Made in India: The Supply of Weapons and Ammunition to Israel

नेहरू ने Israel से माँगे थे हथियार, आज भारत कर रहा है Export, गाजा की तबाही में भारत का बारूद? India’s Hidden Role in Israel Revealed

Summary
'Made in India: The Supply of Weapons and Ammunition to Israel' रिपोर्ट ने मचाई सनसनी.. कभी दूसरों से हथियार खरीदने वाला भारत आज Israel की डिफेंस सप्लाई चेन का अहम हिस्सा कैसे बन गया?

30 जुलाई 2026 को एमनेस्टी इंटरनेशनल ने एक नई रिपोर्ट जारी की, ‘Made in India: The Supply of Weapons and Ammunition to Israel’। जिसे अन्य समाचार पैट्रन ने इस शीर्षक के साथ प्रकाशित किया है, “India’s Supply Of Weapons And Ammunition To Israel Risks Complicity In Gaza Genocide, Says Amnesty International”

आरोप यह है कि जिस भारत को कभी अपनी हर छोटी-बड़ी सुरक्षा ज़रूरत के लिए विदेशों के सामने हाथ फैलाने पड़ते थे, आज वही भारत गाजा संघर्ष के बीच इज़राइल को हथियार, उसके पुर्जे और गोला-बारूद धड़ल्ले से एक्सपोर्ट कर रहा है! एमनेस्टी का दावा है कि इससे भारत पर अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों के उल्लंघन और जेनोसाइड यानी नरसंहार में मिलीभगत का गंभीर जोखिम मंडरा रहा है।

लेकिन क्या आप जानते हैं कि इतिहास में कहानी बिल्कुल उल्टी थी? जब 1962 में चीन ने भारत को धोखा दिया था, तब देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को किन देशों के आगे हाथ जोड़ना पड़ा था? जब 1971 में इंदिरा गांधी को हथियारों की सख्त ज़रूरत थी, तो क्या अमेरिका मदद के लिए आया था या फिर वही इज़राइल, जिस पर आज सवाल उठ रहे हैं, वह मसीहा बनकर आया था?

और तब से लेकर आज तक, भारत कहाँ खड़ा है, इम्पोर्ट-एक्सपोर्ट और आत्मनिर्भरता के मामले में? इस वीडियो में हम बात करेंगे भारत के डिफेंस इम्पोर्ट-एक्सपोर्ट के इन्हीं कुछ आंकड़ों पर और हथियारों की सप्लाई से जुड़े ऐतिहासिक ट्रिविया पर।

एमनेस्टी का आरोप vs फैक्ट्स

सबसे पहले बात करते हैं उस रिपोर्ट की जिसकी वजह से आज यह पूरा तूफ़ान खड़ा हुआ है। एमनेस्टी इंटरनेशनल ने अपनी रिपोर्ट में दावा किया है कि 7 अक्टूबर 2023 से लेकर 30 नवंबर 2025 के बीच, भारत से इज़राइल के लिए कम से कम 2,596 शिपमेंट भेजे गए हैं। इन नंबर्स को भी देख लेते हैं-

  • लगभग 3,90,516 मिलिट्री-ग्रेड स्मॉल आर्म्स पार्ट्स (यानी छोटे हथियारों के पुर्जे)।
  • लगभग 5,64,970 एक्सप्लोसिव ऑर्डनेंस पार्ट्स (इसमें ड्रोन के वॉरहेड्स, आर्टिलरी शेल की केसिंग वग़ैरह शामिल हैं)।
  • और क़रीब 298 मिलिट्री व्हीकल कंपोनेंट्स।

ये सारे सामान सीधे तौर पर इज़राइल की उन बड़ी डिफेंस कंपनियों को भेजे गए हैं जो वहाँ की सेना यानी IDF की सप्लाई चेन की बैकबोन हैं, जैसे Elbit Systems, Rafael Advanced Defense Systems और Israel Aerospace Industries (IAI)।

अब सवाल यह है कि ये सामान भारत में बना कौन रहा है? क्या कोई प्राइवेट कंपनी ऐसा कर रही है या सरकार की अपनी कंपनियाँ भी इसमें शामिल हैं? रिपोर्ट में भारत की जिन चुनिंदा और प्रमुख कंपनियों के नाम लिए गए हैं, उनकी एक लंबी लिस्ट है:

