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पश्चिम बंगाल: देश की सीमा सुरक्षा से ज्यादा ‘मियां’ की जमीन पर चिंता जता रहा द प्रिंट

Summary
बॉर्डर सिक्योरिटी की जब भी बात आती है तो वो मुद्दा लोकल या किसी गांव या उस गांव के चंद लोगों तक सीमित नहीं रह जाता है इसलिए बंगाल की बॉर्डर फेंसिंग राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा है और बंगाल के कई सीमावर्ती गांवों में तो लोग खुद फेंसिंग के समर्थन में भी सामने आए हैं।

ऐसा क्यों होता है कि जब भी देश में सिक्योरिटी से जुड़ा कोई मसला हल हो रहा हो तब अपने ही देश की मीडिया का एक वर्ग उस पूरे प्रोजेक्ट को ही कटघरे में खड़ा करने की कोशिश करता है? 

कभी पर्यावरण तो कभी आदिवासी के नाम पर और इस बार द प्रिंट ने ये काम किया है किसान के नाम पर। पश्चिम बंगाल में बॉर्डर फेंसिंग का काम चल रहा है यानी बांग्लादेश से लगते बॉर्डर पर BSF तार-बाड़ लगाने का काम अब तेजी से कर रही है ताकि वहां घुसपैठ रुके, तस्करी ना हो और अवैध गतिविधियों पर लगाम लगे।

कुलमिलाकर, अवैध बांग्लादेशियों से पश्चिम बंगाल को और पूरे देश को पूरी तरह सुरक्षित किया जाए लेकिन द प्रिंट इस बीच ये स्टोरी लेकर आता है कि बंगाल के बॉर्डर इलाकों में फेंसिंग सीमा की बजाय गांवों के अंदर तक लाई जा रही है। इससे मोहम्मद अज़ीरुल और उनके भाई की खेती और रोजगार पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। जहां मार्किंग के लिए सफेद झंडे लगे हैं वो लोकल लेवल पर अब एक नई लड़ाई को जन्म दे रहे हैं।

कुलमिलाकर, द प्रिंट चुनिंदा लोगों के बयान के आधार पर पश्चिम बंगाल में बॉर्डर फेंसिंग को ग्रामीण बनाम BSF की कहानी की तरह पेश कर रहा है लेकिन जमीनी हकीकत इतनी सीधी नहीं है।

बॉर्डर सिक्योरिटी की जब भी बात आती है तो वो मुद्दा लोकल या किसी गांव या उस गांव के चंद लोगों तक सीमित नहीं रह जाता है इसलिए बंगाल की बॉर्डर फेंसिंग राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा है और बंगाल के कई सीमावर्ती गांवों में तो लोग खुद फेंसिंग के समर्थन में भी सामने आए हैं।

कुछ रिपोर्टों में तो ये भी देखने को मिला है कि ग्रामीणों ने सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए अपनी जमीन तक दान की है और ये बोलते हुए दान की है कि “गांव के लोगों ने डर और असुरक्षा के बीच लंबा समय बिताया है। रात के अंधेरे में सीमा पार से लोग आते थे, मवेशी चोरी होते थे और खेतों को नुकसान पहुंचाया जाता था।”

इन गांव वालों का कहना है कि हमने जमीन इसलिए दी ताकि हमारा गांव सुरक्षित रहे और देश भी सुरक्षित रहे। अब आप इस बात से समझिए कि पश्चिम बंगाल में सबसे बड़ा मुद्दा तो सुरक्षा का है और रही बात जमीन की, खेती की तो ऐसा तो है नहीं कि सरकार या BSF सीधे जमीन पर कब्जा कर रही है बल्कि इसके लिए एक मैकेनिज्म बना हुआ है।

फेंसिंग की इस प्रक्रिया में पहले सर्वे ऑफ इंडिया नई फेंसिंग लाइन तय करता है। फिर BSF, BLRO और CPWD की टीम सफेद झंडे लगाकर जमीन चिन्हित करती है। इसके बाद जमीन मालिकों से दस्तावेज लेकर, उन्हें कागजों को वेरीफाई कर और NOC लेकर मुआवजा तय किया जाता है, अगर उतने पर नहीं मानते हैं तो उन्हें दो-ढ़ाई गुना ज्यादा मुआवजा देने की कोशिश होती है और ये सब प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही जमीन BSF को सौंपी जाती है।

एक और बात बंगाल की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि कुछ बॉर्डर इलाके बरसात के दौरान पूरी तरह डूब जाते हैं, पानी का बहाव इतना तेज कि तार-बाड़ बह जाती है इसलिए कुछ जगहों पर गांव के अंदर तक फेंसिंग की जा रही है।

अब द प्रिंट को यहां केवल मोहम्मद अजीरुल की जमीन दिखती है लेकिन ये विषय उस जमीन से या एक व्यक्ति से कहीं बड़ा है। ये राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा है जिसे ममता बनर्जी सरकार ने इतने सालों से लटकाकर रखा था और अब भाजपा सरकार आते ही तत्काल इस पर काम किया जा रहा है।

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