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सांस्कृतिक मार्क्सवाद का सच: शोषितों की लड़ाई में हर बार बलि चढ़ती महिला पहचान

Summary
रोहिणी घावेरी द्वारा चंद्रशेखर रावण पर लगाए गए आरोपों पर वामपंथी और नारीवादी संगठनों का मौन एक गंभीर वैचारिक दोगलेपन को उजागर करता है। जानिए कैसे सांस्कृतिक मार्क्सवाद और शोषित कार्ड के खेल में महिलाओं के अधिकारों को हमेशा पीछे धकेल दिया जाता है।

यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि जो लोग हर वक्त ‘महिलाओं के अधिकार’, ‘नारीवाद’, ‘Oppression’ और ‘Representation’ जैसी भारी-भरकम बातें करते हैं, वो रोहिणी घावेरी के केस पर पूरी तरह चुप हैं। वे चुप ही रहेंगे, क्योंकि यह कोई पहली बार नहीं है जब ‘Oppressed Communities’ को बचाने के नाम पर Feminism को ही बलि का बकरा बना दिया गया है।

इतिहास गवाह है कि जब भी किसी दबे-कुचले समुदाय को अपनी लड़ाई लड़नी होती है, तो उस लड़ाई की पहली कुर्बानी महिलाओं के हिस्से ही आती है। मुसलमानों की बात करो, तो उनके हक की लड़ाई में औरतें तीन तलाक, हिजाब और मेहर जैसे मुद्दों पर सबसे पीछे छोड़ दी जाती हैं।

दलितों की बात करो, तो उनके अधिकारों के नाम पर सबसे पहले पुरुष चेहरे आगे किए जाते हैं और महिलाओं की पीड़ा को साइडलाइन कर दिया जाता है। इसी पैटर्न को आज फिर से दोहराया जा रहा है—रोहिणी घावेरी बनाम चंद्रशेखर रावण केस में। रोहिणी घावेरी का कहना है कि चंद्रशेखर आजाद ने उनके साथ बेईमानी की है, जिसमें विवाहित होने के बावजूद उन्होंने यह तथ्य छुपाया और कई वर्षों तक उनका मानसिक उत्पीड़न और यौन शोषण किया।

आरोपी चंद्रशेखर रावण वही हैं, जिन्हें ‘दलितों का रॉबिनहुड’, ‘दलितों का मसीहा’ और ‘नया भीम’ बोला जाता है। अब जबकि उसी चंद्रशेखर पर एक दलित महिला रोहिणी घावेरी ने Sexual Harassment का आरोप लगाया है, तो सारे ‘Intersectional Feminist’, ‘Woke’, ‘Anti-Caste Crusader’ और ‘Anti-Brahminical Saviors’ की आंखें बंद हो गई हैं। वे रोहिणी के केस में एक शब्द नहीं बोल पा रहे हैं।

अब न Feminism दिख रहा है, न Social Justice। रोहिणी का कहना है कि चंद्रशेखर ने उन्हें सपने दिखाए कि वो उन्हें मायावती बना देंगे और उन्हें बहुजन समाज में नई जगह मिलेगी। लेकिन असल में इसका नतीजा क्या हुआ, यह आपने भी वीडियो में सुन लिया होगा।

ना कोई ट्विटर थ्रेड, ना कोई ‘जस्टिस फॉर रोहिणी’ का अभियान, ना कोई फेमिनिस्ट पैनल और ना ही फैज़ की कोई क्रांतिकारी शायरी गाता हुआ कोई दिखाई दिया। अगर यही आरोप किसी सवर्ण नेता पर लगते, तो अब तक लंबे-लंबे Op-Eds, मीम्स और जेंडर जस्टिस के भाषणों की बाढ़ आ गई होती। लेकिन इस बार एकदम सन्नाटा पसरा हुआ है। यह एकदम ठोस वैचारिक मौन है।

असल में इसी वैचारिक मौन का नाम Cultural Marxism है, जहाँ न्याय भी सेलेक्टिव होता है। जहाँ पीड़िता की जाति, विचारधारा और उसकी ‘Usefulness’ यह तय करती है कि उसे सपोर्ट मिलेगा या नहीं। इस मामले में औरतें हमेशा मात खा जाती हैं। होता यह है कि जब दूसरी तरफ ऐसा ग्रुप खड़ा हो जो वामपंथ के हिसाब से ज्यादा पीड़ित यानी ‘Oppressed’ है—जैसे दलित, ब्लैक्स, ट्रांसजेंडर या रिफ्यूजी—तो महिलाओं को स्वाभाविक रूप से सबसे आखिरी पायदान पर रख दिया जाता है।

