सोलर पॉवर इंडिया

₹10 से ₹2 यूनिट तक का सफ़र: कैसे भारत ने सोलर को बनाया सबसे सस्ती बिजली का विकल्प?

Summary
भारत की सोलर कैपेसिटी पिछले 11-12 सालों में 50 गुना बढ़कर 150 GW के पार पहुँच गई है। जानिए कैसे मेगा सोलर पार्क्स, पीएम सूर्यघर योजना और PLI स्कीम ने मिलकर भारत को रिन्यूएबल एनर्जी का ग्लोबल लीडर बना दिया।

जब भारत में बिजली उत्पादन की बात होती है, तो लोगों के दिमाग में सबसे पहले क्या आता है? आपके दिमाग़ में छत्तीसगढ़ में लगा कोई बड़ा थर्मल पॉवर प्लांट, तारापुर Nuclear Power Station जैसा न्यूक्लियर प्लांट, या फिर टिहरी जैसा कोई बड़ा Hydro Project आता होगा। लेकिन क्या कभी आपने सोचा था कि सोलर एनर्जी (Solar Energy) भी भारत की Major Electricity System का हिस्सा बन जाएगी? शायद नहीं, क्योंकि ये सब आज भी लोगों को बस एडहॉक सिस्टम्स ही लगते थे। पहले लोग सोलर को सिर्फ घर की छोटी बैकअप सिस्टम या सरकार का एक ‘एक्सपेरिमेंट’ मानते थे। सोलर सिस्टम से पूरे देश को बिजली दी जाए, ये विचार तो कभी इम्प्लीमेंट ही नहीं हुआ था। लेकिन अब ये सोच पूरी तरह बदल चुकी है।

अभी भारत की टोटल Installed Generation Capacity लगभग 530 GW से ज़्यादा है। इसमें से 150 GW से ज़्यादा बिजली Solar Energy से आ रही है। मतलब 28% बिजली कैपेसिटी अब सोलर से जनरेट हो रही है।

और सोलर देश में इतने बड़े स्केल पर कैसे पहुँचा, ये भी एक दिलचस्प कहानी है। भारत की टोटल इंस्टॉल्ड सोलर कैपेसिटी का हिस्सा साल 2014 में सिर्फ 3 GW था और अब ये 150 GW से ज़्यादा है। सीधी भाषा में समझें तो सिर्फ 11-12 साल में भारत की Solar Capacity लगभग 50 गुना बढ़ गई है।

लेकिन ये हुआ कैसे? इसके लिए आपको आज से लगभग 12 साल पीछे चलना पड़ेगा और इंडस्ट्री व पॉलिसी दोनों को एक साथ देखना पड़ेगा। नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बनने से पहले जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे, तब उन्होंने गुजरात में सोलर को काफ़ी अग्रेसिवली पुश किया था। उन्होंने केंद्र सरकार से पहले, यानी साल 2009 में ही सोलर पॉलिसी अनाउंस कर दी थी।

और उन्होंने इस मॉडल को केंद्र में आने के बाद और भी तेज़ी से बढ़ाया। साल 2014 के बाद तेज़ी से National Solar Mission को आगे बढ़ाया गया और इसमें टारगेट रखा गया कि हम बड़े सोलर प्लांट्स लगाएँगे। राजस्थान का 2000 मेगावाट से ज़्यादा कैपेसिटी वाला भदला सोलर प्लांट हो या कर्नाटक का पावागड़ा सोलर प्लांट, ये सब इसी दौर में कमीशन किए गए।

साल 2014 में मोदी सरकार ने 20 हज़ार मेगावाट से ज़्यादा के लार्ज स्केल सोलर प्लांट को मंज़ूरी दी थी, जिनमें से ज़्यादातर अब ऑपरेशनल हो चुके हैं।

150 गुना कैसे बढ़ा सोलर?

