजाद ने कहा कि हम तेज न्याय दिलवाने के लिए आ रहे हैं, पुलिस ने कहा, आपको इजाजत नहीं है। ये जबरन आने लगे। इसके बाद भीम आर्मी और आज़ाद समाज पार्टी से जुड़े नेताओं और कार्यकर्ताओं ने पूरे प्रयागराज को जला दिया। पुलिस पर हमले से लेकर निजी और सरकारी अन्य संपत्तियों का नुकसान हुआ। दंगे जैसी स्थति बना दी गई। पुलिस ने करीब सौ नामजद लोगों को गिरफ्तार किया और करीब 500 बेनाम लोगो के ख़िलाफ़ मुकदमे दर्ज हुए। इन सब के बीच चंद्रशेखर को कुछ नहीं हुआ, लेकिन चंद्रशेखर के होने ने सैकड़ों लोगों का जीवन बर्बाद कर दिए। नेता बनने की ख्वाहिश में बंदा उत्तरप्रदेश पुलिस की हवालात में पंहुच गया। जिसमें सिंपल फार्मूला था कि पुलिस की बात ना माननी, उनसे भिड़ना, किसी भी रूप में लॉ एंड ऑर्डर बिगाड़ना और कहना कि पीड़ित दलित भाई के लिए हम न्याय मांगने किसी भी हद तक जाएँगे। और वायरल हो जाना और इलाके का नेता बन जाना। न्याय मिला कि नहीं, किसी को पता नहीं है लेकिन बवाल और दंगा करवा दिया गया। और ये वही पैटर्न है जो फिर से मेरठ में दोहराया गया।
आज से करीब दो महीने पहले यानि पंद्रह मई को एक प्रेमी युगल के बीच किन्हीं कारणों से विवाद हुआ और प्रेमी लड़के ने अपनी प्रेमिका लड़की की हत्या कर दी। पुलिस ने जांच की, आरोपी को पकड़ा और जेल में डाल दिया। मामला न्यायालय में चला गया। लेकिन मामला दुबारा ज़िंदा हुआ। दरअसल लड़की दलित समुदाय से आती थी और इसी बात पर राजनीति चमकाने का मौक़ा मिल गया।
उत्तप्रदेश में समाजवादी पार्टी, कांग्रेस समेत सभी राजनीतिक दल ऐक्टिव हुए। बयान आए, आरोप लगे, पुलिस पर सवाल खड़े हुए लेकिन भीम आर्मी आजाद समाज पार्टी कांशीराम ने फिर प्रयागराज दोहराने की कोशिश की। आठ जुलाई को मृतक लड़की के परिजनों को लेकर भीम आर्मी के कुछ लोग मेरठ कलेक्ट्रेट के बाहर धरने पर बैठ गए। पुलिस बार-बार कहती रही कि धरना देने की जगह कमिश्नरी पार्क है वहाँ जाइए लेकिन इन लोगों ने नहीं सुना। मेरठ के एसपी देहात, बार बार कहते रहे कि लिखित में ज्ञापन दीजिए लेकिन रोड पर जाम ना लगाइएइसी दौरान एसपी देहात के सामने चिल्लाती हुई एक आवाज आई।
ये आवाज थी उसी रवि गौतम की जिसके बारे में हमने आपको पहले बताया कि टोल जाम करने के मामले में जब गिरफ्तारी हुई तो भीड़ इसे छुड़ाकर ले कर चली गई थी। अब क्या होता है कि पुलिस ने लोगों को उठा उठाकर कमिश्नरेट के सामने से हटाना शुरू कर दिया। तभी रवि गौतम फिर से एसपी देहात से भिड़ने लगता है।
और इसके बाद जब पुलिस के बार बार समझाने के बाद भी रवि गौतम लोगों को उकसाना नहीं बंद करता है तो पुलिस उसे उठाकर वैन में बंद कर देती है ताकि किसी बवाल से बचा जा सके। जब इस रवि गौतम को वैन में बंद किया गया तब उसने वहाँ मीडिया के कैमरों के सामने गमछे के सहारे फाँसी लगाने का प्रयास किया और ये पूरा ड्रामा सिर्फ़ कैमरे के लिए हो रहा था। लेकिन फाँसी लगने के प्रयास की सूचना ने अफरा-तफरी का माहौल बना दिया और उसके बाद जिस वायरल वीडियो का जिक्र पूरे मीडिया में हो रहा है वो निकल कर सामने आया।
ये पूरी जर्नी है उस वीडियो की जो पूरे इंटरनेट पर तैर रहा है। रवि गौतम सीरियल ओफ़ेंडर है। उसके ऊपर कम से कम चार मुकदमे दर्ज हैं, इस बवाल में उसके सहयोगी दिग्विजय भाटी पर नौ मुकदमे दर्ज हैं। इनकी वजह से चार घंटे तक मेरठ कमिश्नरेट का पूरा इलाका जाम से बंद रहा, एंबुलेंस जाम में फँसी रही।
इस घटना की वजह से क्या हुआ? क्या उस मृतक लड़की के केस पर कोई असर पड़ा? उसके परिवार के दुख में कोई बदलाव नहीं हुआ। हुआ तो बस ये कि रवि गौतम के खाते में एक और केस आ गया, एक और रील बन गई पुलिस से भिड़ने की और अगले चुनाव में विधानसभा टिकट पाने की उम्मीद बढ़ गई। अब हमनें चंद्रशेखर की कहानी आपको इसलिए बताई क्योंकि चंद्रशेखर ने जो फेसबुक और इंस्टा पर वायरल होकर नेता बनने का फार्मूला दिया है ये बेहद घातक है। उनके चेले भी आगे जाकर यही फॉर्मूला अपनाते हैं हालांकि इस बार मेरठ एक और प्रयागराज बनने से बच गया क्यूंकि पुलिस ने पिछली घटना से सबक लेकर पहले ही बेहतर एक्शन ले लिया।




