अगर कोई ये कहे कि शेर, हिरन को प्रोटेक्ट कर रहा है, वो उसके लिए लड़ाई लड़ रहा है तो ये बात किसी को भी नहीं पचेगी है ना? ऐसे ही ब्लूमबर्ग ये कह रहा है कि चीन बौद्ध धर्म के लिए लड़ रहा है तो ये बात भी सुनने में कुछ अटपटी लगती है जबकि चीन तो इसके उलट करता है क्या करता है व आगे वीडियो में बताऊंगा लेकिन उससे पहले हम थोड़ा तिब्बत के बारे में जान लेते हैं।
तिब्बत के सर्वोच्च धार्मिक नेता और एक समय पर सबसे बड़े राजनीतिक नेता दलाई लामा तेनजिन ग्यात्सो जिनका नाम है… जिनके उत्तराधिकार को लेकर तिब्बत, चीन, भारत और हमारे पड़ोसी देश नेपाल, भूटान से लेकर अमेरिका तक और बाकी की कंट्रीज जहां-जहां तिब्बतेन रिफ्यूजी हैं या फिर बुद्धिस्ट हैं, वहां इस बात की चर्चा अब बहुत तेजी से होने लगी है कि 14वें दलाई लामा का उत्तराधिकारी आखिर किस देश में या किस रीजन में या फिर किस जगह पर जन्म लेंगे।
जन्म लेंगे से मेरा मतलब ये है कि तिब्बत का जो बौद्ध धर्म है, उसमें दलाई लामा अपनी मर्जी से लोगों के उद्धार, उनकी सेवा, उनके मार्गदर्शन के लिए बार-बार अवतार लेते हैं। इन्हें करुणा के बोधिसत्व चेनरेजिग का अवतार माना जाता है।
इसे अगर आपको और आसान भाषा में समझना हो तो जैसे अपने यहां भगवान विष्णु अलग-अलग युगों में अलग-अलग रूपों में धरती पर अवतार लेते आए हैं। आज के समय में ये कुछ-कुछ वैसा ही है।
अब आपको बेसिक समझ में आ गया होगा कि तिब्बतेन बुद्धिज्म में दलाई लामा का अब तक 14 बार पुनर्जन्म हो चुका है और अब चूंकि 14वें दलाई लामा तेनजिन ग्यात्सो की उम्र धीरे-धीरे बढ़ रही है, इसका सीधा मतलब ये है कि जब उनका ये शरीर इस दुनिया में नहीं रहेगा तो 15वां दलाई लामा कौन होगा? कौन होगा इससे भी बड़ा प्रश्न है ये है कि कहां होगा? क्योंकि ये आने वाले समय में तिब्बत के बौद्ध धर्म का भविष्य तय करेगा।
ये बात तो हम सभी जानते हैं कि तिब्बत पर चीन का कब्जा है और हम ये बात भी जानते हैं कि चीन एक कम्युनिस्ट देश है जिसका मतलब ये है कि वो ना तो किसी धर्म में मानता है और ना ही वो पुनर्जन्म या अवतार में… लेकिन फिर भी चीन ये चाहता है कि 15वां दलाई लामा उसके मतलब का हो, जो उसका खाता हो, उसका पीता हो, उसकी सुनता हो, उसकी बोली बोलता है, उसका गुणगान गाता हो बेसिकली चार शब्दों में आपको बताऊं तो जो उसका पपेट हो। इसका मतलब है कि उस दलाई लामा का ना बुद्धिज्म से कोई लेना-देना होगा और ना ही तिब्बत से वो बस एक चाइनीज कम्युनिस्ट धर्म गुरु होगा और जैसा कि मैंने पहले भी बताया कि धर्म से कम्युनिस्ट चीन का दूर-दूर तक कोई नाता ही नहीं है।
फिर भी चीन ये कोशिश कर रहा है कि दलाई लामा उसकी सहूलियत का हो। अब ये सवाल उठ सकता है कि आखिर चीन ऐसा क्यों करना चाहता है तो इसका जवाब ये है कि चीन ने तिब्बत की जमीन पर तो कब्जा कर लिया है लेकिन वो अब तक तिब्बत की आत्मा पर कब्जा नहीं कर पाया है।
तिब्बत की आत्मा बौद्ध धर्म है, उसकी संस्कृति, उसकी परंपरा है, तिब्बत और दुनिया भर में फैले उसके लोग हैं और इनके सर्वोच्च नेता कौन हैं? दलाई लामा… और अगर वो इस पद पर कब्जा कर लेता है तो वो तिब्बत की भूमि के साथ उसकी आत्मा पर भी कब्जा कर लेगा और परिणाम क्या होगा? इसको मैं आगे आपको बताऊंगा लेकिन उससे पहले ये जानना जरूरी है कि चीन आखिर ऐसा क्या कर रहा है? मैं ये वीडियो क्यों बना रहा हूं और आप ये वीडियो क्यों देख रहे हैं? उसके लिए आप इस आर्टिकल की ये हेडिंग देखिए।
