Grooming Gang

ब्रिटेन का कार्डिफ और भारत का अजमेर: कैसे ग्रूमिंग गैंग्स सीमा पार भी अपना रहे हैं एक ही तरीका

Summary
इंग्लैंड के कार्डिफ और भारत के अजमेर में नाबालिग बच्चियों को दोस्ती, भरोसे और ब्लैकमेल के जरिए शिकार बनाने के एक जैसे पैटर्न।

इंग्लैंड के कार्डिफ और भारत के अजमेर में क्या समानता हो सकती है? यह सवाल सुनने में अजीब लग सकता है, लेकिन एक सच्चाई है जो पूरी दुनिया में एक समान पैटर्न पर चल रही है। यह है कट्टरपंथी मानसिकता वाले गिरोहों द्वारा नाबालिग बच्चियों को अपना निशाना बनाना।

हाल ही में सामने आई रिपोर्टों ने इस भयावह सच्चाई को फिर से कुरेद दिया है। एक ऐसी ही रिपोर्ट 12 साल की उस मासूम बच्ची की कहानी बयां करती है, जिसकी उम्र स्कूल जाने, सपने देखने और भविष्य संवारने की थी। लेकिन जिहादी कट्टरपंथी सोच रखने वाले कुछ दरिंदों ने उसकी मासूमियत को अपना हथियार बना लिया।

यूनाइटेड किंगडम के आधिकारिक रिपोर्टों के अनुसार, ग्रूमिंग गैंग्स ने कई वर्षों तक कमजोर और नाबालिग लड़कियों को पहले दोस्ती के जाल में फँसाया, फिर प्रेम संबंध, उपहारों और नशे के माध्यम से उन्हें ब्लैकमेल करना शुरू किया। चौंकाने वाली बात यह है कि कई पीड़ितों ने आरोप लगाया कि समय रहते उनकी शिकायतों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। एक मामले में तो पीड़ित महिला ने यह तक बताया कि उसके साथ बरसों तक सैकड़ों अलग-अलग पुरुषों द्वारा यौन शोषण किया गया।

ब्रिटेन के बाद अब भारत की ओर रुख करें। जहाँ ब्रिटेन में कहानी कार्डिफ जैसे शहरों की है, वहीं भारत में यह अजमेर (राजस्थान) और उसके आसपास के इलाकों से जुड़कर सामने आई। अजमेर के ब्यावर में मैकेनिक, खलासी और पेंटर जैसे काम करने वाले कुछ लोगों द्वारा हिंदू बच्चियों को निशाना बनाने की बात सामने आई। उनका तरीका यह था—पहले पीछा करना, पर्चियां डालना और फिर परेशान करना। जब इनमें से कोई एक बच्ची उनके चंगुल में फँस जाती, तो उसे अपनी सहेलियों को लाने के लिए मजबूर किया जाता। इसके बाद शोषण और पैसे वसूलने का सिलसिला शुरू होता।

इन दोनों मामलों में काम करने का तरीका (Modus Operandi) बिल्कुल एक जैसा है:

  • पहला कदम: शिकार को ढूँढना और उसे जाल में फँसाना।
  • दूसरा कदम: शोषण और ब्लैकमेल के जरिए उसे अपनी मर्जी चलाने पर मजबूर करना।
  • तीसरा कदम: एक गिरोह बनाकर अन्य लड़कियों को भी उसी जाल में खींचना।

ब्रिटेन में जहाँ ये वारदातें अक्सर भौतिक रूप से सड़कों या पार्कों से शुरू होती हैं, वहीं भारत में अब इनका माध्यम सोशल मीडिया और ऑनलाइन ऐप्स भी बन गए हैं। लेकिन, एक चीज जो हर जगह समान है, वह है इन दरिंदों की मानसिकता और मासूम बच्चियों को फँसाने का वह गणित, जिसे ये लोग एक ‘सिस्टम’ की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं।

यह केवल कानून-व्यवस्था का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी सामाजिक कुरीति है जो बहुत ही व्यवस्थित तरीके से एक पैटर्न का पालन कर रही है। इसे रोकने के लिए न केवल कड़ी कानूनी कार्रवाई, बल्कि समाज में इस कार्यप्रणाली के प्रति जागरूकता फैलाना भी अनिवार्य हो गया है।

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