लेकिन सिर्फ़ पॉलिसी के पुश से कुछ नहीं होता, बल्कि इसमें इंडस्ट्री का भी अहम रोल होता है। जब लार्ज स्केल पर सरकार ने सोलर एनर्जी को पुश किया तो इंडस्ट्री भी आगे आई। इंडस्ट्री के आगे आने से चीजें तेज़ी से बदलीं और जिस सोलर की पर यूनिट कॉस्ट 7 रुपये से लेकर 10 रुपये हुआ करती थी, वो घटकर 2-3 रुपये तक आ गई। इसी दौरान दुनिया में भी सोलर पर पुश हो रहा था, इस वजह से सोलर पैनल्स और ज़्यादा एफिशिएंट हो गए और उनके मॉड्यूल्स भी सस्ते हो गए।

ऐसे में सोलर केवल ‘ग्रीन एनर्जी स्लोगन’ का हिस्सा नहीं, बल्कि सस्ती एनर्जी का भी एक बड़ा ऑप्शन बन गया। और यहीं से देश में सोलर का दूसरा फ़ेज़ शुरू हुआ—और ये फ़ेज़ था Private Investment का। जब सरकार बड़े सोलर पार्क्स को लेकर आगे बढ़ी तो प्राइवेट कैपिटल ने भी इसमें पूरा सहयोग किया।

साल 2018 से 2022 के बीच चाहे टाटा का धोलेरा में लगने वाला सोलर प्लांट हो या फिर मध्य प्रदेश के रीवा में लगा 750 मेगावाट का प्लांट, इसमें इंडस्ट्री लगातार इनवेस्ट करती रही। इसके अलावा आंध्र प्रदेश के कुरनूल में लगे प्लांट हों या अदानी के गुजरात और राजस्थान में लगे बड़े प्लांट्स, इन सारे प्लांट्स की वजह से इंडिया की सोलर इंस्टॉल्ड कैपेसिटी तेज़ी से बढ़ी।

साल 2018 में भारत में टोटल सोलर की इंस्टॉल्ड कैपेसिटी 13 गीगावाट थी, जो 2022 तक तीन गुना बढ़कर 53 गीगावाट हो गई। इसमें बड़ा रोल इन्हीं मेगा सोलर पार्क्स ने निभाया। लेकिन सिर्फ़ बड़े-बड़े सोलर पार्क्स लगाकर देश भर में सोलर को वो स्केल नहीं दिया जा सकता था, जो सिटिजन पार्टिसिपेशन यानी आम जनता की भागीदारी से मिल सकता है।

जब तक हर आदमी के पास इस सोलर कैपेसिटी का फ़ायदा नहीं पहुँचेगा, तब तक चीज़ें लिमिटेड रहेंगी और हमारा एनर्जी ट्रांज़िशन भी धीमा होगा। ऐसे में सोलर को हर घर तक ले जाना ज़रूरी था। अब कोल और हाइड्रो एनर्जी के साथ ये प्रॉब्लम है कि वो केवल लार्ज स्केल पर ही काम कर सकती हैं, लेकिन सोलर काफ़ी मॉड्यूलर है।

और इसी का फ़ायदा मोदी सरकार ने उठाया और अपनी पॉलिसीज़ इस तरीके से डिज़ाइन कीं कि हर घर की छत पर सोलर इंस्टॉल हो जाए। और इसी के साथ आईं ‘पीएम कुसुम’ और ‘पीएम सूर्यघर’ जैसी योजनाएं। जैसे उज्ज्वला योजना के ज़रिए हर घर में गैस सिलेंडर और जल जीवन मिशन से हर घर में पानी का कनेक्शन पहुँचा था, वैसे ही सूर्यघर योजना और PM-KUSUM को सोलर के लिए डिज़ाइन किया गया।

हर घर तक कैसे पहुँचा सोलर?