हिंदी में इसे ट्रांसलेट करें तो दलाई लामा के उत्तराधिकार से पहले बौद्ध धर्म को लेकर चीन और भारत के बीच प्रतिस्पर्धा। यानी चीन और भारत इनके बीच बौद्ध धर्म को लेकर एक राइवलरी चल रही है।
बाद में ब्लूमबर्ग इस हेडिंग को भी बदल देता है, The Rivalry Over Buddhism’s Future. बौद्ध धर्म के भविष्य की लड़ाई।
इस आर्टिकल में नेपाल का बहुत बार जिक्र है कि चीन नेपाल में बुद्धिज्म के लिए इन्वेस्ट कर रहा है और इस मामले में भारत कमजोर पड़ा है। मतलब भारत तिब्बेतन बुद्धिज्म को उतना ओन नहीं कर पाया है, फाइनेंस के लेवल पर हो, डिप्लोमेसी के लेवल पर हो या उसे एक्नॉलेज करने के लेवल पर हो जबकि चीन का पलड़ा भारत के मुकाबले भारी दिख रहा है, ऐसा इस आर्टिकल का टोन है।
ब्लूमबर्ग भी शायद ये जानता होगा कि चीन बुद्धिज्म के लिए नहीं लड़ रहा है बल्कि वो तो उसके खिलाफ लड़ रहा है लेकिन ब्लूमबर्ग की अपनी मजबूरी होगी जैसे कि पहले भी आरोप लगे हैं कि उसे चीन में अपने बिजनेस इंटरेस्ट बचाने के लिए कुछ इन्वेस्टिगेटिव्स रिपोर्ट्स रोकनी पड़ी थी।
खैर, तो सवाल ये है कि एक कम्युनिस्ट देश आखिर बुद्धिज्म के लिए कैसे लड़ सकता है? ये तो वही शेर, हिरन वाली बात हुई।
अब रही भारत की बात तो ऐतिहासिक रूप से अगर हम देखें तो बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति भारत में हुई थी और भारत से ही बौद्ध धर्म तिब्बत गया है और खुद दलाई लामा भी ये बात कहते हैं कि “मैं भारतीयों को गुरु मानता हूं और हम तिब्बती उनके चेले हैं। मूल रूप से हमने आपसे ही सीखा है।”
14वें दलाई लामा स्वयं भारत में हैं। धर्मशाला से निर्वासित तिब्बती सरकार चलती है और बिना किसी भारतीय हस्तक्षेप के… चीन का कोई नियंत्रण नहीं, कोई दबाव नहीं।
जबकि चीन क्या कर रहा है… मैं आपको उसके कुछ एग्जाम्पल दूंगा। अब चूंकि तिब्बत पर चीन का कब्जा है तो इस महीने की पहली तारीख यानी 1 जुलाई, 2026 से चीन ने एथनिक यूनिटी कानून लागू कर दिया है।
इसके मुताबिक, तिब्बत क्षेत्र में 18 साल से कम उम्र का कोई भी बच्चा बौद्ध मठों में दाखिला नहीं ले सकता या फिर धार्मिक शिक्षा नहीं ले सकता। तिब्बत में मठों के बाहर चीनी सुरक्षाकर्मियों को तैनात किया गया है, जिनका काम है अंदर जाने का प्रयास कर रहे बच्चों को रोकना।
इसका मतलब ये है कि भविष्य में नए बौद्ध भिक्षु तैयार होना बंद हो जाएंगे, जिससे सदियों पुरानी मठों की परंपरा खत्म होने की कगार पर आ जाएगी। जबकि मठ तिब्बत की आत्मा हैं, ये तिब्बती समाज के आध्यात्मिक स्तंभ हैं और जब बौद्ध भिक्षु नहीं होंगे तो फिर बुद्धिज्म कहां बच पाएगा।
चीन तिब्बत की भाषा उसकी संस्कृति और उसके अपने एजुकेशन सिस्टम पर लगातार हमला कर रहा है। वो कई छोटे बौद्ध भिक्षुओं को जबरन मठों से निकालकर सरकारी बोर्डिंग स्कूलों में भेजा रहा है ताकि वे बचपन से ही कम्युनिस्ट विचारधारा सीखें।
मान लीजिए, तिब्बत में फलाणे लामा का पुनर्जन्म हुआ है तो चीन ने नए पुनर्जन्मी लामाओं की पहचान करने पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए गए हैं और कई भिक्षुओं को तो मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना देकर मठ छोड़ने पर मजबूर किया जा रहा है।
पंचेन लामा का एक बड़ा उदाहरण हमारे सामने है। 14 मई 1995 को दलाई लामा ने गेंडुन चोक्यी नीमा को 11वें पंचेन लामा की मान्यता दी और 17 मई 1995 को, जब वो केवल 6 साल के थे उन्हें चीनी की कम्युनिस्ट सरकार ने अगवा कर लिया और वो तब से गायब हैं, उनके परिवार का भी कोई पता नहीं है कि वो कहां है? धर्मशाला अगर आप जाएंगे तो वहां दलाई लामा मंदिर है… जहां हर जगह आपको पंचेन लामा को रिलीज किए जाने के पोस्टर देखने को मिलेंगे। पंचेन लामा तिब्बती बौद्ध परंपरा में दलाई लामा के बाद एक बड़ा पद माना जाता है और वो दलाई लामा के बड़े प्रिय भी माने जाते हैं।
