आज अगर किसी 18 साल के स्टूडेंट से पूछिए कि डॉक्टर कैसे बनते हैं, तो उसका जवाब होगा, NEET पास करके लेकिन ज़रा सोचिए, अगर मैं आपसे कहूं कि एक समय ऐसा भी था, जब भारत में NEET नाम की कोई परीक्षा ही नहीं थी।
एक मेडिकल सीट के लिए मेडिकल स्टूडेंट को एक नहीं, बल्कि कई अलग अलग एंट्रेंस एग्जाम देने पड़ते थे। केंद्र सरकार अगर कोई एग्जाम करवा रही है तो उसकी अपनी अलग परीक्षा होती थी।
अगर कोई राज्य सरकार करवा रही है तो उसकी अलग, अगर देश के बड़े मेडिकल कॉलेज जैसे एम्स हो गया ये अपना अलग एग्जाम करवा रहे हैं और तो और प्राइवेट मेडिकल कॉलेज अपना अलग एंट्रेस एग्जाम करवाते थे।
यानी हर परीक्षा के लिए नया फॉर्म भरिए, अलग से एंट्रेंस फीस भरिए, अलग शहर में जाकर परीक्षा दीजिए, जहां पर आप कभी गए भी नहीं है, जहां का आपको कुछ पता भी नहीं है और अलग सिलेबस, अलग पैटर्न के हिसाब से फिर तैयारी कीजिए, फिर अलग-अलग मेरिट लिस्ट और काउंसलिंग का इंतजार कीजिए।
कई बार तो एक ही छात्र कुछ ही हफ्तों के भीतर चार पांच अलग-अलग मेडिकल एंट्रेंस परीक्षाएं देता था। ऐसे में जिसके पास ज्यादा पैसे थे, वही ज्यादा फॉर्म भर सकता था, ज्यादा शहरों में जाकर परीक्षा दे सकता था और कई बार तो एग्जाम छूट भी जाते थे क्योंकि वो पहुंच ही पाते थे।
यानी डॉक्टर बनने से पहले ही छात्रों को एक ऐसी भूलभुलैया से गुजरना पड़ता था, जिसमें मेहनत के साथ किस्मत और पैसा भी बड़ी भूमिका निभाता था और इसी बिखरे हुए सिस्टम ने ऐसे घोटाले भी देखे, जिन्होंने उस वक्त पूरे देश को हिला दिया।
तो फिर भारत ‘One Nation, One Medical Entrance Exam’ तक कैसे पहुंचा और आज जिस NEET और NTA की विश्वसनीयता को लेकर सवाल उठ रहे हैं, उससे पहले वाला सिस्टम कैसा था? क्या आज के जेन जी को उस सिस्टम की जरा सी भी भनक है? इसी पूरी कहानी को शुरुआत से समझते हैं।
2010 के दशक की शुरुआत तक भारत में मेडिकल एंट्रेस एग्जाम का सिस्टम कई हिस्सों में बंटा हुआ था। तब केंद्र सरकार की ओर से All India Pre-Medical Test यानी AIPMT आयोजित की जाती थी, लेकिन ये देश की सभी मेडिकल सीटों के लिए एकमात्र परीक्षा नहीं थी। AIPMT के माध्यम से मुख्य रूप से All India Quota की सीटों पर एडमिशन मिलता था, जबकि बाकी सीटों के लिए अलग-अलग राज्य अपनी-अपनी प्रवेश परीक्षाएँ आयोजित करते थे।
इसे और आसान भाषा में समझें तो किसी राज्य के एक सरकारी मेडिकल कॉलेज की 15% सीट्स AIPMT के जरिए भरी जाती थी और बाकी की बची सीट्स के लिए उस राज्य की सरकार अलग से एग्जाम करवाती थी। जैसे UP का एग्जाम है तो UP-PMT… यही सभी राज्यों पर लागू होता था।
इसके अलावा कई बड़े संस्थानों की अपने अलग एग्जाम होते थे। जैसे, AIIMS MBBS के लिए अलग परीक्षा होती थी, JIPMER की अलग प्रक्रिया थी और कई निजी मेडिकल कॉलेज तो अपनी अलग ही व्यवस्था चलाते थे।
यानी भारत में मेडिकल एजुकेशन के लिए रास्ते बिखरे पड़े थे कोई एक समान प्रक्रिया नहीं थी। एक स्टूडेंट जो डॉक्टर बनना चाहता था, उसे केवल Physics, Chemistry और Biology की तैयारी नहीं करनी होती थी। उसे अलग-अलग परीक्षाओं के लिए अलग-अलग अप्लाइ भी करना पड़ता था। हर परीक्षा की अपनी फीस, अपना पैटर्न, अपनी तारीख और अपनी काउंसलिंग प्रक्रिया होती थी।
