किसी भी व्यक्ति से यदि पूछा जाए कि उसके जीवन का सबसे खूबसूरत वक्त कौन सा था, तो सभी का लगभग एक ही जवाब होता है—बचपन। इंसान के लिए उसके बचपन की यादें किसी ताजा गुलाब की खुशबू की तरह होती हैं, जो उसके जेहन में हमेशा के लिए बस जाती हैं। बचपन एक ऐसा दौर होता है जिसे हम सब एक बार दोबारा जी लेना चाहते हैं। हम सब कुछ लुटाने को भी तैयार होते हैं, लेकिन बचपन कभी दोबारा लौटकर नहीं आता।
आखिर इंसान को बचपन से इतना लगाव क्यों होता है? ऐसा इसलिए होता है क्योंकि ‘बचपन’ व्यक्ति के जीवन का वो दौर होता है जिसे उसने बिना किसी चिंता, तनाव, भय या पीड़ा के गुजारा होता है। लेकिन क्या सबके नसीब में ऐसा बचपन होता है? क्या आप कल्पना कर सकते हैं उन बच्चों के बचपन के बारे में जिन्हें बिहार के सीमांचल इलाके से ट्रेन में ठूंसकर कर्नाटक के एक मदरसे में लाया गया हो? जहां मौलवियों द्वारा उनका शोषण किया जाता हो, उनसे पत्थर तुड़वाए जाते हों, कीचड़ फिंकवाया जाता हो और गड्ढे खुदवाए जाते हों?
ये कोई काल्पनिक कहानी नहीं बल्कि एकदम सत्य घटना है। बेंगलुरु रेलवे स्टेशन पर जब रेलवे पुलिस फोर्स यानी RPF ने 24 मुस्लिम बच्चों को एक साथ बिहार जाने वाली ट्रेन में चढ़ते हुए देखा, तो सुरक्षा बलों को कुछ संदेह हुआ। इन बच्चों से जब पूछताछ की गई तो उन्होंने RPF को जो बताया उसने सबको हैरान कर दिया। इन मुस्लिम बच्चों ने बताया कि वे सभी बिहार के सीमांचल इलाके के रहने वाले हैं, जहां से उनको मुफ्त में मदरसे में पढ़ाई-लिखाई के बहाने कर्नाटक के तुमकुरु जिले के ‘जामिया अरेबिया हुसैनिया’ नामक एक मदरसे में लाया गया था।
इन बच्चों के अम्मी-अब्बू को यह बताया गया था कि ये मदरसे में पढ़ेंगे, जहां उन्हें दीनी तालीम मिलेगी। वे बड़े होकर आलिम, तालिब, मौलवी और इमाम बनेंगे। रहना फ्री है, खाना फ्री है और कोई खर्चा नहीं है। लेकिन असलियत क्या है, इसका पता उन बच्चों को तब लगा जब वो अपना घर छोड़कर सैकड़ों किलोमीटर दूर उस मदरसे में पहुंचे। रेलवे पुलिस से पूछताछ के दौरान बच्चों ने बताया कि मदरसे के मौलवी उनका बुरी तरह शोषण करते हैं। उनसे पत्थर उठवाए जाते हैं, कीचड़ फिंकवाया जाता है, गड्ढे खुदवाए जाते हैं और उनसे बंधुआ मजदूरी करवाई जाती है।
तमाम शोषण और बंधुआ मजदूरी के बाद मदरसे के इन बच्चों को सड़े हुए और कीड़े लगे हुए चावल खाने को दिए जाते हैं, और वो भी भरपेट नहीं मिलता। जब बच्चों ने इस अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाई, तो मौलवी ने उन्हें बहुत बुरी तरह पीटा। फिर एक दिन किसी प्रकार हिम्मत करके ये 24 बच्चे मदरसे से भाग निकले और जैसे-तैसे बेंगलुरु रेलवे स्टेशन पहुंच गए। यहां से RPF ने उन्हें District Child Protection Unit को सौंप दिया। इस मामले में अब जामिया अरेबिया हुसैनिया मदरसा और यहां के मौलवियों के खिलाफ तुमकुरु पुलिस स्टेशन में FIR दर्ज की गई है।
