अक्सर हम भारतीय इस पर गर्व करते हैं कि देखो IIT में पढ़ा हुआ लड़का, IIM में पढ़ा हुआ लड़का या तमिलनाडु या फिर पंजाब से निकला कोई युवक आज दुनिया की बड़ी बड़ी कम्पनियाँ लीड कर रहा है।
लेकिन ऐसे गर्व होने का, इनके कॉमन होने का एक डार्क साइड है! ये डार्क साइड है Brain Drain!
ब्रेन ड्रेन बेसिकली होता है जब आपके देश के ब्रिलियंट माइंडस दूसरे देशों में जाएँ और वहाँ बढ़िया करें लेकिन वो प्रतिभा आपके देश के काम ना आए।
भारत इस प्रॉब्लम से बड़े लेवल पर जूझ रहा है! और ये ब्रेन ड्रेन फिलहाल तब ज्यादा डिबेट में फिर से आया जब अमेरिका ने H1B visa के नियम और कड़े कर दिए, उसकी फीस बढ़ा दी।
एक डिबेट हुई कि अब हजारों लाखों इंडियन प्रोफेशनल्स को वापस भारत लौटना पड़ेगा।
एक साइड ने बोला कि इससे देश का नुकसान होगा, हमें आने वाले रेमिटेंसेस कम होंगे! दूसरी साइड को दिखा कि असल में ये आपदा में अवसर जैसी स्थिति है!
इस साइड ने कहा कि ये लोग भारत के सबसे दिमागदार हैं और इनके वापस आने से भारत में अब इनोवेशन होगा!
अब लोग आएँगे तब क्या होगा, ये तो फ्यूचर में पता चलेगा! लेकिन पहला सवाल वही है कि आखिर ब्रेन ड्रेन हुआ ही क्यों और ये कब से शुरू हुआ?
तो जैसे हर समस्या के साथ होता है, इस समस्या की जड़ें भी इतिहास में जुड़ी हुई हैं!
वैसे तो जब हम ब्रिटिश कॉलोनी हुआ करते थे, तब भी बड़ी संख्या में वैज्ञानिक और डॉक्टर इंग्लैंड जाया करते थे लेकिन आजादी के बाद इस माइग्रेशन की वजह बदली।
जैसा कि आप सबको पता है कि आजादी के बाद पंडित नेहरू हमारे प्रधानमंत्री बने और वो चाहते थे कि इंडिया एक समाजवादी टाइप का देश बने। ऑलमोस्ट कम्युनिस्ट मान लीजिए।
पंडित नेहरू के टाइम कई बड़ी सरकारी कम्पनियाँ बनी, इनमें से ज्यादातर हैवी इंडस्ट्री से जुड़ी हुईं थीं।
पंडित नेहरू के सत्ता संभालने के कुछ ही महीनों के बाद 1951 में Industries Development and regulation Act आया।
बेसिकली यहीं से जन्म हुआ लाइसेंस राज का। इस कानून के चलते अब भारत में हर इंडस्ट्री को सरकार रेगुलेट करने लगी।
मतलब कौन सी कम्पनी कितना माल बनाएगी, कितना माल बेचेगी, कितना प्राइस रखेगी, इन सबका कोटा सरकार तय करने लगी।
लेकिन मामला लाइसेंस तक लिमिटेड रहता तो भी गनीमत थी। 1956 में इसका प्रो मैक्स वर्जन भी नेहरू सरकार ले आई ।
1956 की इंडस्ट्रियल पॉलिसी में नेहरू सरकार ने हथियार बनाने से लेकर शिपबिल्डिंग और एटॉमिक एनर्जी से लेकर स्टील जैसी इंडस्ट्री को सरकारी खाते में डाल दिया।
1956 की इस पॉलिसी के चलते अब प्राइवेट सेक्टर इन इंडस्ट्री में कदम भी नहीं रख सकता था।
और यही वो सेक्टर्स हैं, जहाँ इनोवेशन की सबसे ज्यादा जरूरत होती है। तो भारत के कुछ टॉप ब्रेन्स इन सरकारी फैक्ट्रियों में नौकरी कर लिए और जो बचे वो बाहर गए।
क्योंकि सरकारी इंडस्ट्री में कितने ही लोग नौकरी करते और प्राइवेट सेक्टर में कोई विकल्प था नहीं।
लेकिन सबसे काला दौर आया इसके बाद। नेहरू के बाद एक ब्रीफ पीरियड को हटा दिया जाए तो सरकार पर कब्जा रहा उनकी बेटी इंदिरा गाँधी का।
ये सभी जानते हैं कि इंदिरा गाँधी की सरकार सोशलिस्ट आइडियाज पर बहुत ज्यादा बिलीव करती थी। इस दौर में तो लाइसेंस राज और भी तगड़ा हो गया।
आप समझिए कि टैलेंट को फलने फूलने के लिए चाहिए इनोवेटिव माहौल और इनोवेटिव माहौल के लिए चाहिए फ्री इकॉनमी, लेकिन लाइसेंस राज में तो लग गया था इस पर ब्रेक।
लाइसेंस राज में हर सेक्टर में कुछ ही कम्पनियों का पूरी मार्केट पर कब्जा था। जैसे, हिन्दुस्तान मोटर्स और फिएट के पास कारें बनाने का, बजाज और लम्ब्रेटा के पास स्कूटर बनाने का और टाटा के पास ट्रक्स।
इनका अपना एक कोटा फिक्स था और ये उतनी ही गाड़ियाँ और स्कूटर बनाते थे। कोई नई कम्पनी इनके फील्ड में इंटर नहीं कर सकती थी।
ऐसे में इन कम्पनियों को कम्पटीशन का कोई डर नहीं था। जिस कम्पनी को कम्पटीशन का डर नहीं, भला वो नए प्रोडक्ट्स या सर्विसेज की इनोवेशन पर क्यों खर्चा करती?