कई छात्रों के लिए ये केवल पढ़ाई की चुनौती नहीं थी, बल्कि आर्थिक और प्रशासनिक चुनौती भी थी। मान लो अगर कोई छात्र अपने राज्य से बाहर जाकर मेडिकल कॉलेज में दाखिला चाहता था, तो उसे कई परीक्षाओं में शामिल होना पड़ सकता था। अलग-अलग शहरों में जाना, अलग-अलग एप्लीकेशन फीस देना और अलग-अलग परीक्षाओं की तैयारी करना हर परिवार के लिए आसान नहीं था। उस पर भी मान लो एक एग्जाम AIPMT का दिया, अब उस बच्चे दूसरा एग्जाम भी देना किसी और राज्य में तो उसे वहां भी जाना है और अगर दोनों की टाइमिंग एक जैसी हो या आस-पास हो तो वो कैसे पहुंचे… ट्रैवलिंग की भी दिक्कत।
ऐसे में धीरे-धीरे ये सवाल उठने लगा कि क्या मेडिकल जैसी महत्वपूर्ण शिक्षा के लिए पूरे देश में एक समान व्यवस्था नहीं होनी चाहिए? हालांकि, समस्या केवल यही नहीं थी कि परीक्षाएँ बहुत ज्यादा थीं। दूसरी बड़ी चिंता थी ये थी कि परीक्षा प्रक्रिया की विश्वसनीयता।
भारत में अलग-अलग राज्यों और परीक्षाओं से जुड़े कई ऐसे मामले सामने आए जिनमें Paper Leak, नकल, फर्जी एस्पिरेंट, Solver Gang और प्रवेश प्रक्रिया में अनियमितताओं के कई मामले सामने आते रहते थे।
इनमें मध्य प्रदेश का व्यापम केस सबसे चर्चित उदाहरणों में से एक बना। Vyapam Scam जिसमें दलालों, अधिकारियों और उम्मीदवारों का एक पूरा नेटवर्क सक्रिय था। कहीं असली अभ्यर्थी की जगह कोई दूसरा व्यक्ति परीक्षा देता था, कहीं होशियार उम्मीदवार को जानबूझकर कमजोर उम्मीदवार के बगल में बैठाकर नकल कराई जाती थी, तो कहीं आंसर सीट में हेरफेर की बात सामने आती थी। 2013 में मामला खुलने के बाद हजारों लोगों के खिलाफ जांच शुरू हुई और बाद में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर इसकी जांच CBI को सौंपी गई। यह घोटाला इतना बड़ा था कि इससे जुड़े सैकड़ों मेडिकल एडमिशन रद्द करने पड़े।
इसी तरह अगर आप राज्यों की बात करें तो राजस्थान में RPMT को लेकर प्रश्नपत्र लीक और पैसे के दम पर सीट दिलाने के आरोप लगे। मामला अदालत तक पहुँचा और कई एडमिशन सवालों के घेरे में आ गए।
उत्तर प्रदेश की CPMT भी वर्षों तक पेपर लीक, सॉल्वर गैंग, नकल माफिया और फर्जी अभ्यर्थियों के मामलों को लेकर विवादों में रही। एग्जाम्पल के तौर पर 2014 में पेपर लीक के चलते पूरा एग्जाम रद्द करना पड़ा था और 1 लाख से ज्यादा अभ्यर्थियों को दोबारा परीक्षा देनी पड़ी। इसके अगले ही साल, 2015 में यूपी STF ने एक बड़े सॉल्वर गैंग का भंडाफोड़ किया। जांच में सामने आया कि मेडिकल कॉलेजों के कुछ MBBS छात्र भी इस नेटवर्क का हिस्सा थे। ये लोग एग्जाम सेंटर से पेपर बाहर पहुंचाकर उसके आंसर तैयार करते थे और फिर स्टूडेंट तक पहुंचाए जाते थे। इसके लिए लाखों रुपये वसूले जाते थे। इसी तरह बिहार में मेडिकल प्रवेश परीक्षाओं के दौरान पेपर लीक, संगठित नकल और एग्जाम माफिया की गतिविधियाँ लगातार चर्चा का विषय बनीं, जिससे पूरी परीक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सवाल उठे।