कर्नाटक से आए इस मामले से पता चलता है कि इस देश के कुछ मदरसे किस प्रकार बाल शोषण और अपराधों के गढ़ बन चुके हैं। गरीब मुस्लिम बच्चों को पहले पढ़ाई के बहाने कर्नाटक, महाराष्ट्र, ओडिशा और तमिलनाडु जैसे राज्यों के मदरसों में भेजना और फिर वहां मौलवियों द्वारा उनका शोषण किया जाना और उनसे बंधुआ मजदूरी करवाना कोई नया मामला नहीं है। लेकिन जरा आप BBC की ये रिपोर्ट देखिए। BBC पिछले कुछ समय से यह नैरेटिव फैलाने में जुटा हुआ है कि मदरसों में ऐसा कुछ भी नहीं होता है। मदरसों में बच्चे इसलिए जाते हैं क्योंकि वो गरीब होते हैं और उन्हें अपने गांव में पढ़ने का मौका नहीं मिलता।
मदरसों का रहनुमा BBC
11 अप्रैल को मध्य प्रदेश के कटनी रेलवे स्टेशन पर RPF ने 163 मुस्लिम बच्चों को रेस्क्यू किया था। ये सभी बच्चे बिहार के सीमांचल इलाके से महाराष्ट्र के लातूर में एक मदरसे में ले जाए जा रहे थे। RPF को संदेह हुआ कि यह Child Trafficking और Forced Labour का मामला हो सकता है, इसलिए इन सभी बच्चों को ट्रेन से उतारकर District Child Care Centre भेज दिया गया। इस घटना के बाद मुस्लिम इकोसिस्टम ने बवाल मचा दिया था। कहा गया कि मदरसों को बदनाम करने के लिए जानबूझकर ऐसी कहानी रची गई है। मदरसों में बच्चों का कोई शोषण नहीं होता, बल्कि वहां तो उनको World Class Education दी जाती है।
इसके बाद BBC ने इस मामले में एक ग्राउंड रिपोर्ट पब्लिश की। इस रिपोर्ट के लिए BBC बिहार के सीमांचल पहुंचा और वहां के लोगों से बात करते हुए ऐसा नैरेटिव बनाने का प्रयास किया कि मुस्लिम अपने बच्चों को बाहर के मदरसों में इसलिए भेजते हैं क्योंकि वे गरीब हैं और उनके गांव में स्कूल्स नहीं हैं। जबकि हकीकत इससे बिल्कुल अलग है। इसी रिपोर्ट के एक हिस्से में एक मुस्लिम महिला बता रही है कि आजकल सरकारी स्कूल में कौन पढ़ता है? डॉक्टर-इंजीनियर बनने की क्या जरूरत है? बच्चे को तो दीन का काम करना है। हाफिज बनेगा, मौलवी बनेगा, मस्जिद में नमाज पढ़ाएगा, अजान देगा, क्या उससे पैसा नहीं मिलेगा?
अब इस मानसिकता का क्या किया जा सकता है? सरकार ने स्कूल्स खोले हैं, जहां कोई फीस नहीं लगती। किताबों और ड्रेस से लेकर मुफ्त खाना भी सरकार दे रही है, लेकिन अररिया की इस मुस्लिम महिला को अपना बच्चा उस स्कूल में नहीं भेजना है। इसके पीछे का कारण भी वो खुद बता रही है कि डॉक्टर-इंजीनियर बनने से क्या होता है? असली कामयाबी तो आलिम, फाजिल और मौलवी बनकर दीन का काम करने में है।
दीन से इतना प्रेम है कि बच्चों को घर से सौ मीटर दूर सरकारी स्कूल में नहीं भेजा जाता, बल्कि 2000 किलोमीटर दूर महाराष्ट्र के लातूर के मदरसे में भेजा जाता है। आखिर ये कैसे मां-बाप हैं? इसी रिपोर्ट में एक अन्य व्यक्ति बताता है कि बच्चे शरारती होते हैं और नजदीक के मदरसों से भागकर घर आ जाते हैं, इसलिए उन्हें इतनी दूर भेज देते हैं। क्या कभी BBC या किसी मुस्लिम संगठन ने यह जानने का प्रयास किया कि आखिर ये बच्चे मदरसों से भागते क्यों हैं? क्यों कभी BBC ने इस मुद्दे पर कोई ग्राउंड रिपोर्ट नहीं की कि कैसे कुछ मदरसे इन बच्चों के उत्पीड़न का केंद्र बने हुए हैं?