इन योजनाओं ने देश के खेतों और छतों तक लाखों की संख्या में सोलर पहुँचाए। पीएम कुसुम के ज़रिए देश के खेतों में डीज़ल से चलने वाले पंप अब सोलर एनर्जी से चलने लगे हैं। डेटा कहता है कि देश में 10 लाख से ज़्यादा खेतों में सोलर पंप्स इंस्टॉल किए जा चुके हैं और इसके लिए सरकार ने 7000 करोड़ रुपये से ज़्यादा खर्च किए हैं।

और हर घर सोलर पहुँचाने के लिए ‘पीएम सूर्यघर योजना’ लाई गई थी, जो ब्लॉकबस्टर साबित हुई है। इसमें अब तक 32 लाख नए सोलर कनेक्शन दिए गए हैं और इसके लिए मोदी सरकार ने लगभग 22 हज़ार करोड़ रुपये की सब्सिडी दी है। इसीलिए अब जब आप किसी बड़े शहर में फ़्लाईओवर से निकलते हैं, तो छतों पर सोलर ही सोलर नज़र आते हैं।

सबसे इंट्रेस्टिंग बात ये है कि छतों पर लगाए गए इस सोलर से ही भारत ने 10 हज़ार मेगावाट की एडिशनल कैपेसिटी क्रिएट की है। ये कैपेसिटी देश के सबसे बड़े कोल पॉवर प्लांट से भी बड़ी है। लेकिन सोलर का ये मेगा नेटवर्क ऐसे ही नहीं खड़ा हुआ है, इसके लिए बैकग्राउंड में भी एक तगड़ा काम हुआ है।

और यहीं से आता है हमारी कहानी का एक्स-फ़ैक्टर। ये एक्स-फ़ैक्टर है सोलर की मैन्युफैक्चरिंग। दुनिया में आज सबसे ज़्यादा सोलर पैनल्स का प्रोडक्शन चाइना करता है। इन फ़ैक्ट, चाइना ने इतना प्रोडक्शन कर लिया है कि अब उनके यहाँ डोमेस्टिक डिमांड कम पड़ गई है और वे बेहद कम रेट्स पर पैनल्स एक्सपोर्ट कर रहे हैं।

लेकिन जिस तरह हम कच्चे तेल वाली एनर्जी के लिए दूसरे देशों पर डिपेंड नहीं हो सकते, उसी तरह सोलर पैनल्स भी रिन्यूएबल एनर्जी का कोर हैं और हम इसके लिए चाइना पर डिपेंडेंट नहीं रह सकते। ऐसे में भारत ने लोकली सोलर पैनल्स के प्रोडक्शन के लिए स्कीम्स शुरू कीं।

इसमें इसमें सबसे इम्पोर्टेंट है PLI यानी Production Linked Incentive। मतलब आप जितना भी प्रोडक्शन इंडिया में करेंगे, उसी हिसाब से सरकार आपको इंसेंटिव्स देगी। सोलर सेक्टर में मोदी सरकार ने डोमेस्टिक प्रोडक्शन के लिए 24 हज़ार करोड़ रुपये से ज़्यादा के इंसेंटिव्स का ऐलान किया था।

और इसका रिज़ल्ट ये है कि भारत की सोलर मॉड्यूल कैपेसिटी 2014 में सिर्फ़ 2.3 GW से बढ़कर मार्च 2026 तक 172 GW से ज़्यादा हो चुकी है। हालाँकि अब भी कई ऐसे आइटम्स हैं जिनके लिए हम चाइना पर निर्भर हैं, लेकिन सोलर पैनल्स के मामले में काफ़ी तरक्की हो चुकी है।

बेसिक बात ये है कि जिस सोलर को कभी सिर्फ़ एक बैटरी चार्ज करने तक का साधन माना जाता था, वो आज भारत के रिन्यूएबल एनर्जी पुश में सबसे बड़ा फ़ैक्टर बन चुका है। वो हमें एनर्जी मार्केट्स में लगने वाले झटकों से बचा रहा है और साथ ही हमारे ग्रीन एनर्जी ट्रांज़िशन को भी तेज़ी से आगे बढ़ा रहा है।

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