जब बात हकों की आती है, तब सबसे पहले यह याद आता है कि कैसे एक ट्रांसजेंडर को महिला के साथ ओलंपिक्स में लड़ा दिया जाता है, लेकिन Men’s Match में कोई ट्रांसजेंडर कम्पीट करता हुआ नहीं दिखता। ये लोग कभी इस बारे में बात नहीं करते कि ट्रांसजेंडर के लिए एक अलग ही कैटेगरी रखी जाए। ये उनकी तक बात नहीं करते जो ऐसे वैलिड पॉइंट्स लाते हैं; जैसे J.K. Rowling ने इस बारे में बोला भी था कि थर्ड कैटेगरी बनाई जाए, लेकिन ऐसे समय में उनको सो-कॉल्ड लिबरल्स का सपोर्ट नहीं मिला। यहाँ ट्रांसजेंडर महिला से ज्यादा शोषित कैटेगरी है, इसलिए महिलाओं को यहाँ साइडलाइन किया गया। अब रोहिणी को भी इसी कारण सपोर्ट नहीं मिल रहा क्योंकि सामने वाला दलित कार्ड खेल रहा है।

इसके और भी उदाहरण हैं। ‘The Wire’ में एक पत्रकार थीं दमयंती धर, जिन्होंने अपना अनुभव बताया था। वे एक ग्राउंड रिपोर्ट के लिए अहमदाबाद गई थीं, जहाँ 15-20 दलित पुरुषों की भीड़ ने उन पर हमला किया था। उन्होंने बताया कि इस घटना के बाद जो वामपंथी कार्यकर्ता और संपादक प्रेस की स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की आजादी की बात किया करते थे, उन्होंने इस इंसिडेंट को इग्नोर करने को कहा। उन्होंने कहा कि इसे अपने पेशे का जोखिम मानकर भूल जाओ। क्यों? क्योंकि इसमें दलित इन्वॉल्व थे। इसलिए महिला को पीछे हटने के लिए बोला गया। हालांकि जब उनके साथ कोई खड़ा नहीं था, तब अहमदाबाद पुलिस ने इस पर तुरंत कार्रवाई की थी। Intellectuals के न्यूज़रूम में दमयंती के साथ जो हुआ, वह तो छोटे से लेकर बड़े नैरेटिव को बचाने के लिए अक्सर किया जाता है। चूंकि उस समय आरोप किसी Left-Wing वामपंथी नायक पर आ जाता, इसलिए फेमिनिस्ट पहचान की बात करने वाले उसी न्यूज़रूम ने अपने एजेंडे को बचाने के लिए एक महिला की आवाज दबा दी।

रिफ्यूजी की बात करें तो यूरोप में ऐसे कई केस आए जब औरतों पर अटैक हुए और उन्हें चुप रहना पड़ा। यही बार-बार होता है। ये लोग Race, Caste, Religion, Nationality, Immigrants और Sexual Identity जैसी चीजों को Oppression की बुनियाद बताते हैं, लेकिन जब एक महिला खुद पीड़ित हो और उत्पीड़क इनमें से ही कोई एक हो, तो इनका पूरा जस्टिस का ढांचा हिल जाता है।

आपको तालिब हुसैन याद होगा, जिसने 8 साल की बच्ची के कठुआ मामले में न्याय की मांग की थी। लेकिन बाद में JNU की एक स्टूडेंट ने उसी तालिब हुसैन पर बलात्कार का आरोप लगाया। लड़की ने कहा कि उसने तालिब हुसैन को JNU में बोलने के लिए इनवाइट किया था और बातचीत के बाद उसने अपनी हदें पार कर दीं।

उसने बताया कि वह अक्सर रात में कॉल करता था और सेक्स टॉक करता था। फिर जब वे एक बार बाहर मिले, तो उसने लड़की को एक कमरे में ले जाकर उसके साथ बलात्कार किया। लड़की ने कहा कि वह चिल्लाई और उसे एक्सपोज़ करने की धमकी भी दी, इसी बीच तालिब ने शादी की बात की ताकि वह इस अपराध को जायज़ ठहरा सके।

तब तक तालिब हुसैन के खिलाफ दो बलात्कार के आरोप थे। पहला आरोप उनकी पत्नी द्वारा किया गया घरेलू हिंसा से जुड़ा था। लेकिन इस केस में भी खुद को फेमिनिस्ट बोलने वाली महिलाओं के मुंह से एक चू तक नहीं हुई। क्यों? क्योंकि आरोपी मुस्लिम था, और उनके नैरेटिव में मुसलमान समाज में महिलाओं से ज्यादा Oppressed हैं। अगर उनके खिलाफ कुछ बोला जाएगा तो एक कम्युनिटी पर सवाल उठेगा, जिससे समाज में नफरत पैदा होगी।

लेकिन इस रोहिणी के केस को लेकर वामपंथ चुप क्यों है? चंद्रशेखर रावण, जिस पर रोहिणी घावेरी ने Harassment का आरोप लगाया, उसका जिक्र किसी मेनस्ट्रीम वामपंथी पत्रकार, Intellectual या संगठन ने नहीं किया। क्यों?