  • Munitions India Limited (MIL): यह सरकार के पूर्ण स्वामित्व वाली (Public Sector) कंपनी है। रिपोर्ट के मुताबिक इसने इज़राइल की Elbit कंपनी को 155mm के हाई-एक्सप्लोसिव आर्टिलरी राउंड्स (गोले) सप्लाई किए हैं, जिसमें कम से कम 1,000 राउंड्स का साफ़ ज़िक्र है।
  • Advanced Weapons and Equipment India Limited (AWEIL): यह भी सरकार के अंडर आने वाली कंपनी है, जिसने फ़रवरी 2024 में 120 यूनिट 81mm के मोर्टार लॉन्चर्स सप्लाई किए।
  • India Optel Limited: जो इन्फ्रारेड सेंसर्स और सेमीकंडक्टर आइटम्स मुहैया कराती है।
  • PLR Systems: यह अदानी डिफेंस एंड एयरोस्पेस और इज़राइल वेपन इंडस्ट्रीज (IWI) का एक जॉइंट वेंचर है, जो मशीन गन के पार्ट्स बना रहा है।
  • Kalyani Strategic Systems: यह दिग्गज कंपनी भारत फोर्ज की सब्सिडियरी है, जो आर्टिलरी राउंड्स और उनकी केसिंग्स का निर्माण करती है।
  • Alpha Elsec Defence & Aerospace Systems: यह अल्फा डिज़ाइन और एल्बिट का जॉइंट वेंचर है, जो एक्सप्लोसिव वॉरहेड्स पर काम कर रहा है।
  • इसके अलावा Indo MIM, Premier Explosives और अशोका मैन्युफैक्चरिंग जैसी कंपनियों का नाम भी इस लिस्ट में है।

एमनेस्टी का कहना है कि भारत ने ‘आर्म्स ट्रेड ट्रीटी’ (ATT) पर साइन नहीं किया है और हमारे यहाँ हथियारों के एक्सपोर्ट के दौरान मानवाधिकार से जुड़े ‘ड्यू डिलिजेंस’ (Human Rights Due Diligence) की कमी है। रिपोर्ट का यह भी कहना है कि भारत सरकार को अच्छी तरह पता होना चाहिए था कि यह सारा import-export का चक्र गाजा में मानवाधिकारों के हनन में इस्तेमाल हो सकता है।

इतिहास का ट्रिविया: जब नेहरू-इंदिरा ने माँगी थी मदद

आज जो लोग यह कह रहे हैं कि भारत को इज़राइल को हथियार नहीं भेजने चाहिए, उन्हें यह जानना बेहद ज़रूरी है कि एक वक़्त ऐसा भी था जब भारत की ख़ुद की सुरक्षा दांव पर थी और भारत ने इज़राइल के सामने हाथ फैलाए थे। यह हिस्सा बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि आज की आलोचना को समझने के लिए अतीत जानना ज़रूरी है। बात है 1962 के भारत-चीन युद्ध की। जब अचानक चीन ने भारत पर आक्रमण किया, तो देश के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू सदमे में थे। हमारी सेना के पास आधुनिक हथियारों और मोर्टार्स की भारी कमी थी। उस समय भारत और इज़राइल के बीच कोई औपचारिक कूटनीतिक (Diplomatic) संबंध नहीं थे।

नेहरू जी ने बेहद गोपनीय तरीक़े से इज़राइल के प्रधानमंत्री डेविड बेन-गुरियन (David Ben-Gurion) को संदेश भेजा कि भारत को हथियारों की सख्त ज़रूरत है। लेकिन कूटनीति के अपने पेंच होते हैं। भारत उस समय अरब देशों को नाराज़ नहीं करना चाहता था, क्योंकि पाकिस्तान के ख़िलाफ़ कश्मीर के मुद्दे पर नेहरू जी को अरब देशों के समर्थन की ज़रूरत थी। इसलिए भारत ने एक शर्त रखी, ‘हथियार ऐसे जहाजों में भेजे जाएं जिन पर इज़राइल का झंडा न लगा हो’

इज़राइल के प्रधानमंत्री डेविड बेन-गुरियन बड़े पक्के खिलाड़ी थे। उन्होंने नेहरू के इस प्रस्ताव पर बहुत ही सख़्त जवाब दिया। उन्होंने साफ़ शब्दों में कह दिया—

‘No flag, no weapons!’ (यानी अगर जहाज़ पर हमारा झंडा नहीं होगा, तो हम एक भी हथियार नहीं देंगे।)

आख़िरकार भारत की मजबूरी थी। नेहरू जी को उनकी शर्त माननी पड़ी। इज़रायली झंडे वाले जहाज़ों पर लदकर मोर्टार और छोटे हथियार चुपचाप भारत पहुँचे और उस संकट की घड़ी में भारतीय सेना के काम आए।

