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काफ्का की कहानी से लेकर जेएनयू तक: ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ और अर्बन नक्सलियों का सिंडिकेट, आखिर क्यों पनपते हैं ये आंदोलनजीवी?

Summary
जानिए कैसे देश के विकास और सफाई अभियान से घबराकर कुछ खास विचारधारा के लोगों ने एक नया सिंडिकेट बना लिया है। इतिहास की आड़ और काफ्का की कहानी के जरिए समझिए इस आंदोलनजीवी तंत्र की पूरी सच्चाई।

‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के आने से कई वर्ष पूर्व, महाभारत के वनपर्व में यक्ष ने युधिष्ठिर से कई गूढ़ प्रश्न पूछे थे। इतिहास की किताबों में दर्ज है कि युधिष्ठिर ने सबके सही उत्तर दिए। लेकिन जो वामपंथी इतिहासकारों ने दबा दिया, वो था यक्ष का 101वां प्रश्न।

यक्ष ने पूछा था, ‘हे कुंतीपुत्र! वो कौन सा जीव है जो न्यूक्लियर हमले में भी नहीं मरता, जिसे रीढ़ की हड्डी नहीं होती, जो खाता गंगा ढाबा की चाऊमीन है और गाता चीन की है, जिसे उजाले से एलर्जी है और सड़ांध से अगाध प्रेम है?’

धर्मराज मुस्कुराए और बोले, ‘हे यक्ष! उसे कलियुग में ‘बुद्धिजीवी’ और जीवविज्ञान में ‘कॉकरोच’ यानी तिलचट्टा कहते हैं।’

कबीरा खड़ा बाज़ार में, माँगे सबकी खैर, भाँति-भाँति के कॉकरोच, गटर-गटर से बैर!

‘दास कैपिटल’ लिखते समय कार्ल मार्क्स ने भी ‘सर्वहारा’ की आड़ में इसी ‘कॉकरोच मेनिफेस्टो’ का बीजारोपण किया था, कि जब तक गटर में गंदगी रहेगी, हमारी क्रांति की दुकान चलती रहेगी।

आपने फ्रांज काफ्का की मशहूर कहानी ‘मेटामोर्फोसिस’ (कायांतरण) ज़रूर पढ़ी होगी। कहानी का नायक है ग्रेगर सम्सा। उसे जीवन में हर चीज़ से शिकायत थी। वो सिस्टम को कोसा करता था, समाज को कोसता था। धीरे-धीरे उसकी ये शिकायतें एक असाध्य कुंठा में बदल गईं। एक सुबह जब सम्सा की आँख खुली, तो उसने पाया कि वह एक विशालकाय कॉकरोच में बदल चुका है।

परिवार ने उससे दूरी बना ली, किरायेदारों ने घृणा की, और एक दिन वह उसी अंधेरे कमरे की गंदगी में दम तोड़ गया। सबने राहत की सांस ली। काफ्का दरअसल एक कड़वा सच बता रहे थे कि जब तक आप समाज के लिए उपयोगी हैं, आपका सम्मान है। जैसे ही आप निठल्ले, परजीवी और समाज की जूठन पर पलने वाले बन जाते हैं, आप ‘ग्रेगर सम्सा’ हो जाते हैं।

आज हमारे देश में भी कॉकरोचों का एक पूरा इकोसिस्टम तैयार हो चुका है। इन्हें आप ‘आंदोलनजीवी’, ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ या ‘दरबारी पत्रकार’ कह सकते हैं। हाल ही में जब चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने इन परजीवियों के लिए तिलचट्टा शब्द का संकेत दिया, तो पूरे गटर में बिलबिलाहट मच गई। अब तिलचट्टों की सबसे बड़ी कला यही है कि वे सड़ांध पर सवाल उठाने वाले को ही असभ्य घोषित कर देते हैं।

रोशनी और सफ़ाई के दुश्मन इन तिलचट्टों ने घबराकर अब अपना एक नया सिंडिकेट बना लिया है, जिसे हम कहते हैं, ‘कॉकरोच जनता पार्टी’। कमाल देखिए, कॉकरोचों के इस गिरोह का राष्ट्रीय अध्यक्ष एक गिरगिट निकला। वही अर्बन नक्सली गिरगिट, जो पूरे दस साल तक दिल्ली की छाती पर बैठकर रंग बदलता रहा। वैसे तो प्रकृति के नियम के अनुसार गिरगिट कॉकरोच को खा जाता है, लेकिन यहाँ गिरगिट ने कॉकरोचों को अपना कोर वोटर और खास गुर्गा बना लिया। जब दिल्ली की जनता ने इस गिरगिट को सत्ता के शीशमहल से बेदखल किया, तो इसने अपने मुख्य तिलचट्टे को आदेश दिया कि जाओ, देश भर के गटरों से कॉकरोचों को इकट्ठा करो और एक मोर्चा बनाओ।

