आपने कभी सोचा है कि कोई देश खुद अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी कैसे मार सकता है? अगर नहीं तो ब्रिटेन को देखो। 9 मार्च को वहां की Labor party ने ‘Anti-Muslim Hostility’ की एक ऐसी परिभाषा जारी की है, जिसे देखकर लगता है कि इन्होंने ‘आधुनिक उदारवाद’ यानी (Modern Liberalism) के डेथ वारंट पर साइन कर दिए हैं। ऊपर से देखने में तो लगता है कि वाह! कितनी इंक्लूसिव सरकार है, सबको साथ लेकर चल रही है। लेकिन थोड़ा गहरा उतरोगे न, तो समझ आएगा कि ये ‘सेक्युलरिज्म’ नहीं, बल्कि अपनी पूरी सिविलाइजेशन की आजादी का सौदा है। इसे कहते हैं ‘Suicide of Liberalism’।
तो इसमें Labor party क्या तर्क दे रही है? कह रही है कि ‘इस्लामोफोबिया’ शब्द थोड़ा कन्फ्यूजिंग है, इसलिए हम ‘होस्टिलिटी’ (शत्रुता) शब्द ला रहे हैं। क्यों? ताकि इस्लाम की बुराई और मुस्लिमों से नफरत के बीच एक लकीर खींची जा सके। पर भाई, ये लकीर इतनी पतली और धुंधली है कि अब ये ‘सुरक्षा’ के नाम पर ‘सेंसरशिप’ का सरकारी हथियार बन गई है। ये उन लोगों के मुंह पर ताला लगाने का जुगाड़ है जो ग्रूमिंग गैंग्स या जिहादी कट्टरपंथ पर सवाल उठाने की हिम्मत करते हैं।
अब जरा इस नई प रिभाषा के तीन तगड़े झोल समझिए, जिसने पूरे ब्रिटेन में आग लगा रखी है:
- पहला है- भेदभाव या Stereotyping: यानी अगर आप मुस्लिम समुदाय के बारे में ऐसी बात कहते हो जिससे उनकी इमेज खराब हो, भले ही वो बात 100 टका सच क्यों न हो, तो उसे अब ‘शत्रुता’ मान लिया जाएगा। सच बोलना भी अब क्राइम की कैटेगरी में है!
- दूसरा है- Racialisation का खेल: यहाँ सरकार ने मज़हब को ‘नस्ल’ (Race) बना दिया है। मतलब, अगर आप जिहादी कट्टरपंथ का विरोध कर रहे हो, तो वो उसे मजहबी बहस नहीं बल्कि ‘नस्लवाद’ (Racism) का नाम देकर आपकी आवाज दबा देंगे। यानी लॉजिकल डिबेट को सीधे ‘गाली’ बना दिया गया है। (Assumptions are made about people from diverse ethnic, racial and cultural backgrounds and they are treated as a collective group and negatively stereotyped, irrespective of their actual opinions, beliefs or actions as individuals – a process sometimes described as racialisation.)
- तीसरा और सबसे अजीब- ‘Perceived Muslimness’: ये तो खैर हद ही है! ये कहता है कि अगर आप मुस्लिम नहीं हो, हिंदू हो या सिख हो, लेकिन आपको ‘मुस्लिम समझकर’ किसी ने कुछ कह दिया, तो वो भी इसी कानून में आएगा। हिंदू-सिख चिल्ला रहे हैं कि भाई, हमारी हजारों साल की अलग पहचान को तुम एक ही ‘नस्ली’ पहचान में क्यों ठूंस रहे हो? – Anti-Muslim hostility not only affects Muslims but also other people who are perceived to be Muslim – including Sikhs, Hindus or those who have left Islam. This can mean that people are targeted simply because they look Muslim.