यह तो थी 1962 की चीन से लड़ाई की कहानी। अब बात करते हैं 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध की, जिसने नक़्शे पर बांग्लादेश को जन्म दिया। बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान इंदिरा गांधी की सरकार को हथियारों की सख्त ज़रूरत थी। अमेरिका पाकिस्तान के साथ था। भारत को इस बात का डर था कि कहीं अमेरिका और चीन मिलकर भारत पर दबाव न बना दें। ऐसे में इज़राइल की प्रधानमंत्री गोल्डा मेयर ने गुप्त रूप से भारत की मदद की थी। गोल्डा मेयर ने बिना एक पल गँवाए मदद का हाथ बढ़ाया। उस समय इज़राइल के पास जो हथियारों की खेप ईरान के रास्ते कहीं और जाने वाली थी, उन्होंने उसे डायवर्ट करके सीधे भारत की तरफ़ मोड़ दिया।

एक जाने-माने आर्म्स डीलर श्लोमो ज़बलुडोविक्ज़ (Shlomo Zabludowicz) के ज़रिए गुप्त रूप से मोर्टार, गोला-बारूद और इज़रायली सैन्य प्रशिक्षक (Instructors) भारत भेजे गए। ये भारतीय सेना और मुक्ति वाहिनी दोनों के काम आए।

बदले में गोल्डा मेयर ने सिर्फ़ एक ही माँग रखी थी कि भारत इज़राइल के साथ Full Diplomatic Relations स्थापित कर ले। लेकिन इंदिरा गांधी की सरकार ने घरेलू और अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक मजबूरियों के चलते उस समय यह क़दम नहीं उठाया। यही वजह है कि भारत और इज़राइल के बीच Full Diplomatic Relations इंदिरा गांधी के जाने के सालों बाद, 1992 में जाकर पी.वी. नरसिम्हा राव की सरकार के दौरान स्थापित हो पाए।

यानी इतिहास इस बात की गवाही देता है कि जब भारत को ज़रूरत थी, तब इज़राइल ने बिना झिझक के मदद की थी। और आज जब इज़राइल अपनी सुरक्षा के सबसे बड़े संकट से गुज़र रहा है और भारत एक ग्लोबल डिफेंस मैन्युफैक्चरर बन चुका है, तो हमारे पब्लिक सेक्टर और प्राइवेट सेक्टर की कंपनियाँ उन्हें पार्ट्स और एम्युनिशन सप्लाई कर रही हैं।

डिफ़ेंस मार्केट में कहाँ है भारत?

इसी बहाने अब देखते हैं कि आज की तारीख़ में ग्लोबल डिफेंस मार्केट में भारत की वास्तविक कंडीशन क्या है? क्या हम सच में आत्मनिर्भर हैं या सिर्फ़ भ्रम में जी रहे हैं?

लेटेस्ट फैक्ट्स पर नज़र डालते हैं। स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) की ताज़ा 2021-2025 की रिपोर्ट और भारत के रक्षा मंत्रालय के आँकड़े क्या कहते हैं, इसे बहुत ध्यान से समझिए:

  • Imports के मामले में हम नंबर वन पर हैं: आज भी भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा हथियार ख़रीदने वाला देश (Global Arms Importer) है। दुनिया के कुल हथियारों के आयात में अकेले भारत की हिस्सेदारी 8.2% है। यानी हम दुनिया में सबसे बड़े ख़रीदारों में से एक हैं।
  • रूस पर घटती निर्भरता: अच्छी बात यह है कि रूस पर हमारी पारंपरिक निर्भरता तेज़ी से कम हुई है। एक ज़माना था जब हमारे 70% हथियार रूस से आते थे, जो अब घटकर क़रीब 40% पर आ गए हैं। लेकिन उनकी जगह किसने ली है? फ्रांस अब 29% और इज़राइल 15% हिस्सेदारी के साथ भारत के सबसे बड़े डिफेंस पार्टनर बनकर उभरे हैं।
  • Production और Exports में ऐतिहासिक उछाल: सरकारी आँकड़ों के मुताबिक, भारत का घरेलू Defence Production FY 2025 में रिकॉर्ड ₹1.54 लाख करोड़ के आँकड़े को पार कर चुका है। जहाँ पहले हम अपनी 65 से 70% रक्षा ज़रूरतों के लिए विदेशों पर निर्भर थे, वहीं अब देश में ही क़रीब 65% रक्षा उपकरण बनने लगे हैं। और बात अगर export की करें, तो पिछले कुछ सालों में भारत का डिफेंस एक्सपोर्ट आसमान छू रहा है। FY 2017 के मुक़ाबले आज हमारा डिफेंस एक्सपोर्ट 25 गुना से ज़्यादा बढ़कर लगभग ₹23,000 से ₹38,000 करोड़ के सालाना रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच चुका है। हम ब्रह्मोस मिसाइल से लेकर आर्टिलरी गन और रडार दुनिया के कई देशों को बेच रहे हैं।