यानी इन कम्पनियों ने कभी वो इकोसिस्टम ही तैयार नहीं किया, जिसमें रिसर्च और डेवलपमेंट हो। बाहर से किसी प्रोडक्ट का लाइसेंस लो और यहाँ उसे बना कर सालों तक बेचते रहो।
नेहरू-गाँधी सरकार तो पहले ही लोगों को समाजवाद दिखा कर किनारे लगाए हुई थी, प्राइवेट सेक्टर भी निश्चित था।
रिसर्च और डेवलपमेंट अकेले सरकार के भरोसे हो नहीं सकते और प्राइवेट सेक्टर तो तब ये करने के मूड में था नहीं, ऐसे में यहाँ के टॉप टैलेंट्स क्या करते ?
उनके पास दो ही रास्ते थे, या तो किसी सरकारी विभाग में बाबू हो जाओ या फिर फ्लाइट पकड़ के विदेश निकल जाओ।
अब चाहे सैनडिस्क के को-फाउंडर संजय मेहरोत्रा हों या फिर सन माइक्रोसिस्टम्स के विनोद खोसला… ज्यादातर ब्राइट माइंडस सेक्युलर सोशलिस्ट रिपब्लिक भारत को छोड़ कर पश्चिम गए और बड़ा नाम बने।
केंद्र सरकार की डिपार्टमेंट ऑफ़ साइंस एंड टेक्नोलॉजी की एक रिपोर्ट बताती है कि 1951 से 1990 के बीच रिसर्च और डेवलपमेंट पर खर्च GDP का 0.5% भी नहीं था!
अमेरिका इस दौरान GDP का 2.8% तक का खर्च अपने यहाँ इनोवेशन पर कर रहा था, यहाँ तक कि चाइना भी इस कहानी में हमसे आगे था। तो भला कोई स्मार्ट ब्रेन यहाँ क्यों रुकेगा?
तो 1991 में आर्थिक उदारीकरण से पहले ब्रेन ड्रेन का मेन विलेन था लाइसेंस राज और भारत के प्राइवेट सेक्टर का इनोवेशन के प्रति उदासीन रवैया।
एक रिपोर्ट बताती है कि 1990 से पहले IIT से पढ़ने वाले लगभग 40% लोग देश छोड़ कर चले गए।
लेकिन 1991 में जब हमारी इकॉनमी खुली और प्राइवेट सेक्टर में कम्पटीशन का दौर आया तब भी हालात नहीं बदले।
लेकिन ऐसा क्यों नहीं हुआ? ऐसा इसलिए नहीं हुआ क्योंकि हमने रिफॉर्म्स किए नहीं, बल्कि मजबूरी में करने पड़े। और जब हमने मजबूरी में रिफॉर्म्स किए तो बिना तैयारी के किए।
रिफॉर्म्स के बाद भारत के लोगों को देखने को मिला कि बाहर की दुनिया हमसे कितना आगे निकल चुकी है और हम कितना पीछे हैं।
इसके बाद उनमें एस्पिरेशन जागना शुरू हुआ और हमारे यहाँ भी अमेरिकन ड्रीम उछाल मारने लगा। हमारी अच्छी किस्मत कहें या बदकिस्मती कि यही वो दौर था जब पूरी दुनिया में इन्टरनेट क्रान्ति आ रही थी।
IIT, IIM से पढ़े हुए भारतीय युवा पश्चिमी कम्पनियों के लिए सबसे सूटेबल एम्प्लॉयी थे। क्योंकि वो अंग्रेजी बोलते थे, टेक फील्ड में स्किल्ड होते थे और सबसे जरूरी बात कि कम पैसे पर इन कम्पनियों के लिए काम करने को राजी थे।
ऐसे में हमारे देश से माइग्रेशन चालू हुआ जो आज तक जारी है। लेकिन सवाल वही कि क्या इसे रोका जा सकता था? तो इसका जवाब है हाँ! इसे रोका जा सकता था!
