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‘हिंदू अल्पसंख्यक हैं’, मौलाना सज्जाद नोमानी के बयान से खुली 2027 की टूलकिट

Summary
मौलाना ने भावुक होकर कहा, “खुदा के बंदों, अपने पड़ोसी हिंदू के घर जाओ, राबता कायम करो, वहां खाना खाओ, अपनी खवातीन को उनकी महिलाओं से दोस्ती करने भेजो। मस्जिदों से बाहर निकलो और दावत दो।”

उत्तर प्रदेश का चुनाव पास आते ही कुछ लोगों के सियासी कैलकुलेटर की स्पीड अचानक 5जी से भी तेज हो जाती है। मकसद साफ है, वोट बैंक का ध्रुवीकरण। और इस घटनाक्रम को समझने के लिए आपको ज्यादा दूर जाने की जरूरत नहीं है।

पहले समाजवादी पार्टी के सांसद जावेद अली खान ने एक फॉर्मूला दिया, “हर मुस्लिम 4-4 हिंदू दोस्त बनाए, तो भाजपा खत्म।”

इसके ठीक बाद ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के प्रवक्ता मौलाना सज्जाद नोमानी भी इसी सुर में सुर मिलाते दिखे। यह कोई संयोग नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश चुनाव में समाजवादी पार्टी को सियासी ऑक्सीजन देने की एक सोची-समझी रणनीति है।

असल में, एक खास बिरादरी की समस्या यह है कि वह पूरी दुनिया को ‘काफिर बनाम गैर-काफिर’ के चश्मे से ही देखती है। उनकी नजरों में भाजपा का मतलब सिर्फ ‘हिंदू’ है। जबकि इसके उलट, हिंदुओं के पास दुनिया को देखने के कई नजरिए हैं, जो पूरी तरह धर्मनिरपेक्ष, तार्किक और लोकतांत्रिक हैं।

कुछ लोगों का भारत को लेकर एक पुराना और बड़ा ‘रोमांटिक’ सपना है, देश की मूल पहचान बदलकर इसे किसी और रंग में रंगना। अभी तक यह खेल परदे के पीछे से चल रहा था, लेकिन ‘मिल्लत टाइम्स’ जैसे मंचों से इसे सीधा प्रसारित किया जा रहा है।

फरवरी 2026 के इस सम्मेलन के वीडियो को अब जाकर सार्वजनिक किया गया है। घटनाक्रम समझिए हुजूर! यूपी चुनाव का बिगुल बजने वाला है, तो पटकथा को दोबारा जारी तो करना ही था।

व्हीलचेयर पर बैठे मौलाना सज्जाद नोमानी ने मंच से जो सिद्धांत दिया, उसे सुनकर तो अल्बर्ट आइंस्टीन भी अपना सापेक्षता का सिद्धांत भूल जाएं। मौलाना ने देश के बहुसंख्यक समाज को ही ‘अल्पसंख्यक’ घोषित कर दिया!

मौलाना के गणित के मुताबिक, दलित, आदिवासी, लिंगायत, जाट, गुर्जर, सिख, बौद्ध, जैन, तमिल, केरल वाले और यहां तक कि नास्तिक भी हिंदू नहीं हैं।

अब भाई, अगर ये सब हिंदू नहीं हैं, तो हिंदू बचा कौन? मौलाना साहब कहते हैं कि सिर्फ मुट्ठी भर ऊंची जातियां ही हिंदू हैं, जिनका देश के संसाधनों पर कब्जा है। जरा याद कीजिए… क्या ऐसी ही मिलती-जुलती बात आपने देश के किसी बड़े ‘युवा’ नेता के मंचों से नहीं सुनी, जो सुबह से शाम तक ‘संसाधनों पर कब्जे’ का एक्स-रे करने की बात करते हैं?

ऐसा लगता है कि जातियों में बांटने वाली इस सियासी टूलकिट के पन्ने दिल्ली से लेकर लखनऊ और मौलाना के मदरसे तक, सब जगह एक जैसे ही छपे हैं।

मौलाना ने मंच पर बाकायदा एक ‘मनोविज्ञान विशेषज्ञ’ की तरह मुसलमानों को उकसाया। उन्होंने ‘चार ठग और मौलवी की बकरी’ वाली कहानी सुनाई, जहां लोग बार-बार बकरी को कुत्ता कहकर मौलवी को भ्रमित कर देते हैं और मौलवी बकरी छोड़ देता है।

मौलाना का दर्द यह था कि मुसलमानों को ‘अल्पसंख्यक’ कह-कहकर डरा दिया गया है, इसलिए अब वे डरना छोड़ें और मान लें कि हिंदू खुद अल्पसंख्यक हो चुका है।

अब मौलाना साहब, उदाहरण देने के लिए आपको पूरी दुनिया में ‘बकरी’ ही मिली? चलिए, आपकी पसंद पर क्या ही सवाल उठाना! लेकिन इसके बाद जो ‘मीठा जिहादी जहर’ घोला गया, वह समझने लायक है।