BBC कटनी रेलवे स्टेशन पर 163 मुस्लिम बच्चों के रेस्क्यू पर सवाल उठाते हुए रिपोर्टिंग करता है कि यह मदरसों को बदनाम करने की साजिश है, जबकि मदरसों में ऐसा कुछ भी नहीं होता। लेकिन जिस दिन BBC की ये रिपोर्ट पब्लिश हुई, ठीक उसी दिन बेंगलुरु रेलवे स्टेशन पर रेस्क्यू किए गए 24 बच्चों के शोषण के मामले में तुमकुरु पुलिस स्टेशन में मामला दर्ज किया गया। अब सवाल उठता है कि इन बच्चों को 24 अप्रैल को ही RPF ने रेस्क्यू कर लिया था, तो क्या BBC का कैमरा उन बच्चों तक नहीं पहुंच पाया? क्या BBC के रिपोर्टर को तुमकुरु जिले के जामिया अरेबिया हुसैनिया ट्रस्ट के मदरसे का पता नहीं मिल पाया, जहां इन बच्चों का मौलवियों ने उत्पीड़न किया था?
जाहिर सी बात है कि BBC ऐसा नहीं करेगा क्योंकि यह उसके नैरेटिव को सूट नहीं करता। वास्तव में BBC को इन बच्चों की कोई चिंता नहीं है। उसे बस इस बात से मतलब है कि वह किसी मुद्दे को इस तरह पेश कर सके कि इस देश में अल्पसंख्यकों के ऊपर अत्याचार हो रहा है। वे मजलूम, गरीब और बेचारे हैं और उनकी हर समस्या के लिए इस देश की व्यवस्था जिम्मेदार है। जब लोग अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में भेजने को तैयार नहीं हैं, तो क्या इसमें सरकार का दोष है? आखिर इस मानसिकता का कोई भी सरकार क्या इलाज कर सकती है जो सोचती है कि इंजीनियर-डॉक्टर बनने से क्या होता है, असली काम तो लाउडस्पीकर पर अजान देना और नमाज पढ़वाना है।
BBC और उनका इकोसिस्टम कहता है कि मदरसों में बच्चों का शोषण नहीं होता है, लेकिन सच्चाई क्या है? 2018 में पुणे के एक मदरसे से पुलिस ने 36 मुस्लिम बच्चों को रेस्क्यू किया था। इन बच्चों ने बताया कि मदरसे के मौलवी रहीम ने उनका यौन शोषण किया और गंभीर उत्पीड़न किया। ये सभी बच्चे भी बिहार से पुणे लाए गए थे। हैदराबाद के एक मदरसे में पढ़ाने वाले मौलवी रेहान को 6 बच्चों के यौन शोषण के मामले में गिरफ्तार किया गया था।
क्या आपको केरल के जाने-माने फिल्ममेकर अली अकबर का बयान याद है? अली अकबर ने अपने बचपन का अनुभव साझा करते हुए बताया था कि जब वे मदरसे में पढ़ा करते थे, तब एक मौलवी ने उनका यौन शोषण किया था। अली अकबर ने यह भी कहा था कि आज भी मदरसों में ये सब होता है। Media One Group की जर्नलिस्ट VP राजीना का मामला भी यहां याद दिलाना उचित होगा। VP राजीना ने 2015 में अपनी फेसबुक पोस्ट में बताया था कि जब वो केरल के कोझिकोड के एक मदरसे में पढ़ा करती थीं, तब किस तरह से वहां मौलवियों ने उनका और अन्य बच्चों का यौन शोषण किया था। राजीना की इस पोस्ट के बाद उन्हें जान से मारने की धमकियां और खूब गालियां दी गई थीं।
