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‘मोदी सीढ़ियाँ नहीं चढ़ सके’ या सुरक्षा का सवाल? न्यूज़ीलैंड में हिंदुओं को मिली धमकी पर क्यों चुप रही कॉन्ग्रेस

Summary
प्रधानमंत्री मोदी का मज़ाक उड़ाने के लिए 'सीढ़ियाँ नहीं चढ़ पाए' वाला नैरेटिव चलाया गया। आख़िर एक फर्जी नैरेटिव इतना बड़ा कैसे बन गया? और इसका FCRA कार्रवाई से क्या संबंध है?

आपने भी वह हेडलाइन देखी होगी। वह वीडियो क्लिप भी देखी होगी और सोशल मीडिया पर मचा वह शोर भी सुना होगा। जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी न्यूज़ीलैंड और ऑस्ट्रेलिया के दौरे पर थे, तब अचानक एक नैरेटिव चल पड़ा। कहीं दावा किया गया कि प्रधानमंत्री ने बीच कार्यक्रम में ‘Nap Time’ मांगा। कहीं लिखा गया कि उनकी टीम ने ऐसी जगहों से बचने को कहा जहाँ बहुत सीढ़ियाँ हों। देखते ही देखते सोशल मीडिया पर मीम्स बनने लगे। कांग्रेस नेताओं और उनके समर्थकों ने इसे इस तरह पेश किया मानो 75 साल के प्रधानमंत्री अब चलने-फिरने में असमर्थ हों या सार्वजनिक कार्यक्रमों से बच रहे हों।

इस पूरे शोर के पीछे एक ऐसी Important चीज छिप गई, जिसे हम आपको बताने जा रहे हैं। पहले देख लें कि कैसे इतनी Important बात छोड़कर कांग्रेस और ट्रोल्स ने किस चीज़ पर बातचीत की? सबसे पहले ऑस्ट्रेलिया के 7News के पत्रकार ब्लेक जॉनसन की एक क्लिप पर सुप्रिया श्रीनेत ने जमकर हाय-तौबा मचाई। न्यूज़ीलैंड के इस पत्रकार ने प्रधानमंत्री मोदी पर आरोप लगाया कि वे केवल ‘Stage-managed’ कार्यक्रम करते हैं और अनौपचारिक सवालों से बचते हैं। इस एक क्लिप को बार-बार शेयर किया गया, मानो किसी विदेशी पत्रकार ने मोदी की पूरी पोल खोल दी हो।

WATCH : The Dark Truth Behind the ‘Modi Can’t Climb Stairs’ Lie

लेकिन जब ऑपइंडिया (OpIndia) ने ब्लेक जॉनसन से सीधे संपर्क किया, तो तस्वीर कुछ अलग निकली। क्या आपने कभी रुककर सोचा कि उस ब्लेक जॉनसन नाम के पत्रकार की खुजली का असली कारण क्या था? ऑपइंडिया पर ही हमारे साथी जर्नलिस्ट दिबाकर दत्ता को Email के जवाब में जॉनसन ने कुछ ऐसा लिखा, जिसने हमारा ध्यान एक बिल्कुल अलग दिशा में खींच दिया। उन्होंने अचानक 2008 में मेलबर्न में हुई एक सड़क दुर्घटना का ज़िक्र शुरू कर दिया।

जॉनसन ने कहा कि अगर उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से सवाल पूछने का मौका मिलता, तो वे 2008 के उस सड़क हादसे के दोषी भारतीय नागरिक पुनीत पुनीत के बारे में भी सवाल करते। जॉनसन का कहना था कि ऑस्ट्रेलिया लंबे समय से उसके प्रत्यर्पण की मांग कर रहा है और वे जानना चाहते हैं कि वह इस समय भारत में कहाँ है। यह मामला एक ऐसे भारतीय नागरिक का है, जिसने 2008 में मेलबर्न में शराब पीकर एक घातक सड़क दुर्घटना की थी। यह मामला ऑस्ट्रेलिया में बहुत इमोशनल और कानूनी रूप से लंबा खिंच गया है। ब्लेक जॉनसन ने कहा कि अगर उन्हें मौका मिले, तो वे मोदी से इस केस पर जवाब मांगेंगे।

यहाँ अब ज़रा ठहरने की ज़रूरत है। साल 2008 की बात आज क्यों? 2026 में एक पत्रकार अचानक पुराने मामलों को क्यों कुरेद रहा है? ये हैरान क्यों करता है, इसके लिए आपको न्यूज़ीलैंड के ही अखबार में प्रकाशित एक और खबर को पढ़ना होगा, जिसमें पीएम मोदी के इवेंट की ‘Nap Time’ और ‘Stairs’ को लेकर कटाक्ष किए गए हैं।

