राष्ट्रीय पुरस्कारों का ऐलान हुआ। द केरल स्टोरी (The Kerala Story) को सर्वश्रेष्ठ निर्देशक और सर्वश्रेष्ठ सिनेमैटोग्राफ़ी का नेशनल अवॉर्ड मिला। लेकिन जैसे ही यह ख़बर आई, केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन का चेहरा उतर गया। और हमेशा की तरह, उन्होंने वही पुराना घिसा-पिटा स्क्रिप्ट दोहराया,केरल की छवि को धूमिल किया गया है… यह संघ का एजेंडा है… सांप्रदायिक नफ़रत फैलाई गई है…”
शब्द वही थे, जज़्बात वही थे, एक कठोर सच्चाई से भागते हुए नेता की बौखलाहट।
लेकिन सवाल ये है, मुख्यमंत्री जी आप किस ‘छवि’ की बात कर रहे हैं? उस छवि की, जो टूरिज़्म विज्ञापनों में दिखती है? नारियल के पेड़, बैकवॉटर, और कथकली का रंगीन चेहरा? या उस छवि की जो धीरे-धीरे इस्लामिक कट्टरता की आग में झुलस रही है?
केरल को बदनाम कौन कर रहा है? एक फिल्म जो सच्चाई दिखाती है, या वो शासन जो आंखें मूंद लेता है?
‘द केरल स्टोरी’ ने जो दिखाया, वह कल्पना नहीं थी। वह उन लड़कियों की कहानी थी जो इस्लामी धर्मांतरण और लव जिहाद के जाल में फंसीं। वह उन परिवारों की कहानी थी, जिनकी बेटियों ने ISIS जैसे आतंकी संगठन में शामिल होकर देश को छोड़ा। वह एक पैटर्न था, एक रैकेट, जो सालों से सक्रिय है, और जिसे आपकी सरकार ने या तो अनदेखा किया, या अनजाने में समर्थन दिया।
और ये हम नहीं कह रहे, आपके ही पूर्व मुख्यमंत्री VS Achuthanandan ने कहा था कि “केरल को इस्लामिक राज्य बनाने की कोशिशें चल रही हैं”। क्या वो भी संघ एजेंडे पर काम कर रहे थे?
मुख्यमंत्री जी, आपके केरल में एक आरएसएस कार्यकर्ता के दोनों पैर इसलिए काट दिए जाते हैं क्योंकि उसने “भारत माता की जय” कहा। 2016-17 के सरकारी आंकड़े बताते हैं कि हर साल 130 से ज़्यादा इस्लामी धर्मांतरण के केस दर्ज हो रहे हैं। साल 2020 में गृह मंत्रालय ने राज्यसभा में स्वीकार किया कि ISIS जैसे आतंकी संगठन केरल में सक्रिय हैं। तो अब आप ही बताइए, बदनाम कौन कर रहा है? वो, जो सच्चाई दिखा रहा है, या वो जो सच्चाई से भाग रहा है?
और जब इस सच्चाई को नेशनल अवॉर्ड मिलता है, जब देश उसकी कला, उसकी चेतावनी, और उसकी हिम्मत को सम्मान देता है, तो आप बिलबिला जाते हैं। फिर वही पुरानी रट, वही संघ-संघ की टर टर।
पिनराई विजयन, आप सच्चाई से भाग सकते हैं, लेकिन उसे बदल नहीं सकते। आपके मुख्यमंत्री बनने से पहले केरल में जो इस्लामिक कट्टरता की जड़ें जम चुकी थीं और आपके कार्यकाल में वो बेल फल-फूल रही है तो अगली बार जब कोई केरल की कट्टरता की बात करे,
तो उससे सपाट चेहरा बनाकर मत कहिए कि “केरल को बदनाम मत करो।” बल्कि एक बार दर्पण देखिए और पूछिए कि क्या आपमें और आपके कथित “केरला मॉडल” वाले राज्य में सच सुनने की ताक़त क्या बची है?