दक्षिण भारत में तस्वीर थोड़ी अलग थी। कर्नाटक में विवाद पेपर लीक से ज्यादा निजी मेडिकल कॉलेजों में मैनेजमेंट कोटा और कैपिटेशन फीस को लेकर रहा। आरोप लगते रहे कि मोटी रकम देकर मेडिकल सीट हासिल की जा सकती है। महाराष्ट्र में MH-CET को लेकर परीक्षा संचालन, प्रश्नपत्रों की त्रुटियों और विभिन्न बोर्डों के छात्रों के साथ समानता के मुद्दों पर विवाद हुए,,, जबकि पश्चिम बंगाल में WBJEE मेडिकल की परीक्षा सुरक्षा और काउंसलिंग प्रक्रिया पर सवाल उठते रहे।
यानी समस्या सिर्फ एक राज्य या एक परीक्षा तक सीमित नहीं थी। अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग रूपों में मेडिकल एडमिशन सिस्टम की पारदर्शिता पर लगातार सवाल उठते रहे।
इन्हीं चुनौतियों के बीच एक विचार मजबूत होने लगा। अगर मेडिकल प्रवेश के लिए पूरे देश में एक ही परीक्षा हो तो? 2009 में Medical Council of India ने एक Common Medical Entrance Examination का विचार सामने रखा।
तर्क यही था कि अगर देश में मेडिकल शिक्षा के लिए न्यूनतम मानक एक जैसे हैं, तो प्रवेश प्रक्रिया भी एक समान क्यों नहीं होनी चाहिए?
एक पेपर, एक मेरिट लिस्ट और एक समान अवसर। इसी सोच के आधार पर National Eligibility-cum-Entrance Test यानी NEET का प्रस्ताव सामने आया।
तब यही बात उठी थी कि इससे छात्रों को बार-बार अलग-अलग परीक्षाएँ नहीं देनी पड़ेंगी, निजी मेडिकल कॉलेजों की अलग-अलग प्रवेश परीक्षाओं को खत्म किया जा सकेगा और पूरे देश में एक समान मेरिट व्यवस्था बनाई जा सकेगी।
अब कुछ समय के लिए फिर नीट लागू भी हुआ लेकिन NEET का रास्ता आसान नहीं था, कई राज्यों और संस्थानों ने इसका विरोध किया। इनका तर्क था कि उनके State Board और CBSE के पाठ्यक्रम में अंतर है, तब एग्जाम CBSE लेती थी, इसलिए एक नेशनल एग्जाम से उनके स्टूडेंट्स को नुकसान हो सकता है।
कुछ निजी मेडिकल संस्थानों और अल्पसंख्यक संस्थानों ने अपने अधिकारों का मुद्दा उठाया। मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँचा और 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने NEET को रद्द कर दिया, इसके बाद वापस AIPMT पर आ गए।
इसके बाद जब देश में सरकार बदली। केंद्र में भाजपा सरकार आई तो दोबारा इस पर चर्चा होने लगी। 2016 में सुप्रीम कोर्ट की पाँच जजों की बेंच ने इस मामले को दोबारा देखा तो NEET को लागू करने का रास्ता साफ हुआ और फिर संसद ने भी कानून में संशोधन करके NEET को स्पष्ट कानूनी आधार दिया।
हालांकि, तब तमिलनाडु समेत कई दक्षिणी राज्यों ने इसका विरोध किया। उनकी दलील थी कि स्टेट बोर्ड के स्टूडेंट्स को अचानक नेशनल एग्जाम में बैठाना उचित नहीं होगा। इस समस्या के समाधान के लिए और इस विरोध को खत्म करने के लिए मोदी सरकार ने NEET वापस नहीं लिया, बल्कि केवल 2016-17 के लिए राज्य कोटे की सीटों पर एक साल की छूट देने वाला अध्यादेश लाया। यानी दक्षिण के राज्यों को एक साल का टाइम मिल गया अपनी समस्याओं को सुलझाने का और हां मोदी सरकार ने उसी समय साफ भी कर दिया था कि यह छूट अस्थायी है और 2017 से पूरे देश में मेडिकल और डेंटल एंट्रेस केवल NEET के आधार पर ही होंगे।
इसके बाद धीरे-धीरे अलग-अलग मेडिकल प्रवेश परीक्षाएँ NEET व्यवस्था में शामिल होती चली गईं। AIIMS और JIPMER जैसी प्रतिष्ठित संस्थानों की अलग-अलग परीक्षाएँ भी समाप्त कर दी गईं और MBBS प्रवेश के लिए NEET को मुख्य माध्यम बनाया गया।