क्योंकि उन्होंने उसे एक ‘दलित आइकॉन’ बना दिया है, जो ब्राह्मणवाद के खिलाफ बोलता है, जो भगवा झंडे को चुनौती देता है और जिसका स्टेटस अब सांसद बनने के बाद समाज में और बड़ा हो गया है। अब अगर वह किसी महिला के साथ गलत करे, तो उसकी जाति, उसका इतिहास और उसका सो-कॉल्ड संघर्ष ही उसकी ढाल बन जाता है।

इस दोहरे क्राइटेरिया के उदाहरण सिर्फ भारत में ही नहीं हैं। अमेरिका की बात करें तो 2008 में डेमोक्रेटिक पार्टी में लीडरशिप की लड़ाई में हिलेरी क्लिंटन और बराक ओबामा आमने-सामने थे। हिलेरी एक महिला थीं, जिन्होंने वर्षों तक राजनीति में योगदान दिया था, लेकिन जब Representation की बात आई, तो Black Identity को ज्यादा Oppressed माना गया और हिलेरी को पीछे हटना पड़ा। क्यों? क्योंकि जब दो Oppressed Identities आमने-सामने हों, तो हमेशा महिला वाली पहचान पीछे धकेल दी जाती है।

भारत में मार्क्सवाद कोई इंटेलेक्चुअल आंदोलन नहीं, बल्कि एक राजनीतिक पैंतरा बन गया है। इसे तब उठाया जाता है जब कुछ लोगों को खुद को नैतिक रूप से श्रेष्ठ दिखाना हो या जब उन्हें समाज में ‘Intellectual Hero’ बनना हो।

लेकिन असलियत में ये खुद कितना बराबरी पसंद करते हैं, यह इन मामलों से समझ आ जाता है। उन्हें बराबरी चाहिए, मगर Gender Equality नहीं; उन्हें न्याय चाहिए, लेकिन सिर्फ तभी तक जब तक आरोपी उनके पाले में खड़ा हो।

जब तक मुद्दा मनुस्मृति, ब्राह्मणवाद, संघ या हिंदू रीति-रिवाजों को कोसने का हो, ये वामपंथी, एक्टिविस्ट्स और क्रांतिकारी पत्रकार सबसे आगे रहते हैं। मगर जैसे ही मामला दलित समुदाय के भीतर Misogyny या Sexism का होता है, तब इनकी जुबान पर ताले लग जाते हैं।

यह सिर्फ रोहिणी की ही बात नहीं है, हर एक औरत को समझना होगा कि फेमिनिज्म के नाम पर Cultural Marxism की जो विचारधारा है, वह आज कैसे औरतों को इस्तेमाल कर रही है। पितृसत्ता से आजादी के नाम पर ये औरतों को अपनी ओर खींचते तो हैं, लेकिन फिर उन्हें कहाँ-कहाँ पर कॉम्प्रोमाइज करना होता है, उसके नतीजे ऐसे आते हैं कि किसी न किसी रूप में उन्हें हारना ही होता है—एक दूसरी कट्टर और ज्यादा Oppressed घोषित की गई आइडेंटिटी के सामने।

लेकिन रोहिणी घावेरी तो ब्राह्मण भी नहीं है, फिर भी उनके साथ यह सब किया जा रहा है? इसका मतलब यही है कि इनकी नजरों में महिलाओं की वैल्यू सिर्फ वोट मांगने तक है, या फिर तब तक है जब तक उनके मुद्दों का इस्तेमाल समाज को बांटने के लिए किया जा सके। उसके बाद महिलाएं और उनके मुद्दे ऐसे नेताओं के लिए कुछ नहीं हैं, भले ही वे किसी भी जाति की हों।

रोहिणी का केस हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हम एक ऐसे समाज में रह रहे हैं जहाँ महिला होना ही काफी नहीं है? रोहिणी को विक्टिम तभी माना जाएगा जब वह इनकी पॉलिटिक्स और आइडियोलॉजी के फ्रेम में फिट बैठेंगी।

वामपंथी विमर्श यूरोप से होकर जब भारत आया, तो यहाँ उसकी खिचड़ी बना दी गई ताकि उसका इस्तेमाल सिर्फ अपने विरोधियों पर सवाल खड़े करने के लिए किया जा सके। यह समय इन वामपंथियों को आईना दिखाने का है और यह पूछने का है कि क्या उनका Feminism सच में Universal है या बस एक राजनीतिक Convenience?

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