तिब्बत के स्कूलों में तिब्बती की जगह चीनी भाषा मैंडरिन में पढ़ाई अनिवार्य की जा रही है। सरकारी बोर्डिंग स्कूलों में पढ़ने वाले तिब्बती बच्चों को छुट्टियों के दिनों में भी अपने घर जाने या धार्मिक त्योहारों में शामिल होने की इजाजत नहीं है, ताकि वे अपनी संस्कृति भूल जाएं। जो बच्चे घर जाते हैं उनके परिवार को ये हिदायत दी जाती है कि वो घर में भी चीनी भाषा में बात करें, तिब्बती में नहीं।
इंटरनेट और सोशल मीडिया पर जो लोग तिब्बती भाषा को बचाने की बात करते हैं, उन्हें जेल में डाला जा रहा है… या फिर सेंसर किया जा रहा है। पूरे तिब्बत में एक समय आएगा जब तिब्बती भाषा ही नहीं बचेगी, तो उस भाषा में लिखे गए प्राचीन बौद्ध ग्रंथों, दर्शन और शास्त्रों को पढ़ने और समझने वाला कम से कम वहां पर तो कोई नहीं रहेगा।
चीन ने दलाई लामा की तस्वीरों, उनसे जुड़ी किताबों और यहां तक कि उनका नाम लेने पर भी पाबंदी लगाई हुई थी। चीन में बौद्ध धर्म से जुड़े चिन्हों या प्रतीकों या चित्रों के साथ कम्युनिस्ट नेताओं की फोटोज लगवाई जाती हैं।
चीन में मठों पर कार्रवाई होती है। एक रिपोर्ट कहती है कि चीन में 6 हजार से ज्यादा मठों को तोड़ा गया है और बीते साल 600 से ज्यादा बौद्ध मठों को चीन ने जमींदोज किया है। चीन ऐसा इसलिए भी कर रहा है कि क्योंकि चीन मठों को दबाकर किसी भी संभावित विद्रोह को हमेशा के लिए कुचलना चाहता है।
कई बार ये देखने को मिला है कि तिब्बत में चीन के खिलाफ शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन हुए हैं जिनमें बौद्ध भिक्षुओं और भिक्षुणियों ने मुख्य भूमिका निभाई है, उन्होंने आत्मदाह किया है, अपने जीवित शरीर को आग लगाई है, ठीक वैसे ही जैसे न्यूयॉर्क में 3 जुलाई को तिब्बतेन एक्टिविस्ट लोगा रांगजेन ने तिब्बत की आजादी के लिए खुद को आग लगा दी। तो ये तिब्बत की बदकिस्मती है और चीन का सच है।
अब मैं दोबारा अपनी बात को रिपीट कर रहा हूं कि चीन के उलट भारत में दलाई लामा सुरक्षित हैं, निर्वासित तिब्बती प्रशासन यहां से बहुत बेहतर काम करता है, उनकी पार्लियामेंट धर्मशाला में मौजूद हैं, उनके मंत्रालय, विभाग यहां मौजूद हैं, प्रधानमंत्री यहां बैठते हैं। तिब्बती बौद्ध मठ और विद्यालय भारत के अलग-अलग हिस्सों में संचालित होते हैं और हजारों तिब्बती बच्चे अपनी परंपरा के अनुसार शिक्षा प्राप्त करते हैं। यानी भारत ने तिब्बती बौद्ध विरासत को सुरक्षित रखने की बहुत बड़ी और अहम भूमिका निभाई है।
चीन बुद्धिज्म पर नियंत्रण चाहता है ताकि उसका तिब्बत पर हर तरह से पूरा कब्जा हो और उसके पॉलिटिकल एंबीसन पूरे हों। चीन अपनी पसंद का धार्मिक नेतृत्व स्थापित कर तिब्बत की स्वतंत्र पहचान को कमजोर करना चाहता है, उसे मिटा देना चाहता जबकि तिब्बती समुदाय अपनी आस्था, संस्कृति और परंपरा को बचाए रखने के संघर्ष में लगा हुआ है।
ये बुद्धिज्म को बचाने के लिए चीन की लड़ाई नहीं है। इसलिए ब्लूमबर्ग जैसे मीडिया संस्थान या कोई भी इसे एक खांचे में नहीं ढाल सकते हैं कि चीन और भारत बुद्धिज्म के लिए लड़ रहे हैं। भारत और तिब्बत के लिए बौद्ध धर्म एक साझी विरासत है और हम उसे बचाए रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं जबकि चीन तो उस विरासत को ही खत्म करने में लगा हुआ है।