NEET लागू होने के बाद भारत की मेडिकल प्रवेश व्यवस्था में सबसे बड़ा बदलाव यह आया कि देश के अलग-अलग हिस्सों में होने वाली कई परीक्षाओं की जगह एक राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा ने ले ली।
पहले एक छात्र को मेडिकल कॉलेज में प्रवेश के लिए कई अलग-अलग परीक्षाएँ देनी पड़ सकती थीं। लेकिन NEET के बाद MBBS और BDS में प्रवेश के लिए एक ज्वाइंट पेपर और एक ज्वाइट मेरिट लिस्ट तैयार होने लगी।
इसका मतलब था कि देश के किसी भी राज्य का छात्र एक ही परीक्षा के माध्यम से देशभर के मेडिकल कॉलेजों के लिए प्रतिस्पर्धा कर सकता था।
ये बदलाव केवल छात्रों की सुविधा तक सीमित नहीं था। इससे मेडिकल कॉलेजों के लिए भी प्रवेश प्रक्रिया एक समान हुई। पहले अलग-अलग राज्यों और संस्थानों की अलग-अलग परीक्षाओं के कारण यह तय करना मुश्किल होता था कि किस छात्र का मूल्यांकन किस स्तर पर हुआ है। NEET ने इस समस्या को कम करने की कोशिश की।
अगर पहले किसी छात्र ने उत्तर प्रदेश की मेडिकल परीक्षा में अच्छा प्रदर्शन किया और किसी दूसरे छात्र ने महाराष्ट्र या कर्नाटक की परीक्षा में अच्छा प्रदर्शन किया, तो दोनों के प्रदर्शन की सीधी तुलना आसान नहीं थी।
क्योंकि दोनों परीक्षाओं का स्तर और मूल्यांकन प्रक्रिया अलग हो सकती थी। NEET ने इस अंतर को कम करने का प्रयास किया। यही NEET के पक्ष में सबसे बड़ा तर्क था। एक देश, एक मेडिकल प्रवेश परीक्षा।
अब NEET का एक बड़ा बदलाव निजी मेडिकल कॉलेजों को लेकर भी था।
NEET से पहले कई निजी मेडिकल कॉलेज और संस्थान अपनी अलग-अलग प्रवेश परीक्षाएँ आयोजित करते थे। इससे छात्रों के सामने कई अलग-अलग प्रक्रियाएँ होती थीं और प्रवेश प्रणाली को लेकर पारदर्शिता पर सवाल उठते थे।
NEET के बाद मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश के लिए NEET स्कोर को अनिवार्य किया गया। इसका उद्देश्य ये था कि चाहे कॉलेज सरकारी हो या निजी, प्रवेश के लिए एक न्यूनतम राष्ट्रीय मानक तय हो।
इसके अलावा AIIMS और JIPMER जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों की अलग-अलग प्रवेश परीक्षाएँ भी समाप्त कर दी गईं और इन संस्थानों में MBBS प्रवेश NEET के माध्यम से होने लगा।
यानी जो छात्र पहले AIIMS के लिए अलग परीक्षा देते थे, JIPMER के लिए अलग और अन्य मेडिकल कॉलेजों के लिए अलग परीक्षाएँ देते थे, उन्हें अब एक ही परीक्षा के माध्यम से मौका मिलने लगा।
और ये सिर्फ एंट्रेस एग्जाम को एक करने तक ही बात सीमित नहीं रही। जब AIPMT अपने अंतिम दौर में था, तब पूरे देश में MBBS की करीब 50 से 55 हजार सीटें थीं। आज ये संख्या बढ़कर लगभग 1.37 लाख तक पहुंच चुकी है। यानी पिछले एक दशक में मेडिकल एजुकेशन की कैपेबिलिटी ढाई गुना के करीब बढ़ी है। अब सवाल ये कि आखिर ये कैसे हुआ? इसके लिए मोदी सरकार ने 2014 में एक बड़ा मिशन शुरू किया। मिशन ये था कि जिन जिलों में मेडिकल कॉलेज नहीं हैं, वहां जिला अस्पतालों से जुड़े नए सरकारी मेडिकल कॉलेज खोले जाएं, ताकि छात्रों को अपने ही राज्य और अपने ही क्षेत्र में मेडिकल एजुकेशन का अवसर मिल सके।