लेकिन दोस्तों, सिक्के का दूसरा पहलू देखना भी उतना ही ज़रूरी है। आँकड़े चाहे जितने भी ब्राइट हों, सच यह है कि पूरी आत्मनिर्भरता अभी भी हमसे थोड़ी दूर है। हमारे डिफेंस सिस्टम में आज भी कई ‘गैप’ हैं जिन्हें भरा जाना बाक़ी है-

  • Jet Engine Dependency: हमारे देश का गौरव कहे जाने वाला हल्का लड़ाकू विमान Tejas हो या आने वाला एडवांस्ड फाइटर जेट AMCA, इनके इंजन के लिए हम आज भी अमेरिकी कंपनी GE (General Electric) के F404 और F414 इंजनों पर पूरी तरह निर्भर हैं। हमारा अपना ‘कावेरी इंजन प्रोग्राम’ (Kaveri Engine Program) दशकों की कोशिशों के बाद भी सफल नहीं हो पाया। मजबूरी में अब हमें फ्रांस की एक कंपनी के साथ मिलकर नया इंजन विकसित करने के लिए हाथ मिलाना पड़ा है।
  • एडवांस्ड सेंसर्स और सेमीकंडक्टर: रक्षा क्षेत्र में इस्तेमाल होने वाले क़रीब 80% एडवांस्ड सेंसर्स और हाई-टेक सेमीकंडक्टर चिप्स आज भी विदेशों से ही import करने पड़ते हैं।
  • इसके अलावा High-Temperature Materials और Propulsion Systems और गाइडेड मिसाइल की कुछ ख़ास टेक्नोलॉजी में हमारी विदेशी निर्भरता आज भी बनी हुई है।

यही वजह है कि SIPRI ने अपनी रिपोर्ट में साफ़ तौर पर कहा है कि भले ही भारत का घरेलू उत्पादन तेज़ी से बढ़ रहा हो, लेकिन देश की सेना की आधुनिक ज़रूरतों को पूरा करने के लिए विदेशी सप्लायरों पर निर्भरता लगातार बनी हुई है। हम आज भी राफेल के अतिरिक्त विमान, जर्मनी से पनडुब्बियाँ और अमेरिका से ड्रोन (MQ-9B Predator) ख़रीदने के बड़े-बड़े सौदे कर रहे हैं।

India’s Hidden Role in Israel Revealed

कुल मिलाकर कहानी एकदम साफ़ है। 1962 और 1971 में जब भारत पर आफत आई थी, तब हमने इज़राइल से मदद माँगी थी। डेविड बेन-गुरियन ने “No flag, no weapons” की शर्त रखी थी और गोल्डा मेयर ने गुप्त रूप से हथियार भेजे थे। आज वक़्त बदल चुका है। भारत अब सिर्फ़ हथियारों का import करने वाला देश नहीं रहा, बल्कि दुनिया के कई देशों को हथियारों और उनके पार्ट्स का export करने वाला एक उभरता हुआ ग्लोबल पावर बन चुका है।

एमनेस्टी की रिपोर्ट आरोप लगाती है कि भारत इज़राइल की सप्लाई चेन का हिस्सा बन गया है। भारत सरकार की तरफ़ से अभी सार्वजनिक विस्तृत जवाब नहीं आया है। रक्षा सहयोग दोनों देशों के बीच लंबे समय से रणनीतिक है। फैक्ट्स यही हैं। इतिहास, वर्तमान आँकड़े और एमनेस्टी के “आरोप”, इन तीनों को एक साथ रखकर आप ख़ुद फ़ैसला करें। क्या भारत को अपनी Defence Economy को मज़दूर करने के लिए ग्लोबल बाज़ार में हथियारों का निर्यात जारी रखना चाहिए, भले ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसके राजनीतिक और मानवाधिकार से जुड़े मायने कुछ भी निकाले जाएँ? या फिर भारत को अपनी सप्लाई चेन पर नैतिक पाबंदियाँ लगानी चाहिए?

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