Delhi Gymkhana CIA

द जिमखाना फाइल्स: टेनिस कोर्ट, स्कॉच के पेग और CIA का वो खुफिया ऑपरेशन

Summary
क्या हुआ जब CIA के एक एजेंट ने दिल्ली जिमखाना क्लब के टेनिस कोर्ट के बीच अपनी गाड़ी घुसा दी, और पीछे पड़ी थी भारत की खुफिया एजेंसी IB। उस दिन वहां क्या हुआ, जिसने भारत के सबसे घातक टैंक T-72 के राज़ दुनिया के सामने खोल दिए? आइए जानते हैं।

अगर आपको किसी Nuclear-Armed State या दुनिया की उभरती हुई Superpower की National Security में सेंध लगानी हो, तो आपको उसके मिलिट्री बेस पर बम गिराने की ज़रूरत नहीं है. आपको बस उस देश के सबसे रसूखदार, कॉलोनियल टाइम के एलीट क्लब की मेंबरशिप लेनी है, जहाँ शाम को देश के पॉलिसी मेकर्स अपनी सिक्योरिटी और डिग्निटी को स्कॉच के पेग में घोल देते हैं.

यह सब कुछ सत्य घटनाओं पर आधारित कहानियाँ हैं, जो मैं आपको बताने जा रहा हूँ. ये बताती हैं कि कैसे राजधानी दिल्ली के सीने पर बना एक एलीट क्लब दशकों तक विदेशी जासूसों का खेल का मैदान बना रहा. और इस कहानी के केंद्र में है दिल्ली जिमखाना क्लब (DGC), जिसे बचाने के लिए दरबारियों ने अपना पूरा ज़ोर लगाया हुआ है.

चैप्टर 1: लुटियंस दिल्ली की ‘मधुशाला’ और नेशनल सिक्योरिटी का अलार्म

साल 2026 की शुरुआत दिल्ली जिमखाना क्लब के लिए एक बड़े झटके के साथ हुई. भारत सरकार के भूमि और विकास कार्यालय (L&DO) ने इस 113 साल पुराने क्लब को खाली करने का सख्त हुक्मनामा जारी कर दिया. इसकी वजह राष्ट्रीय सुरक्षा, रक्षा बुनियादी ढांचे को मजबूत करना और जनहित बताई गई.

यह क्लब प्रधानमंत्री आवास (7 लोक कल्याण मार्ग) से महज़ कुछ मीटर की दूरी पर 27.3 एकड़ के बेहद सेंसिटिव और रणनीतिक इलाके में फैला है. आम जनता के लिए यह केवल रईसों के मनोरंजन का अड्डा हो सकता है, लेकिन भारत सरकार के लिए यह हमेशा से एक राष्ट्रीय सुरक्षा जोखिम रहा है. साल 2020 में कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय ने अदालत में इस क्लब के ढर्रे पर एक बेहद कठोर बयान दिया था. इसमें कहा गया था कि ‘यह क्लब व्यायामशाला से मधुशाला बन चुका है’. यह एक ऐसी ‘रियासत’ बनकर रह गया था, जहाँ देश की संभ्रांत नौकरशाही और विदेशी राजनयिकों का ऐसा घालमेल था जो सुरक्षा तंत्र की आँखों में धूल झोंकने के लिए काफी था.

कोल्ड वॉर के दौरान, दिल्ली जिमखाना क्लब एक ऐसा कांटेक्ट ज़ोन था जहाँ एम्बेसेडर्स यानी राजनयिकों के भेष में घूम रहे विदेशी जासूस बिना किसी सरकारी रोक-टोक या IB जैसी ख़ुफ़िया संस्थाओं की नज़रों में आए भारतीय जनरलों और नौकरशाहों से मिल सकते थे.

चैप्टर 2: टी-72 टैंक और टेनिस कोर्ट का जादुई ‘ड्रॉप’

साल 1978 था. भारतीय सेना ने सोवियत संघ से पहली बार अपने दौर के सबसे खतरनाक और एडवांस T-72 टैंक (T-72/T-72M) मंगाए थे. करीब 41 टन वजनी यह फौलादी दैत्य उस समय अमेरिकी सेना (Pentagon) और CIA के लिए एक बड़ा रहस्य बना हुआ था. सवाल यह था कि आखिर इस टैंक में ऐसा क्या था जिसने अमेरिका की नींद उड़ा रखी थी?

पहली वजह थी इसकी बेहद मजबूत फ्रंट आर्मर (Glacis Armour). यह सिर्फ स्टील की चादर नहीं थी, बल्कि हाई-कार्बन स्टील और पॉलीयुरेथेन की कई परतों से बनी ऐसी सुरक्षा ढाल थी जिसे भेदना बेहद मुश्किल माना जाता था.