इसके लिए भी ये सुविधा की गई कि इन मेडिकल कॉलेज की लागत का 60 प्रतिशत हिस्सा केंद्र सरकार देगी और 40 प्रतिशत राज्य सरकार। इसी में एक और खास बात ये है कि पूर्वोत्तर और अन्य विशेष श्रेणी के राज्यों के लिए ये अनुपात 90 प्रतिशत केंद्र और केवल 10 प्रतिशत राज्य का रखा गया, यानी 90 परसेंट फंड केंद्र देगी और राज्य केवल 10 परसेंट ये इसलिए ताकि भौगोलिक और आर्थिक रूप से चुनौतीपूर्ण क्षेत्रों में भी मेडिकल कॉलेज स्थापित किए जा सकें।
एक और बात ये केवल कागजों तक सीमित नहीं हैं। अब तक इस योजना के तहत 157 नए मेडिकल कॉलेज स्वीकृत किए जा चुके हैं, जिनमें से बड़ी संख्या में कॉलेज शुरू भी हो चुके हैं, जबकि बाकी निर्माण और संचालन की प्रक्रिया में हैं।
तो एक तरफ मेडिकल एंट्रेस को एक एग्जाम के जरिए सरल बनाया गया, तो दूसरी तरफ देशभर में मेडिकल कॉलेजों और MBBS सीटों की संख्या बढ़ाकर डॉक्टर तैयार करने की क्षमता भी लगातार बढ़ाई गई।
अब इतना जानने के बाद तो आप भी जान गए होंगे कि नीट लागू होने के बाद कितनी समस्याओं को दूर किया गया है।
आज हम देखते हैं कि लाखों की संख्या में नीट एस्पिरेंट एक ही समय पर एक ही पेपर देते हैं। हालांकि किसी भी परीक्षा प्रणाली की सबसे बड़ी ताकत केवल यह नहीं होती कि उसमें कितने छात्र बैठते हैं।
उसकी सबसे बड़ी ताकत होती है, छात्रों का भरोसा और यही भरोसा तब थोड़ा डगमगाया जब NEET, पेपर लीक के चलते विवादों में घिर गया।
देखिए, इस पर राजनीति अपनी जगह है और पॉलिसी लेवल पर इसका आकलन अपनी जगह… तो सवाल ये वाजिब है कि जिस परीक्षा को देश में पारदर्शिता और समान अवसर के लिए लाया गया था, उसे और सुरक्षित कैसे बनाया जाए?
इसके लिए अब एक और चर्चा शुरू हो गई है और इस बात के संकेत सरकार की तरफ से भी देखने को मिलते हैं कि आने वाले समय में नीट की परीक्षा भी Computer Based Test यानी CBT के साथ हो सकती है। चूंकि नीट को एनटीए ऑर्गनाइज करवाता है और एनटीए बाकी के जितने भी एग्जाम करवाता है उसमें से ज्यादातर CBT बेस्ड होते हैं तो फिर नीट भी ऐसे ही हो सकता है।
अब इस बात से भी शायद ही कोई डिनाय करे कि जब-जब कोई सिस्टम बनाया जाता है तो उसमें कोई ना कोई लूपहोल होता ही है और उसी लूपहोल का फायदा उस सिस्टम से जुड़े माफिया उठाते हैं।
भारत में मेडिकल एंट्रेस एग्जाम के संबंध में भी यही था। अब तक कई लूपहोल सामने आए। भारत की मेडिकल प्रवेश परीक्षा की पूरी यात्रा को अगर देखें तो एक बात साफ दिखाई देती है।
पहले समस्या थी कि देश में बहुत सारी अलग-अलग परीक्षाएँ थीं। फिर समस्या ये बनी कि एक राष्ट्रीय परीक्षा को पूरी तरह सुरक्षित और भरोसेमंद कैसे बनाया जाए।
AIPMT इसलिए आया क्योंकि अलग-अलग परीक्षाओं वाली व्यवस्था में कई सीमाएं थीं। NEET इसलिए आया क्योंकि मेडिकल प्रवेश को एक समान राष्ट्रीय मंच देने की जरूरत थी और अगर आज NEET में कमियाँ सामने आ रही हैं, तो उनका समाधान भी इसी सुधार प्रक्रिया का अगला चरण होगा।
किसी भी परीक्षा प्रणाली की सफलता इस बात से तय नहीं होती कि उसमें कभी कोई गलती नहीं होगी बल्कि इस बात से तय होती है कि गलती सामने आने के बाद वह खुद को कितना बेहतर बनाती है।
क्योंकि भारत के मेडिकल प्रवेश की कहानी किसी एक परीक्षा की कहानी नहीं है। यह लगातार सुधारों की कहानी है। एक ऐसी यात्रा जिसमें व्यवस्था बदलती रही, चुनौतियाँ बदलती रहीं और समाधान भी बदलते रहे।