इस पार्टी में शामिल कॉकरोचों की प्रजातियाँ अलग हैं, पर डीएनए एक ही है—देशद्रोह और अराजकता। इस गटर के बदबू मारते कुछ मुख्य चेहरों पर एक नज़र डालते हैं।

जिहादी और खालिस्तानी कॉकरोच

ताहिर हुसैन और अमानतुल्ला ख़ान: ये वो प्रजाति है जो नालियों के भीतर पेट्रोल बम और पत्थर जमा करती है ताकि 2020 में दिल्ली को दंगों की आग में झोंका जा सके।

शरजील इमाम: इस कॉकरोच की बौद्धिक भूख देखिए। यह कहता था कि ‘चिकन नेक’ को भारत से काट दो और रेलवे ट्रैक्स पर इतना मवाद डाल दो कि सेना न निकल पाए। जिसे मवाद और सड़ांध से इतना इश्क हो, उसे आप कॉकरोच नहीं तो क्या सफेद कबूतर कहेंगे?

उमर खालिद और शाहीन बाग गैंग: CAA के नाम पर सफ़ेद टोपी और छोटा पाजामा पहनकर सड़कों को बंधक बनाने वाली ये वो प्रजातियाँ थीं, जिन्हें दाना-पानी उसी गिरगिटराज के वीआईपी फंड से मिल रहा था।

इस चक्कर में मैंने एक आंदोलनकारी कॉकरोच से पूछा कि कॉमरेड, तुम दिन-रात देश को तोड़ने की बात करते हो, देश के टुकड़े होने की दुआ मांगते हो, पर शाम को सरकारी सब्सिडी वाली जेएनयू की कैंटीन में चाय पीने क्यों चले आते हो? वह मुस्कुराकर बोला, ‘भंते, यही तो हमारी मार्क्सवादी साधना है। भारत के विनाश का संकल्प भारत सरकार के ही टैक्स के पैसों पर पलकर पूरा किया जाए, इससे बड़ा समाजवाद और क्या होगा?’ इस बिरादरी की सबसे बड़ी त्रासदी यही है कि ये सरकार को गाली भी पूरी मुस्तैदी से देते हैं और यह उम्मीद भी रखते हैं कि जेल में उन्हें वीआईपी ट्रीटमेंट और मिनरल वाटर मिले।

आरफ़ा ख़ानम: इस बौद्धिक कॉकरोच की स्ट्रेटेजी तो गोएबल्स को भी मात देती है। यह खुले मंच से कहती है कि अभी हमारी संख्या कम है, इसलिए गटर और नालियों में दुबके रहो। जिस दिन मोटे-ताज़े हो जाओ, बाहर निकलना और इंसानों पर टूट पड़ना। वैसे, परमाणु हमले से भी कॉकरोच इसीलिए बच जाते हैं, क्योंकि वे ऐन वक्त पर गटर की गहराई नाप लेते हैं और स्ट्रेटेजी बदल देते हैं।

खालिस्तानी पैरासाइट्स: 26 जनवरी 2021 को लालकिले पर उत्पात मचाने वाले ये वो कीड़े हैं जो लाशों पर पलते हैं। किसी निर्दोष की हत्या करके उसकी लाश को खंभे पर टांग देना किसी जानवर का काम नहीं, गंदे गटर के परजीवियों का ही चरित्र है।

तामसी और विषैले कॉकरोच

महुआ मोइत्रा: तृणमूल गटर की ये वो शानदार कॉकरोच हैं जो संसद में खड़े होकर बड़े गर्व से खुद को तिलचट्टा स्वीकार करती हैं। ज़ाहिर है, सिंडिकेट की कट-मनी और तामसी भोज्य पदार्थों से जिसे ऊर्जा मिलती हो, उसकी कर्कश आवाज़ से अमृतवाणी तो निकलेगी नहीं।

उदयनिधि स्टालिन: तमिलनाडु का यह विशेष कॉकरोच विधानसभा के पटल से चिल्लाता है कि सनातन धर्म को मलेरिया और डेंगू की तरह मिटा देना चाहिए। भाई, धर्म, संस्कृति और मर्यादा से दिक्कत सिर्फ उसी को हो सकती है जो खुद किसी महामारी के कीटाणु से पैदा हुआ हो।

तिलचट्टों की इस क्रोनोलॉजी को देखने के बाद ही बुद्ध ने भी आनंद से कहा था, और आनंद जी की लाल डायरी से मैं वो आपको सुना रहा हूँ कि हमारे देश में ईमानदारी और सिद्धांतों का अकाल नहीं है, बस उनका इस्तेमाल मौसम के हिसाब से होता है। इन तिलचट्टों के पास भी सिद्धांत की एक पूरी अलमारी होती है। जब तक गटर खुला है, ये परम दार्शनिक हैं। जैसे ही सफ़ाई का नगर निगम का अमला आता है, ये तुरंत मानवाधिकार का चश्मा पहन लेते हैं। असल में, इस देश में बुद्धिजीवी वह नहीं है जो सत्य को जानता है, बल्कि वह है जो यह जानता है कि देशद्रोह को किस भाषा में पैक करके अभिव्यक्ति की आज़ादी के बाज़ार में बेचा जा सकता है। इनकी नैतिकता का पहिया सिर्फ तभी घूमता है, जब उसमें विदेशी फंडिंग का तेल पड़ता है।

