आख़िर सरकार E20 वाले पेट्रोल का मैंडेट वापस क्यों नहीं ले लेती? ऐसा भी क्या फ़ायदा हो रहा है कि E20 के विरोध के बाद भी लगातार उसे प्रमोट किया जा रहा है? और आख़िर फ़ायदा हो रहा तो कितने लाख, कितने करोड़ हो रहा है? किसे हो रहा है?
अगर इथेनॉल इतना ही फायदेमंद है तो ये फ़ायदा हमें यानी कंज्यूमर्स को क्यों नहीं मिलता, क्यों पेट्रोल के रेट वही पुराने हिसाब से ही तय किए जाते हैं? ये सारे सवाल पिछले 15 दिनों में E20 पर मचे हल्ले के बीच आपके मन में भी जरूर आए होंगे! आपने जरूर सोचा होगा कि आख़िर कुछ तो इंसेंटिव होगा कि सरकार इस मामले पर बिल्कुल नहीं दबती!
आपके इन्हीं सवालों का जवाब एक कैलकुलेशन के सहारे मैं देता हूँ! शुरू से शुरू करते है। तो देश में जितना भी पेट्रोल बिकता है, वो सारा बिकता है गाड़ियों के लिए! ऐसा कहती है पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल की एक रिपोर्ट! PPAC ने ही बताया कि पिछले साल यानी 2025-26 में देश में 6200 करोड़ लीटर पेट्रोल बिका।
और भले ही 1 अप्रैल, 2026 से एथनॉल ब्लेंडेड पेट्रोल देश भर में अनिवार्य किया गया हो, पिछले वर्ष यानी जून के आसपास से ही ऑलमोस्ट 90% पेट्रोल पंप देश में E20 पेट्रोल ही बेच रहे थे। अब आपको ये बात तो पता ही होगी कि हमें अपना पेट्रोल डीजल विदेशों से कच्चे तेल के रूप में मिलता है।
हम उसे रिफाइन करके पेट्रोल, डीजल, केरोसिन और बाक़ी पेट्रोल बनाते हैं। लेकिन ऐसा नहीं है कि एक लीटर क्रूड से सारा पेट्रोल ही बनाया जाता है। बल्कि PPAC कहती है कि हमारे यहाँ जितना भी क्रूड रिफाइन किया जाता है, उसका लगभग 15 से 17% ही पेट्रोल बनता है। बाक़ी से डीजल और केरोसिन, बिटूमिन जैसे प्रोडक्ट्स बनते हैं।
तो अब इस 6200 करोड़ लीटर पेट्रोल के लिए अनुमान के अनुसार हमें 2025-26 में लगभग 30,400 करोड़ लीटर कच्चे तेल की जरूरत पड़ती। लेकिन यहाँ भी एक पेंच है। इस 30,400 करोड़ लीटर में से लगभग 12% क्रूड हम ख़ुद प्रोड्यूस करते हैं और बाक़ी का लगभग 88-89% हमें इंपोर्ट करना पड़ता है।
तो अब हमारी क्रूड की जरूरत बचती है 26,920 करोड़ लीटर। यानी हमें अपने पूरे साल के पेट्रोल के कंजम्पशन के लिए इतना क्रूड मंगवाना पड़ता और इसे रिफाइन करके हमारा वो 6200 करोड़ लीटर पेट्रोल बनता। और यहीं से होती है उस इंसेटिव की एंट्री जिसके चलते सरकार इथेनॉल के समर्थन में है।
साल 2025-26 में क्रूड का भाव ऊपर नीचे हुआ लेकिन कुछ खास नहीं। PPAC हर महीने हमें क्रूड का रेट क्या पड़ा इसका डेटा देती है, इसे इंडियन क्रूड बास्केट कहते है। तो इसके हिसाब से 2025-26 में औसतन हर महीने हमारे लिए क्रूड का रेट 66 डॉलर 50 सेंट था।
हम अगर 6200 करोड़ लीटर प्योर पेट्रोल बना रहे होते तो हमें इस 26920 करोड़ लीटर क्रूड के लिए विदेशों को लगभग 112 बिलियन डॉलर यानी ₹9.43 लाख करोड़ रुपए देने होते। यानी हमारे विदेशी मुद्रा भंडार से 112 बिलियन जाते।
लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ऐसा क्यों नहीं हुआ? क्योंकि हमने 20% एथनॉल मिक्स करने का फैसला लिया। अब पेट्रोल के लिए इंपोर्टेड क्रूड की रिक्वायरमेंट घट कर आ गई लगभग 21,000 करोड़ लीटर पर। और इसके इंपोर्ट के लिए हमें देने पड़े लगभग 20% कम यानी 87.7 बिलियन डॉलर, रुपयों में कहें तो ₹7.3 लाख करोड़।
अब आपको डिफरेंस समझ में आया होगा। ये भी समझ आया होगा कि सरकार आख़िर क्यों तेजी से 20% एथनॉल मिक्सिंग को लेकर कदम उठा रही। क्योंकि इस कदम से सीधे तौर पर लगभग 25 बिलियन डॉलर या फिर लगभग 1.9 लाख करोड़ रुपए की बचत भारत को एक साल में हुई। ये पैसा भारत से बाहर नहीं गया क्योंकि हमें अपने देश में बना एथनॉल यहाँ पेट्रोल में मिक्स किया।
और ये बचत हर साल होगी, अगर एथनॉल का परसेंटेज नीचे नहीं लाया गया। पेट्रोल में एथनॉल का परसेंटेज बढ़ने पर ये बचत और बढ़ेगी। लेकिन अभी हमारा एक सवाल बाक़ी है, और वो है कि अगर एथनॉल से इतना ही फ़ायदा हुआ तो आख़िर कंज्यूमर को वही पुराने रेट्स पर आख़िर पेट्रोल क्यों बेचा जा रहा है?
इसके दो जवाब हैं। पहला जवाब है कि एथनॉल की मिस्किंग पेट्रोल में इसलिए की गई है ताकि उस 20% पेट्रोल के लिए हमें क्रूड इंपोर्ट ना करना पड़े, यानी हम इंपोर्ट सब्स्टिटूशन करें। ऐसे समझिए कि कोई चीज हमें विदेश से इंपोर्ट करनी पड़ती थी और अब उसकी जगह वो देश में ही बन रही है।
इसका मतलब ये नहीं हुआ कि वो सस्ती हो जाएगी। तो ऐसे में एथनौल की पूरी कवायद का सीधा फ़ोकस डॉलर देश से बाहर जाने से रोकना है ना कि पेट्रोल सस्ता करना। और पेट्रोल के प्राइस अब भी उसी 80% असली पेट्रोल के भाव से ही तय होंगे। इसीलिए आपको एथनॉल मिक्स पेट्रोल भी सस्ता नहीं पड़ता।
दूसरा जवाब है एथनॉल ख़ुद कोई बहुत सस्ती चीज नहीं है। बल्कि एक लीटर एथनॉल की कॉस्ट लगभग 55-75 रुपए के बीच में होती है, ये पूरी तरह डिपेंड करता है कि कौन से फीड से एथनॉल बन रहा है, जैसे गन्ने से बना एथनॉल सस्ता पड़ता है, मक्के से बना एथनॉल महंगा पड़ता है।
तो ऐसे में स्पष्ट है कि एथनॉल भी देश की तेल विपणन कंपनियों को कोई खास सस्ता नहीं पड़ रहा। बस फ़ायदा ये है कि उन्हें क्रूड कम इंपोर्ट करना पड़ रहा है और साथ ही जो पैसा खर्च भी हो रहा है वो देश के भीतर ही हो रहा है। अंत में बात ये है कि एथनॉल मिक्स करने का सीधा फ़ायदा इंपोर्ट बिल से है।
और सरकार ने तो ख़ुद कहा है कि उसे अब तक लगभग ₹1.84 लाख करोड़ की बचत हुई है और मैंने आपको अपनी कैलकुलेशन बताई है।
अब 25 बिलियन डॉलर अगर बच रहे हैं तो आख़िर सरकार क्यों ही एथनॉल पर कदम वापस लेगी? आपको भी ये गणित जरूर समझ में आ गई होगी। ऐसी ही और इंट्रेस्टिंग वीडियोज देखने के लिए सब्सक्राइब करें ओपिण्डिया।