दूसरी वजह थी इसका लेज़र रेंजफाइंडर और ऑटो-लोडर सिस्टम. यानी टारगेट की दूरी नापने और गोला लोड करने का काम मशीन खुद करती थी, जिससे टैंक दुश्मन पर बहुत तेजी से फायर कर सकता था.

तीसरी और सबसे खतरनाक चीज थी इसकी 125mm स्मूथबोर गन. उस दौर में यह दुनिया की सबसे घातक टैंक गनों में गिनी जाती थी, जो कुछ ही सेकंड में दुश्मन के टैंक को कबाड़ में बदल सकती थी.

CIA इस टैंक का कच्चा चिट्ठा (जिसे खुफिया भाषा में ‘SOVMAT’ कहा जाता था) हर हाल में हासिल करना चाहती थी. उन्होंने एक भारतीय सैन्य अधिकारी को घूस देकर टैंक को सीमा पार पाकिस्तान भगाने का भी प्लान बनाया, जो नाकाम रहा.

तभी मैदान में उतरता है CIA का एक शातिर फील्ड एजेंट, जिसका नाम था रॉबर्ट बेयर (Robert Baer). CIA का यह आदमी नई दिल्ली में अमेरिकी दूतावास में तैनात था. बेयर ने अपनी पॉपुलर बायोग्राफी ‘सी नो इविल’ (See No Evil) में इस खतरनाक किस्से का जिक्र किया है.

बेयर के एक भारतीय एजेंट ने सेना के लॉकर से T-72 के बेहद गोपनीय मैनुअल्स चुरा तो लिए थे, लेकिन एक बड़ी शर्त थी. मैनुअल्स को सिर्फ दो घंटे के भीतर वापस सैन्य तिजोरी में रखना था, इससे पहले कि सार्जेंट की ड्यूटी बदले और राज़ खुल जाए. बेयर मैनुअल लेकर भागा, लेकिन भारत की खुफिया एजेंसी ‘इंटेलिजेंस ब्यूरो’ (IB) की पाँच गाड़ियाँ बेयर का पीछा कर रही थीं.

वक़्त तेज़ी से खत्म हो रहा था, सिर्फ 17 मिनट बचे थे. बेयर ने दिमाग दौड़ाया और अपनी गाड़ी सीधे दिल्ली जिमखाना क्लब के गेट के भीतर घुसा दी. पीछे IB की गाड़ियाँ भी आ गईं. बेयर ने बिना गाड़ी रोके उसे सीधे टेनिस कोर्ट के बीच के पतले बजरी वाले पैदल रास्ते पर दौड़ा दिया, जहाँ IB की गाड़ियाँ पीछे नहीं आ सकती थीं.

बेयर ने मैनुअल्स को एक टेनिस बैग में डाला और इमली (Tamarind) के पेड़ों के बीच से होते हुए गेस्ट हाउस नंबर तीन के पास की झाड़ियों के पीछे छिपे अपने एजेंट की तरफ फेंक दिया. इसके बाद, पीछा कर रहे IB के जासूसों को भ्रमित करने के लिए बेयर सीधे जिमखाना क्लब के बार में गया. वहाँ थ्री-पीस सूट पहने अकेले बैठे एक बेहद सम्मानित और निर्दोष भारतीय सज्जन के बगल में बैठ गया और वेटर को आवाज़ देकर दो डबल स्कॉच का ऑर्डर दे दिया.

जब IB के जासूस हांफते हुए बार में घुसे, तो उन्होंने बेयर को उस भारतीय संभ्रांत व्यक्ति के साथ गंभीर चर्चा करते देखा. IB का सारा ध्यान उस बेचारे भारतीय पर टिक गया कि आखिर बेयर इतनी हड़बड़ी में इससे क्या बात करने आया था?

इस ड्रामे ने CIA के एजेंट को इतना वक़्त दे दिया कि वह मैनुअल लेकर सुरक्षित वापस जा सके और उन्हें सेना के लॉकर में रख दे.

इस चोरी का नतीजा क्या हुआ? 1982 में CIA ने इस मैनुअल के जरिए निष्कर्ष निकाला कि शुरुआती T-72 वर्जन की रात में लड़ने की क्षमता पश्चिमी समकक्ष टैंकों की तुलना में सीमित थी. यह रणनीतिक कमजोरी CIA ने तुरंत अमेरिकी डिफेंस इंडस्ट्री और अपने फ्रंटलाइन पार्टनर पाकिस्तान की सेना के साथ शेयर कर दी.

चैप्टर 3: पंजाब का जंगल, ‘चोर दरवाज़ा’ और मोर का अवैध शिकार

सैन्य अधिकारियों के लिए नियम सख्त होते थे. वे किसी विदेशी से नहीं मिल सकते थे और मिलने पर तुरंत सरकार को रिपोर्ट करना होता था. ऐसे में CIA के लिए सीधे सैन्य अधिकारियों को जाल में फँसाना नामुमकिन था.