असली गटर – रानी मधुमक्खी की कांग्रेस : द कांग्रेस कनेक्शन

अब सवाल उठता है कि इन सारे छोटे-बड़े कॉकरोचों की फ़िरदौस कहाँ है? इनका ओरिजिन ऑफ स्पीशीज़ क्या है? सच तो यह है कि कांग्रेस पार्टी ही वो मेन गटर है, जिससे इन तमाम कॉकरोचों का जन्म हुआ है। वामपंथी, जिहादी, फ़सादी, नक्सली, खालिस्तानी, कॉकरोचों की जितनी भी ज़हरीली और हाइब्रिड प्रजातियाँ आज बाज़ार में घूम रही हैं, वे सब इसी कांग्रेसी गटर के पानी से सींची गई हैं।

विशेषकर वामपंथी कॉकरोच, जिनमें दीमक, खटमल, गिरगिट और तिलचट्टे के सारे गुण एक साथ पाए जाते हैं। इन्होंने दशकों तक देश की यूनिवर्सिटीज़, इतिहास की किताबों और व्यवस्था को दीमक की तरह चाटा। जनता को गरीबी, भुखमरी और अशिक्षा के गटर में जिंदा रहने पर मजबूर किया, ताकि इनकी लाल क्रांति का झंडा लहराता रहे।

सफ़ाई इस देश का सबसे बड़ा अधर्म मान लिया गया है। जैसे ही आप झाड़ू उठाते हैं, समाज के चार बड़े बुद्धिजीवी चिल्लाने लगते हैं कि ठहरो, इस गंदगी के भीतर हमारी प्राचीन कुंठाओं का इतिहास छिपा है, तुम इसे कैसे साफ़ कर सकते हो? इन कॉकरोचों को विकास की रोशनी से वैसा ही डर लगता है, जैसा एक भ्रष्ट अफ़सर को अचानक होने वाले ऑडिट से लगता है। इन्हें अंधेरा चाहिए ताकि ये शांति से देश के संसाधनों को कुतर सकें। जब देश तरक्की की पटरी पर दौड़ने लगता है, तो इनका कलेजा फटने लगता है कि अगर सब कुछ साफ़ हो गया, तो हम अपनी वकालत की दुकानें कहाँ खोलेंगे?

इन कॉकरोचों की सबसे बड़ी समस्या यह है कि इन्हें अंधकार पसंद है। इसलिए इन्हें देश के विकास की चमक चुभती है। इन्हें सड़कों की सफ़ाई से दिक्कत है, डिजिटल पेमेंट की सफ़ाई से दिक्कत है, आतंकवाद के सफ़ाये से दिक्कत है और भ्रष्टाचार की सफ़ाई से तो जान ही निकल जाती है। सफ़ाई होगी तो गटर बंद होंगे, और गटर बंद होंगे तो ये जिएंगे कहाँ?

इनका असली मक़सद क्रांति लाना नहीं है, बल्कि देश की नई पीढ़ी के भीतर से हर आदर्श, हर संस्था और हर उपलब्धि के प्रति विश्वास को मार देना है। जब विश्वास मरेगा, तब अव्यवस्था फैलेगी। और अव्यवस्था ही वो गंदगी है जहाँ नए कॉकरोच अंडे देते हैं।

लेकिन इतिहास गवाह है कि कॉकरोचों ने कभी कोई सभ्यता नहीं बनाई। उन्होंने कभी कोई राष्ट्र खड़ा नहीं किया। वे हमेशा दूसरों के बनाए हुए आलीशान मकानों की दरारों और गटरों में छिपे रहे हैं। सभ्यता हमेशा उन लोगों ने बनाई जो उजाले में खड़े हुए, जिन्होंने पसीना बहाया, जिन्होंने निर्माण किया। कॉकरोच जनता पार्टी ने पूरा ज़ोर लगा लिया कि झुंड में हमला करके देश की सत्ता पर कब्ज़ा कर लें। लेकिन वे भूल गए कि देश का एक-एक सनातनी और राष्ट्रवादी नागरिक आज अपने हाथ में राष्ट्रवाद का ‘लाल हिट’ लेकर खड़ा है।

अब ये तय समाज को करना है कि उसे शहद बनाने वाली मधुमक्खियों का समाज चाहिए या सड़ांध फैलाने वाले कॉकरोचों का? क्योंकि कॉकरोच कभी बदलाव नहीं लाते, वे सिर्फ गंदगी को स्थायी बनाते हैं। और इन तिलचट्टों की आखिरी नियति वही गटर है, जहाँ से ये रेंगते हुए बाहर आए थे।

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