लोगों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सिक्योरिटी को लेकर किए गए इंतज़ाम पर मीम्स तो बनाए, लेकिन इस एक चीज़ पर सिर्फ हमारा ही ध्यान गया है, प्रधानमंत्री मोदी के दौरे से कुछ समय पहले न्यूज़ीलैंड में ‘डेस्टिनी चर्च’ के नेता ब्रायन तमाकी का एक वीडियो सामने आया, जिसे दुनिया ने नज़रअंदाज़ कर दिया। इस तमाकी ने एक वीडियो में खुलेआम कहा है कि ‘न्यूज़ीलैंड को हिंदुओं, सिखों और मुसलमानों से मुक्त करने का समय आ गया है।’

यह वीडियो 17 जून को सोशल मीडिया पर शेयर किया गया था। इस वीडियो में ब्रायन तमाकी कहता है, ‘अगर इंडियंस चर्च जला रहे हैं, तो हम भी उनकी मस्जिदें और मंदिर जला दें, जैसे को तैसा।’ तमाकी ने वीडियो में कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लीडरशिप में बच्चों के साथ ‘सामूहिक दुष्कर्म’ हो रहा है और ऐसा इंडिया के मुस्लिम और इस्लामिस्ट कर रहे हैं। तमाकी ने एक और बयान में कहा कि ‘मैं अपनी शिकार वाली बंदूक उठाऊंगा, उनके घर जाऊंगा, दरवाज़ा तोड़ दूंगा और उन्हें गोली मार दूंगा।’

तमाकी का इंडियन के ‘Purge’ यानी सफाई अभियान कोई मज़ाक नहीं था। जब पुलिस ने उसकी बंदूक का लाइसेंस ज़ब्त किया, तो तमाकी ने क्या कहा? उसने कहा कि पुलिस ने यह कार्रवाई मोदी को खुश करने के लिए की है। न्यूज़ीलैंड के अखबार के अनुसार, ये तमाम बयान देने वाले डेस्टिनी चर्च के लीडर तमाकी ने इंडिया में ईसाइयों पर होने वाले कथित अत्याचार के विरोध में दिए हैं। यहीं ‘Christian persecution narrative’ की भूमिका सामने आती है।

FCRA और ‘Victimhood’ का धंधा

क्या आप जानते हैं कि यह ईसाई उत्पीड़न का नैरेटिव क्यों बनाया जाता है? इसके पीछे कोई धार्मिक भावना नहीं, बल्कि फंडिंग का धंधा है। जब भारत सरकार ने FCRA के तहत उन संस्थाओं पर फुल स्टॉप लगाया जो विदेशी पैसे से देश की जड़ों को खोखला कर रही थीं, तब आर्चबिशप जोसेफ डिसूजा जैसे लोगों ने इसे ‘नाज़ी जर्मनी’ से जोड़ दिया था।

यह डिसूजा वही है जो विदेशों में बैठकर यह प्रोपेगेंडा फैलाता है कि ‘भारत में ईसाई खतरे में हैं।’ जबकि सच यह है कि खुद यह व्यक्ति विदेशी फंडिंग के नाम पर ज़मीनों का मालिक बन रहा था। जब उनकी दुकान बंद होने लगी, तो उसने विक्टिम कार्ड खेला। तमाकी और डिसूजा की विचारधारा एक ही है, भारत की छवि को ‘Intolerant’ दिखाना ताकि विदेशी फंड का फ्लो बना रहे। इसके बारे में आप ऑपइंडिया के ही यूट्यूब चैनल पर सर्च कर सकते हैं, जिसमें मैंने डिटेल में FCRA बैन और जोसेफ डिसूजा जैसों के बिज़नेस के बारे में विस्तार से बताया है।

मज़े की बात ये है कि यही डिसूजा FCRA बैन को नाज़ी रेजीम में होने वाले टॉर्चर से कंपेयर कर रहा था। अब आज न्यूज़ीलैंड के डेस्टिनी चर्च के लीडर, ब्रायन तमाकी जो भारतीयों के खिलाफ सीधा सफाई अभियान छेड़ने की बात कर रहा है, असल में नाज़ी रेजीम का एग्जांपल तो वो तमाकी है।