आप पूछेंगे कैसे? देखिए! इनोवेशन को आवश्यकता होती है इंडस्ट्री की। हमने इकॉनमी को लिबरल तो बनाया लेकिन हमने कोई इंडस्ट्री नहीं खड़ी की।
हम 1990 के बाद एक सर्विस बेस्ड इकॉनमी में तब्दील होते गए और मैन्युफैक्चिरंग को तिलांजली दे दी। जो सर्विस इंडस्ट्री बनी भी, वो सिर्फ डिजिटल कुली का काम करती रही।
हमने इंफोसिस और विप्रो जैसी कम्पनियाँ खड़ी की, जिनका मेन फोकस कभी इनोवेशन पर नहीं रहा बल्कि वो हमेशा पश्चिमी कम्पनियों की सर्विस प्रोवाइडर बनी रहीं।
आज के समय में TCS जैसी कम्पनियों के पास 1 लाख करोड़ रूपए से ज्यादा के एसेट्स हैं लेकिन टेक के मामले में आगे हैं US की कम्पनियाँ! तो यहाँ आज भी इनोवेशन पर कोई SERIOUSNESS नहीं है।
अब हमारे यहाँ मैन्यूफेक्चरिंग इंडस्ट्री नहीं थी तो रिसर्च करने वाले इंसान विदेश भागे! और मजे की बात देखिए कि मैन्यूफेक्चरिंग ना होने के चलते हम चाइना जैसे देशों पर डिपेंड होते गए।
सर्विस इंडस्ट्री में भी ज्यादा सैलरी वाली नौकरियाँ पश्चिमी देशों में क्रिएट हुईं, जिसके चलते लोग यहाँ से माइग्रेट हुए। वेस्ट का अच्छा लाइफ स्टैण्डर्ड भी इसका एक बड़ा फैक्टर बना।
NERB की एक रिपोर्ट बताती है कि JEE एग्जाम के टॉप 1000 स्कोरर में से 36% ने भारत छोड़ना पसंद किया।
अब जिस देश में दिन भर राहुल गाँधी जैसे नेता जाति-जाति का शोर मचाते हों, लालू प्रसाद यादव जैसे घोटाले करने वाले नेताओं पर MBA स्टडी होती हों और बेंगलुरु के गड्ढों की कंप्लेंट करने को सीएम सिद्दारमैया जैसे नेता नखरे बता दें तो भला कोई माइग्रेट क्यों नहीं करेगा।
तो मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा ना देना और सर्विस को केवल स्वेट-शॉप वाला काम बनाना बड़ा कारण बना कि हम अपने टैलेंट को नहीं रोक पाए।
लेकिन जब हमने इसके लिए काम करना शुरू किया भी तो भी इसका विरोध होता है।
राहुल गाँधी के साथ घूमने टहलने वाले अर्थशास्त्री रघुराम राजन का हाल ही में कहना था कि भारत में मैन्युफैक्चिरंग का कोई स्कोप नहीं है।
उनका कहना है कि भारत को बस पश्चिम के देशों के लिए काम करने वाला सॉफ्टवेयर मुल्क बने रहना चाहिए।
रिसर्च एंड डेवलपमेंट के मोर्चे पर पिछले कुछ सालों में स्थितियाँ तेजी से बदली हैं। संसद में दिए गए एक सरकारी डाटा के अनुसार, 2010-11 में जहाँ लगभग 60 हजार करोड़ का खर्च ही रिसर्च एंड डेवलपमेंट पर होता था, वहीं 2020-21 में ये बढ़ कर 1 लाख 20 हजार करोड़ हो चुका है।
हालाँकि ग्लोबल एवरेज से ये अभी भी कम ही है। समस्या है प्राइवेट सेक्टर इसमें केवल 36% का खर्च ही करता है जबकि पश्चिमी देशों में इनोवेशन पर खर्च का 70% प्राइवेट सेक्टर के हिस्से है।
भारत का टैलेंट पूल बाहर ना जाए और यहीं रिसर्च में हिस्सा ले, इसके लिए मोदी सरकार ने जून 2025 में 1 लाख करोड़ का एक फंड भी तैयार किया है।
पिछले कुछ सालों में माइग्रेशन भी कम हुआ है, स्टार्टअप कल्चर का भारत में बढ़ना इसका एक बड़ा कारण है! इसके अलावा इनोवेशन के मोर्चे पर भी कुछ सुधार हुआ है।
भारत अब ट्रेडमार्क्स फाइलिंग के मामले में दुनिया में केवल अमेरिका और चीन के पीछे है, जो कभी एक दो साल पहले यह पाँचवे नम्बर पर था।
पेटेंट्स फाइलिंग के मामले में भी भारत ने बड़ी छलाँग लगाई है। सरकारी डाटा बताता है कि साल 2016-17 में जहाँ लगभग 45,000 पेटेंट फ़ाइल होते थे तो वहीं ये नम्बर अब बढ़ कर 80 हजार के ऊपर पहुँच गया है।
2017 में लगभग 10 हजार ही पेटेंट्स दिए जाते थे जो कि अब लगभग 35,000 तक पहुँच गए हैं। दुनिया में इमिग्रेशन के खिलाफ बढ़ता माहौल और भारत में बदलती संभावनाएँ शायद आने वाले समय में ये इंश्योर करेंगी कि हम दुनिया के नॉलेज कैपिटल बनें और ब्रेन ड्रेन रुके ।