साफ बात ये है कि ये ‘Backdoor Blasphemy Law’ है। एक ऐसा सिस्टम जहाँ आप जिहादी कट्टरपंथ पर बोले तो आपको दुश्मन घोषित कर दिया जाएगा। ब्रिटेन की सड़कों पर आज खौफ है। अगर आप कहो कि ‘जिहाद’ के नाम पर आतंक फैल रहा है, तो कानून इसे मानहानि मान लेगा।
आपको ‘रॉदरहैम’ (Rotherham) याद होगा? जहाँ सालों तक ग्रूमिंग गैंग्स ने ईसाई बच्चियों का शिकार किया और सिस्टम सिर्फ इसलिए चुप रहा क्योंकि उन्हें ‘इस्लामोफोबिया’ का टैग लगने का डर था। ये बिल्कुल वैसा ही है जैसे कोई बाप अपनी बेटियों का रेप होते देख रहा हो और हाथ बांधकर खड़ा रहे क्योंकि उसे ‘पॉलिटिकल करेक्टनेस’ की बीमारी है। आज सवाल ये नहीं है कि फोबिया क्या है; सवाल ये है कि जब 10 में से 6 लोग आपके वजूद को मिटाने की बात करें, तो आप चुप कैसे रह सकते हैं? आप इस्लाम और मुस्लिम में यहाँ पर फर्क कैसे करेंगे?
डर तब तक गलत नहीं है जब तक वो बिना वजह न हो। जब पूरी दुनिया में जिहादी कट्टरता की घटनाएं सामने हैं, तो उसे ‘बेवजह की नफरत’ कहना असलियत से आंखें मूंदना है। ये कानून अपराधियों को ‘विक्टिम कार्ड’ खेलने का सरकारी लाइसेंस दे रहा है।‘रंगीला रसूल‘ से लेकर नूपुर शर्मा तक के मामले गवाह हैं कि सच बोलने को कैसे ‘ईशनिंदा’ बना दिया जाता है। लिबरलिज्म तो ‘Right to Offend’ की बात करता था, पर यहाँ तो कट्टरता पर सवाल न उठाने का ‘वीटो पावर’ दिया जा रहा है। ये ब्रिटेन को उजाले की तरफ नहीं, बल्कि उस ‘बौद्धिक अंधेरे’ (Intellectual Darkness) की ओर ले जा रहा है जहाँ सच बोलना ही सबसे बड़ा गुनाह होगा।
ब्रिटेन की सरकार एक भूलभुलैया में फंसी है। वो कहती है धर्म का सम्मान करो पर कट्टरपंथ का विरोध। पर भाई, इन्हें अलग कैसे करोगे? अगर आप कहते हो कि इस्लाम अच्छा है पर कुछ मुस्लिम बुरे हैं, तो आप किताब की उन आयतों को इग्नोर कर रहे हो जो उन लोगों को उकसाती हैं। और अगर आप विचारधारा को बुरा कहते हो, तो आप उन करोड़ों लोगों को नाराज कर देते हो जो उसे मानते हैं। समस्या तब आती है जब एक हाथ में किताब और दूसरे में कट्टरता लिए आदमी कहता है कि ‘यही असली मजहब है’। तब एक आम आदमी क्या करे? चुप रहकर सुसाइड कर ले या सच बोलकर जेल जाए?
डगलस मरे ने अपनी किताब ‘The Strange Death of Europe’में ठीक ही कहा था कि यूरोप अपनी विरासत से इतना शर्मिंदा है कि वो ‘सहिष्णु’ दिखने के चक्कर में खुद को खत्म करने पर तुला है। ये कानून ब्रिटेन के उस सपने का अंत है जहाँ सबको साथ आना था।
भारत के लिए भी ये एक बहुत बड़ी चेतावनी है। अगर ब्रिटेन में जिहादियों की आलोचना ‘नफरत’ बन गई, तो ये उन ‘एंटी-इंडिया’ नेक्सस को ढाल देगा जो वहां बैठकर भारत के खिलाफ जहर उगलते हैं। ब्रिटेन आज एक ऐसे ‘यूटोपिया’ में रहना चाहता है जहाँ सब हरा-भरा है, जबकि हकीकत में वहां शरिया कॉलोनियां और इलीगल इमिग्रेशन ने दम घोंट रखा है।
अगर ब्रिटेन को बचना है, तो उसे ‘परिभाषाओं के ठेकेदार’ पालना बंद करना होगा। कानून सबके लिए एक होना चाहिए और सच बोलने की हिम्मत को ‘शत्रुता’ नहीं, ‘साहस’ कहना चाहिए।





