27 साल की एक नर्स, जो मरीजों की सेवा में जुटी थी। रात के सन्नाटे में उसे हॉस्टल से उठा लिया जाता है। चार दिन तक उसके साथ गैंगरेप किया जाता है, शरीर को सिगरेट से दागा जाता है, अमानवीय यातनाएं दी जाती हैं और अंत में शरीर को सड़क पर फेंक दिया जाता है, जिस पर गोलियों के अनगिनत निशान होते हैं।
यह कल्पना करने के लिए मैंने इसलिए कहा क्योंकि यह कोई हॉरर फिल्म की पटकथा नहीं है, यह कहानी है कश्मीर की सरला भट्ट की।
और आज, 35 साल बाद… आखिरकार उसके हत्यारों के घरों पर छापे पड़ रहे हैं। सोचने वाली बात यह है कि इसमें इतना वक्त क्यों लगा? यह ‘जस्टिस डिलेड’ है या ‘डेलिब्रेटली डिनाइड’ था?
सरला भट्ट अनंतनाग की रहने वाली एक कश्मीरी पंडित थीं, जो एसकेआईएमएस (SKIMS) सौरा में नर्स के तौर पर कार्यरत थीं। 1990 का वह दौर था, जब कश्मीर जल रहा था। उस वक्त घाटी में एक ही नारा गूंज रहा था, जिसे आतंकी चिल्ला-चिल्लाकर कहते थे – ‘रलिव, चलिव या गलिव’ यानी या तो धर्म बदलो, घाटी छोड़ो या फिर मर जाओ।
जहां उस समय लोग जान बचाने के लिए घाटी छोड़ रहे थे, वहीं सरला भट्ट ने डर के मारे अपनी नौकरी नहीं छोड़ी। उनका कहना था कि ‘मैं उन मरीजों को कैसे छोड़ सकती हूं?’
जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (JKLF) के आतंकियों ने सरला को हब्बा कंतून हॉस्टल से अगवा कर लिया।
वे चार दिनों तक लापता रहीं। फिर 19 अप्रैल को उनकी डेड बॉडी श्रीनगर की सड़क पर मिली। उनके शरीर के पास जेकेएलएफ (JKLF) का एक नोट मिला, जिस पर लिखा था – ‘यह सीआईडी (CID) की मुखबिर थी।’
पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में गैंगरेप और भीषण यातना के सबूत साफ थे। यह महज एक मर्डर नहीं था। यह कश्मीरी पंडितों को डराकर भगाने का एक सिस्टमैटिक प्लान था। नतीजतन, लाखों पंडित घाटी छोड़कर रिफ्यूजी बन गए।
और हम? हम ‘कश्मीर फाइल्स’ फिल्म देखकर रोए, लेकिन असली फाइलें तो अब खुल रही हैं।
मुख्य आरोपी कौन था? जेकेएलएफ (JKLF) चीफ यासीन मलिक। आज वह तिहाड़ जेल में उम्रकैद की सजा काट रहा है, लेकिन उस समय? वह खुलेआम घूमकर भाषण दे रहा था।
35 साल तक यह केस ठंडे बस्ते में पड़ा रहा। कांग्रेस सरकारों की सॉफ्ट-पेडल नीतियां… सब खामोश।
अब क्या हुआ? एलजी मनोज सिन्हा के प्रयासों से जम्मू-कश्मीर की एसआईए (SIA) ने इस केस को दोबारा खोला। 12 अगस्त 2025 को 8 जगहों पर छापे मारे गए।
आखिरकार ‘आजादी’ के ठेकेदारों के घरों की तलाशी हुई। यासीन मलिक के घर समेत कई अहम दस्तावेज हाथ लगे हैं।
सरला भट्ट का केस केवल एक मामला नहीं, बल्कि पूरे कश्मीरी हिंदू जेनोसाइड (Genocide) की एक अहम कड़ी है। जो लोग आज भी यह दावा करते हैं कि कश्मीर में पंडितों के साथ कुछ नहीं हुआ, यह उनके मुंह पर एक करारा तमाचा है।
इसके साथ न जाने ऐसी कितनी अनकही कहानियां हैं जिन्हें आज भी न्याय की दरकार है। मोदी युग में न्याय अब अपनी दिशा ले चुका है। कश्मीर घाटी में सरला की चीख को अब न्याय दिया जा रहा है।