किसी ने ये ध्यान भी नहीं दिया कि तमाकी तो सभी भारतीयों की बात कर रहा है, हिंदुओं की भी, सिखों की भी, मुस्लिमों की भी… और वो चालाकी से ईसाइयों को छोड़ देता है। और अगर किसी भारतीय ईसाई को लगता है कि तमाकी जैसे लोग उन्हें छोड़ देंगे, तो उन्हें अमेरिका को देखना चाहिए, जहाँ ‘Blacks’ दिनभर अपने खिलाफ उत्पीड़न की बात करते हैं और उनमें अधिकांश तो चर्च जाने वाले ईसाई ‘Blacks’ ही होते हैं। बहरहाल, अभी हम वापस चलते हैं भारतीयों के खिलाफ फैलाई जा रही उस नफरत पर, जो ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड में हमें देखने को मिली; जबकि सुप्रिया श्रीनेत और उनके ट्रोल्स इसे नज़रअंदाज़ करके प्रधानमंत्री पर मीम्स बना रहे थे।

पिछले कुछ समय से आप देखिए, विदेशी धरती पर भारतीयों के खिलाफ माहौल तो बना हुआ ही है; कहीं उन पर हमले हो रहे हैं, कहीं उनकी हत्याएँ हो रही हैं। अमेरिका जैसे पश्चिमी देशों में तो ये आम बात हो गई है, लेकिन अब ऑस्ट्रेलिया में भी ऐसी खुली धमकी आना क्या इस बात की ओर इशारा नहीं करता है कि विदेशी धरती पर भारतीयों की ज़िंदगी खतरे में है? क्या हम एक नई साज़िश की तरफ बढ़ रहे हैं?

आज अगर ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका या न्यूज़ीलैंड में भारतीयों पर हमले हो रहे हैं, तो इसके पीछे यही ‘Hate Campaign’ है। जब न्यूज़ चैनलों और सोशल मीडिया पर एक एजेंडा चलाया जाता है कि ‘मोदी के राज में माइनॉरिटीज और खासकर ईसाइयों पर हमले हो रहे हैं’, तो उसका सीधा असर विदेश में रह रहे आम भारतीय पर पड़ता है। जो कट्टरपंथी ताकतें भारत में विफल हो गईं, वे अब विदेश में भारतीय प्रवासियों को निशाना बना रही हैं।

कांग्रेसी ट्रोल्स जिस मीम-बाज़ी का आनंद ले रहे हैं, उन्हें यह नहीं पता कि वे अनजाने में उन ताकतों का साथ दे रहे हैं जो भविष्य में किसी भी भारतीय की जान की दुश्मन बन सकती हैं। विदेशी धरती पर रह रहे भारतीयों की सुरक्षा को लेकर कोई भी सीरियस बात करने के बजाय, ये लोग बस मोदी-विरोध का नशा कर रहे हैं। जब भारत में बैठे कांग्रेसी और कुछ मीडिया चैनल्स मोदी की सीढ़ियों और झपकी पर मीम्स बनाकर उन्हें ट्रोल करते हैं, तो वे अनजाने में उस आग को हवा दे रहे होते हैं जो विदेश में बसे भारतीयों को जला रही है।

इस आग के केंद्र में है वही FCRA का बैन, जिसके कारण एंटी-इंडिया नेक्सस का एक-एक किरदार बौखलाया हुआ है। इस पूरी कहानी में एक और पैटर्न दिखाई देता है। एक ओर भारत को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर लगातार ‘अल्पसंख्यक उत्पीड़न’ और ‘धार्मिक स्वतंत्रता’ के मुद्दों पर कठघरे में खड़ा करने की कोशिश होती है, तो दूसरी ओर विदेशी फंडिंग पर भारत सरकार की सख्ती, खासकर FCRA के तहत की गई कार्रवाइयों का सबसे तीखा विरोध भी उसी नेटवर्क के अलग-अलग हिस्सों से सामने आता है।

इस समय सबसे ज़्यादा ज़रूरी है कि मोदी सरकार ने FCRA पर जो कठोर कदम लिए हैं, वे बरकरार रहें; क्योंकि जिस किस्म का माहौल बनाया जा रहा है, उससे साफ दिख रहा है कि पूरा प्रोपेगेंडा इसी फॉरेन फंडिंग को लेकर है। ये FCRA बैन एक Important स्टेप है, जिससे इंटरनल सिक्योरिटी ठीक हुई है। चाहे ये पूरा कैंपेन हो या एक ऑस्ट्रेलियाई पत्रकार द्वारा 2008 की न्यूज़ को Dig करना हो, ये पूरी इस लॉबी का हिस्सा हो सकती है ताकि भारत पर वापस दबाव बनाया जा सके।

हो सकता है कि हर घटना एक-दूसरे से जुड़ी न हो, लेकिन जब पुराने मामलों को फिर से उछाला जाता है, भारत की छवि पर लगातार सवाल खड़े किए जाते हैं और सुरक्षा प्रोटोकॉल तक का मज़ाक बनाया जाता है, तब इतना सवाल पूछना तो बनता है, क्या यह सब केवल संयोग है, या फिर किसी बड़े नैरेटिव की अलग-अलग कड़ियाँ?


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