रॉबर्ट बेयर ने अपनी किताब के पेज नंबर 75 पर लिखा है कि उन्होंने इस कठोर सिस्टम में एक चोर दरवाज़ा यानी Back Door खोज निकाला. बेयर को पता चला कि भारतीय सैन्य अधिकारियों को शिकार करने का गजब का शौक है.

इसके बाद बेयर ने अपनी एक शिकारी वाली पहचान बना ली, सिविलियन नंबर प्लेट वाली एक मिलिट्री जीप खरीदी और पंजाब के जंगलों में डेरा डाल दिया. वहां उनकी मुलाकात ‘सिंह’ नाम के एक रसूखदार भारतीय सैन्य अधिकारी से हुई, जो भारत-सोवियत दोस्ती के सख्त खिलाफ था. दोनों के बीच दोस्ती गहरी हुई. वे वीकेंड पर पंजाब के जंगलों और यहाँ तक कि प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के निजी एस्टेट में अवैध रूप से भारत के राष्ट्रीय पक्षी ‘मोर’ का शिकार करने लगे.

बेयर ने सिंह को एक बेहद कीमती इतालवी बन्दूक (Browning Double-Barrel) तोहफे में दी. बाद में, नई दिल्ली के CIA स्टेशन प्रमुख ‘वाइल्ड बिल’ (Bill) को भी इस शिकार वाली ट्रिप में शामिल किया गया और ‘सिंह’ को पूरी तरह से रिक्रूट कर लिया गया. सिंह ने अनजाने में भारत के सोवियत मिलिट्री इक्विपमेंट्स और डिफेंस या स्ट्रेटेजिक लूपहोल्स की सारी सेंसिटिव इन्फॉर्मेशन CIA को दे दी.

चैप्टर 4: हनीट्रैप और मद्रास कैफ़े की कड़वी हकीकत

CIA का यह एलीट नेटवर्क सिर्फ दिल्ली या पंजाब तक सीमित नहीं था. 1980 के दशक के बीच में, जब श्रीलंका का गृहयुद्ध अपने चरम पर था, भारत की बाह्य खुफिया एजेंसी R&AW के मद्रास स्टेशन प्रमुख के.वी. उन्नीकृष्णन थे.

उन्नीकृष्णन को श्रीलंका (कोलंबो) में उनकी तैनाती के दौरान CIA ने एक एयर होस्टेस के ज़रिए बेहद शातिर तरीके से हनीट्रैप (Sex for Secrets) में फँसा लिया था. उनकी कुछ आपत्तिजनक तस्वीरें और वीडियो रिकॉर्ड कर लिए गए. इसके बाद शुरू हुआ ब्लैकमेलिंग का वह खेल, जिसने भारत के राष्ट्रीय हितों को गहरे जख्म दिए.

उन्नीकृष्णन ने लगभग दो साल तक CIA के लिए काम किया. उन्होंने भारत की सबसे ख़ुफ़िया पालिसी – तमिल उग्रवादियों (LTTE) को भारत द्वारा दी जा रही हथियारों की ट्रेनिंग और श्रीलंका शांति समझौते को लेकर भारत सरकार की रणनीति की पूरी फाइलें CIA को सौंप दीं.

CIA ने यह सेंसिटिव इन्फॉर्मेशन श्रीलंकाई सरकार तक पहुँचाई, जिसके कारण बाद में भारतीय शांति सेना (IPKF) को वहां भारी सैन्य और मानवीय नुकसान झेलना पड़ा. जब तक IB की काउंटर-इंटेलिजेंस विंग ने उन्हें मुंबई से गिरफ्तार किया, तब तक देश का बहुत बड़ा नुकसान हो चुका था. इसके बाद उन्हें सर्विस से बर्खास्त कर तिहार जेल में डाल दिया गया था.

चैप्टर 5: जासूसों के अन्य पसंदीदा ‘अड्डे’ और कराची कनेक्शन

दिल्ली जिमखाना क्लब अकेला नहीं था. एलीट कल्चर के ऐसे कई ठिकाने सुरक्षा एजेंसियों के रडार पर रहे हैं, जैसे:

  • दिल्ली गोल्फ क्लब: लुटियंस दिल्ली के केंद्र में 170 एकड़ में फैला यह गोल्फ क्लब देश के रिटायर्ड जनरलों, खुफिया प्रमुखों और नौकरशाहों का अनऑफिशियल अड्डा रहा है. यहाँ ‘सॉफ्ट कल्टीवेशन’ के ज़रिए विदेशी एम्बेसेडर्स खेल-खेल में देश की पॉलिसी उगलवा लेते थे.
  • जयपुर पोलो ग्राउंड (दिल्ली): प्रधानमंत्री आवास के ठीक सामने यह मैदान खेल और सत्ता के मेलजोल का बड़ा अड्डा हुआ करता था, जिस पर कुछ टाइम पहले ही मोदी सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा कारणों से ही एक्शन लिया है.
  • कराची जिमखाना क्लब (पाकिस्तान): ठीक दिल्ली जिमखाना की तरह, औपनिवेशिक काल का यह क्लब पाकिस्तान के कराची शहर के केंद्र में स्थित है. यहाँ भी अमेरिकी और पश्चिमी राजनयिक वहाँ के लोकल और शौकीन अधिकारियों और सेना के जवानों को प्रभावित करने और लोकल खुफिया नेटवर्क तैयार करने के लिए सोशल नेटवर्किंग करते थे.

इसके अलावा, लुटियंस दिल्ली के संभ्रांत इलाकों जैसे ‘गोल्फ लिंक्स’ के बंगले हमेशा से खुफिया सर्विलांस के मुख्य केंद्र रहे हैं. पूर्व R&AW अधिकारी मलय कृष्ण धर ने अपनी किताब ‘ओपन सीक्रेट्स’ में खुलासा किया है कि कैसे राजीव गांधी सरकार के दौरान राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह और गृह मंत्री के बीच की तनातनी को रिकॉर्ड करने के लिए राष्ट्रपति भवन तक को टैप किया गया था. वैसे, ऐसा नहीं है कि भारत ने कभी ऐसी तरकीबें नहीं अपनाईं. मलय कृष्ण लिखते हैं कि कई बार मणिपुर के उग्रवादियों और एक पुलिस कांस्टेबल से जानकारी निकलवाने के लिए कभी-कभी शराब भी एक टूल की तरह इस्तेमाल की जाती थी.

लेकिन ख़ुफ़िया एजेंसीज के इस जिमखाना जैसे ढीले एलीट सिक्योरिटी सिस्टम का फायदा उठाकर साल 2004 में R&AW के संयुक्त सचिव रबिंदर सिंह CIA के एजेंट डेविड वकाला की मदद से जाली पासपोर्ट पर काठमांडू के रास्ते अमेरिका भागने में सफल रहे. इस घटना को R&AW के पूर्व विशेष सचिव अमर भूषण ने अपनी चर्चित किताब ‘एस्केप टू नोव्हेयर’ (Escape to Nowhere) में बताया है.

सवाल आता है कि भारत के नजरिए से यह बेहद संवेदनशील क्यों है?

विदेशी ताकतों के लिए ये जिमखाना जैसे संभ्रांत क्लब राष्ट्रीय सुरक्षा के सबसे बड़े सॉफ्ट टारगेट क्यों रहे हैं? इसके तीन रणनीतिक कारण हैं:

  1. प्रोटोकॉल का डर नहीं: एक सरकारी दफ्तर में विदेशी राजनयिकों से मिलने के लिए कड़े नियम होते हैं, लेकिन जिमखाना या गोल्फ क्लब की हरी घास पर स्कॉच का ग्लास हाथ में लिए डिप्लोमेट्स और रक्षा अधिकारी बिना किसी रिटेन परमिशन के आपस में सिक्योरिटी पॉलिसीज़ शेयर कर लेते हैं.
  2. सॉफ्ट कल्टीवेशन: टेनिस, पोलो या गोल्फ जैसे स्पोर्ट्स और हंटिंग जैसे निजी शौक को जरिया बनाकर विदेशी एजेंसियां धीरे-धीरे अधिकारियों को अपना कर्जदार बना लेती हैं. शुरुआत गोल्फ स्टिक्स उधार लेने या बन्दूक गिफ्ट में देने से होती है और एंडिंग देशद्रोह पर जाकर रुकती है.
  3. स्ट्रेटेजिक करीबी: ये सभी एलीट क्लब राजधानी दिल्ली के हार्ट यानी प्रधानमंत्री आवास और संवेदनशील रक्षा मुख्यालयों के ठीक बगल में मौजूद हैं. ऐसे सेंसिटिव ज़ोन में सिक्योरिटी ऑडिट के बिना विदेशी नागरिकों की बेरोकटोक आवाजाही किसी भी देश के लिए एक आत्मघाती कदम है.

यही वजह है कि साल 2026 में भारत सरकार ने इस औपनिवेशिक दौर से मिले विशेष अधिकार वाले सुरक्षित ठिकाने का पट्टा खत्म करने और उसे खाली कराने का बड़ा फैसला लिया है. आखिर किसी भी संप्रभु देश के लिए कुछ चुनिंदा रईसों के मनोरंजन और शराब की महफिलों से कहीं ज्यादा अहम उसकी National Security होती है. देश की सुरक्षा से बढ़कर कोई विशेषाधिकार नहीं हो सकता.

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