सीरिया के ड्रूज समुदाय का नरसंहार

Who are the Druze: सीरिया के ड्रूज समुदाय के नरसंहार का सच

Summary
सीरिया में Druze समुदाय पर जिहादी हमला होता है। इसमें 350 को मौत के घाट उतारा जाता है, घर जलाए जाते हैं। यहाँ पूर्व ISIS कमांडर की सरकार है।

दुनिया में कुछ समुदाय इतने अकेले होते हैं कि उनका अस्तित्व ही एक शिकायत बन जाता है। ड्रूज (Druze)  समुदाय उन्हीं में से हैं। न ये मुसलमान हैं, न गैर। हर कोई इन्हें अपना कहने में झिझकता है, और दुश्मन कहने में देर नहीं करता। और यही बात, आज फिर हमें देखने को मिल रही है, सीरिया में। ये पूरा मामला क्या है, आज के इस वीडियो में हम आपको बताएँगे ।

13 जुलाई 2025 को सीरिया के दक्षिणी शहर स्वैदा में Druze और सुन्नी बेदौइन कबीलों के बीच एक झड़प होती है । चार दिन तक हिंसा चलती है, और इसमें 350 से ज़्यादा Druze समुदाय के लोग मारे जाते हैं। इसमें महिलाएं, बच्चे, बुज़ुर्ग, किसी को नहीं बख्शा गया।

ये सब देखने पर सीरियाई सेना आती है ,लेकिन बचाने नहीं, बल्कि सज़ा देने के लिए। गलियों में गोलियों की आवाजें आती हैं, घर जलाए जाते हैं, और Radwan गेस्टहाउस में दर्जनों Druze को लाइन में खड़ा करके गोली मार दी जाती है। कुछ रिपोर्ट्स  कहते  हैं, 12 नहीं बल्कि 19 लोग मारे गए। फिर वीडियो सामने आते हैं, जहाँ कैद किए गए Druze की दाढ़ियाँ ज़बरदस्ती काटी जा रही हैं। हिंसा के बाद लाशें सड़कों पर बिखरी थीं। चारों ओर बंदूकें गरज रही थीं।

इसी बीच इज़राइल की एंट्री होती है। और इज़रायली प्रधानमंत्री नेतन्याहू कहते हैं कि “सीरियाई सरकार Druze को खत्म करना चाहती है, और हम चुप नहीं रहेंगे।” उन्होंने अल्टीमेटम दिया कि चौबीस घंटे में द्रुज पर हमले बंद किए जाएँ वरना जिस तरह से तुम्हारी सरकार बनी है, उसी तरह से वो ख़त्म भी कर दी जाएगी।

फिर इज़राइली फौज सीरिया पर मिसाइलें बरसाती है। दमिश्क के डिफेंस मिनिस्ट्री और आर्मी हेडक्वार्टर को टारगेट किया जाता है। इज़राइल का तर्क है कि वो  Druze समुदाय की रक्षा कर रहा है।

अब सवाल यही है, कि ये Druze आख़िर हैं कौन?

Druze समुदाय 11वीं सदी में अस्तित्व में आया था। ये शिया इस्माइली मत से निकले, लेकिन बाद में एक अलग रास्ता चुन लिया। इन्हें मुस्लिम समुदाय वाले ही मगर मुस्लिम नहीं मानते हालांकि इनकी भाषा अरबी है और नस्ल अरब। ये एकेश्वरवादी हैं, लेकिन कुरान, हदीस या इस्लामी रिवाजों को नहीं मानते। नमाज़, रोज़ा, हज, कुछ नहीं। यहाँ तक कि ये पुनर्जन्म में यकीन करते हैं। द्रुज इतने ज़्यादा रूढ़िवादी हैं कि ये न धर्म परिवर्तन करते हैं, न करवाते हैं।
न किसी से शादी करते हैं, न किसी और धर्म को अपने में मिलाते हैं।

और शायद यही इनकी सबसे बड़ी राजनीतिक भूल थी।

Druze आज मुख्य रूप से सीरिया,लेबनान,इज़राइल और जॉर्डन में रहते हैं। सीरिया में सबसे ज़्यादा,करीब 5 लाख Druze हैं, जो दक्षिणी पहाड़ी इलाके स्वैदा या जबल अल-द्रूज़ में रहते हैं।

इज़राइल में भी इनकी आबादी क़रीब 1.5 लाख है। ये ISRAEL की  सेना मेंभर्ती होते हैं, टैक्स भरते हैं, और देश के लिए लड़ते भी हैं। लेकिन दिल से आज भी गोलान हाइट्स के बहुत से Druze खुद को सीरियाई ही मानते हैं।

अब एक अहम मोड़ आता है, जब सीरिया की सत्ता बशर अल-असद से हटकर ट्रांजिशनल गवर्नमेंट के हाथ में जाती है। और उस सरकार का चेहरा कौन है?