शोषण की यह कहानी सिर्फ बंधुआ मजदूरी या यौन उत्पीड़न तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह क्रूरता की सारी हदें पार कर जाती है। उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर के एक मदरसे से ऐसी खौफनाक तस्वीरें सामने आई थीं, जिसने हर संवेदनशील इंसान को झकझोर कर रख दिया था। यहां मासूम बच्चों को लोहे की भारी-भारी बेड़ियों और जंजीरों से बांधकर रखा जाता था, ताकि वे भाग न सकें। जब यह मामला सामने आया, तो हर कोई हैरान था कि दीनी तालीम के नाम पर बच्चों को जानवरों की तरह जंजीरों में जकड़ कर रखा जा रहा है। लेकिन इस भयानक सच पर भी BBC साइलेंट रहा।
ये तो केवल कुछ ही मामले हैं। मदरसों में बच्चों के शोषण को लेकर आप इंटरनेट पर सर्च कीजिए, आपको ऐसे कई मामले मिल जाएंगे। 2022 में योगी सरकार ने UP के मदरसों के सर्वे का आदेश दिया था। उत्तर प्रदेश बाल आयोग का दावा था कि मदरसों में शिक्षा के नाम पर बड़े पैमाने पर Child Trafficking को अंजाम दिया जा रहा है। आयोग की सदस्य डॉक्टर शुचिता त्यागी ने बताया कि मदरसों के माध्यम से मानव तस्करी की जा रही है। उन्होंने बताया कि बिहार और UP से बड़े पैमाने पर बच्चों को और खासकर लड़कियों को गुजरात, महाराष्ट्र, केरल इत्यादि जगहों पर ले जाया जाता है, जहां से उनकी तस्करी की जाती है।
अब सवाल उठता है कि BBC कभी इस मामले में कोई ग्राउंड रिपोर्ट क्यों नहीं करता? यह तंत्र कभी इस पर बात क्यों नहीं करता? इसका कारण सिर्फ इतना है कि इन मदरसों से निकलने वाले तत्वों ने समाज के एक बड़े हिस्से को अपने जाल में जकड़ रखा है। कुरीतियों पर उठने वाली किसी भी आवाज को निर्ममता से कुचल दिया जाता है। इस हद तक ब्रेनवॉश किया हुआ है कि लोग सब कुछ जानकर भी अपने बच्चों को ऐसे मदरसों में भेजने को तैयार हैं, जहां के अत्याचारों के वे खुद भुक्तभोगी रहे हैं।
सवाल यह भी उठता है कि आखिर इस मनोवृत्ति का इलाज क्या है? कैसे इन मासूम बच्चों का बचपन सुरक्षित रहेगा? क्या तरीका है कि इन मासूमों को शोषण से बचाया जा सके? इस समस्या का समाधान यही है कि सभी बच्चों के लिए Right to Education यानी RTE के तहत जरूरी Modern Education को लागू करना, चाहे वे किसी भी धर्म के हों। राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग के अध्यक्ष प्रियंक कानूनगो ने समय-समय पर मदरसों में गैर-मुस्लिम बच्चों के दाखिले और वहां दी जाने वाली शिक्षा के स्तर पर सवाल उठाए हैं। पूर्व की कमेटियों ने भी माना है कि मदरसों के बच्चों को गणित, साइंस और कंप्यूटर की आधुनिक शिक्षा मिलनी चाहिए। सरकार इसके लिए बजट भी देती है, लेकिन आधुनिक दुनिया से दूर रखने की जिद के कारण नुकसान इन मासूम बच्चों का ही हो रहा है।