मौलाना ने मुस्लिम समुदाय, बुद्धिजीवियों और विधायकों को जिम्मेदारी दी है कि वे इन तथाकथित ‘गैर-हिंदू’ (दलित, आदिवासी, जाट, तमिल) समूहों को लक्ष्य बनाएं।

मौलाना ने भावुक होकर कहा, “खुदा के बंदों, अपने पड़ोसी हिंदू के घर जाओ, राबता कायम करो, वहां खाना खाओ, अपनी खवातीन को उनकी महिलाओं से दोस्ती करने भेजो। मस्जिदों से बाहर निकलो और दावत दो।”

ऊपर से देखने पर यह ‘गंगा-जमुनी तहजीब’ का ओवरडोज लग सकता है, लेकिन इसके पीछे छिपी रणनीति वही सपा सांसद वाली है, “4 हिंदू जोड़ो, भाजपा हराओ।”

आइए इसकी गणित समझते हैं। अगर 100 मुस्लिम मतदाता संगठित होकर 4-4 हिंदू मतदाताओं को अपने नैरेटिव से प्रभावित कर लें, तो चुनावी समीकरण “900 बनाम 100” देखते ही देखते “500 बनाम 500” में बदल जाएगा। इसलिए इसे सिर्फ भाईचारे की ‘बिरयानी’ समझना भूल होगी, यह विशुद्ध रूप से 2027 का चुनावी रायता है।

लेकिन, जनता सब जानती है! भाईचारे का यह ‘सॉफ्ट वर्जन’ बेचने वाले शायद भूल गए कि देश का आम नागरिक अब सोशल मीडिया के दौर में जीता है। उसे उत्तम नगर के तरुण, गाजियाबाद के सूर्या, दिल्ली दंगों के अंकित शर्मा और दिलबर नेगी जैसे नाम भी याद हैं, जहां ‘पड़ोस’ की परिभाषा रातों-रात बदल गई थी।

और कश्मीर? कश्मीर का इतिहास तो खैर आज भी गवाह है कि जब पड़ोसियों ने ही घर का रास्ता दिखाया था, उनकी बहन-बेटियों के साथ दुष्कर्म करने के बाद कैसे उन्हें आरा मशीन से चीर दिया था और रातों-रात हजारों हिंदुओं का नरसंहार कर उन्हें भगाया गया था। भाईचारे का इतना खौफनाक मंजर कि वे आज तक अपने घरों में लौट नहीं पाए हैं।

उत्तर प्रदेश सहित पूरे देश की जनता को याद है कि 2017 से पहले की सरकारों में त्योहार कैसे मनाए जाते थे, अनगिनत दंगों का क्या हश्र होता था और बहुसंख्यक समाज की क्या स्थिति थी।

प्रधानमंत्री मोदी और मुख्यमंत्री योगी की जोड़ी ने तुष्टिकरण के इस ‘सौ साल पुराने अभियान’ के पहिए जाम कर दिए हैं, इसलिए अब यह छटपटाहट मंचों पर खुलकर दिखने लगी है।

जो सज्जाद नोमानी साहब हिंदुओं की जातियों को उंगलियों पर गिनकर ‘परिभाषित’ कर रहे हैं, उन्होंने कभी अपने समाज के अंदर झांकने की जहमत उठाई?

क्या मौलाना बताएंगे कि मुसलमानों के 72 फिरकों का क्या हिसाब-किताब है?

शिया और सुन्नी मस्जिदों के बीच की दूरियां कम करने के लिए आपकी व्हीलचेयर कब आगे बढ़ेगी?

देवबंदी, अहमदिया और बरेलवियों के बीच जो ‘काफिर-काफिर’ का खेल चलता है, उस पर कोई टूलकिट जारी क्यों नहीं होती?

जिन मुस्लिम महिलाओं को मस्जिदों में जाने तक का हक नहीं मिलता, उन्हें हिंदू महिलाओं को ‘इस्लाम की खूबसूरती’ समझाने की जिम्मेदारी देना कितना व्यावहारिक है?

नासिक के टीसीएस ग्रूमिंग गैंग से लेकर शामली से आए अजीबोगरीब पैटर्न तक, जहां धर्मांतरण और संपत्ति के लिए बाकायदा नेटवर्क काम कर रहा था, जनता सब देख रही है।

सज्जाद नोमानी का यह समय-आधारित भाषण और समाजवादी नेताओं की जुगलबंदी यह साबित करने के लिए काफी है कि 2027 में ‘बाबा’ की तीसरी बार वापसी को रोकने के लिए नैरेटिव की हर मुमकिन खिचड़ी पकाई जा रही है। लेकिन जातियां गिनने वाले शायद भूल रहे हैं कि जब वोट की चोट होती है, तो अच्छे-अच्छे राजनीतिक टूलकिट धरे के धरे रह जाते हैं।

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