अहमद अल-शराआ, जो पहले ISIS कमांडर था, और तब उसका नाम थाअबू मोहम्मद अल-जौलानी।  ये वही आदमी है जिस पर अमेरिका ने कभी 10 मिलियन डॉलर का इनाम रखा था।

अब वही इंसान, सूट बूट पहनकर अमेरिका की सहमति से सीरिया का अंतरिम राष्ट्रपति बन चुका है। और Druze फिर एक बार सोच में पड़ गए हैं। उनका भय ये है कि वो असद की तानाशाही से ही डरते थे, और अब इस खलीफा जैसे पुराने जिहादी से कैसे बचेंगे?

28 अप्रैल को जब Druze लड़ाकों  ने सुन्नी  बेदौइन लड़ाकों के हमलों का विरोध किया, तो सीरियाई सेना खुद बेदौइनों के साथ खड़ी हो गई, और शुरू हुआ एक तरह का Ethnic Cleansing।

सिर्फ Druze ही नहीं, कुछ ही हफ्तों में ईसाई और अलावी समुदाय भी इसी सरकार के जिहादी विचारों का शिकार बने। दावा किया गया था कि नई सरकार इन्क्लूसिव होगी, लेकिन मार्च में बनी कैबिनेट में सिर्फ़ एक Druze मंत्री को शामिल किया गया।

अब अगर इस पूरी तस्वीर को थोड़ा और बड़ा करें। तो ये सिर्फ सीरिया की कहानी नहीं लगती। कुछ समय पहले बांग्लादेश में भी कुछ ऐसा ही देखा गया था।

अमेरिका जैसे ही वहां की सत्ताधारी पार्टी के खिलाफ खड़ा हुआ, जमात-ए-इस्लामी जैसे कट्टर संगठनों को ऑक्सीजन मिल गया। और नतीजा ये हुआ कि सबसे पहले हिन्दू और बौद्ध अल्पसंख्यकों पर हमले शुरू हुए। जबरन धर्मांतरण, मंदिरों पर हमले और गांवों से भगाया जाना, ये सब अचानक एक पैटर्न बन गया।

और अब सीरिया में देखिए, अमेरिका एक ISIS-प्रेरित पूर्व आतंकी को ट्रांजिशनल राष्ट्रपति बना देता है, और कुछ ही हफ्तों में Druze और ईसाइयों का सफाया शुरू हो जाता है।

तो सवाल उठता है, कि क्या ये सिर्फ इत्तेफ़ाक है? जब भी अमेरिका कहीं लोकतंत्र बचाने की कोशिश करने का नाटक करता है तो लोकतंत्र बचता है या नहीं, ये तो पता नहीं लेकिन वहाँ पर माइनॉरिटी जरूर मरने लगते हैं। यही हमने इराक़ में देखना, लीबिया में देखी,  और अब बांग्लादेश में भी देख रहे हैं।

और यहाँ एक और बड़ा सवाल खड़ा होता है, भारत, जो खुद दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, जिसके यहाँ भी एक ऐतिहासिक समस्या रही है, क्या वो इस स्थिति से कुछ सीखेगा?  हमने देखा है कि मध्य पूर्व में यहूदी समुदाय के साथ क्या हुआ, उन्हें जबरन इस्लाम अपनाने या मौत चुनने के बीच खड़ा कर दिया गया। आज वही सिलसिला द्रुज़ समुदाय के साथ भी दोहराया जा रहा है। हमारे पड़ोसी देश बांग्लादेश में भी जिहादी मानसिकता के चरम पर आते ही हिंदुओं को चुन चुनकर निशाना बनाया जा रहा है। और यही मानसिकता भारत में भी समय-समय पर दिखती है, चाहे वह कश्मीर में “रलीव,गलिव, चलीव” जैसे नारे हों या फिर जनसंख्या के असंतुलन के ज़रिए हिंदुओं को पलायन के लिए मजबूर करने की सुनियोजित प्रक्रिया।

यह एक चेतावनी है उन हिंदुओं के लिए, जो यह मानकर आश्वस्त हैं कि वे 80% हैं, संख्या कोई सुरक्षा नहीं देती जब सामने वाली विचारधारा घातक हो और सत्ताधारी मानस उसे पनाह दे। जिस दिन यह जिहादी मानसिकता पूरी ताक़त के साथ हमारे बीच खड़ी होगी, उस दिन हमारे साथ भी वही होगा जो यज़ीदी और द्रुज़ के साथ हुआ। वो हमें हिंदी-इंग्लिश, लैंग्वेज, कास्ट जैसी डिबेट, में उलझा के रखते हैं, ताकि हम इस खतरे को देख ना सकें।

यही Druze की असली त्रासदी भी है। वो कहीं भी पूरी तरह “अपने” नहीं हैं। हर देश में बस एक “useful minority”, जब तक चुप हैं, ठीक हैं। अगर वो बोलें, तो मिटा दिए जाते हैं। मिडिल ईस्ट की कहानी सिर्फ़ यहूदी, मुस्लिम और ईसाई धर्मों की नहीं है। वो उन अनसुने समुदायों की चीख भी है, जो हर बार इतिहास के हाशिए पर फेंक दिए जाते हैं और जिहादी मानसिकता द्वारा कुचल दिए जाते हैं। 

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